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Class 9 Hindi भारति, जय, विजयकरे Extra Question Answer
Class 9 Hindi Chapter 10 भारति, जय, विजयकरे Extra Question Answer
भारति, जय, विजयकरे Extra Question Answer लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
कवि भारत माता को ‘विजयकरे’ कहकर क्या प्रार्थना कर रहा है?
उत्तर:
कवि भारत माता की जय-जयकार करते हुए उनसे प्रार्थना कर रहा है कि वे हमेशा विजयी रहें और अपने भक्तों व राष्ट्र का कल्याण करें।
प्रश्न 2.
कविता में लंका की तुलना किससे की गई है और वह कहाँ स्थित है?
उत्तर:
कविता में लंका की तुलना ‘शतदल’ (कमल) से की गई है और उसे भारत माता के चरणों (पदतल) में स्थित बताया गया है।
प्रश्न 3.
किस प्रकार की स्तुति का उल्लेख किया गया है?
उत्तर:
कविता में अर्थपूर्ण और बहुआयामी स्तुति का उल्लेख किया गया है, जो भगवान की महानता को व्यक्त करती है।
प्रश्न 4.
भारत माता के आँचल का श्रृंगार किस प्रकार हुआ है?
उत्तर:
भारत माता के वस्त्रों रूपी आँचल में सुंदर फूल (सुमन) जड़े हुए हैं, जो प्रकृति की सुंदरता को दर्शाते हैं।
प्रश्न 5.
गंगा के जल-कण का क्या महत्व बताया गया है?
उत्तर:
गंगा के जल के कण शुद्धता और पवित्रता के प्रतीक हैं, जो जीवन की ऊर्जा और दिव्यता को व्यक्त करते हैं।
प्रश्न 6.
“गर्जितोर्मि सागर-जल” में कौन-सी ध्वनि का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
यह समुद्र की लहरों की गर्जना और उसकी शक्ति का प्रतीक है, जो समुद्र की विशालता और उग्रता को दर्शाता है।
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Class 9 Hindi Chapter 10 Extra Questions and Answers दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
कविता में भारत माता के स्वरूप का जो चित्रण किया गया है, उसे अपने शब्दों में विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
कवि ने भारत माता को एक साक्षात देवी के रूप में चित्रित किया है, जिनका श्रृंगार संपूर्ण प्रकृति करती है। उनके पैरों के पास लंका एक कमल के समान सुशोभित है और समुद्र की लहरें निरंतर उनके चरणों को धोती हैं। भारत की हरियाली, वन और लताएँ उनके वस्त्र हैं, जिनमें खिले हुए फूल रत्नों की तरह जड़े हैं। गंगा की श्वेत धारा उनके गले का हार है और हिमालय की बर्फ उनके मस्तक का चमकीला मुकुट है। इस प्रकार, कवि ने भौगोलिक तत्वों को मानवीय अंगों और आभूषणों के रूप में प्रस्तुत कर माँ का भव्य स्वरूप निर्मित किया है।
प्रश्न 2.
निराला जी ने भारत माता के आभूषणों और परिधान (वस्त्रों) के लिए किन प्राकृतिक प्रतीकों का चुनाव किया है और क्यों?
उत्तर:
कवि ने प्रकृति के सबसे सुंदर और विराट तत्वों को माँ के श्रृंगार के लिए चुना है-
- वस्त्र (वसन) – उन्होंने वृक्षों, घास, वनों और लताओं को माँ के वस्त्र माने हैं क्योंकि भारत भूमि सदैव हरियाली से ढकी रहती है।
- हार – गंगा के पवित्र और प्रकाशमान जल को ‘धवल हार’ कहा गया है, जो भारत के हृदय पर बहती है।
- मुकुट – उत्तर में स्थित हिमालय की बर्फ को ‘शुभ्र मुकुट’ कहा गया है, जो राष्ट्र की गरिमा और उच्चता का प्रतीक है। इन प्रतीकों का चुनाव इसलिए किया गया है ताकि पाठक अपनी मातृभूमि की सुंदरता को देवी के साक्षात स्वरूप में महसूस कर सके।
प्रश्न 3.
इस कविता के माध्यम से कवि पाठकों में किस प्रकार की भावनाओं का संचार करना चाहते हैं?
