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Class 9 Hindi मैं और मेरा देश Extra Question Answer
Class 9 Hindi Chapter 7 मैं और मेरा देश Extra Question Answer
मैं और मेरा देश Extra Question Answer लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को फल क्यों भेंट किए?
उत्तर:
जब जापानी युवक ने सुना कि स्वामी जी को फल नहीं मिल रहे और वे कह रहे हैं कि “शायद जापान में अच्छे फल नहीं मिलते”, तो उसे लगा कि इससे उसके देश की प्रतिष्ठा कम हो रही है। अपने देश के गौरव को बचाने के लिए उसने भागकर ताज़े फल लाकर स्वामी जी को भेंट किए।
प्रश्न 2.
पुस्तकालय से चित्र चुराने वाले विदेशी विद्यार्थी को क्या सजा मिली?
उत्तर:
उस विद्यार्थी को न केवल पुस्तकालय और देश से बाहर निकाला गया, बल्कि पुस्तकालय के बाहर एक नोटिस लगा दिया गया कि उस देश का कोई भी नागरिक उस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता। एक व्यक्ति की गलती की सजा पूरे देश को मिली।
प्रश्न 3.
लेखक के अनुसार ‘सच्चा देशप्रेम’ क्या है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार, ऊँचे स्वर में केवल नारे लगाना देशप्रेम नहीं है, बल्कि अपने दैनिक व्यवहार, स्वच्छता बनाए रखना, नियमों का पालन करना और शिष्टाचार दिखाना ही सच्चा देशप्रेम है, क्योंकि इससे देश की छवि सुधरती है।
प्रश्न 4.
महान कमालपाशा ने देहाती बूढ़े का उपहार क्यों स्वीकार किया?
उत्तर:
महान कमालपाशा ने देहाती बूढ़े का उपहार इसलिए स्वीकार किया क्योंकि उसने उसे बड़े प्रेम से भेंट किया था। उस उपहार में कमालपाशा को बूढ़े व्यक्ति के हृदय की शुद्ध भावना दिखाई दी।
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प्रश्न 5.
अपने देश को ‘हीन’ और दूसरे देश को ‘श्रेष्ठ’ सिद्ध करना-ऐसा हम कब कर रहे होते हैं?
उत्तर:
जब हम किसी देश से अपने देश की तुलना करते हैं, तो अपने देश को हीन तथा दूसरे देश को श्रेष्ठ सिद्ध साबित करते हैं। जब हम सार्वजनिक स्थानों; जैसे-रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, क्लब आदि में अपने देश की कमजोरियों व कमियों का वर्णन करते हैं और दूसरे देश की तुलना में अपने देश को ‘हीन’ कहते हैं और दूसरे देश को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं, तब हम देश के शक्ति बोध को चोट पहुँचा रहे होते हैं।
प्रश्न 6.
हम ऐसा क्या कर सकते हैं जिससे हमारे देश की सुरुचि और सौंदर्य को ठेस न पहुँचे?
उत्तर:
यदि हम अपने घर की गंदगी सड़क पर फेंकते हैं या उसे उसके स्थान पर नहीं फेंकते हैं, अपने मुँह से अपशब्द निकालते हैं, अपने आस-पास की जगह को थूक या पीक से गंदा करते हैं, तो हम अपने देश के सौंदर्य बोध को ठेस पहुँचा रहे हैं। हमें इस प्रकार के कार्यों को नहीं करना चाहिए तथा यदि कोई कर रहा है, तो उसे रोकना चाहिए।
Class 9 Hindi Chapter 7 Extra Questions and Answers दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
‘मैं और मेरा देश दो अलग चीजें नहीं हैं।’ लेखक ने इस कथन के माध्यम से क्या संदेश दिया है? सविस्तार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस कथन के माध्यम से लेखक यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि नागरिक और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस प्रकार शरीर का एक अंग बीमार हो तो पूरा शरीर प्रभावित होता है, वैसे ही एक नागरिक का बुरा व्यवहार पूरे देश का सिर शर्म से झुका देता है और एक नागरिक का अच्छा कार्य देश को ऊँचाइयों पर ले जाता है। व्यक्ति की पहचान उसके देश से होती है, इसलिए वह जो भी करता है, वह उसके देश की प्रतिष्ठा से जुड़ जाता है। हमें यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि हमारे अकेले के गलत कार्य से देश का क्या बिगड़ेगा।
प्रश्न 2.
