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Class 9 Hindi Chapter 10 भारति, जय, विजयकरे Question Answer
भारति, जय, विजयकरे Class 9 Question Answer
Class 9 Ganga Chapter 10 Question Answer – Class 9 Hindi भारति, जय, विजयकरे Question Answer
अभ्यास (पृष्ठ 168-174)
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
प्रश्न 1.
“भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से-
(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।
(ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है।
(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
(घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।
उत्तर:
(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
तर्क – इस कविता में भारत की प्राकृतिक सुंदरता (गंगा, हिमालय), समृद्धि (कनक – शस्य) और आध्यात्मिकता (ओंकार) का
गुणगान है।
प्रश्न 2.
“कनक- शस्य कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है-
(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
(ख) भारत की नदियों का सौंदर्य
(ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता
(घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास
उत्तर:
(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
तर्क – ‘कनक- शस्य’ का शाब्दिक अर्थ है- सोने जैसी फसलें। यह भारत की कृषि प्रधानता और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि भारत भूमि फसलों और प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण है।
प्रश्न 3.
समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं-
(क) गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले
(ख) गर्जितोर्मि सागर – जल / धोता शुचि चरण युगल
(ग) भारति, जय, विजयकरे / कनक-शस्य-कमलधरे!
(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार / शतमुख-शतरव-मुखरे!
उत्तर:
(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार / शतमुख-शतरव-मुखरे!
तर्क – इन पंक्तियों में बताया गया है कि भारत की कीर्ति और संदेश केवल देश तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे विश्व में गूँज रहे हैं। यह भारत के वैश्विक प्रभाव और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है।
प्रश्न 4.
कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
(क) सरल, बोल-चाल की भाषा
(ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त
(ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण
(घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक
उत्तर:
(ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त
तर्क – कविता में ‘गर्जितोर्मि’, ‘हिम-तुषार’, ‘ज्योतिर्जल’, ‘शुचि – चरण – युगल’ जैसे तत्सम और सामासिक शब्दों का प्रयोग किया है, जो भाषा को गंभीर और भव्य बनाते हैं।
प्रश्न 5.
भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
(ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम
(ग) ऐतिहासिक और भौगालिक
(घ) सामाजिक और राजनीतिक
उत्तर:
(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
तर्क – प्रकृति को वस्त्र और नदियों को आभूषण बताना यह संदेश देता है कि हमारी संस्कृति प्रकृति से अभिन्न है और इसका संरक्षण हमारी पहचान है।
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अर्थ और भाव
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए।
(क) “लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर जल
धोता शुचि चरण युगल !”
उत्तर:
अर्थ – कवि भारत माता के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि भारत के दक्षिण में स्थित लंका उनके चरणों के नीचे एक कमल के पुष्प के समान सुशोभित है। विशाल सागर का जल अपनी गर्जना करती हुई लहरों के साथ निरंतर भारत माता के उन दोनों पवित्र चरणों को धो रहा है।
भाव – इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने भारत की भौगोलिक स्थिति को एक आध्यात्मिक और श्रद्धापूर्ण रूप दिया है। सागर द्वारा चरणों को धोना इस भाव को दर्शाता है कि प्रकृति स्वयं भारत माता की सेवा में लीन है। समुद्र भारत माता के पवित्र चरणों को धो रहा है। ‘लंका पदतल शतदल’ कहकर कवि ने भारत के है, जहाँ लंका भारत के मानचित्र का सुंदर चित्रण किया
चरणों में एक छोटे और सुंदर द्वीप (कमल) की तरह स्थित है। ‘शुचि’ शब्द का प्रयोग यह बताता है कि भारत की भूमि केवल एक भू-भाग नहीं बल्कि एक पवित्र अस्तित्व है, जिसकी मर्यादा और शुचिता की रक्षा स्वयं समुद्र करता है। ‘गर्जितोर्मि’ शब्द से समुद्र की विशालता और उसकी शक्ति का बोध होता है, जो भारत माता के चरणों में अपनी शक्ति को समर्पित कर रहा है। यहाँ प्रकृति और राष्ट्र के प्रति अगाध श्रद्धा का संगम है, जहाँ भौगोलिक सत्य को काव्य की कल्पना से वंदनीय बना दिया गया है।
(ख) “प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख- शतरव – मुखरे!”