उत्तर:
यह कविता पाठकों में देशभक्ति, राष्ट्रीय गौरव और प्रकृति के प्रति अनुराग की भावनाओं का संचार करती है। कवि भारत माता को ‘विजयकरे’ कहकर पाठकों को राष्ट्र की विजय और उन्नति के लिए प्रेरित करते हैं। भारत के गौरवशाली भूगोल (हिमालय, गंगा, सागर) का वर्णन करके वे अपनी विरासत के प्रति सम्मान जगाते हैं। अंततः, ‘ओंकार’ और ‘उदार दिशाओं’ के माध्यम से वे एक ऐसी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान प्रस्तुत करते हैं, जो हमें अपनी मातृभूमि के प्रति गौरवान्वित और समर्पित होने की प्रेरणा देती है।
Class 9 Ganga Chapter 10 Extra Question Answer दक्षता आधारित प्रश्नोत्तर
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
प्रश्न 1.
कविता के शीर्षक ‘भारति, जय, विजयकरे!’ में ‘भारत’ शब्द का प्रयोग किन दो संदर्भों में किया गया है और यह कविता के मूल भाव को कैसे पुष्ट करता है?
उत्तर:
‘भारत’ के दो संदर्भ-
- माँ सरस्वती – ‘भारति’ शब्द का एक प्रसिद्ध अर्थ सरस्वती है। कविता की शुरुआत में “भारति, जय, विजय करे” का अर्थ है कि ज्ञान की देवी की जय हो। निराला जी चाहते हैं कि भारत में ज्ञान का प्रकाश फैले, अज्ञानता का अंधकार दूर हो और बुद्धि का विकास हो। बिना ज्ञान और विवेक के कोई भी राष्ट्र वास्तव में ‘विजयी’ नहीं हो सकता।
- भारत माता – दूसरा और सबसे प्रमुख संदर्भ ‘भारत माता’ से है। यहाँ कवि अपने देश को एक देवी के रूप में देख रहे हैं। जब वे कहते हैं “कनक शस्य कमल धरे”, तो वे भारत भूमि की उर्वरता और उसकी प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन कर रहे हैं। यहाँ ‘भारति’ पूरे राष्ट्र की अस्मिता और गौरव का प्रतीक है।
कविता के मूल भाव की पुष्टिः
यह प्रयोग कविता के मूल भाव को निम्नलिखित प्रकार से पुष्ट करता है-
- सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना-इन दो संदर्भों के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करते हैं कि भारत की विजय केवल हथियारों या सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि ज्ञान (सरस्वती) और समृद्धि (भारत माता) के मेल से होगी। यह कविता को मात्र एक राजनीतिक गीत से ऊपर उठाकर एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वंदना बना देता है।
- प्राकृतिक और बौद्धिक सुंदरता का मेल – जहाँ एक ओर कवि भारत की नदियों और सागर के माध्यम से उसकी भौगोलिक महत्ता बताते हैं, वहीं ‘भारति’ शब्द के प्रयोग से वे यह भी याद दिलाते हैं कि यह देश ऋषियों और ज्ञानियों की भूमि है।
- राष्ट्रभक्ति और श्रद्धा – ‘भारति’ शब्द का प्रयोग पाठक के मन में देश के प्रति केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि श्रद्धा का भाव भी जागृत करता है। इससे यह संदेश मिलता है कि देश की सेवा करना साक्षात देवी की पूजा करने के समान है।
‘भारत’ शब्द इस कविता में शक्ति और ज्ञान का अद्भुत संगम है, जो भारत को विश्व गुरु और एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के कवि के संकल्प को सिद्ध करता है।
प्रश्न 2.
‘तरु-तृण-वन-लता वसन’ पंक्ति के आधार पर बताइए कि कवि ने प्रकृति के संरक्षण को राष्ट्रभक्ति से कैसे जोड़ा? पारिस्थितिक संतुलन की दृष्टि से वनों का क्या महत्व है?
