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Sanskrit Class 8 Chapter 8 Hindi Translation पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम् Summary
पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम् Meaning in Hindi
Class 8 Sanskrit Chapter 8 Summary Notes पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम्
इस पाठ में भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित आठ राज्यों का वर्णन प्राप्त होता है। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र, जिसमें अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम ये आठ राज्य सम्मिलित हैं, देश का एक विशेष और अद्वितीय भू–भाग है। ‘अष्ट्रभ्रातृभगिन्यः’ अथवा ‘सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च’ के नाम से प्रसिद्ध ये राज्य भारत के पूर्वी छोर पर स्थित हैं और दक्षिण – पूर्व एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में माने जाते हैं।
Class 8 Sanskrit Chapter 8 Hindi Translation पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम्
(1) अरुणाचलप्रदेशः, असमः, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड, त्रिपुरा एवञ्च सिक्किमः इत्येतानि अष्टराज्यानि देशस्य पूर्वोत्तरभागे स्थितानि। एतानि राज्यानि भारतस्य केवलं स्थानविशेषत्वेन न, अपितु सांस्कृतिक-ऐतिहासिक-विविधतायाः कारणेन विशेषमहत्त्वं वहन्ति । एषां प्रदेशानां प्राकृतिकं सौन्दर्य, समुदायानां विविधता, भौगोलिक – पर्यावरणीयं वैचित्र्यं च देशस्य अन्येभ्यः भागेभ्यः पृथक् अस्ति।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- एवञ्च – और/ तथा (And),
- विविधताया: – भिन्न प्रकार के (Different types of),
- समुदायानां समुदायों की (Of communities),
- वैचित्र्यं-विचित्रता (Uniqueness),
- भागेभ्य: – भागों से (From parts)।
सरलार्थ-
अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम – ये आठों राज्य देश के पूर्वोत्तर भाग में स्थित हैं। ये राज्य भारत के केवल स्थान नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और विविधता के कारण भी विशेष महत्व रखते हैं। इन प्रदेशों की प्राकृतिक सुंदरता, समुदायों की विविधता और भौगोलिक एवं पर्यावरणीय विचित्रता देश के अन्य भागों से अलग हैं।

(2) पर्वतैः नदीभिः च सुशोभितानि एतानि राज्यानि पूर्वहिमालय – श्रेणिषु पत्काई – नागपर्वत- प्रदेशे च स्थितानि । एतेषु बराक-ब्रह्मपुत्रादि-नद्यः प्रवहन्ति एवञ्च पर्वतश्रेण्यः, पीठस्थलानि, निम्नपर्वताः, उपत्यकाः च अस्मिन् भू-भागे भू-वैविध्यं धारयन्ति। प्राकृतिक-सम्पदाभिः समृद्धः अयं प्रदेश: पूर्व-दक्षिणपूर्व एशियायाः द्वारम् अस्ति । तानि राज्यानि अष्टभ्रातृभगिन्यः इति नाम्ना प्रसिद्धानि सन्ति । तानि एव ‘अष्टभगिन्यः’ अथवा ‘सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च’ इति कथ्यन्ते।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- प्रवहन्ति – बहती हैं (Flow),
- पीठस्थलानि – पठार (Plateau),
- भू-वैविध्यं -भूमि की विविधता (Land diversity)।
सरलार्थ-
पर्वतों और नदियों से सुशोभित ये राज्य पूर्व- हिमालय की श्रृंखलाओं में ‘पत्काई – नागपर्वत’ क्षेत्र में स्थित हैं। इन राज्यों में बराक, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ बहती हैं और यहाँ पर्वत श्रृंखलाएँ, पठारी क्षेत्र, लघु पर्वत तथा घाटियाँ इस भू-भाग में भूमि की विविधता को धारण करती हैं। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध यह क्षेत्र पूर्व-दक्षिणपूर्व एशिया का द्वार है। ये राज्य आठ भाई-बहन के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्हें ही ‘आठ बहनें’ या ‘सात बहनें और एक भाई’ कहा जाता है।
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(1) अध्यापिका – सुप्रभातं छात्राः।
छात्रा: – सुप्रभातम् आचार्ये।
अध्यापिका – शुभाशयाः। अद्य किं पठनीयम् ?