पाठ में वर्णित स्वामी रामतीर्थ और विदेशी विद्यार्थी के उदाहरणों की तुलना कीजिए। इनसे हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर:
ये दोनों उदाहरण एक-दूसरे के विपरीत हैं। जापानी युवक ने निस्वार्थ भाव से अपने देश का मान बढ़ाया, जबकि विदेशी विद्यार्थी ने अपनी चोरी से अपने पूरे देश को अपमानित करवाया। स्वामी रामतीर्थ वाला प्रसंग हमें सिखाता है कि हम अपनी छोटी-छोटी सेवाओं से भी देश के गौरव को सातवें आसमान पर पहुँचा सकते हैं। वहीं दूसरा प्रसंग हमें सचेत करता है कि हमारा अनुचित व्यवहार (जैसे चोरी, नियम तोड़ना, गंदगी फैलाना) हमारे देश पर कलंक लगा सकता। अतः हमें हमेशा ऐसा आचरण करना चाहिए जिससे देश का मस्तक ऊँचा रहे।
प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए-
महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति का आशय है कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। अगर कार्य करने के पीछे अच्छी भावना होती है तो कोई छोटे से छोटा कार्य भी महान बन जाता है। इसके विपरीत बुरी भावना के साथ किया गया बड़े से बड़ा कार्य भी हीन बन जाता है। अतः इसलिए कहा गया है कि जीवन में महत्त्व कार्य के छोटे-बड़े से नहीं होता है, उसका महत्त्व तो काम करने की भावना से होता है। बड़े से बड़ा कार्य भी तुच्छ श्रेणी का बन जाएगा, यदि उसके पीछे कर्ता की भावना पवित्र एवं महान नहीं है।
प्रश्न 4.
‘मैं और मेरा देश’ निबंध के माध्यम से लेखक समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तर:
यह पाठ हमें यह सिखाता है कि ‘मैं’ और ‘मेरा देश’ एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। देश अपने नागरिकों से मिलकर बनता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के विचार, व्यवहार और कर्म देश की प्रगति को प्रभावित करते हैं।
यदि हम ईमानदारी, परिश्रम और अनुशासन के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तो देश स्वतः ही उन्नति की ओर बढ़ता है।
देश के लिए किया गया हर छोटा-बड़ा कार्य महत्वपूर्ण होता है । इस प्रकार हम सब मिलकर अपने देश को सम्मानित, स्वतंत्र और खुशहाल बना सकते हैं।
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Class 9 Ganga Chapter 7 Extra Question Answer दक्षता आधारित प्रश्नोत्तर
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
प्रश्न 1.
‘जापानी युवक और विदेशी विद्यार्थी की कहानियाँ केवल व्यक्तिगत आचरण के उदाहरण नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्रीय छवि के निर्माण की प्रक्रिया को दर्शाती हैं।’ पाठ के आलोक में इस कथन का विश्लेषण कीजिए कि किस प्रकार एक नागरिक का सूक्ष्म व्यवहार वैश्विक स्तर पर उसके देश की पहचान निर्धारित करता है।
उत्तर:
- जापानी युवक ने किसी नारे या भाषण से नहीं, बल्कि एक छोटे से ‘सेवा भाव’ से अपने देश की गरिमा को विदेशी अतिथि की नजरों में ऊँचा किया। यह नागरिक की देश के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है।
- विदेशी विद्यार्थी की एक ‘निजी चोरी’ ने न केवल उसे दंडित करवाया, बल्कि उसके पूरे देश के नागरिकों के लिए पुस्तकालय के द्वार बंद करवा दिए। यह सिद्ध करता है कि विश्व मंच पर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत पहचान से पहले अपने ‘देश’ के नाम से जाना जाता है।
- प्रत्येक नागरिक अपने देश का एक चलता-फिरता प्रतिनिधि होता है। सार्वजनिक स्थानों पर हमारा शिष्टाचार, समय की पाबंदी और स्वच्छता के प्रति जागरूकता ही वास्तव में राष्ट्र निर्माण की पहली सीढ़ी है।
- व्यक्ति और राष्ट्र का संबंध ‘अविभाज्य’ है; इसलिए हमें अपनी हर क्रिया को देश के मान-सम्मान की कसौटी पर कसना चाहिए।
प्रश्न 2.
