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Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Question Answer
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Class 9 Question Answer
Class 9 Ganga Chapter 9 Question Answer – Class 9 Hindi राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Question Answer
अभ्यास (पृष्ठ 156-164)
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
प्रश्न 1.
“पितु समेत कहि कहि निज नामा लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?
(क) आदर और सम्मान
(ख) भक्ति और श्रद्धा
(ग) भय और शिष्टाचार
(घ) प्रेम और सहिष्णुता
उत्तर:
(ग) भय और शिष्टाचार
तर्क – परशुराम का वेश अत्यंत भयानक था, जिससे राजा डर के मारे व्याकुल थे, परंतु सामाजिक मर्यादा निभाने के लिए वे अपना नाम बताकर प्रणाम (शिष्टाचार) कर रहे थे।
प्रश्न 2.
“जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
(क) संवेदनशीलता
(ख) शिष्टता
(ग) सहनशीलता
(घ) उदासीनता
उत्तर:
(ख) शिष्टता
तर्क – राजा जनक एक मर्यादित शासक थे। मुनि के आगमन पर स्वयं झुकना और अपनी पुत्री से प्रणाम करवाना उनके उच्च
संस्कारों और अतिथि के प्रति शिष्ट व्यवहार को दर्शाता है।
प्रश्न 3.
“अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था-
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
(ग) शिव-धनुष का खंडित होना
(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
उत्तर:
(ग) शिव धनुष का खंडित होना
तर्क – परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके आराध्य का धनुष टूटना ही उनके क्रोध का एकमात्र और सबसे बड़ा
कारण था।
प्रश्न 4.
राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) कूटनीति और चतुराई
(ख) विनम्रता और मर्यादा
(ग) त्याग और समर्पण
(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
उत्तर:
(ख) विनम्रता और मर्यादा
तर्क – राम जानते थे कि परशुराम क्रोध में हैं। स्वयं को ‘दास’ कहना उनकी महानता, विनम्रता और बड़ों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की मर्यादा को दर्शाता है।
प्रश्न 5.
“सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
उत्तर:
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
तर्क – लक्ष्मण का उद्देश्य परशुराम को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उनके अनावश्यक क्रोध और अहंकार को तर्कों के माध्यम से चुनौती देना था ताकि अन्याय का प्रतिकार किया जा सके।
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मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए।
प्रश्न 1.
“अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
इस पंक्ति का अर्थ है कि आधा पल (क्षण) भी एक कल्प (युगों) के समान लंबा प्रतीत हो रहा था। जब मन में अत्यधिक डर या व्याकुलता होती है, तो समय का एक छोटा-सा हिस्सा भी बहुत भारी लगने लगता है। यह पंक्ति सीता जी के संदर्भ में कही गई है।
सीता जी परशुराम के अत्यंत क्रोधी स्वभाव से परिचित थीं। जब उन्होंने देखा कि परशुराम क्रोध में भरकर सभा में आए हैं और उनके वचनों से अनिष्ट की संभावना बढ़ गई है, तो वे बहुत डर गईं। उन्हें भय था कि कहीं परशुराम के कोप से यह विवाह उत्सव किसी बड़ी विपदा में न बदल जाए। इसी मानसिक तनाव और व्याकुलता के कारण उन्हें समय का एक छोटा अंश भी युगों जैसा लंबा लग रहा था।
प्रश्न 2.
“सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
परशुराम की इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज- समाज पर गहरा और भयावह प्रभाव पड़ा होगा। सभा में उपस्थित राजा पहले से ही परशुराम के ‘कराल’ (भयानक) वेश को देखकर डरे हुए थे। इस सीधी धमकी ने उनके डर को साक्षात् मृत्यु के भय में बदल दिया होगा। राजाओं को लगा होगा कि धनुष किसी एक व्यक्ति ने तोड़ा है, किंतु दंड पूरे समाज को मिल सकता है। इससे उनमें हड़कंप मच गया होगा। कई वीर राजा वहाँ मौजूद थे, लेकिन परशुराम के प्रताप और उनके पूर्व के क्षत्रिय – विनाश के इतिहास को जानते हुए वे मौन रहकर अपना अपमान सहने को मजबूर हो गए होंगे।
प्रश्न 3.
तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
मेरी दृष्टि में परशुराम जैसे क्रोधी व्यक्ति को शांत करने के लिए श्रीराम का ‘विनय’ (विनम्रता) का मार्ग ही अधिक उचित है।
कारण और तर्क :
- क्रोध पर विजय – क्रोध को क्रोध से नहीं, बल्कि शांत स्वभाव से ही जीता जा सकता है। लक्ष्मण के तर्क और व्यंग्य ने परशुराम के क्रोध की अग्नि में ‘घी’ का काम किया, जिससे विवाद और बढ़ गया।
- मर्यादा – राम का व्यवहार संयमित और बड़ों के प्रति आदरपूर्ण था, जो भारतीय संस्कृति के मूल्यों के अनुरूप है। विनय से विपक्षी का हृदय परिवर्तन संभव है।
यद्यपि लक्ष्मण के तर्क तार्किक दृष्टि से सही थे, लेकिन वे परिस्थिति को सुलझाने के बजाय उलझा रहे थे।
अंतत : राम की मधुर वाणी और विनम्रता ने ही परशुराम के संशय और क्रोध को समाप्त किया।
प्रश्न 4.
‘हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।’ श्रीराम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
उत्तर:
यह पंक्ति श्रीराम के व्यक्तित्व के ‘स्थितप्रज्ञ’ (समान भाव रखने वाले) धैर्य और गंभीरता तथा भावनात्मक परिपक्वता
के गुण को दर्शाती है। वे न तो सफलता (धनुष टूटने) पर उत्साहित होते हैं और न ही संकटों (परशुराम का क्रोध) से दुखी या विचलित होते हैं। वे अपनी भावनाओं के सेवक नहीं बल्कि स्वामी हैं। उनके यही गुण उन्हें एक कुशल नेतृत्वकर्ता और ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनाते हैं।
अन्य पात्रों से तुलना (भावनात्मक संतुलन):
- परशुराम बनाम राम – परशुराम अत्यधिक क्रोधी और आवेशपूर्ण हैं, जबकि राम शांत समुद्र की तरह गंभीर हैं।
- लक्ष्मण बनाम राम – लक्ष्मण चंचल और उग्र हैं, वे तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि राम सोच-समझकर और अत्यंत नपे-तुले शब्दों में बोलते हैं।
- अन्य राजा बनाम राम – जहाँ अन्य राजा डर से काँप रहे थे, वहीं राम पूरी तरह निर्भय और स्थिर थे।
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर दीजिए।
प्रश्न 1.
कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
मैं जनकपुर की उस भव्य सभा में बैठा था / बैठी थी जहाँ चारों ओर शिव धनुष टूटने का कोलाहल और श्रीराम की विजय की चर्चा थी। तभी अचानक सभा का वातावरण बदल गया। द्वार से मुनि परशुराम ने प्रवेश किया। उनका वेश अत्यंत भयानक था – कंधे पर फरसा, माथे पर भस्म और आँखों में साक्षात् अग्नि। उन्हें देखते ही हम सभी राजा, जो स्वयं को शूरवीर समझ रहे थे, डर के मारे काँपने लगे। हमने अपने सिंहासन छोड़ दिए और दंडवत प्रणाम कर अपना परिचय दिया।
परशुराम जी का क्रोध सातवें आसमान पर था। जब उन्होंने टूटा हुआ धनुष देखा, तो उनकी गर्जना से पूरी सभा दहल उठी। उन्होंने अपराधी को सामने आने की चुनौती दी और पूरी सभा के विनाश की धमकी दे डाली। तभी राजकुमार लक्ष्मण और उनके बीच तीखी नोक-झोंक शुरू हो गई। लक्ष्मण के व्यंग्य उन्हें और भड़का रहे थे, जबकि श्रीराम अपनी शांत मुद्रा में खड़े थे। एक समय ऐसा लगा कि अब अनर्थ होकर रहेगा, लेकिन तभी श्रीराम ने अत्यंत विनम्र स्वर में परशुराम जी से बात की। उनके शीतल वचनों ने मुनि के क्रोध की अग्नि को शांत कर दिया। अंततः, श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर मुनि का संशय दूर हुआ। वे नतमस्तक हुए और आशीर्वाद देकर शांत भाव से महेंद्र पर्वत की ओर चले गए। हमने चैन की साँस ली।
प्रश्न 2.
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?