छात्रा: – वयं सर्वे स्वदेशस्य राज्यानां विषये ज्ञातुमिच्छामः।
अध्यापिका – शोभनम्। वदत, अस्माकं देशे कति राज्यानि सन्ति?
स्वरा – महोदये ! मम भगिनी कथयति यत् अस्माकं देशे अष्टाविंशति: राज्यानि सन्ति इति । एतद् अतिरिच्य अष्टकेन्द्रशासित प्रदेशाः अपि सन्ति ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- स्वदेशस्य-अपने देश का (Of our country),
- ज्ञातुम् – जानने के लिए (To know),
- अतिरिच्य- इसके अतिरिक्त (Besides),
- केन्द्रशासित प्रदेशा:- केंद्र द्वारा शासित प्रदेश (Union territories)।
सरलार्थ-
अध्यापिका – सुप्रभात, बच्चो!
छात्रा – सुप्रभात, आचार्या!।
अध्यापिका – शुभकामनाएँ। आज क्या पढ़ना है?
छात्रा – हम सभी अपने देश के राज्यों के विषय में जानना चाहते हैं।
अध्यापिका – बहुत सुंदर। बताओ, हमारे देश में कितने राज्य हैं ?
स्वरा – महोदया! मेरी बहन कहती है कि हमारे देश में अट्ठाईस ( 28 ) राज्य हैं। इसके अतिरिक्त आठ (8) केंद्र शासित प्रदेश भी हैं।
(2) अध्यापिका – शोभनं स्वरे! सम्यक् जानाति तव भगिनी । भवतु, अपि यूयं जानीथ यद् एतेषु राज्येषु अष्टराज्यानाम् एकः समवायोऽस्ति यः सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च इति नाम्ना प्रथितः अस्ति ।
सर्वे छात्राः – (परस्परं साश्चर्यं पश्यन्तः) सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च!
श्रीशः – इमानि राज्यानि सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च इति किमर्थं कथ्यन्ते?
अध्यापिका – प्रयोगोऽयं प्रतीकात्मको वर्तते । कदाचित् सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्यानां साम्याद् भौगोलिकवैशिष्ट्यात् च इमानी उक्तोपाधिना प्रथितानि ।
सर्वे छात्राः – अहो! अत्यन्तं सुखकरी वार्ता । श्रावयतु तावद् यत् कानि तानि राज्यानि इति ?
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- जानीथ – जानते हैं (to know),
- समवाय: – समूह (Combination),
- प्रथितः – प्रसिद्ध (Famous),
- प्रतीकात्मको-प्रतीकात्मक (Symbolic),
- साम्याद् – समानता के कारण (Because of similarity),
- उक्तोपाधिना – दिए हुए नाम से (By the given name)।
सरलार्थ-
अध्यापिका – बहुत अच्छा स्वरा! सही कहती है तुम्हारी बहन । अच्छा, तुम सब भी जानते हो इन राज्यों में से आठ राज्यों का एक समूह है जो ‘सांत बहनें और एक भाई’ के नाम से प्रसिद्ध है।
सभी छात्र – (आपस में आश्चर्य से देखते हुए) सात बहनें और एक भाई !
श्रीश – इन राज्यों को ‘सात बहनें और एक भाई’ क्यों कहा जाता है ?
अध्यापिका – यह प्रयोग प्रतीकात्मक है। कभी-कभी सामाजिक, सांस्कृतिक परिदृश्यों की समानता और भौगोलिक विशेषताओं के कारण ये राज्य इस उपाधि से प्रसिद्ध हुए हैं।
सभी छात्र – अरे वाह! बहुत सुख की बात है । बताइए, वे सब राज्य कौन-कौन से हैं?