उत्तर:
कविता की पंक्ति “तरु-तृण-वन-लता-वसन” के माध्यम से कवि निराला जी ने प्रकृति और राष्ट्रभक्ति के बीच एक गहरा और अटूट संबंध स्थापित किया है। इसकी व्याख्या और महत्व को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं-
प्रकृति संरक्षण और राष्ट्रभक्ति का संबंध
कवि ने इस पंक्ति में भारत माता का मानवीकरण किया है। यहाँ ‘वसन’ का अर्थ है – वस्त्र।
- प्रकृति ही राष्ट्र का स्वरूप है- कवि कहते हैं कि भारत के वृक्ष (तरु), तिनके (तृण), घने जंगल (वन) और बेलें (लता) भारत माता के वस्त्र हैं। जब हम अपने देश की प्रकृति की रक्षा करते हैं, तो वास्तव में हम भारत माता के सम्मान और उनके आँचल की रक्षा कर रहे होते हैं।
- श्रद्धा का भाव-प्रकृति को वस्त्र मानकर कवि यह संदेश देते हैं कि देश की हरियाली को नुकसान पहुँचाना राष्ट्र
के अपमान के समान है। इसलिए प्रकृति का संरक्षण करना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।
पारिस्थितिक संतुलन में वनों का महत्व
वैज्ञानिक और पारिस्थितिक दृष्टि से वनों का महत्व अत्यधिक है, जिसे कविता के मूल भाव से भी जोड़ा जा सकता है-
- प्राणवायु का स्रोत – वन ऑक्सीजन के मुख्य स्रोत हैं। पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए हवा का शुद्ध होना अनिवार्य है, जो वनों के बिना संभव नहीं।
- वर्षा और जल चक्र – वन बादलों को आकर्षित करते हैं। और नियमित वर्षा में सहायक होते हैं। वे भू-जल स्तर को बनाए रखने में मदद करते हैं।
- मृदा अपरदन रोकना – वनों के वृक्ष अपनी जड़ों से मिट्टी को जकड़कर रखते हैं, जिससे उपजाऊ मिट्टी बहने से बच जाती है और बाढ़ का खतरा कम होता है।
- जैव विविधता – वन अनगिनत पशु-पक्षियों और जीवों का घर हैं। प्रकृति की खाद्य श्रृंखला को सुचारू रूप से चलाने के लिए वनों का होना अनिवार्य है।
- तापमान नियंत्रण – वन ग्लोबल वार्मिंग को कम करने और धरती के तापमान को संतुलित रखने में फेफड़ों की तरह कार्य करते हैं। निराला जी की यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि भारत माता की जय-जयकार केवल नारों से नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक स्वरूप यानी हमारे वनों और हरियाली को सुरक्षित रखकर ही की जा सकती है। प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी राष्ट्र समृद्ध और विजयी होगा।
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भारति, जय, विजयकरे Extra Questions काव्यबोध पर आधारित प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
कवि ने ‘भारत’ शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया है?
उत्तर:
कवि ने ‘भारत’ शब्द का प्रयोग भारतमाता, वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती तथा राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक रूप में किया है। यहाँ ‘भारति’ केवल भौगोलिक भारत नहीं, बल्कि एक दिव्य पूजनीय और चेतन शक्ति का रूप है। कवि उन्हें विजय प्रदान करने वाली, समृद्धि और ज्ञान की स्रोत तथा राष्ट्र की आत्मा के रूप में चित्रित करता है। इस प्रकार, ‘भारति’ भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता, प्रकृति-सौंदर्य और राष्ट्रीय गौरव का समन्वित रूप है, जिसकी स्तुति करके कवि देशवासियों में राष्ट्रप्रेम और श्रद्धा की भावना जागृत करना चाहता है।
प्रश्न 2.
‘कनक शस्य’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘कनक-शस्य’ से अभिप्राय भारत की सुनहरी फसलों से है, जो देश की कृषि-संपन्नता, उर्वरता और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक हैं। कवि ने इन फसलों को कमल के समान सुंदर और पवित्र बताया है, जो भारतमाता के हाथों में सुशोभित हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत प्राकृतिक संसाधनों से समृद्धि और संपन्न राष्ट्र है। ‘कनक’ शब्द फसलों की स्वर्णिम आभा को दर्शाता हैं, जबकि ‘शस्य’ कृषि उपज का प्रतीक है। इस प्रकार, यह पद भारत की समृद्धि, सौंदर्य और जीवनदायिनी प्रकृति का प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 3.
‘लंका पदतल शतदल’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति में कवि ने भारतमाता के विराट स्वरूप का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है। यहाँ श्रीलंका को भारतमाता के चरणों के नीचे स्थित सौ पंखुड़ियों वाले कमल के समान बताया गया है। इससे भारत के भौगोलिक विस्तार और गौरव का बोध होता है। कवि यह दर्शाना चाहता है कि भारतमाता का स्वरूप इतना विशाल और दिव्य है कि उसके चरणों के नीचे भी सुंदर और पवित्र प्रदेश स्थित हैं। यह उपमा भारत की महानता, श्रेष्ठता और गौरवपूर्ण स्थिति को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है।
प्रश्न 4.