उत्तर:
अर्थ – कवि कहते हैं कि भारत माता के प्राण स्वयं ‘ॐ’ (प्रणव ओंकार) की पवित्र ध्वनि में बसे हैं। भारत की यह उदार और महान आध्यात्मिक शक्ति सभी दिशाओं में गूँज रही है। भारत का गौरव और ज्ञान सैकड़ों मुखों और सैकड़ों स्वरों के माध्यम से पूरी दुनिया में मुखरित (प्रकट) हो रहा है।
भाव – इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को रेखांकित किया है। भारत को केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि ‘ओंकार’ का स्वरूप माना गया है। ‘ॐ’ भारतीय दर्शन में ब्रह्म का प्रतीक है, अत- भारत को ज्ञान और धर्म की जन्मस्थली बताया गया है। ‘ध्वनित दिशाएँ उदार’ का अर्थ है कि भारत का ज्ञान और शांति का संदेश किसी एक कोने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण विश्व (सभी दिशाओं) में फैला है। ‘शतमुख – शतरव’ का प्रयोग यह दर्शाता है कि भारत की महिमा का गुणगान करने वाले अनगिनत लोग हैं। और इसकी सांस्कृतिक विरासत अत्यंत विविधतापूर्ण और प्रभावशाली है। इन पंक्तियों में ‘प्राण’ शब्द यह संकेत देता है कि भारत एक जीवित और जागृत राष्ट्र है, जिसकी आत्मा में वेदों और उपनिषदों का सार गूँजता है। यहाँ कवि ने भारत माता को एक ऐसी देवी के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसकी आध्यात्मिक गूँज पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह भारत के गौरवशाली अतीत और उसके गौरवमय वर्तमान का संगम है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए।
प्रश्न 1.
कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
उत्तर:
कविता में निराला जी की प्रगाढ़ देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव की भावना प्रकट होती है। उन्होंने भारत को केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि साक्षात देवी के रूप में चित्रित किया है। वे भारत की प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण प्रकट करते हुए उसे विजयी देखने की मंगलकामना करते हैं।
प्रश्न 2.
कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
उत्तर:
कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का दिव्य मानवीकरण किया गया है। कवि ने हिमालय को ‘शुभ्र मुकुट’, गंगा को ‘धवल हार’ और वनों लताओं को भारत माता के ‘वस्त्र’ के रूप में चित्रित किया है। मेरा मानना है कि प्रकृति संरक्षण ही वास्तविक देशप्रेम है, क्योंकि राष्ट्र का अस्तित्व उसकी नदियों, मिट्टी और हरियाली पर टिका होता है। प्राकृतिक संपदा की रक्षा करना न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाना है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन और देश की खुशहाली को सुरक्षित करना भी है।
प्रश्न 3.
“कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन- किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
उत्तर:
‘कनक-शस्य कमलधरे’ पंक्ति भारतभूमि की भौतिक और आध्यात्मिक संपन्नता को दर्शाती है। ‘कनक’ शब्द देश की स्वर्ण जैसी समृद्धि और गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है। ‘शस्य’ यहाँ की उपजाऊ धरती और लहलहाती फसलों की ओर संकेत करता है, जो भारत के कृषि प्रधान और खुशहाल स्वरूप को उजागर करता है। वहीं ‘कमलधरे’ भारत की सांस्कृतिक पवित्रता, सौंदर्य और ज्ञान का परिचायक है। समग्र रूप से, यह पंक्ति भारत को एक ऐसी दिव्य भूमि बताती है जो धन-धान्य से परिपूर्ण, हरी-भरी और अत्यंत पावन है।
प्रश्न 4.