(3) अध्यापिका – अद्वयं मत्रयं चैव न-त्रि- युक्तं तथाद्वयम् ।
सप्तराज्यसमूहोऽयं भगिनीसप्तकं मतम् ।
तेन युक्तो लघुः भ्राता सिक्किमः इति विश्रुतः ।
पश्यत कोणमैशान्य भारतस्य मनोहरम् ॥
इत्थं भ्रात्रा सिक्किमेन सह भगिनीसप्तके इमानि राज्यानि सन्ति – अरुणाचलप्रदेशः, असम, मणिपुरम्, मिजोरमः, मेघालय:, नागालैण्ड, त्रिपुरा चेति । यद्यपि क्षेत्रपरिमाणैः इमानि लघूनि वर्तन्ते तथापि गुणगौरवदृष्ट्या बृहत्तराणि प्रतीयन्ते।
सर्वे छात्राः – कथं मान्ये!
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- कोणमैशान्यं – पूर्वोत्तर कोना (North-east corner ),
- परिमाणैः – मापों द्वारा (By measurement),
- प्रतीयन्ते–वे प्रतीत होते हैं (They seem to be)।
सरलार्थ-
अध्यापिका -अ से दो, म से तीन, न और त्रि से युक्त दो, इन सात राज्यों का समूह सात बहनों के नाम से जाना जाता है। इनके साथ छोटा भाई सिक्किम नाम से प्रसिद्ध है। देखो! यह भारत का अत्यंत सुंदर पूर्व – उत्तर (कोना) भाग है।
इस प्रकार भाई सिक्किम के साथ सात बहनों रूपी ये शांमिल हैं- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा । यद्यपि क्षेत्रफल की दृष्टि से ये छोटे हैं, फिर भी गुण और गरिमा से ये बड़े प्रतीत होते हैं।
सभी छात्र – कैसे आचार्या?
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(4) अध्यापिका – भ्रात्रा सह इमाः सप्तभगिन्यः स्वीये प्राचीनेतिहासे प्रायः स्वाधीनाः एव दृष्टाः । न केनापि शासकेन इमाः स्वायत्तीकृताः । विविध संस्कृतिविशिष्टायां भारतभूमौ एतासां भ्रातृ-भगिनीनां संस्कृतिः महत्त्वाधायिनी वर्तते ।
स्वरा – अन्यत् किमपि वैशिष्ट्यमस्ति एतासाम् ?
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- स्वाधीन :- स्वतंत्र (Independent),
- स्वायत्तीकृताः – अपने अधीन किए गए (Captural autonomous)।
सरलार्थ-
अध्यापिका – भाई (सिक्किम) के साथ ये सात बहनें अपने प्राचीन इतिहास में प्रायः स्वतन्त्र ही देखी गई हैं। इन्हें कोई भी शासक पूरी तरह अपने अधीन नहीं कर सका। भारत – भूमि की विभिन्न सांस्कृतिक विशेषताओं में इन भाई – बहनों की संस्कृति अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण है।
स्वरा – क्या इनकी कोई और विशेषताएँ भी हैं ?
(5) अध्यापिका – नूनम् अस्ति एव। पर्वत – वृक्ष – पुष्प – प्रभृतिभिः प्राकृतिकसम्पद्भिः सुसमृद्धानि सन्ति इमानि राज्यानि । भारतवृक्षे पुष्प – स्तबकसदृशानि विराजन्ते एतानि । अस्ति तावदेतेषां विषये किञ्चिद वैशिष्ट्यमपि कथनीयम् । सावहितमनसा शृणुत। जनजातिबहुलप्रदेशो ऽयम् । गारो – खासी – नागा-मिजो – लेप्चा-प्रभृतयः बहवः जनजातीयाः अत्र निवसन्ति। शरीरेण ऊर्जस्विनः एतत्प्रादेशिका : बहुभाषाभिः समन्विताः, पर्वपरम्पराभिः परिपूरिताः, स्वलीला – कलासु च निष्णाताः सन्ति।
मालती – महोदये! तत्र तु वंशवृक्षाणां वनानि अपि प्राप्यन्ते ?