(संकेत – सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
उत्तर:
जब राजा जनक जैसा शक्तिशाली और धैर्यवान सम्राट परशुराम के डर से निरुत्तर हो गया, तो सभा में उपस्थित ‘कुटिल’ (स्वार्थी और ईर्ष्यालु) राजाओं के मन में प्रसन्नता होने के कई कारण हो सकते हैं:
- स्वयंवर में जो राजा धनुष नहीं उठा पाए थे, वे अपनी असफलता से कुंठित होंगे जनक को संकट में और असहाय देखकर उनकी ईर्ष्या को तृप्ति मिल रही होगी । उन्हें लगा होगा कि जो अपमान उन्हें झेलना पड़ा, अब वैसा ही डर और अपमान राजा जनक को भी झेलना पड़ रहा है।
- वे राजा श्रीराम की सफलता से भी जल रहे होंगे। उन्हें लगा होगा कि यदि परशुराम दंड देते हैं, तो जनक और राम दोनों ही मुसीबत में पड़ेंगे, जिससे उनकी अपनी हार का दुख कम हो जाएगा।
यह स्थिति मनुष्य के स्वभाव की एक कड़वी सच्चाई ‘परपीड़ा में आनंद’ को उजागर करती है। जब कोई व्यक्ति स्वयं दुखी या असफल होता है, तो वह दूसरों को, विशेषकर अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति को संकट में देखकर मानसिक सुख का अनुभव करता है। यह संकीर्ण मानसिकता और सहानुभूति के अभाव को दर्शाता है, जहाँ व्यक्ति दूसरों के पतन में अपनी जीत ढूँढ़ता है।
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विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के ‘बालकांड’ का एक अंश है जहाँ शिव धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। दोनों के बीच के ये संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है, संवाद ही चरित्र का निर्माण करते हैं और संवादों से ही भावों में विविधता भी आती है। इस प्रकार यह कविता काव्यात्मक विधा में संवाद प्रस्तुति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।
संवादों की विशेषता

उत्तर:
संवादों की विशेषता
| संवाद की विशेषता | कविता से उदाहरण (पंक्तियाँ) |
| राम की विनम्रता | नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। |
| परशुराम का रौद्र रूप | बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जाँ लहि तव राजू।। |
| लक्ष्मण का प्रत्युत्तर | बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। |
| पौराणिक संदर्भ | धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।। (शिव धनुष और त्रिपुरारि का संदर्भ) |
| नाटकीयता | सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।। |
भाव-पहचान एवं विश्लेषण
• आपने पढ़ा कि राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। नीचे दिए गए भावों / मनःस्थिति को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है? आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।

उत्तर:
| भाव / मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
| चिंता | बिधि अब सँवरी बात बिगारी | सीता की माता सुनयना | पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित |
| भय | अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। | राजा जनक | परशुराम के क्रोध से भयभीत |
| क्रोध | अति रिस बोले बचन कठोरा। | परशुराम | धनुष टूटने का आक्रोश |
| व्यग्रता | अरध निमेष कलप सम बीता। | सीता | स्थिति को लेकर चिंता |
| संयम / विनम्रता | हृदयँ न हरषु बिषादु | श्रीराम | परशुराम के क्रोध को शांत करने और मर्यादा बनाए रखने के लिए। |
| ईर्ष्या / कुटिलता | कुटिल भूप हरषे मन माहीं। | सभा के अन्य राजा | जनक की लाचारी और राम-लक्ष्मण पर आने वाले संकट को देख ईर्ष्यावश खुश होना। |
• “अति डरु उतरु देत नृषु नाहीं।”
परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।
विश्लेषण कैसे करें
1. संदर्भ स्पष्ट कीजिए’ आरंभ में यह बताइए कि यह पंक्ति / घटना किस स्थिति में आई है, उससे पहले क्या घट चुका था।
2. विश्लेषण में घटना का वर्णन क्रम, उसका कारण और प्रभाव अधिक लिखना होता है- केवल क्या हुआ नहीं, बल्कि क्यों हुआ लिखिए।
3. कारण → भाव → परिणाम का क्रम बनाइए।
4. निष्कर्ष दीजिए अंत में 1-2 पंक्तियों में ‘अपना’ स्पष्ट निष्कर्ष लिखिए जैसे- ‘इससे स्पष्ट होता है कि…’ या ‘यह पंक्ति संकेत देती है कि….’