“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
उत्तर:
कविता में हिमालय को भारत माता का ‘मुकुट’ इसलिए कहा गया है क्योंकि वह देश के उत्तर में सर्वोच्च स्थान पर स्थित है, जैसे शरीर में मस्तक पर मुकुट होता है। ‘शुभ्र हिम-तुषार’ का अर्थ है श्वेत बर्फ, जो चाँदी की तरह चमकते हुए मुकुट की आभा देती है। यह न केवल भारत की भौगोलिक श्रेष्ठता और गौरव का प्रतीक है, बल्कि एक रक्षक के रूप में देश की सीमाओं की मर्यादा और पवित्रता को भी गरिमा प्रदान करता है।
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विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
नीचे दी गई पंक्तियों को पढ़िए-
“भारति, जय, विजयकरे!
कनक- शस्य- कमलधरे!”
इन पंक्तियों में कवि ने चित्रात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए भारतभूमि का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। इस कविता की कुछ अन्य विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। कविता में से उन विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए-

उत्तर:
| विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
| प्रकृति का मानवीकरण | “तरु-तृण वन लता वसन”, “धोता शुचि चरण युगल” |
| आलंकारिक प्रयोग | “लंका पदतल शतदल” (रूपक अलंकार), “कनक शस्य कमलधरे” (अनुप्रास अलंकार) |
| समस्त पद / सामासिक पद का प्रयोग | “हिम-तुषार”, “कनक- शस्य”, “ज्योतिर्जल-कण” |
| संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग | “शुचि चरण युगल”, “गर्जितोमिं सागर-जल”, “प्राण प्रणव ओंकार” |
विषयों से संवाद
प्रश्न 1.
स्वतंत्रता- पूर्व लिखी इस कविता में भारत का ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक / परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?
उत्तर:
यदि मुझे वर्तमान संदर्भ में भारत को प्रस्तुत करना हो, तो मैं ज्ञान, कृषि और संस्कृति के साथ-साथ निम्नलिखित विशेषताओं को सम्मिलित करूँगा / करूँगी-
उत्तर:
- तकनीकी और डिजिटल शक्ति – भारत आज ‘डिजिटल इंडिया’ और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व कर रहा है।
- वैज्ञानिक प्रगति – अंतरिक्ष अनुसंधान (ISRO) और मिसाइल तकनीक में भारत की आत्मनिर्भरता।
- युवा शक्ति – विश्व का सबसे युवा देश होने के नाते भारत की नवाचार और उद्यमिता की क्षमता।
- लोकतांत्रिक विविधता – विभिन्न भाषाओं, धर्मों और विचारधाराओं के बावजूद ‘विविधता में एकता’ का जीवंत उदाहरण।
प्रश्न 2.
“शतमुख-शतरव-मुखरे!” पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना को साकार करते हैं?
उत्तर:
‘शतमुख-शतरव मुखरे’ का अर्थ है-सैकड़ों मुखों और सैकड़ों आवाज़ों से गूँजता हुआ। भारत के विभिन्न त्योहारों (ईद, दीवाली, पोंगल) उत्सव और रीति-रिवाज भारत के प्रतीक हैं। अलग-अलग त्योहार, भाषाएँ और परंपराएँ मिलकर भारत की एकता को मजबूत करते हैं। विविधता में एकता ही भारत की पहचान है। इनका मूल उद्देश्य भाईचारा और सामूहिकता है। इस प्रकार, एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना साकार होती है।
प्रश्न 3.
भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान- परंपरा के महत्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर:
भारत को सुदृढ़ बनाने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। भारत की प्रकृति-नदियाँ, पर्वत, वन और उपजाऊ भूमि न केवल जीवन का आधार हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संतुलन को भी बनाए रखती हैं। गंगा, हिमालय और हरित वन भारत की पहचान हैं, जो लोगों को आजीविका और शुद्ध वातावरण प्रदान करते हैं।
भारत की संस्कृति उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। विविध भाषाएँ, रीति-रिवाज, त्योहार और परंपराएँ देश को एकता के सूत्र में बाँधती हैं। ‘विविधता में एकता’ भारत की विशेष पहचान है, जो समाज में प्रेम, सहिष्णुता और सहयोग की भावना को बढ़ाती है।
इसके साथ ही भारत की ज्ञान परंपरा वेद, उपनिषद, योग, आयुर्वेद और दर्शन-विश्व को मार्गदर्शन देती रही है। यह परंपरा हमें नैतिक मूल्यों, अनुशासन और जीवन जीने की सही दिशा प्रदान करती है।
इस प्रकार, प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान परंपरा मिलकर भारत को मजबूत, समृद्ध और विश्व में विशिष्ट बनाती हैं। इनके संरक्षण और विकास से ही देश का उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।
प्रश्न 4.
कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर:
बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय के स्वरूप को गंभीर रूप से प्रभावित किया है-
- नदियाँ – औद्योगिक कचरे और सीवेज के कारण ‘श्वेत हार’ जैसी दिखने वाली पवित्र गंगा और अन्य नदियाँ आज प्रदूषित हो चुकी हैं, जिससे जलीय जीवन और पेयजल संकट बढ़ गया है।
- हिमालय – ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे नदियों के जलस्तर में असंतुलन, बाढ़ और भविष्य में नदियों के सूखने का खतरा उत्पन्न हो गया है। जो हिमालय कभी अडिग प्रहरी था, वह आज पारिस्थितिक असंतुलन के कारण संवेदनशील हो गया है।
विविध रंग भारत के
आप अपने कक्षा – समूह में मिलकर भारत की सांस्कृतिक विविधता पर आधारित एक पावरपॉइंट प्रस्तुति / पोस्टर / चार्ट / कोलाज तैयार कीजिए और इसे अपनी कक्षा में दिखाइए। आप भारत के विभिन्न राज्यों पर केंद्रित पावरपॉइंट प्रस्तुति / पोस्टर / चार्ट / कोलाज भी बना सकते हैं।
उत्तर:
इस गतिविधि के लिए छात्र निम्नलिखित बिंदुओं को अपने पोस्टर या प्रस्तुति में शामिल कर सकते हैं-
पोशाक : उत्तर भारत का कुर्ता-पायजामा, दक्षिण की लुंगी -कमीज और पूरब-पश्चिम की क्षेत्रीय वेशभूषा।
नृत्य : कत्थक, भरतनाट्यम, भांगड़ा और बिहू जैसे विविध नृत्यों के चित्र।
खान-पान : विभिन्न राज्यों के प्रसिद्ध व्यंजन (जैसे- दाल-बाटी, डोसा, सरसों का साग)।
वास्तुकला : दक्षिण के भव्य मंदिर और उत्तर के ऐतिहासिक स्मारक।
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सृजन
प्रश्न 1.
मान लीजिए आपको भारत को एक मनुष्य के रूप में कल्पित करते हुए सुसज्जित करने का अवसर मिले तो आप अपने राज्य के किन सांस्कृतिक, पारंपारिक वेशभूषा, आभूषण, चिह्नों, पुष्पों आदि का प्रयोग कर उसकी साज-सज्जा करेंगे?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश राज्य के आधार पर सज्जा :
- वेशभूषा-भारत रूपी मनुष्य काशी का विश्वप्रसिद्ध पीतांबर रेशमी वस्त्र धारण करेगा, जो पवित्रता और राजसी ठाट का प्रतीक है। कंधे पर लखनऊ की चिकनकारी से सुसज्जित ‘अंगरखा’ या दुपट्टा होगा, जो नजाकत और तहजीब को दर्शाएगा।
- आभूषण-गले में मथुरा की भक्ति परंपरा को दर्शाती तुलसी की माला होगी। हाथों में फिरोजाबाद की कांच की कलाकारी से प्रेरित कंगन होंगे।
- चिह्न (तिलक)-माथे पर प्रयागराज के संगम की त्रिवेणी मिट्टी का तिलक होगा, जो ज्ञान और अध्यात्म के मिलन को दर्शाता है।
- पुष्प-साज-सज्जा के लिए उत्तर प्रदेश के राजकीय पुष्प पलाश के फूलों का प्रयोग किया जाएगा। अग्नि के समान दहकते ये केसरिया फूल भारत के शौर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा को दर्शाएँगें।
- सुगंध-पूरे व्यक्तित्व से कन्नौज के विश्वप्रसिद्ध ‘मिट्टी के इत्र’ की भीनी-भीनी खुशबू आएगी, जो भारत की मिट्टी से जुड़ाव का अहसास कराएगी।
(विद्यार्थी अपने राज्य के अनुसार उत्तर देंगे।)
प्रश्न 2.