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- प्राकृतिकसम्पद्भिः – प्राकृतिक संपत्तियों से (With natural resources),
- पुष्प – स्तबकसदृशानि – फूलों के गुच्छों के समान (As bunch of flowers),
- सावहितमनसा – ध्यानपूर्वक (With attention ),
- ऊर्जस्विनः – शक्तिशाली (Energetic),
- पर्वपरम्पराभिः-उत्सवों की परंपरा से (With festive traditions),
- परिपूरिताः – भरपूर (Full of),
- निष्णाता: – निपुण (Expert/Master)।
सरलार्थ-
अध्यापिका – निश्चित ऐसा ही है। ये सभी राज्य पर्वतों, वृक्षों, फूलों आदि प्राकृतिक संपत्तियों से समृद्ध हैं। ये भारतीय वृक्ष पर लगे फूलों के गुच्छों की तरह शोभायमान हैं। इनके विषय में कुछ विशेषताएँ भी उल्लेखनीय हैं। ध्यानपूर्वक सुनो। यह क्षेत्र जनजातियों से भरपूर है। गारो, खासी, नागा, मिजो, लेप्चा आदि बहुत सी जनजातियाँ यहाँ निवास करती हैं। इन क्षेत्रों के निवासी शरीर से बलवान, अनेक भाषाओं में पारंगत, पर्वों की परंपराओं से समृद्ध और अपनी लोक-कलाओं में निपुण होते हैं।
मालती – आचार्या! वहाँ तो वंश परंपरा से जुड़े वन, वृक्ष भी पाए जाते होंगे ?
(6) अध्यापिका – आम्। प्रदेशेऽस्मिन् हस्तशिल्पानां बाहुल्यं वर्तते । आवस्त्राभूषणेभ्यः गृहनिर्माणपर्यन्तं प्रायः वंशवृक्षनिर्मितानां वस्तूनाम् उपयोगः क्रियते । यतो हि अत्र वंशवृक्षाणां प्राचुर्यं विद्यते । साम्प्रतं वंशोद्योगोऽयम् अन्ताराष्ट्रियख्यातिम् अवाप्तोऽस्ति।
अभिनवः – भ्रातृ-भगिनीप्रदेशोऽयं बह्वाकर्षकः इति प्रतीयते।
मृदुलः – मान्ये! किं भ्रमणाय भ्रातृ-भगिनीप्रदेशोऽयं समीचीन : ?
सर्वे छात्राः – (उच्चैः) महोदये! आगामिनि अवकाशे वयं तत्रैव गन्तुमिच्छामः।
स्वरा – आचार्ये! भवती अपि अस्माभिः सार्द्धं चलतु किल।
अध्यापिका – रोचते मेऽयं विचारः । एतानि राज्यानि तु भ्रमणार्थ स्वर्गसदृशानि सन्ति । अतः अवश्यं चलामः।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- वंशवृक्षाणां – बाँस के वृक्षों के (Of bamboo trees),
- बह्वाकर्षकः – अत्यधिक आकर्षक (Very attractive)।
सरलार्थ-
अध्यापिका – हाँ। इस प्रदेश में बहुत से हस्तशिल्प हैं। वस्त्रों और आभूषणों से लेकर घरों के निर्माण तक, प्रायः बांस (वंश वृक्ष) से बनी वस्तुओं का ही उपयोग किया जाता है, क्योंकि यहाँ बांस के वृक्ष बहुतायत में उपलब्ध हैं। आजकल यह बांस – उद्योग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँच चुका है।
अभिनव – भाई-बहन जैसे ये राज्य बहुत ही आकर्षक प्रतीत होते हैं।
मृदुल – महोदया! क्या भ्रमण के लिए यह भाई-बहन प्रदेश उपयुक्त है ?
