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Class 9 Hindi रैदास के पद Extra Question Answer
Class 9 Hindi Chapter 8 रैदास के पद Extra Question Answer
रैदास के पद Extra Question Answer लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
रैदास ने ‘चंदन’ और ‘पानी’ का उदाहरण क्यों दिया है?
उत्तर:
जिस प्रकार चंदन के संपर्क में रहने से उसकी सुगंध पानी के कण-कण में समा जाती है, वैसे ही ईश्वर की भक्ति रैदास के अंग-अंग में बस गई है। यह उदाहरण भक्त और भगवान के बीच के उस अटूट संबंध को दर्शाता है जिसे अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए रैदास ने चंदन और पानी का उदाहरण दिया है।
प्रश्न 2.
‘चकोर’ पक्षी की क्या विशेषता बताई गई है और ने कवि खुद को चकोर क्यों कहा है?
उत्तर:
चकोर पक्षी के बारे में प्रसिद्ध है कि वह चंद्रमा से इतना प्रेम करता है कि पूरी रात बिना पलक झपकाए उसे निहारता रहता है। रैदास ने स्वयं को चकोर इसलिए कहा है क्योंकि वे भी अपने आराध्य प्रभु के दर्शन पाने के लिए हमेशा लालायित रहते हैं।
प्रश्न 3.
रैदास स्वयं को क्या मानते हैं?
उत्तर:
रैदास स्वयं को भगवान का दास (सेवक) मानते हैं। वे अपने आपको पूर्ण रूप से ईश्वर के चरणों में समर्पित बताते हैं।
प्रश्न 4.
‘जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा’ से कवि क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तर:
इस पंक्ति से कवि यह संदेश देना चाहते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापी है। वह किसी मंदिर या तीर्थ स्थान तक सीमित नहीं है। रैदास जहाँ भी जाते हैं या जो कुछ भी देखते हैं, उन्हें हर तरफ ईश्वर की ही महिमा और उपस्थिति दिखाई देती है।
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प्रश्न 5.
सुहागा क्या है तथा सोने में मिलाने से क्या होता है?
उत्तर:
सुहागा (बोरेक्स) एक प्रकार का खनिज पदार्थ है, जिसका उपयोग धातुओं को साफ करने और जोड़ने में किया जाता है। सोने में सुहागा मिलाने से सोना शुद्ध और चमकदार बनता है। यह सोने की अशुद्धियाँ दूर करने में मदद करता है और उसे अधिक साफ व आकर्षक बनाता है।
प्रश्न 6.
‘तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ’ पंक्ति के माध्यम से रैदास ने क्या कहा है?
उत्तर:
“तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ” पंक्ति के माध्यम से रैदास कहते हैं कि यदि वे भगवान से अपना संबंध तोड़ लें, तो फिर किसी और से संबंध जोड़ना संभव नहीं है। अर्थात उनके लिए भगवान ही सबसे महत्वपूर्ण हैं और उनके बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं है।
Class 9 Hindi Chapter 8 Extra Questions and Answers दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
पहले पद के आधार पर रैदास की भक्ति भावना का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
पहले पद में रैदास की ‘दास्य भाव’ (सेवक भाव) की अनन्य भक्ति प्रकट होती है। वे ईश्वर को अपना ‘स्वामी’ और स्वयं को उनका ‘दास’ मानते हैं। रैदास ने कई प्राकृतिक प्रतीकों; जैसे-चंदन-पानी, घन मोरा, चंद-चकोरा, दीपक बाती, मोती धागा के माध्यम से यह सिद्ध किया है। कि भक्त का अस्तित्व ईश्वर के बिना अधूरा है। उनकी भक्ति में पूर्ण समर्पण है, जहाँ भक्त अपनी स्वतंत्र पहचान खोकर पूरी तरह ईश्वर के रंग में रंग जाना चाहता है।
प्रश्न 2.
दूसरे पद का मूल भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि रैदास ने समाज को क्या नया मार्ग दिखाया है?
उत्तर:
दूसरे पद का मूल भाव प्रभु के प्रति अटूट विश्वास और सांसारिक मोह माया का त्याग है। रैदास कहते हैं कि यदि ईश्वर उनसे नाता तोड़ना भी चाहें, तो भी वे ईश्वर को नहीं छोड़ सकते। उन्होंने समाज को यह नया मार्ग दिखाया कि ईश्वर को ढूँढ़ने के लिए कर्मकांडों, व्रतों या तीर्थों की आवश्यकता नहीं है। सच्ची भक्ति मन, क्रम और वचन से ईश्वर में आशा रखने और उनसे आंतरिक जुड़ाव महसूस करने में है। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर के प्रति समर्पण ही मनुष्य को मानसिक शांति और मोक्ष दिला सकता है।
प्रश्न 3.