5. संक्षेप में क्या, क्यों, कैसे के आधार पर विश्लेषण कीजिए और निष्कर्ष लिखिए।
उत्तर:
1. संदर्भ स्पष्टीकरण – यह घटना उस समय की है जब शिव-धनुष टूटने का समाचार पाकर मुनि परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर राजा जनक की सभा में प्रवेश करते हैं। सभा में उपस्थित सभी राजा भयभीत होकर अपना परिचय देते हैं। परशुराम जी ने जब टूटे हुए धनुष को देखा, तो उन्होंने अत्यंत कठोर स्वर में जनक से पूछा कि यह धनुष किसने तोड़ा है और चेतावनी दी कि यदि अपराधी सामने नहीं आया तो वह समस्त राज- समाज का विनाश कर देंगे। इसी विकट स्थिति में राजा जनक मौन रह जाते हैं।
2. कारण और प्रभाव का विश्लेषण – जनक का मौन केवल ‘भय’ नहीं, बल्कि एक गंभीर विवेकपूर्ण निर्णय’ भी था। इसके पीछे निम्नलिखित कारण और प्रभाव थे-
- कारण – परशुराम का क्रोध उस समय अपने चरम पर था। जनक जानते थे कि परशुराम एक ऐसे मुनि हैं जो आवेश में आकर किसी भी तर्क को सुनने की स्थिति में नहीं हैं। यदि वे उस समय उत्तर देते, तो मुनि का क्रोध शांत होने के बजाय और भड़क सकता था, जिससे पूरी सभा का विनाश संभव था।
- भाव – जनक के मन में अपनी पुत्री सीता के भविष्य और आए हुए अतिथियों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता (व्याकुलता) थी। पंक्ति ‘अति डरु’ स्पष्ट करती है कि उस क्षण का वातावरण इतना भयानक था कि बड़े-बड़े शूरवीर भी बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे।
- प्रभाव – उनके इस मौन ने स्थिति को और अधिक बिगड़ने से तात्कालिक रूप से रोके रखा। यदि जनक कुछ कहते तो मुनि उसे चुनौती मान सकते थे। उनके मौन ने अंततः श्रीराम को आगे आकर अत्यंत विनम्रता से उत्तर देने का अवसर प्रदान किया।
3. कारण, भाव परिणाम का क्रम-
- कारण – परशुराम की संहारक चेतावनी और शिव धनुष के प्रति उनका अनन्य अनुराग।
- भाव – उत्तरदायित्व का बोध और मुनि के प्रताप से उत्पन्न स्वाभाविक ‘भय’।
- परिणाम – जनक का मौन रहना, जिससे सभा में शांति बनी रही और अंततः राम के विनयपूर्ण संवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि जनक का मौन भय और विवेक का सम्मिश्रण था। जहाँ एक ओर परशुराम का रौद्र रूप देखकर मानवीय स्वभाव के अनुरूप उनमें भय व्याप्त था, वहीं दूसरी ओर एक कुशल शासक के रूप में उनका यह मौन एक ‘राजनीतिक निर्णय’ भी था।
यह पंक्ति संकेत देती है कि विपरीत और अत्यंत क्रोध पूर्ण परिस्थितियों में मौन रहना ही सबसे बड़ा विवेक होता है, क्योंकि मौन विवाद को बढ़ने से रोकता है और समाधान के लिए स्थान बनाता है।
काव्य पंक्ति और भाव
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥”
(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर:
यदि मैं इन पंक्तियों (“रे नृप बालक काल बस…”) को मंच पर बोलता / बोलती तो मेरे चेहरे पर अत्यधिक क्रोध (रौद्र भाव) और अहंकार मिश्रित कठोरता के भाव होते। मेरी आँखें बड़ी और लाल होतीं भौहें तनी हुई होतीं और आवाज में एक भारी गर्जना होती। चूँकि ये पंक्तियाँ परशुराम जी के घोर क्रोध और चेतावनी को दर्शाती हैं, इसलिए चेहरे पर एक ‘अपमानित योद्धा’ का तीव्र आक्रोश झलकना अनिवार्य होता।
(ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे-
• परशुराम
• राजा जनक
• लक्ष्मण
• राम
• सभा में उपस्थित अन्य राजा
उत्तर:
इस प्रसंग में प्रत्येक पात्र की मन:स्थिति अलग है, जिसे निम्नलिखित भावों द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है:
• परशुराम-
- भाव – रौद्र (क्रोध), गर्व और आवेश।