सभी छात्र – (उच्च स्वर में ) महोदया ! अगले अवकाश में हम सब वहाँ जाने की इच्छा रखते हैं।
स्वरा – आचार्ये! आप भी हमारे साथ चलिए।
अध्यापिका – मुझे यह विचार पसंद आया। ये सभी राज्य वास्तव में यात्रा के लिए स्वर्ग के समान हैं। इसलिए अवश्य ही चलेंगे।

अत्र इदम् अवधेयम्
(यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए )
यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि कुल दस दिशाएँ होती हैं-
पूर्वाग्नेयी दक्षिणा च नैर्ऋती पश्चिमा तथा ।
वायवी चोत्तरैशानी ऊर्ध्वा चाधो दिशो दश ॥
पूर्वा – पूर्व
दक्षिणा – दक्षिण
पश्चिमा – पश्चिम
उत्तरा – उत्तर
ऊर्ध्वा – ऊपर की दिशा
- आग्नेयी – दक्षिण-पूर्व दिशा
- नैऋती – दक्षिण-पश्चिम दिशा
- वायवी – उत्तर-पश्चिम दिशा
- ईशानी – उत्तर-पूर्व दिशा
- अधः – नीचे की दिशा
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Class 8 Sanskrit Chapter 8 संसारसागरस्य नायकाः Summary Notes
संसारसागरस्य नायकाः Summary
अनुपम मिश्र की एक प्रसिद्ध रचना है-आज भी खरे हैं तालाब। प्रस्तुत पाठ इस रचना के ‘संसार सागर के नायक’ नामक अध्याय से संगृहीत है। यहाँ लेखक ने मानव निर्मित तालाब आदि को संसार सागर का नाम दिया है। इसमें विलुप्त हो रहे पारम्परिक ज्ञान और शिल्प के धनी गजधर के सम्बन्ध में चर्चा की गई है।पाठ का सार इस प्रकार है

सैकड़ों हजारों तालाबों का निर्माण अपने आप नहीं हुआ है। हम उन महान् शिल्पकारों को भूल गए हैं। ये तालाब ही संसार सागर हैं। नूतन समाज ने इन कलाकारों को भुला दिया है।प्रतिदिन नई-नई विधियों का आविष्कार हो रहा है, परन्तु किसी को भी ज्ञात नहीं है कि पूर्व निर्मित इन निर्माणों की गहराई को कौन माप सकता है। आज जो अज्ञात नाम हैं, वे पहले बहुत प्रसिद्ध थे। सम्पूर्ण देश में ये कलाकार निवास करते थे।

तालाबों को बनाने वालों के लिए ‘गजधर’ यह सम्मानसूचक शब्द था। जो गज भर माप को धारण करते थे, उन्हें ‘गजधर’ कहा जाता है। ये गजधर समाज की गहराई को भी मापते थे। इसलिए वे संसार सागर के नायक थे।
संसारसागरस्य नायकाः Word Meanings Translation in Hindi
मूलपाठः, अन्वयः, शब्दार्थः सरलार्थश्च ।
(क) के आसन् ते अज्ञातनामानः?
शतशः सहस्रशः तडागाः सहसैव शून्यात् न प्रकटीभूताः। इमे एव तडागाः अत्र संसारसागराः इति। एतेषाम् आयोजनस्य नेपथ्ये निर्मापयितृणाम् एककम्, निर्मातॄणां च दशकम् आसीत्। एतत् एककं दशकं च आहत्य शतकं सहस्रं वा रचयतः स्म। परं विगतेषु द्विशतवर्षेषु नूतनपद्धत्या समाजेन यत्किञ्चित् पठितम्। पठितेन तेन समाजेन एककं दशकं सहस्रकञ्च इत्येतानि शून्ये एव परिवर्तितानि।
शब्दार्थ-
के-कौन।
आसन्-थे।
अज्ञातनामान:-अज्ञात (अपरिचित) नाम वाले।
शतशः-सैकड़ों।
सहस्त्रशः-हजारों (Thousands)।
तडागाः-अनेक तालाब।
सहसैव-अचानक ही।
प्रकटीभूताः-प्रकट हुए।
इमे एव-ये ही।
एतेषाम्-इनका।