समुद्र की लहरें क्या कार्य करती प्रतीत होती हैं?
उत्तर:
कवि के अनुसार समुद्र की गर्जना करती हुई लहरें भारतमाता के पवित्र चरणों को धोती हुई प्रतीत होती हैं। यह दृश्य केवल प्राकृतिक क्रिया का वर्णन नहीं है, बल्कि इसमें गहरा प्रतीकात्मक अर्थ निहित है। समुद्र की लहरें मानो श्रद्धापूर्वक भारतमाता की आरती उतार रही हैं और उनकी स्तुति कर रही हैं। इससे भारतमाता की महानता, पवित्रता और दिव्यता का भाव व्यक्त होता है। कवि ने यहाँ मानवीकरण अलंकार के माध्यम से प्रकृति को भी भारतमाता की सेवा में तत्पर दिखाकर राष्ट्र के प्रति श्रद्धा की भावना को सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया है।
प्रश्न 5.
‘शुचि चरण युगल’ किसके चरणों की ओर संकेत करता है?
उत्तर:
‘शुचि चरण युगल’ से अभिप्राय भारतमाता के पवित्र और दिव्यं चरणों से है । कवि ने भारतमाता को देवी के रूप में चित्रित करते हुए उनके चरणों को अत्यंत पावन, निर्मल और पूजनीय बताया है। समुद्र की लहरें इन चरणों को धोती हुई प्रतीत होती हैं, जिससे उनकी महानता और श्रेष्ठता का संकेत मिलता है। यह चित्रण भारत की पवित्र भूमि के प्रति गहरी श्रद्धा और सम्मान की भावना को व्यक्त करता है। इस प्रकार, कवि भारतमाता के चरणों को दिव्यता, गरिमा और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 6.
‘स्तव कर बहु-अर्थ-भरे’ का तात्पर्य क्या है?
उत्तर:
‘स्तव कर बहु-अर्थ-भरे’ का तात्पर्य है कि समुद्र की गर्जन करती लहरें अनेक अर्थों से युक्त स्तुति करते हुए भारतमाता की महिमा का गुणगान कर रही हैं। यहाँ कवि ने समुद्र की ध्वनि को भारतमाता की वंदना के रूप में प्रस्तुत किया है। यह केवल प्राकृतिक ध्वनि नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि प्रकृति का प्रत्येक तत्त्व भारतमाता की सेवा और स्तुति में संलग्न है। इस प्रकार, यह पंक्ति भारत की दिव्यता, गरिमा और सार्वभौमिक महत्ता को प्रभावशाली रूप में व्यक्त करती है।
प्रश्न 7.
‘अंचल में खचित सुमन’ का आशय क्या है?
उत्तर:
‘अंचल में खचित सुमन’ का आशय है कि भारतमाता के आँचल में खिले हुए सुंदर फूल ऐसे प्रतीत होते हैं मानो उनके वस्त्रों पर रत्न जड़े हों। कवि ने यहाँ प्रकृति के पुष्पों को भारतमाता के श्रृंगार के रूप में चित्रित किया है। इससे भारत की प्राकृतिक सुंदरता, विविधता और समृद्धि का बोध होता है। यह चित्रण भारतमाता के सजीव और आकर्षक स्वरूप को प्रस्तुत करता है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि प्रकृति के विविध पुष्प भारत की सांस्कृतिक विविधता और सौंदर्य के प्रतीक हैं, जो राष्ट्र की शोभा को बढ़ाते हैं।
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प्रश्न 8.
गंगा की धारा की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
कवि ने गंगा की पवित्र धारा की तुलना भारतमाता के गले में सुशोभित मोतियों के हार से की है। गंगा के उज्ज्वल जल की चमक मोतियों के समान प्रतीत होती है, जिससे भारतमाता का दिव्य और अलंकारिक स्वरूप उभरकर सामने आता है। इस रूपक के माध्यम से कवि गंगा नदी की पवित्रता, महानता और सांस्कृतिक महत्त्व को स्पष्ट करता है। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और आध्यात्मिक चेतना की जीवनरेखा है, जो भारतमाता के सौंदर्य और गौरव को और अधिक उज्ज्वल बनाती है।
प्रश्न 9.