भारत पर आधारित एक डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के लिए आवरण पृष्ठ बनाइए और बताइए कि आप उसमें किन-किन प्रतीकों को सम्मिलित करेंगे और क्यों?
उत्तर:
यदि मुझे भारत पर आधारित एक डाक टिकट या पुस्तक का आवरण पृष्ठ तैयार करना हो, तो मेरा डिजाइन ‘प्राचीन गौरव और आधुनिक प्रगति’ के संतुलन पर आधारित होगा।
इसमें मैं निम्नलिखित प्रतीकों को सम्मिलित करूँगा:
- अशोक स्तंभ-यह भारत का राजचिह्न है जो ‘सत्यमेव जयते’ के साथ साहस, शक्ति और गौरव का प्रतिनिधित्व करता है।
- कमल और लहलहाती फसलें-कमल शांति और सांस्कृतिक पवित्रता का प्रतीक है, जबकि फसलें कृषि प्रधान भारत की समृद्धि को दर्शाती हैं।
- हिमालय और गंगा की लहरें-यह भारत की भौगोलिक अखंडता और जीवनदायिनी नदियों के प्रति सम्मान प्रकट करेगा।
- ISRO / चंद्रयान का सूक्ष्म चित्रण-आधुनिक भारत की वैज्ञानिक सोच और वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में उभरते भारत को प्रदर्शित करने के लिए।
- विविध कलाकृतियाँ-डाक टिकट या आवरण के किनारों पर वर्ली या मधुबनी पेंटिंग का बॉर्डर होगा, जो हमारी लोक कलाओं और ग्रामीण विरासत को जोड़े रखेगा।
3. नदी की यात्रा
गंगा नदी की अपने उद्गम स्रोत से लेकर बंगाल की खाड़ी में विलीन होने तक की पूरी यात्रा के बीच में आने वाली प्राकृतिक, सांस्कृतिक, भाषिक और आदि विशेषताओं का वर्णन करते हुए एक रोचक यात्रा-वृत्तांत लिखिए।
(संकेत – पर्वतीय सौंदर्य से लेकर गंगासागर तक की संस्कृति इत्यादि।)
उत्तर:
मैं हूँ गंगा
मैं हूँ भारत की जीवनदायिनी नदी – गंगा। मेरी यात्रा आरंभ होती है हिमालय की गोद में स्थित गंगोत्री ग्लेशियर से जहाँ मैं बर्फ के रूप में जन्म लेती हूँ। यहाँ का वातावरण अत्यंत शांत, शीतल और दिव्य होता है। ऊँचे-ऊँचे पर्वत, बर्फ से ढकी चोटियाँ और निर्मल हवा मेरे प्रारंभिक जीवन को अद्भुत बनाते हैं।
जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ती हूँ, मेरा रूप और विस्तार बढ़ता जाता है। हरिद्वार और ऋषिकेश में पहुँचकर मैं धार्मिक आस्था का केंद्र बन जाती हूँ। यहाँ साधु-संत, योगी और श्रद्धालु मेरे तट पर स्नान करते हैं और मुझे माँ का दर्जा देते हैं। गंगा आरती का दृश्य मन को भक्ति से भर देता है।
आगे बढ़ते हुए मैं उत्तर भारत के विशाल मैदानों में प्रवेश करती हूँ। वाराणसी में मेरा स्वरूप और भी भव्य हो जाता है। यहाँ के घाट, मंदिर और संस्कृति मेरी पहचान को और गहरा बनाते हैं। विभिन्न भाषाएँ रीति-रिवाज और त्योहार मेरे तटों पर जीवन की विविधता को दर्शाते हैं।
इसके बाद मैं पटना और कोलकाता जैसे बड़े शहरों से गुजरती हूँ। यहाँ मैं लोगों के जीवन, व्यापार और खेती का आधार बनती हूँ। मेरी जलधारा से खेत हरे-भरे रहते हैं और सभ्यता फलती-फूलती है।
अंत में मैं गंगासागर पहुँचती हूँ, जहाँ मैं बंगाल की खाड़ी में समा जाती हूँ। यहाँ का वातावरण सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति पर लाखों श्रद्धालु यहाँ स्नान करने आते हैं।