लाला लाजपत राय के अनुभव को लेखक ने ‘मानसिक भूकंप’ कहा है। इस प्रसंग के आधार पर समझाइए कि किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता और सम्मान व्यक्ति के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
लाला लाजपत राय जी की विदेश यात्राओं के दौरान भारत की गुलामी के अनुभव ने लेखक को हिला दिया। उसे ही उन्होंने मानसिक भूकंप कहा है। मानसिक भूकंप से अभिप्राय मानसिक विचारों और विश्वासों में हलचल उत्पन्न होना है। लाला लाजपत राय जी ने लेखक को बताया कि उनकी विदेशी यात्राओं के दौरान भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक उनके माथे पर लगा रहा। वे दुनिया के कई बड़े देशों में गए, लेकिन जहाँ भी गए, भारतवर्ष की गुलामी की शर्म उनके साथ रही। इस अनुभव ने लेखक को एहसास कराया कि जब तक देश स्वतंत्र नहीं है, व्यक्तिगत खुशियों और सफलताओं का कोई महत्त्व नहीं है। इससे लेखक को अपनी पूर्णता अपूर्ण लगने लगी। किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता और सम्मान व्यक्ति के जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं। जब देश स्वतंत्र और सम्मानित होता है, तब उसके नागरिक आत्मगौरव और सम्मान के साथ जीवन जीते हैं।
मैं और मेरा देश Extra Questions विषयवस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए
प्रश्न 1.
लेखक ने अपने बचपन के संदर्भ में ‘पड़ोस’ के महत्त्व को किस रूप में वर्णित किया है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार, उनका व्यक्तित्व केवल उनके घर तक सीमित नहीं था, बल्कि वे अपने पड़ोस में खेलकर और पड़ोसियों की ममता व दुलार पाकर बड़े हुए। उनके लिए पड़ोस एक बड़े परिवार की तरह था, जहाँ पारस्परिक प्रेम और सहयोग की भावना कूट-कूट कर भरी थी। इसी आत्मीय वातावरण ने उनके सामाजिक चरित्र और मानवीय दृष्टिकोण का निर्माण किया। लेखक मानते हैं कि पड़ोसियों के बीच का यह गहरा संबंध ही राष्ट्र की एकता और प्रेम की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण आधारशिला होती है।
प्रश्न 2.
स्वामी रामतीर्थ ने जापान की यात्रा के दौरान फलों की कमी पर क्या टिप्पणी की थी? इस टिप्पणी का जापानी नागरिक पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
स्वामी रामतीर्थ को जब जापान में किसी स्टेशन पर अच्छे फल नहीं मिले, तो उन्होंने सहज भाव से कह दिया – “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते।” उनकी यह टिप्पणी किसी आलोचना के लिए नहीं, बल्कि एक साधारण यात्री की सामान्य निराशा थी। हालाँकि एक जापानी युवक ने इसे अपने देश के सम्मान पर चोट माना। उसने तुरंत स्वामी जी को ताजे फल भेंट किए ताकि विदेशी मेहमान के मन में जापान के प्रति कोई गलत धारणा न रहे। यह छोटी-सी घटना नागरिक की देश के प्रति सजगता को दर्शाती है।
प्रश्न 3.
जापानी युवक ने स्वामी जी के सामने ताजे फलों की टोकरी रखकर क्या सिद्ध किया?
उत्तर:
युवक ने ताजे फलों की टोकरी भेंट करके यह सिद्ध किया कि राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक अपने देश का चलता-फिरता विज्ञापन और रक्षक होता है। उसने स्वामी जी के कहे वचनों का शब्दों से विरोध नहीं किया, बल्कि अपने श्रेष्ठ कर्म से देश की हीनता को दूर कर दिया। उसने दिखाया कि एक साधारण नागरिक भी अपने आचरण से पूरे राष्ट्र की प्रतिष्ठा को ऊँचा उठा सकता है। युवक की इस क्रिया ने यह संदेश दिया कि देश के गौरव की रक्षा के लिए बड़े पद की नहीं, बल्कि बड़ी सोच की आवश्यकता है।
प्रश्न 4.
‘मैं अपने देश का प्रतिनिधि हूँ – लेखक ने इस भाव को क्यों महत्त्वपूर्ण माना है?
उत्तर:
लेखक का मानना है कि हम जहाँ भी जाते हैं, अपनी पहचान के साथ-साथ अपने राष्ट्र की अदृश्य छवि भी साथ लेकर चलते हैं। यदि हम अशिष्ट व्यवहार करते हैं, तो लोग हमें व्यक्तिगत रूप से बुरा नहीं कहते, बल्कि हमारे पूरे देश की आलोचना करते हैं। स्वयं को देश का प्रतिनिधि समझना हमें एक जिम्मेदार नागरिक बनाता है और हमारे आचरण को मर्यादित करता है। यह बोध व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठाकर राष्ट्रहित में कार्य करने के लिए निरंतर प्रेरित करता रहता है।
प्रश्न 5.