रैदास के पदों की भाषा-शैली पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
- मिश्रित शब्दावली – रैदास की भाषा में सहजता और सरलता है। यद्यपि इनके पदों की मुख्य भाषा ब्रज भाषा है, परंतु इसमें उस समय की प्रचलित अन्य भाषाओं; जैसे-अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का सुंदर सम्मिश्रण मिलता है; जैसे- बास, समानी, अंदेसा दासा।
- गेयता और संगीतात्मकता – ये पद गेय हैं, अर्थात् इन्हें संगीत के रागों में बाँधकर गाया जा सकता है। पदों में तुकबंदी का बहुत सटीक प्रयोग हुआ है; जैसे- ‘पानी – समानी’, ‘मोरा-चकोरा’, ‘बाती राती’। इससे पदों में एक विशेष प्रकार का प्रवाह और माधुर्य पैदा होता है।
- अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग – रैदास ने अपनी बात को प्रभावी ढंग से कहने के लिए अलंकारों का सटीक प्रयोग किया है।
- उपमा अलंकार – ‘प्रभु जी तुम चंदन हम पानी’ (यहाँ ईश्वर और भक्त की तुलना विभिन्न वस्तुओं से की गई है।
पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार – ‘अंग-अंग’ शब्द में एक ही शब्द की आवृत्ति से भाव को बल मिला है। - रूपक अलंकार – ‘चरन कमल’ में चरणों को सीधे कमल का रूप दिया गया है।
- उपमा अलंकार – ‘प्रभु जी तुम चंदन हम पानी’ (यहाँ ईश्वर और भक्त की तुलना विभिन्न वस्तुओं से की गई है।
- प्रतीकात्मक शैली – रैदास ने अपनी रहस्यवादी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए दैनिक जीवन और प्रकृति से जुड़े प्रतीकों का चुनाव किया है। चंदन, चकोर, घन, बाती, मोती और सुहागा जैसे प्रतीक ईश्वर की महानता और भक्त की लघुता एवं अभिन्नता को बहुत स्पष्टता से समझाते हैं।
- दास्य भाव की प्रधानता – शैली की दृष्टि से इनके पदों में विनय और आत्म समर्पण का भाव झलकता है। वे स्वयं को तुच्छ और प्रभु को सर्वशक्तिमान मानकर अपनी बात कहते हैं, जो उनके ‘दास्य भाव’ को पुष्ट करता है।
- सरलता और स्पष्टता – रैदास ने जटिल दार्शनिक बातों को भी अत्यंत सरल उपमाओं के माध्यम से जनमानस तक पहुँचाया है। उनकी शैली उपदेशात्मक न होकर अनुभवात्मक है, जो सीधे पाठक के हृदय को छूती है।
प्रश्न 4.
‘मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों’, इस पंक्ति का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ये पंक्तियाँ भक्तिकाल की प्रखर चेतना और अनन्य प्रेम का प्रतीक हैं, जिनका मुख्य अभिप्राय पूर्ण आत्मसमर्पण और सांसारिक मोह का त्याग है। जब साधक या भक्त (विशेषकर मीराबाई के भाव में) यह कहता है कि उसने अपना मन ‘हरि’ से जोड़ लिया है, तो इसका अर्थ केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरे भावनात्मक और आध्यात्मिक रूपांतरण को दर्शाता है। यहाँ ‘हरि से जोरौ’ का तात्पर्य उस परम सत्ता के साथ अटूट संबंध स्थापित करने से है, जहाँ भक्त की अपनी इच्छाएँ और पहचान ईश्वर की भक्ति में विलीन हो जाती हैं। यह एक ऐसी अवस्था है। जहाँ आत्मा को अपने वास्तविक स्रोत का अनुभव हो जाता है और उसे परमानंद की प्राप्ति होती है।
इस जुड़ाव का दूसरा और अनिवार्य पक्ष ‘सबन सो तोरो’ है, जिसका अर्थ है संसार के सभी मिथ्या बंधनों, लोक-लाज, और सांसारिक अपेक्षाओं से विच्छेद। कवि यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर से सच्चा प्रेम और संसार से अत्यधिक मोह एक साथ नहीं चल सकते। जिस प्रकार एक पात्र में दो विपरीत वस्तुएँ नहीं समा सकतीं, उसी प्रकार हृदय में केवल एक ही सर्वोपरि प्रेम रह सकता है। सांसारिक रिश्तों को तोड़ने का अर्थ घृणा करना नहीं, बल्कि उन पर अपनी निर्भरता को समाप्त करना है। भक्त यह घोषणा करता है कि अब उसकी प्रसन्नता या दुख सांसारिक लाभ-हानि पर निर्भर नहीं है, क्योंकि उसने अपना केंद्र बदल लिया है। यह पंक्ति उस निर्भीकता को भी दर्शाती है। जो ईश्वर के साथ एकनिष्ठ संबंध बनाने के बाद आती है, जहाँ भक्त समाज की परवाह किए बिना अपनी भक्ति के मार्ग पर अडिग रहता है। अंततः यह पंक्ति जीव की उस यात्रा का सार है, जहाँ वह नश्वर संसार से नाता तोड़कर अविनाशी (ब्रह्म) से जुड़ जाता है।
Class 9 Ganga Chapter 8 Extra Question Answer दक्षता आधारित प्रश्नोत्तर
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
प्रश्न 1.