प्रस्तुत कविता ‘भारति, जय, विजयकरे!’ में कवि भारतमाता के किस स्वरूप की स्तुति कर रहा है?
उत्तर:
कवि भारतमाता के दिव्य, विराट, पवित्र और समृद्ध स्वरूप की स्तुति कर रहा है। वह भारत को केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि देवी के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसके वस्त्र वनस्पतियाँ हैं, गले का हार गंगा नदी है और मस्तक का मुकुट हिमालय है।
समुद्र उनकी आरती करता हुआ प्रतीत होता है और दिशाएँ उनकी महिमा का गुणगान करती हैं। इस प्रकार, , कवि भारतमाता को प्राकृतिक सौंदर्य, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक वैभव से परिपूर्ण एक महान शक्ति के रूप में चित्रित करता है।
प्रश्न 10.
कवि ने भारतमाता की तुलना देवी से क्यों की है?
उत्तर:
कवि ने भारतमाता की तुलना देवी से इसलिए की है, क्योंकि कवि भारत को केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक पवित्र, दिव्य और पूजनीय सत्ता मानता है। भारत की प्राकृतिक संपन्नता, सांस्कृतिक महानता और आध्यात्मिक चेतना उसे देवी के समान महान बनाती है। वन, नदियाँ, पर्वत और दिशाएँ उसके आभूषणों के रूप में चित्रित किए गए हैं। इस प्रकार, कवि देश के प्रति श्रद्धा, सम्मान और भक्ति की भावना व्यक्त करता है। तथा देशवासियों के मन में राष्ट्रप्रेम जागृत करने का प्रयास करता है।
प्रश्न 11.
कविता ‘भारति, जय, विजयकरे!’ में भारतमाता के स्वरूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
कविता में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने भारतमाता का स्वरूप अत्यंत दिव्य, विराट और गौरवपूर्ण रूप में चित्रित किया है। उन्होंने भारतमाता को देवी के समान महान और पूजनीय बताया है। उनके हाथों में सुनहरी फसलें कमल के समान शोभायमान हैं, जो देश की समृद्धि का प्रतीक हैं। श्रीलंका को उनके चरणों के नीचे स्थित शतदल कमल के रूप में दर्शाया गया है और समुद्र की गर्जन करती लहरें उनके पवित्र चरणों को धोती हुई प्रतीत होती हैं।
इस प्रकार, कवि ने प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों के माध्यम से भारतमाता की महिमा, पवित्रता और विशालता का प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करते हुए राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और गौरव की भावना व्यक्त की है।
प्रश्न 12.
कवि ने श्रीलंका को ‘शतदल’ क्यों कहा है? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने श्रीलंका को ‘शतदल’ अर्थात् सौ पंखुड़ियों वाले कमल के समान बताया है, जो भारतमाता के चरणों के नीचे स्थित है। कमल भारतीय संस्कृति में पवित्रता, सौंदर्य और गरिमा का प्रतीक माना जाता है। इस उपमा के माध्यम से कवि ने श्रीलंका की सुंदरता और महत्त्व को दर्शाने के साथ-साथ भारतमाता के विराट स्वरूप को भी स्पष्ट किया है। यह चित्रण इस बात का संकेत देता है कि भारतमाता इतनी विशाल और महान हैं कि उनके चरणों के नीचे भी सुंदर और पवित्र प्रदेश स्थित हैं। इस प्रकार, ‘शतदल’ शब्द भारत की भौगोलिक व्यापकता, सांस्कृतिक श्रेष्ठता और गौरवपूर्ण स्थिति को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।
प्रश्न 13.
कवि ने भारतमाता के विराट स्वरूप का चित्रण कैसे किया है?
उत्तर:
कवि ने भारतमाता के विराट स्वरूप का चित्रण प्रकृति के विविध रूपों के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया है। उन्होंने सुनहरी फसलों को उनके हाथों का कमल, श्रीलंका को उनके चरणों के नीचे स्थित शतदल कमल तथा समुद्र को उनके चरणों को धोने वाला सेवक बताया है। वन, तृण और लताएँ उनके वस्त्र हैं तथा पुष्प उनके आँचल की शोभा बढ़ाते हैं। गंगा नदी को उनके गले का उज्ज्वल हार और हिमालय को उनके मस्तक का मुकुट कहा गया है। दिशाएँ उनकी स्तुति करती हुई प्रतीत होती हैं। इस प्रकार, कवि ने संपूर्ण प्रकृति को भारतमाता की सेवा में प्रस्तुत कर उनके दिव्य और व्यापक स्वरूप को सजीव बना दिया है।
प्रश्न 14.