पुस्तकालय से चित्र फाड़ने वाले विद्यार्थी की घटना से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:
इस घटना से यह शिक्षा मिलती है कि एक व्यक्ति का अनैतिक कार्य पूरे समुदाय या राष्ट्र के लिए अपमान और तिरस्कार का कारण बन सकता है। उस विद्यार्थी की एक छोटी सी चोरी ने उसके देश के सभी छात्रों के लिए जापानी पुस्तकालय के दरवाजे हमेशा के लिए बंद करवा दिए। यह घटना ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ के सिद्धांत को बहुत प्रभावी ढंग से स्पष्ट करती है। हम जो भी गलत कार्य करते हैं, उसका दंड केवल हमें ही नहीं, बल्कि हमारे देश की प्रतिष्ठा को भी भोगना पड़ता है।
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प्रश्न 6.
लेखक के अनुसार नागरिक का ‘अशिष्ट आचरण’ देश के लिए कैसे हानिकारक है?
उत्तर:
जब कोई नागरिक सार्वजनिक स्थानों पर नियमों का उल्लंघन करता है या अभद्र व्यवहार करता है, तो वह देश की गरिमा को धूल में मिला देता है। इससे विदेशी पर्यटकों के मन में देश के प्रति सम्मान कम होता है और राष्ट्र की छवि एक ‘असभ्य राष्ट्र’ की बन जाती है। अशिष्टता नागरिक के चरित्र के साथ-साथ राष्ट्र के सांस्कृतिक स्तर को भी विश्व मंच पर नीचा दिखाती है। लेखक के अनुसार, शिष्टाचार का अभाव ही वह कलंक है, जो राष्ट्र के मस्तक को पूरी दुनिया के सामने झुका देता है।
प्रश्न 7.
लेखक ने ‘मैं और मेरा देश’ के संबंधों को किस प्रकार गहराई से स्थापित किया है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार व्यक्ति की पूर्णता केवल उसकी निजता में नहीं है, बल्कि वह अपने परिवार, समाज और राष्ट्र की पहचान से जुड़ा है। जैसे बूँद से सागर बनता है, वैसे ही नागरिकों के व्यक्तिगत आचरण के योग से ही राष्ट्र का स्वरूप निर्मित होता है। हम जो भी कार्य करते हैं, वह हमारे नाम के साथ-साथ हमारे देश के नाम को भी प्रभावित करता है। लेखक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि नागरिक का हर छोटा- 1-बड़ा कदम राष्ट्र की
गरिमा का हिस्सा होता है।
प्रश्न 8.
लेखक ने ‘शक्ति-बोध’ और ‘सौंदर्य बोध’ को राष्ट्र के लिए क्यों अनिवार्य माना है?
उत्तर:
‘शक्ति-बोध’ से नागरिकों में आत्मविश्वास और सुरक्षा का भाव आता है, जिससे वे राष्ट्र की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। वहीं ‘सौंदर्य बोध’ से सामाजिक जीवन में शालीनता, अनुशासन और कलात्मकता आती है।
इन दोनों तत्त्वों के बिना कोई भी राष्ट्र विश्व मंच पर न तो शक्तिशाली बन सकता है और न ही पूर्ण विकसित। ये दोनों बोध नागरिक के चरित्र को मजबूत करते हैं और राष्ट्र को आंतरिक व बाहरी रूप से सुदृढ़ बनाते हैं। इनके अभाव में राष्ट्र अपनी पहचान और गौरव खोकर भीतर से खोखला होने लगता है।
प्रश्न 9.
सार्वजनिक स्थानों पर थूकना या गंदगी फैलाना लेखक की दृष्टि में क्या है?
उत्तर:
लेखक इसे एक गंभीर राष्ट्रीय अपराध और नागरिकों के चारित्रिक दोष के रूप में देखते हैं। यह आचरण दर्शाता है कि नागरिक में सार्वजनिक उत्तरदायित्व और सामाजिक संवेदनशीलता की भारी कमी है। ऐसी गंदी आदतें न केवल बीमारियाँ फैलाती हैं, बल्कि हमारे राष्ट्रीय ‘सौंदर्य-बोध’ को भी वैश्विक स्तर पर कलंकित करती हैं। लेखक के अनुसार, स्वच्छता के प्रति यह उदासीनता हमारे देश को पिछड़ा और असभ्य साबित करने के लिए पर्याप्त है।
प्रश्न 10.