‘तीरथ बरत न करूँ अंदेसा’ – इस पंक्ति के आलोक में रैदास के ‘निर्गुण भक्ति’ के स्वरूप और सामाजिक दृष्टिकोण का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
इस पंक्ति का अर्थ है कि मुझे तीर्थ यात्राओं और व्रतों की कोई अभिलाषा नहीं। यह पंक्ति रैदास के प्रगतिशील और रूढ़िमुक्त विचार एवं अविरल भक्ति मार्ग का विश्लेषण करती है।
- भक्ति का स्वरूप – रैदास कर्मकांडों, तीर्थ यात्राओं और उपवास जैसे बाहरी आडंबरों को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग नहीं मानते। उनके लिए ईश्वर मंदिर या तीर्थ में नहीं, बल्कि मनुष्य के अंत:करण में निवास करते हैं।
- सामाजिक दृष्टिकोण – मध्यकाल में तीर्थ यात्रा और कठिन व्रत उच्च जातियों और संपन्न लोगों के वर्चस्व का हिस्सा थे। रैदास ने समाज को बताया कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी पंडित, पुरोहित या किसी विशेष वर्ग की मध्यस्थता आवश्यक नहीं है। भक्ति मन की शुद्धता से जुड़ी है, न कि शरीर को कष्ट देने (व्रत) या धन खर्च करने (तीर्थ यात्रा) से।
प्रश्न 2.
रैदास के पद के आधार पर भक्ति की विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
रैदास के पद में भक्ति की कई महत्वपूर्ण विशेषताएँ दिखाई देती हैं; जैसे- पूर्ण समर्पण, गहरा प्रेम विनम्रता और एकात्मकता। कवि हर स्थिति में स्वयं को भगवान से जुड़ा हुआ महसूस करता है और अपने अस्तित्व को प्रभु में विलीन मानता है। वह अहंकार को त्यागकर प्रभु की शरण में जाता है। यह निष्काम भक्ति है, जिसमें किसी प्रकार की इच्छा या स्वार्थ नहीं है। ऐसी भक्ति मनुष्य को आत्मिक शांति, संतोष और परमानंद प्रदान करती है।
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Class 9 Hindi Chapter 8 Extra Question Answer for Practice
नीचे दिए गए पठित पद्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर चुनिए।
1. अब कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा।।
(क) “राम रट लागी” का क्या अर्थ है?
(i) राम का नाम भूल जाना
(ii) ईश्वर की भक्ति में निरंतर लीन होना
(iii) राम से दूर हो जाना
(iv) राम का त्याग करना
(ख) “तुम चंदन हम पानी” से क्या भाव प्रकट होता है?
(i) दूरी का
(ii) विरोध का
(iii) घनिष्ठता और मिलन का
(iv) उपेक्षा का
(ग) “तुम दीपक हम बाती” से क्या संबंध व्यक्त होता है?
(i) ईश्वर से विरोध का
(ii) समर्पण का
(iii) सांसारिक मोह का
(iv) घृणा का
(घ) “मोती और धागा” का संबंध किसे दर्शाता है?
(i) अलगाव का
(ii) अटूट रूप से जुड़ने का
(iii) क्रोध का
(iv) भय का
(ङ) निम्नलिखित कथन (A) तथा कारण (R) को ध्यानपूर्वक पढ़िए। उसके बाद दिए गए विकल्पों में से कोई एक सही
विकल्प चुनकर लिखिए।
कथन (A) – कवि स्वयं को ‘दासा’ कहता है।
कारण (R) – क्योंकि वह प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण और भक्ति व्यक्त करना चाहता है।
विकल्प-
(i) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
(ii) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(iii) कथन (A) सही है, लेकिन कारण (R) गलत है।
(iv) कथन (A) गलत है, लेकिन कारण (R) सही है।
निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर लगभग 25-30 शब्दों में दीजिए।
प्रश्न 1.
‘जाकी जोति बरै दिन राती’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 2.
कवि ने किससे नाता तोड़ लिया है?
प्रश्न 3.
‘सबही पहर तुम्हारी आसा मन क्रम वचन कहै रैदासा।’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 4.
कवि को तीर्थ या व्रत में विश्वास क्यों नहीं है?