कवि भारतमाता की विजय की कामना क्यों करता है? ‘भारति, जय, विजयकरे!’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि भारतमाता की विजय की कामना इसलिए करता है, क्योंकि वह भारत को एक महान, पवित्र और गौरवशाली राष्ट्र के रूप में देखता है। वह चाहता है कि भारत संसार में सम्मान, समृद्धि और शक्ति के साथ आगे बढ़े तथा पराधीनता, अज्ञान और दुर्बलता से मुक्त होकर स्वतंत्रता और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो। कवि के मन में राष्ट्र के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम है, इसलिए वह भारतमाता की विजय की प्रार्थना करता है। यह कामना केवल राजनीतिक विजय तक सीमित नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति की भी अभिव्यक्ति है, जो देशवासियों में उत्साह और आत्मविश्वास उत्पन्न करती है।
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प्रश्न 15.
प्रस्तुत कविता ‘भारति, जय, विजयकरे!’ देशभक्ति की भावना को कैसे जागृत करती है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता भारतमाता के दिव्य और गौरवशाली स्वरूप का चित्रण करके देशभक्ति की भावना को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से जागृत करती है। कवि ने भारत की प्राकृतिक संपन्नता-सुनहरी फसलें, गंगा की पवित्र धारा, हिमालय का ऊँचा मुकुट तथा समुद्र की लहरों द्वारा चरण धोने जैसे चित्रों के माध्यम से राष्ट्र की महानता को व्यक्त किया है।
दिशाओं का भारतमाता की स्तुति करना और प्रकृति का उनकी सेवा में तत्पर होना पाठकों के मन में गहरी श्रद्धा उत्पन्न करता है। इन उदाहरणों के माध्यम से कवि देशवासियों को अपने राष्ट्र के प्रति गर्व और सम्मान का अनुभव कराता है तथा उनमें देशसेवा की प्रेरणा जागृत करता है।
प्रश्न 16.
भारतमाता के दिव्य स्वरूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
कवि ने भारतमाता को एक दिव्य और पूजनीय देवी के रूप में चित्रित किया है, जिनका स्वरूप प्राकृतिक वैभव से अलंकृत है। उनके वस्त्र वन, तृण और लताओं से बने हैं तथा उनके आँचल में खिले हुए पुष्प रत्नों के समान सुशोभित हैं।
गंगा की उज्ज्वल धारा उनके गले का हार है और हिमालय उनके मस्तक का चमकदार मुकुट है। समुद्र की लहरें उनके चरणों को धोती हुई प्रतीत होती हैं और दिशाएँ उनकी महिमा का गुणगान करती हैं। इस प्रकार, भारतमाता का स्वरूप आध्यात्मिक चेतना, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक गरिमा से युक्त एक महान और प्रेरणादायक रूप में सामने आता है।
प्रश्न 17.
कवि ने प्रकृति के विभिन्न अंगों को भारतमाता के आभूषणों के रूप में कैसे चित्रित किया है?
उत्तर:
कवि ने प्रकृति के विभिन्न अंगों को अत्यंत सुंदर और प्रभावशाली ढंग से भारतमाता के आभूषणों के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने वन, तृण और लताओं को उनके वस्त्र बताया है तथा रंग-बिरंगे पुष्पों को उनके आँचल में जड़े रत्नों के समान दर्शाया है।
गंगा की पवित्र धारा को उनके गले का उज्ज्वल मोतियों का हार और हिमालय को उनके मस्तक का दिव्य मुकुट कहा गया है। समुद्र की लहरें उनके चरणों को धोती हुई दिखाई गई हैं। इस प्रकार, कवि ने प्रकृति के माध्यम से भारतमाता के सौंदर्य, वैभव और दिव्यता को अत्यंत सजीव और आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया है।
Class 9 Hindi Chapter 10 Extra Question Answer for Practice
नीचे दिए गए पठित पद्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए गए विकल्पों में से चुनिए।
1. तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन;
गंगा ज्योतिर्जल – कण
धवल धार हार गले।
(क) ‘अंचल में खचित सुमन’ पंक्ति से क्या भाव प्रकट होता है?