लेखक ने ‘कतार’ में खड़े होने को नागरिकता का गुण क्यों बताया है?
उत्तर:
कतार में खड़ा होना अनुशासन, धैर्य और दूसरों के अधिकारों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का एक माध्यम है। जो व्यक्ति कतार तोड़ता है, वह न केवल व्यवस्था बिगाड़ता है, बल्कि स्वार्थी और अशिष्ट भी कहलाता है। अनुशासित नागरिकता ही एक व्यवस्थित, सभ्य और न्यायप्रिय समाज की सबसे अनिवार्य आधारशिला है। कतार में अपनी बारी की प्रतीक्षा करना यह दर्शाता है कि नागरिक नियमों का पालन करने में गर्व महसूस करता है।
प्रश्न 11.
लाला लाजपत राय के अनुभव ने लेखक की पूर्णता को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर:
लाला लाजपत राय के प्रेरक अनुभवों और राष्ट्रवादी विचारों ने लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के जीवन दर्शन को एक नई दिशा प्रदान की, जिससे उनके व्यक्तित्व में ‘पूर्णता’ का संचार हुआ। लाला जी के इस सिद्धांत ने कि ‘अपने जन्मसिद्ध अधिकारों की रक्षा करना हर नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य है’, लेखक को एक सजग पत्रकार और संघर्षशील स्वतंत्रता सेनानी के रूप में गढ़ा। लेखक ने अनुभव किया कि जो व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए सजग नहीं रहता, वह अपनी गरिमा के साथ-साथ राष्ट्र के सम्मान को भी खो देता है। लाला जी द्वारा पुरुषार्थ की भावना से कार्य करने की सीख ने लेखक को यह सिखाया कि व्यक्तिगत सफलता का अर्थ तभी है जब वह राष्ट्रहित के साथ जुड़ी हो। स्वराज्य की प्राप्ति के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी और नैतिक निष्ठा के जिस मार्ग का उल्लेख लाला जी ने किया, उसी ने लेखक को ‘मैं’ और ‘मेरा देश’ के अविभाज्य संबंध को समझने में मदद की। अंततः इन अनुभवों ने लेखक को एक ऐसा संवेदनशील नागरिक बनाया, जिसके लिए उसकी अपनी पूर्णता और देश का गौरव एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए।
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प्रश्न 12.
लेखक ने लाला लाजपत राय को तेजस्वी पुरुष क्यों कहा?
उत्तर:
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने लाला लाजपत राय को ‘तेजस्वी पुरुष’ उनकी निडरता, अडिग देशभक्ति और उनके विचारों की प्रखरता के कारण कहा है। लाला जी ने सिखाया था कि अपने जन्मसिद्ध अधिकारों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का सबसे बड़ा नैतिक कर्त्तव्य है और इसके लिए तन-मन-धन से समर्पित रहना चाहिए। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसा तेज था, जो देशवासियों को गुलामी की जंजीरें तोड़ने और स्वराज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने के लिए प्रेरित करता था। लेखक के अनुसार, लाला जी के शब्द केवल उपदेश नहीं थे, बल्कि उनमें राष्ट्र को जाग्रत करने वाली एक अद्भुत शक्ति और चमक थी। जेल जाते समय देश के नाम उनका संदेश उनके इसी तेजस्वी और साहसी स्वभाव को प्रकट करता है। अंततः, उनके विचारों की स्पष्टता और राष्ट्र के प्रति उनके पूर्ण समर्पण ने ही उन्हें लेखक दृष्टि में एक प्रभावशाली और तेजस्वी महापुरुष बनाया।
प्रश्न 13.
पंडित नेहरू ने किसान की खाट का उपहार क्यों स्वीकार किया?
उत्तर:
पंडित नेहरू ने किसान की खाट का उपहार इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे उस भेंट के पीछे छिपी निश्छल आत्मीयता और सम्मान की भावना को पहचानते थे। जब वे ग्रामीण क्षेत्रों के दौरे पर जाते थे, तो गरीब किसान अपनी सामर्थ्य के अनुसार सबसे अच्छी चीज़ (खाट) उन्हें विश्राम के लिए भेंट करते थे। नेहरू जी के लिए वह केवल एक साधारण खाट नहीं थी, बल्कि जनता का अटूट विश्वास और प्रेम था, जिसे ठुकराना उनके स्नेह का अपमान होता। उन्होंने इसे सहजता से स्वीकार कर यह दर्शाया कि एक जननायक के लिए जनता का प्यार किसी भी राजसी सुख-सुविधा से कहीं अधिक मूल्यवान है। यह प्रसंग नेहरू जी के जन- जुड़ाव और किसानों के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता को पूरी स्पष्टता के साथ उजागर करता है। उनकी यह सादगी और जनता के प्रति सम्मान भाव ही उन्हें एक महान और लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित करता था।
प्रश्न 14.