मेरी यह यात्रा केवल जल की धारा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, आस्था, भाषा और जीवन का संगम है। मैं पर्वतों से निकलकर मैदानों को सींचती हुई सागर में विलीन हो जाती हूँ, पर अपने पीछे जीवन और सभ्यता की अमिट छाप छोड़ जाती हूँ।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
बहुभाषी देश हमारा
भारत की एक विशेषता उसकी बहुभाषिकता है। यदि आपको एक सचेत नागरिक के रूप में भारत से अपनी मातृभाषा में संवाद का अवसर मिले तो आप किन विषयों पर और क्या-क्या संवाद करना चाहेंगे? इन संवादों को अपनी मातृभाषा और हिंदी में लिखिए।
(संकेत – समाज, पर्यावरण, संस्कृति आदि।)
उत्तर:
नागरिक – हे भारत माता! आज हमारा समाज बहुत बदल गया है। हम आधुनिक तो हो गए हैं, पर समाज में आपसी भाईचारा कम और दिखावा ज्यादा बढ़ गया है।
भारत माता – पुत्र, जब समाज केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचता है, तब वह अपनी संस्कृति और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुँचाता है।
नागरिक – समाज और पर्यावरण का क्या जुड़ाव है, माँ?
भारत माता – देखो, एक जागरूक समाज ही अपनी विरासत को बचाता है। तुम्हारी संस्कृति ने सिखाया है कि ‘पूरा विश्व एक परिवार है’ (वसुधैव कुटुंबकम)। अगर समाज इस मूल्य को याद रखे, तो कोई भी व्यक्ति लालच में आकर जंगलों को नहीं काटेगा और न ही नदियों को गंदा करेगा।
नागरिक – सच है माँ! आज का समाज त्योहारों पर केवल शोर और प्रदूषण फैलाता है, जबकि हमारी संस्कृति प्रकृति के साथ उत्सव मनाना सिखाती है।
भारत माता – बिलकुल! यदि समाज के लोग मिलकर ठान लें, तो अपनी सांस्कृतिक आदतों; जैसे पेड़ लगाना, पानी बचाना और सादगी से रहना आदि से पर्यावरण को फिर से स्वर्ग बना सकते हैं।
नागरिक – मैं समझ गया माँ मैं अपने समाज के लोगों को इकट्ठा करूँगा और उन्हें समझाऊँगा कि अपनी संस्कृति को बचाना ही पर्यावरण को बचाने का सबसे सही रास्ता है। (इन संवादों को विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में स्वयं लिखेंगे।)
मातृभाषा और भाव
• “स्तव कर बहु-अर्थ-भरे”
उपर्युक्त पंक्ति में भारत की प्रशंसा विविध अर्थों में की गई है। आप भी अपनी मातृभाषा में भारत की स्तुति के लिए एक कविता की रचना कीजिए और उसका भावार्थ हिंदी में भी लिखिए।
उत्तर:
कविता:
मेरी प्यारी भाषा
“जन-जन की जो आशा है,
वह हमारी हिंदी भाषा है,
संस्कृति की पहचान है,
हर भारतीय की शान है।
सरल, सुबोध और मीठी वाणी, इसमें बसी है भारत की जान,
साहित्य का यह मान बढ़ाती,
प्रेम का हमें पाठ पढ़ाती।”
भावार्थ : इस कविता का अर्थ है कि हिंदी भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि भारत के प्रत्येक नागरिक की आशा और हमारी संस्कृति की असली पहचान है। यह भाषा बहुत ही सरल और सुनने में मीठी है। इसमें हमारा गौरवशाली इतिहास और महान कहानियाँ रची गई हैं। यह भाषा न केवल साहित्य को समृद्ध करती है, बल्कि सभी को आपस में प्रेम और भाईचारे से रहना सिखाती है।