नेपथ्ये-पर्दे के पीछे।
निर्मापयितृणाम्-बनवाने वालों का।
एककम्-इकाई (Unit, Ones)।
निर्मातृणाम्-बनाने वालों का।
दशकम्-दहाई (Tens)
आहत्य-गुणित होकर (Multiply)।
रचयतः-रचना करते हैं (Creation)।
विगतेषु-बीते हुए (पिछले)।
द्विशतवर्षेषु-दो सौ सालों में।
नूतन०-नई विधि से।
पठितेन-पढ़े हुए के द्वारा।
शून्ये-शून्य में (Zero)
परिवर्तितानि-परिवर्तित हो गए हैं (Changed)।
शतकम्-सैकड़ा।
यत्किञ्चित्-जो कुछ।
सहस्त्रकम्-हजार।
सरलार्थ-
वे अज्ञात नाम वाले कौन थे? सैकड़ों व हजारों तालाब अचानक ही शून्य से प्रकट नहीं हुए हैं। ये तालाब ही यहाँ संसार सागर हैं। इनके आयोजन का पर्दे के पीछे बनाने वालों की इकाई और बनने वालों की दहाई थी। यह इकाई व दहाई गुणित होकर सौ तथा हजार की रचना करते थे। परन्तु बीते हुए दो सौ वर्षों में नई पद्धति के द्वारा समाज ने जो कुछ पढ़ा है। उस पठित समाज ने इकाई, दहाई और हजार को शून्य में ही बदल दिया है।
(ख) अस्य नूतनसमाजस्य मनसि इयमपि जिज्ञासा नैव उद्भूता यद् अस्मात्पूर्वम् एतावतः तडागान् के रचयन्ति स्म। एतादृशानि कार्याणि कर्तुं ज्ञानस्य यो नूतनः प्रविधिः विकसितः, तेन प्रविधिनाऽपि पूर्व सम्पादितम् एतत्कार्यं मापयितुं न केनापि प्रयतितम्। अद्य ये अज्ञातनामानः वर्तन्ते, पुरा ते बहुप्रथिताः आसन्। अशेषे हि देशे तडागाः निर्मीयन्ते स्म, निर्मातारोऽपि अशेषे देशे निवसन्ति स्म।
शब्दार्थ-
मनसि-मन में।
नैव-न ही।
उद्भूता-उत्पन्न हुई।
अस्मात्-इससे।
एतावतः-इन (को)।
के-कौन।
एतादृशानि-ऐसे (इस प्रकार के)।
कर्तुम्-करने के लिए।
प्रविधिः-विधि (Method)।
सम्पादितम्-बनाया गया।
मापयितुम्-मापने के लिए।
प्रयतितम्-प्रयत्न किया (Tried)।
बहुप्रथिताः-बहुत प्रसिद्ध (Very Famous)।
अशेषे-सम्पूर्ण (Whole)।
निर्मीयन्ते स्म-बनाए जाते थे।
नूतनसमाजस्य-नए समाज के।
इयमपि-यह भी।
जिज्ञासा-जानने की इच्छा।
केनापि-किसी ने भी।
पुरा-पहले, प्राचीन काल में।
निर्मातारः-बनाने वाले।
सरलार्थ-
इस नये समाज के मन में यह जानने की इच्छा भी नहीं उत्पन्न हुई कि इससे पहले इन तालाबों को किसने बनाया था। ऐसे कार्यों को करने के लिए ज्ञान की जो नई विधि विकसित हुई उस विधि के द्वारा भी पहले बनाए गए इस कार्य को मापने के लिए किसी ने भी प्रयास नहीं किया। आज जो अज्ञात नाम हैं, पहले वे बहुत प्रसिद्ध थे। सम्पूर्ण देश में तालाब बनाए जाते थे। उन्हें बनाने वाले भी सम्पूर्ण देश में निवास करते थे।
(ग) गजधरः इति सुन्दरः शब्दः तडागनिर्मातॄणां सादरं स्मरणार्थम्। राजस्थानस्य केषुचिद् भागेषु शब्दोऽयम् अद्यापि प्रचलति। कः गजधरः? यः गजपरिमाणं धारयति स गजधरः। गजपरिमाणम् एव मापनकार्ये उपयुज्यते। समाजे त्रिहस्त-परिमाणात्मिकीं लौहयष्टिं हस्ते गृहीत्वा चलन्तः गजधराः इदानीं शिल्पिरूपेण नैव समादृताः सन्ति। गजधरः, यः समाजस्य गाम्भीर्यं मापयेत् इत्यस्मिन् रूपे परिचितः।