लेखक ने जीवन को युद्ध क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने जीवन को ‘युद्ध’ इसलिए कहा है, क्योंकि उनके अनुसार प्रगति और सफलता की राह चुनौतियों और संघर्षों से भरी होती है। जिस प्रकार एक सैनिक को युद्धभूमि में निरंतर सजग रहना पड़ता है, उसी प्रकार एक नागरिक को अपने आलस्य, अशिष्टता और स्वार्थ जैसी आंतरिक बुराइयों से प्रतिदिन लड़ना पड़ता है। लेखक का मानना है कि श्रेष्ठ नागरिक बनने के लिए हमें अपनी उन आदतों के विरुद्ध युद्ध करना होगा, जो राष्ट्र के सम्मान को ठेस पहुँचाती हैं। केवल सीमाओं पर शस्त्र उठाना ही युद्ध नहीं है, बल्कि देश की प्रगति के लिए अपनी कमियों को दूर करना भी एक महान संघर्ष है। यह युद्ध स्वयं को बेहतर बनाने का है ताकि हमारा आचरण राष्ट्र की गरिमा का विज्ञापन बन सके। अंततः पुरुषार्थ और निरंतर कर्मशीलता के माध्यम से ही हम जीवन के इस युद्ध को जीतकर देश को महान बना सकते हैं।
प्रश्न 15.
लेखक के अनुसार, साधारण नागरिक देश के सम्मान की रक्षा कैसे कर सकता है?
उत्तर:
लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के अनुसार, एक साधारण नागरिक अपने दैनिक जीवन के छोटे-छोटे कार्यों और मर्यादित आचरण के माध्यम से देश के सम्मान की रक्षा कर सकता है। नागरिक को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि वह जहाँ भी जाता है, अपने राष्ट्र के एक ‘चलता-फिरता विज्ञापन’ या प्रतिनिधि के रूप में जाना जाता है। जब हम सार्वजनिक स्थानों पर नियमों का पालन करते हैं, कतार में खड़े होते हैं, समय की पाबंदी रखते हैं और शिष्टाचार का परिचय देते हैं, तो हम विश्व के सामने अपने देश की एक सभ्य और सुसंस्कृत छवि प्रस्तुत करते हैं। इसके विपरीत गंदगी फैलाना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या अशिष्ट व्यवहार करना राष्ट्र के मस्तक पर कलंक लगाने जैसा है।
लेखक का मानना है कि देशभक्ति केवल सीमा पर लड़ने में नहीं, बल्कि ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य निभाने और अपनी कमियों को दूर करने में है। अंततः एक नागरिक का श्रेष्ठ चरित्र और उसका सुरुचिपूर्ण व्यवहार ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के गौरव को अक्षुण्ण बनाए रखने का सबसे सशक्त माध्यम है।
प्रश्न 16.
लेखक के अनुसार नागरिक का मुख्य कर्त्तव्य क्या है?
उत्तर:
लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के अनुसार, एक नागरिक का मुख्य कर्त्तव्य अपने आचरण और व्यवहार के माध्यम से राष्ट्र के गौरव और सम्मान की रक्षा करना है। नागरिक को यह समझना चाहिए कि उसकी पहचान उसके देश से जुड़ी है, इसलिए उसे कोई भी ऐसा अशिष्ट कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे देश की छवि खराब हो।
लेखक ने अधिकारों के प्रति सजग रहने और ‘पुरुषार्थ’ की भावना से अपने कार्यों को करने पर विशेष बल दिया है। सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखना, नियमों का पालन करना और शिष्टाचार दिखाना ही सच्ची नागरिकता और राष्ट्रप्रेम है।
जब हम अपने उत्तरदायित्वों को ईमानदारी से निभाते हैं, तभी हम अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रख सकते हैं। अंतत: स्वयं को देश का ‘प्रतिनिधि’ मानकर श्रेष्ठ आचरण करना ही एक नागरिक का परम धर्म और कर्त्तव्य है।
प्रश्न 17.
लेखक के अनुसार चुनाव की कसौटी क्या होनी चाहिए?