(i) प्रकृति का विनाश
(ii) प्रकृति की सजावट और सौंदर्य
(iii) फूलों की कमी
(iv) मनुष्य का जीवन
(ख) ‘गंगा ज्योतिर्जल-कण’ में ‘ज्योति’ शब्द किस गुण को दर्शाता है?
(i) ठंडक
(ii) गहराई
(iii) चमक और पवित्रता
(iv) गति
(ग) कवि ने गंगा की धारा को ‘हार’ क्यों कहा है?
(i) क्योंकि वह बहती है
(ii) क्योंकि वह लंबी है
(iii) क्योंकि वह पृथ्वी के गले की शोभा बढ़ाती है
(iv) क्योंकि वह ठंडी है
(घ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
(i) प्रकृति की शक्ति
(ii) प्रकृति का सौंदर्य और अलंकरण
(iii) प्रकृति का क्रोध
(iv) प्रकृति का रहस्य
(ङ) निम्नलिखित कथन (A) तथा कारण (R) को ध्यानपूर्वक पढ़िए। उसके बाद दिए गए विकल्पों में से कोई एक सही विकल्प चुनकर लिखिए।
कथन (A) : कवि ने प्रकृति को मानवीय रूप में चित्रित किया है।
कारण (R) : क्योंकि प्रकृति को वस्त्र, अंचल और हार से सजाया गया है।
विकल्प-
(i) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
(ii) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(iii) कथन (A) सही है, लेकिन कारण (R) गलत है।
(iv) कथन (A) गलत है, लेकिन कारण (R) सही है।
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2. तरु-तृण वन लता वसन,
अंचल में खचित सुमनः
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!
(i) कवि ने ‘तरु-तृण-वन-लता’ को किसका रूप माना है?
(क) भारत की सीमाओं का
(ख) भारतमाता के वसन का
(ग) भारत की नदियों का
(घ) भारत के आभूषणों का
(ii) काव्यांश के अनुसार गंगा की धवल धारा किसके समान प्रतीत होती है?
(क) मुकुट के समान
(ख) कंगन के समान
(ग) हार के समान
(घ) वस्त्र के समान
(iii) ‘मुकुट शुभ्र हिम-तुषार’ पंक्ति में किसका संकेत किया गया है?
(क) गंगा नदी
(ख) वन-प्रदेश
(ग) हिमालय पर्वत
(घ) समुद्र
(iv) कथन (A) : कवि ने भारत की प्रकृति को भारतमाता के आभूषणों के रूप में चित्रित किया है।
कारण (R) : इससे भारतमाता के दिव्य और सजीव स्वरूप का प्रभावशाली चित्र उभरता है।
कूट
(क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं।
(ख) कथन (A) सही है, किंतु कारण (R) गलत है।
(ग) कथन (A) और कारण (R) दोनों गलत हैं।
(घ) कथन (A) गलत है, किंतु कारण (R) सही है।
(v) ‘प्राण प्रणव ओंकार’ पंक्ति से क्या अभिप्राय है?
(क) भारत की प्राकृतिक संपन्नता का वर्णन
(ख) भारत की आध्यात्मिक चेतना का संकेत
(ग) भारत की भौगोलिक विशालता का वर्णन
(घ) भारत की सैन्य शक्ति का संकेत
निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर लगभग 25-30 शब्दों में दीजिए।
प्रश्न 1.
गंगा नदी को भारत के गले का हार क्यों गया है?
प्रश्न 2.
कवि ने ‘भारति’ को किस रूप में चित्रित किया है? स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 3.
‘मुकुट शुभ्र हिम- तुषार’ में हिमालय की भूमिका और प्रतीकात्मक अर्थ स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 4.
समुद्र द्वारा ‘चरण धोना’ किस भाव का प्रतीक है? अपने शब्दों में लिखिए।
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काव्यबोध पर आधारित प्रश्न
प्रश्न 1.
‘तरु-तृण वन लता’ किसके प्रतीक हैं?
प्रश्न 2.
प्राण प्रणव ओंकार का क्या अर्थ है?
प्रश्न 3.
हिमालय को किस रूप में चित्रित किया गया है?
प्रश्न 4.
गंगा नदी को ‘हार’ के रूप में चित्रित करने का आशय स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 5.
काव्यांश में प्रकृति के माध्यम से भारतमाता का चित्रण कैसे किया गया है?
प्रश्न 6.
काव्यांश में व्यक्त राष्ट्रगौरव की भावना पर प्रकाश डालिए।