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समास-समस्त पद एवं विग्रह
• “कनक शस्य कमलधरे”
उपर्युक्त पंक्ति में ‘कनक शस्य’ का अर्थ है- कनक के समान शस्य (सोने जैसी फसलें) और कमलधरे का अर्थ है- हे कमल को धारण करने वाली ! ये शब्द समास शब्द कहलाते हैं। ‘कनक शस्य’ और ‘कमलधरे’ समस्त पद / सामासिक पद हैं। कमलधरे संबोधन शब्द है।
समास का अर्थ है- संक्षेप । समास में दो या अनेक शब्दों के मेल से एक नए शब्द की रचना होती है। समास-रचना में प्रायः दो पद (शब्द) होते हैं। पहले पद को पूर्वपद और दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं। समास – रचना से बने शब्द को ‘समस्त पद’ कहते हैं। यदि समास रचना से बने शब्द (समस्त पद) के अंग अलग-अलग करने हों, तो उस प्रक्रिया को समास विग्रह कहते हैं। आपने ‘क्या लिखूँ?’ निबंध के अभ्यास में समास और सामासिक पदों के बारे में विस्तार से जाना है।
कविता में से चुनकर कुछ सामासिक पद (शब्द) नीचे दिए गए हैं। उनके समास विग्रह अपनी लेखन – पुस्तिका में लिखिए।

उत्तर:
| समस्त पद | समास-विग्रह | समास का नाम |
| शतदल | शत (सौ) दलों (पंखुड़ियों) का समूह | द्विगु समास |
| ज्योतिर्जल | ज्योति (प्रकाश) रूपी जल | कर्मधारय समास |
| शतमुख | शत (सौ) मुखों का समूह | द्विगु समास |
| सागरजल | सागर का जल | तत्पुरुष समास (संबंध) |
अलंकार – समझ और प्रयोग
• “शतमुख-शतरव-मुखरे!”
उपर्युक्त पंक्ति के ‘शतमुख’ और ‘शतरव’ में ‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति हो रही है, इसीलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
• “मुकुट शुभ्र हिम- तुषार”
उपर्युक्त पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट कहा गया है। वास्तव में हिमालय मुकुट नहीं है, लेकिन कवि ने कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे दिया। इससे भारत की छवि भव्य और दिव्य बन जाती है। यहाँ गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद स्थापित किया गया है, इसीलिए यहाँ रूपक अलंकार है।
“रैदास के पद” पाठ में आपने अलंकार के विषय में विस्तार से जाना-समझा है। अब निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(क) कविता में जहाँ-जहाँ अनुप्रास अलंकार आया है, उन पंक्तियों को खोजकर लिखिए।
उत्तर:
(क) अनुप्रास अलंकार वहाँ होता है जहाँ एक ही वर्ण की आवृत्ति बार – बार हो।
- “कनक-शस्य-कमलधरे”-यहाँ ‘क’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।
- “तरुतृण” – यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।
- “शतमुख – शतरव”-यहाँ ‘श’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।
- “धवल धार हार” – यहाँ ‘ध’ वर्ण की आवृत्ति से चमत्कार उत्पन्न हुआ है।
(ख) कविता की उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ रूपक अलंकार है। साथ ही यह भी बताइए कि कवि ने किस प्राकृतिक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर चित्रित किया है?