उत्तर:
लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के अनुसार, चुनाव की असली कसौटी उम्मीदवार की योग्यता, चरित्र और राष्ट्र के प्रति उसकी निष्ठा होनी चाहिए। लेखक का मानना है कि चुनाव के समय नागरिक को किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत प्रलोभन, जातिवाद या संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर केवल देशहित को सर्वोपरि रखना चाहिए।
एक सजग नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपना बहुमूल्य मत केवल उसी व्यक्ति को दे, जो राष्ट्र की प्रगति और उसकी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को सुरक्षित रखने में सक्षम हो। अयोग्य व्यक्ति का चुनाव करना न केवल एक राजनीतिक भूल है, बल्कि यह देश की स्वतंत्रता और उसके गौरव को भी दुर्बल करने जैसा है।
लेखक के अनुसार, सही प्रतिनिधि का चयन करना ही नागरिक की सूझबूझ और राष्ट्र के प्रति उसके उत्तरदायित्व की वास्तविक परीक्षा है। अंतत: चुनाव वह अवसर है, जहाँ हम अपने विवेक का उपयोग कर राष्ट्र के भविष्य की नींव को मजबूत बना सकते हैं।
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Class 9 Hindi Chapter 7 Extra Question Answer for Practice
दिए गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर विकल्पों से चुनिए।
1. एक दिन वह सरकारी पुस्तकालय से कोई पुस्तक पढ़ने के लिए लाया। इस पुस्तक में कुछ दुर्लभ चित्र थे। इन चित्रों को उस विद्यार्थी ने पुस्तक में से निकाल लिया और पुस्तक वापस कर दी। किसी जापानी विद्यार्थी ने उसे देख लिया और पुस्तकालय के अधिकारी को सूचना दे दी। पुलिस ने तलाशी लेकर वे चित्र उस विद्यार्थी के पास से बरामद किए और उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया। अपराधी को दंड मिलना ही चाहिए पर दंड वहीं तक नहीं रुका। उस पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया कि उस विद्यार्थी के देश का कोई भी निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता। जहाँ एक युवक ने अपने कार्य से अपने देश का सिर ऊँचा किया था, वहीं इस दूसरे युवक ने अपने कार्य से अपने देश के माथे पर कलंक का ऐसा टीका लगाया, जो दिनों तक संसार की आँखों में चुभता रहा।
(क) युवक ने पुस्तक कहाँ से ली थी?
(i) निजी पुस्तकालय से
(ii) सरकारी पुस्तकालय से
(iii) विद्यालय से
(iv) बाजार से
(ख) पुस्तक में किस प्रकार के चित्र थे?
(i) सामान्य चित्र
(ii) रंगीन चित्र
(iii) दुर्लभ चित्र
(iv) पुराने चित्र
(ग) युवक ने पुस्तक के साथ क्या किया?
(i) वापस नहीं की
(ii) चित्र निकाल लिए
(iii) पुस्तक बेच दी
(iv) पुस्तक फाड़ दी
(घ) युवक की गलती किसने पकड़ी?
(i) पुस्तकालयाध्यक्ष ने
(ii) पुलिस ने
(iii) जापानी विद्यार्थी ने
(iv) शिक्षक ने
(ङ) निम्नलिखित में से कौन-कौन से कथन सही हैं?
1. युवक ने चित्र चुराए
2. चित्र उसके कमरे से मिले
3. उसे दंड नहीं मिला
4. उसके देश के लोगों पर प्रतिबंध लगा
(i) केवल 1 2 और 4
(ii) केवल 1 और 3
(iii) केवल 2 और 3
(iv) सभी सही हैं
2. ‘शक्ति-बोध’ और ‘सौंदर्य बोध’, ये दो ऐसे तत्त्व हैं, जो किसी भी राष्ट्र की आधारशिला होते हैं। शक्ति बोध का अर्थ केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि नागरिक का अपने अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक होना है। जब हम अपने देश की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तो हमारा शक्ति बोध जाग्रत होता है। वहीं सौंदर्य बोध हमारे सामाजिक और व्यक्तिगत व्यवहार की शालीनता से जुड़ा है। यदि हम अपने आस-पास की स्वच्छता का ध्यान रखते हैं और दूसरों के साथ शिष्टता से पेश आते हैं, तो हम राष्ट्र सौंदर्य बोध को बढ़ाते हैं। लेखक का मानना है कि जिस देश के नागरिकों में इन दोनों बोधों का अभाव होता है, वह राष्ट्र भीतर से खोखला हो जाता है। अतः प्रत्येक नागरिक का यह परम कर्त्तव्य है कि वह अपने हर छोटे-बड़े कार्य में राष्ट्र की शक्ति और उसके सौंदर्य का प्रतिबिंब प्रस्तुत करे।
(i) लेखक के अनुसार राष्ट्र की आधारशिला कौन-से दो तत्त्व हैं?