शब्दार्थ-
स्मरणार्थम्-याद करने के लिए।
अद्यापि-आज भी।
परिमाणम्-माप को (Measurement)।
उपयुज्यते-उपयोग किया जाता है (Used)।
परिमाणात्मिकी-माप वाली।
गृहीत्वा-लेकर।
इदानीम् – अब।
समादृताः-आदर को प्राप्त (Honoured)।
मापयेत्-माप ले।
त्रिहस्त-तीन हाथ।
केषुचिद्-कुछ।
प्रचलति-चलता है।
धारयति-धारण करता है (Bears)।
यष्टि०-छड़ी।
चलन्तः-चलते हुए।
नैव-नहीं।
गाम्भीर्यम्-गहराई को (Depth)।
गजधरः-गज (लम्बाई, चौड़ाई, गहराई, मोटाई मापने की लोहे की छड़) को रखने वाला व्यक्ति।
तडागनिर्मातृणाम्-तालाब बनाने वालों के।
सादरं-आदर के साथ।
सरलार्थ-
‘गजधर’ यह सुन्दर शब्द तालाबों को बनाने वालों के सादर स्मरण के लिए है। राजस्थान के कुछ भागों में यह शब्द आज भी चलता है। (यह) गजधर कौन है? जो हाथी (गज = 3 फुट) के माप को धारण करता है, वह गजधर है। मापन कार्य में गज का माप ही उपयोग किया जाता है। समाज में तीन हाथ के माप वाली लोहे की छड़ी को हाथ में लेकर चलते हुए गजधर अब शिल्पी के रूप में आदर नहीं पाते हैं। जो समाज की गहराई (गंभीरता) को मापे-इसी रूप में जाने जाते हैं।
(घ) गजधराः वास्तुकाराः आसन्। कामं ग्रामीणसमाजो भवतु नागरसमाजो वा तस्य नव-निर्माणस्य सुरक्षाप्रबन्धनस्य च दायित्वं गजधराः निभालयन्ति स्म। नगरनियोजनात् लघुनिर्माणपर्यन्तं सर्वाणि कार्याणि एतेष्वेव आधृतानि आसन्। ते योजनां प्रस्तुवन्ति स्म, भाविव्ययम् आकलयन्ति स्म, उपकरणभारान् सगृह्णन्ति स्म। प्रतिदाने ते न तद् याचन्ते स्म यद् दातुं तेषां स्वामिनः असमर्थाः भवेयुः। कार्यसमाप्तौ वेतनानि अतिरिच्य गजधरेभ्यः सम्मानमपि प्रदीयते स्म। नमः एतादृशेभ्यः शिल्पिभ्यः।
शब्दार्थ –
वास्तुकाराः-भवन आदि का निर्माण करने वाले (Architects)।
कामम्-भले ही (चाहे)।
पर्यन्तम्-तक।
निभालयन्ति स्म-निभाते थे।
एतेष्वेव-इनमें ही।
सर्वाणि-सब। प्रस्तुवन्ति
स्म-प्रस्तुत करते थे।
आधृतानि-आधारित (Based)।
आकलयन्ति स्म-आकलन (अनुमान) करते
भाविव्ययम्-होने वाले खर्च को।
उपकरणभारान्-साधन सामग्री को (Means)।
सगृह्णन्ति स्म-संग्रह करते थे (Collected)
प्रतिदाने-बदले में (Obligation)
असमर्थाः-असमर्थ (Incapable)
भवेयुः-हों।
अतिरिच्य-अतिरिक्त (Extra)
प्रदीयते स्म-प्रदान किया जाता था (Given)
नमः-नमस्कार। वा-अथवा।
सरलार्थ-
गजधर भवननिर्माण करने वाले होते थे। भले ही, ग्रामीण समाज हो अथवा नगरीय समाज हो, उसके नवनिर्माण का और सुरक्षाप्रबन्धन का दायित्व गजधर निभाते थे। नगर नियोजन से लेकर छोटे निर्माणकार्य तक सभी कार्य इन पर ही आधारित थे। वे योजना को प्रस्तुत करते थे, भावी व्यय का अनुमान करते थे तथा साधन सामग्री का संग्रह करते थे। बदले में वे वह नहीं माँगते थे, जो उनके स्वामी न दे सकें। कार्य की समाप्ति पर वेतन से अतिरिक्त गजधरों को सम्मान भी प्रदान किया जाता था। ऐसे शिल्पियों को नमस्कार।