उत्तर:
(ख)
| पंक्ति | रूपक का आधार (प्राकृतिक दृश्य या वस्तु और उसका रूप) |
| “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” | हिमालय की बर्फ को भारत माता का मुकुट माना गया है। |
| “धवल धार हार गले” | गंगा की सफ़ेद जलधारा को माँ के गले का हार माना गया है। |
| “तरु-तृण-वन-लता वसन” | वृक्षों और लताओं (प्रकृति) को माँ के वस्त्र के रूप में चित्रित किया गया है। |
| “लंका पदतल शतदल” | लंका देश को माता के चरणों के नीचे स्थित कमल का रूप दिया गया है। |
गतिविधियाँ
मिलकर लें शपथ
• “तरु-तृण-वन-लता वसन/ अंचल में खचित सुमन”
वन, लता, पुष्प आदि भारत के अमूल्य प्राकृतिक संसाधन हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियमों के बारे में सूचना एकत्रित कीजिए और वन संरक्षण के लिए बनाए नियमों पर विचार कीजिए।
उत्तर:
भारत के वन संसाधनों के संरक्षण के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण नियम बनाए हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 – यह वन भूमि को गैर-वन कार्यों (जैसे उद्योग) के लिए उपयोग करने पर कड़ाई से रोक लगाता है।
- भारतीय वन अधिनियम, 1927 यह वनों की कटाई और लकड़ी के परिवहन को नियंत्रित करता है।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 – यह दुर्लभ पौधों, लताओं और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर देता है।
नियमों पर मेरे विचार
- सराहनीय कदम – ये नियम वनों की अंधाधुंध कटाई को रोकने में ढाल का काम करते हैं।
- चुनौती और समाधान – केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं; वनीकरण को जन आंदोलन बनाने और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कठोर दंड की आवश्यकता है।
भाषा संगम
“कनक-शस्य-कमलधरे”
कविता में आए ‘शस्य’ शब्द का अर्थ ‘उपज’ भी होता है। नीचे ‘उपज’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
जो उपजा हो, पैदावार, फसल (हिंदी); शस्यम् (संस्कृत); उपज, पैदावार (पंजाबी), पैदावार (उर्दू); पॉदावार (कश्मीरी); उपज, पैदावार (सिंधी); पीक (मराठी); ऊपज, पेदाश (गुजराती); पीक न (कोंकणी; उब्जाबाली, उपज (नेपाली); फसल (बांग्ला) ; शस्य, खेति, फचल, कृषि जात ऋतु (असमिया); महै मरोङ थाबा पोत्थोक (मणिपूरी); फसल, खेति (ओड़िआ); पंट (तेलुगु); विळैच्चल् (तमिल); विळवु (मलयालम); बेळे फसलु (कन्नड़)।
• इनके अतिरिक्त यदि आप ‘शस्य’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
• उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp
उत्तर:
स्वर्ण-धान और नीरज धारे।
झरोखे से
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की भाँति मैथिलीशरण गुप्त ने भी भारत का मनोरम और ओजस्वी गुणगान किया है। आइए, नीचे उनकी चर्चित कविता ‘जय जय भारतमाता’ का एक अंश पढ़ते हैं।
उत्तर:

(इस कविता को पुस्तकालय से ढूँढ़कर पूरा पढ़िए।)
छात्र स्वयं करें।
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खोजबीन
प्रश्न 1.
देशप्रेम से संबंधित अन्य कविताएँ पुस्तकालय, इंटरनेट से खोजकर पढ़िए और किसी एक कविता का कक्षा में वाचन भी कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।
प्रश्न 2.
इस कविता की तरह ही संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से युक्त निराला की एक अन्य कविता, ‘वर दे, वीणावादिनि वर दे!’ पुस्तकालय, इंटरनेट से ढूँढ़कर पढ़िए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।