(क) केवल सैन्य बल और आर्थिक प्रगति।
(ख) शक्ति-बोध और सौंदर्य बोध।
(ग) विदेशी व्यापार और राजनीति।
(घ) केवल साक्षरता और मनोरंजन।
(ii) शक्ति-बोध का वास्तविक अर्थ क्या है?
(क) दूसरे देशों पर आक्रमण करना।
(ख) अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति नागरिक जागरूकता।
(ग) केवल शारीरिक बल का प्रदर्शन।
(घ) बहुत अधिक धन संचित करना।
(iii) सौंदर्य-बोध हमारे किस व्यवहार से झलकता है?
(क) केवल महँगे और आधुनिक वस्त्र पहनने से।
(ख) सामाजिक शालीनता और स्वच्छता बनाए रखने से।
(ग) घर के अंदर चुपचाप बैठे रहने से।
(घ) विदेशी वस्तुओं के अधिक प्रयोग से।
(iv) कथन (A) : जिस राष्ट्र में नागरिकों के भीतर बोध का अभाव होता है, वह भीतर से कमजोर हो जाता है।
कारण (R) : राष्ट्र की वास्तविक शक्ति और सुंदरता उसके नागरिकों के चरित्र और चेतना पर टिकी होती है।
कूट
(क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R). कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
(ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(ग) कथन (A) सही है, किंतु कारण (R) गलत है।
(घ) कथन (A) गलत है, किंतु कारण (R) सही है।
(v) निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प नागरिक कर्त्तव्य के संदर्भ में सही है?
1. नागरिक का छोटा कार्य भी राष्ट्र की छवि को प्रभावित करता है।
2. सौंदर्य बोध का संबंध केवल कला की वस्तुओं से होता है।
3. देश की कमियों की सार्वजनिक चर्चा करना राष्ट्र के मानसिक बल को कमजोर करता है।
कूट
(क) केवल 1
(ख) केवल 2
(ग) 1 और 3
(घ) इनमें से कोई नहीं
निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर लगभग 25-30 शब्दों में दीजिए।
प्रश्न 1.
रामतीर्थ स्टेशन पर फल क्यों ढूँढ़ रहे थे?
प्रश्न 2.
रामतीर्थ जापानी युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध हो गए क्यों
प्रश्न 3.
पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर क्या लिख दिया गया?
प्रश्न 4.
देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास कैसे हो रहा है?
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विषयवस्तु पर आधारित प्रश्न
प्रश्न 1.
भ्रष्टाचार को लेखक ने देश के लिए किस प्रकार का खतरा माना है?
प्रश्न 2.
‘स्वराज्य’ की प्राप्ति के लिए लेखक ने किस जिम्मेदारी पर जोर दिया है?
प्रश्न 3.
रेलवे स्टेशनों और प्लेटफार्मों की स्थिति पर लेखक के क्या विचार हैं?
प्रश्न 4.
ऐतिहासिक इमारतों की दीवारों पर नाम लिखना किस मानसिकता का परिचायक है?
प्रश्न 5.
लेखक ने ‘समय की पाबंदी’ को राष्ट्र निर्माण से कैसे जोड़ा है?
प्रश्न 6.
विदेशी धरती पर एक नागरिक का आचरण कैसा होना चाहिए?
प्रश्न 7.
लेखक के अनुसार ‘सच्चा राष्ट्रप्रेम’ क्या है?
प्रश्न 8.
निबंध में ‘असंस्कृति’ शब्द का प्रयोग किन संदर्भों में किया गया है?
प्रश्न 9.
लेखक ने ‘सामाजिक स्वच्छता को व्यक्तिगत स्वच्छता से ऊपर क्यों रखा है?
प्रश्न 10.
‘अकेलापन और व्याकुलता का राष्ट्र के प्रति क्या प्रभाव पड़ता है?
प्रश्न 11.
शिष्टाचार का पालन न करने पर व्यक्ति और राष्ट्र की क्या हानि होती है?
प्रश्न 12.
‘जीवन एक युद्ध है’ इस विचार के साथ लेखक क्या संदेश देना चाहते हैं?