- प्रदर्शन – ऊँची और कड़क आवाज, तमतमाया हुआ चेहरा और फरसे को लहराते हुए आक्रामक मुद्रा।
• राजा जनक-
- भाव – चिंता, विवशता और विनय।
- प्रदर्शन – माथे पर चिंता की लकीरें झुकी हुई आँखें और हाथ जोड़कर शांत एवं व्याकुल मुद्रा।
• लक्ष्मण –
- भाव – हास्य (व्यंग्य), निर्भीकता और चपलता।
- प्रदर्शन – चेहरे पर एक हल्की और तिरछी मुस्कान, आँखों में निडरता और कटाक्षपूर्ण (व्यंग्यमयी) लहजा।
• राम-
- भाव – शांति (विनम्रता), गंभीरता और धैर्य।
- प्रदर्शन – सौम्य और शांत चेहरा, मधुर वाणी और आदर के साथ झुकी हुई दृष्टि। वे संतुलन और मर्यादा के प्रतीक के रूप में दिखेंगे।
• सभा में उपस्थित अन्य राजा-
- भाव- भय (डर) और व्याकुलता।
- प्रदर्शन – काँपता हुआ शरीर, घबराहट से भरी आँखें और छिपने या भागने की कोशिश करती हुई मुद्रा। कुछ राजाओं के चेहरे पर ईर्ष्या मिश्रित कुटिलता भी दिख सकती है।
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विषयों से संवाद
प्रश्न 1.
सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
उत्तर:
श्रीराम के गुण-विनम्रता, मर्यादा, धैर्य और उदात्त चरित्र-आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। हमें निम्नलिखित परिस्थितियों में इनका परिचय देना पड़ता है-
- सामूहिक परियोजना कार्य के दौरान जब समूह में कोई सदस्य काम नहीं कर रहा होता है और पूछने पर वह मुझ पर ही चिल्लाने लगता है तो ऐसी स्थिति में मैं क्रोध करने के बजाय धैर्य (धीर) रखता / रखती हूँ और शांति से उसे उसकी जिम्मेदारी समझाता / समझाती हूँ।
- किसी मैच के दौरान रेफरी का कोई गलत फ़ैसला हो या विपक्षी टीम के खिलाड़ी का अभद्र व्यवहार, तब मर्यादा का परिचय देना होता है। एक ‘उदात्त’ खिलाड़ी वही है जो नियम नहीं तोड़ता और अपनी शालीनता बनाए रखता है; ठीक वैसे ही जैसे राम ने परशुराम के अनुचित क्रोध के सामने अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी।
- जब माता-पिता या शिक्षक मेरी किसी बात को नहीं समझ पा रहे हों और मुझ पर नाराज हों तो विनय का मार्ग अपनाकर ऊँची आवाज में जवाब देने की बजाय शांति से अपनी बात कहता / कहती हूँ।
- कठिन परीक्षाओं या परिणामों के समय जब मेहनत के बाद भी परिणाम इच्छा के अनुसार नहीं आता, तब भावनात्मक संतुलन की आवश्यकता होती है। न तो अत्यधिक दुखी (विषाद) होना और न ही सफलता मिलने पर घमंड (हर्ष) करना। यह ‘स्थितप्रज्ञ’ स्वभाव मुझे हर मुश्किल परिस्थिति से बाहर निकालता है।
प्रश्न 2.
कविता में वर्णित प्रसंग सीता स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक – ऐतिहासिक आदि (घटना / प्रसंग) का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
उत्तर:
सीता स्वयंवर के अतिरिक्त भारतीय पौराणिक इतिहास में ‘द्रौपदी स्वयंवर’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है, जिससे हमें स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की विस्तृत जानकारी मिलती है।
द्रौपदी स्वयंवर का प्रसंग
पांचाल नरेश महाराज द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के विवाह के लिए एक अत्यंत कठिन प्रतियोगिता की घोषणा की। इसके लिए उन्होंने देश-विदेश के राजाओं और राजकुमारों को आमंत्रित किया।
स्वयंवर की शर्त यह थी कि एक ऊँचे स्तंभ के ऊपर एक मछली की आँख (लक्ष्य) रखी गई थी जो निरंतर घूम रही थी। नीचे एक पात्र में जल भरा था। धनुर्धर को जल में मछली का प्रतिबिंब देखकर ऊपर घूमती हुई मछली की आँख पर निशाना साधना था।
सभा में उपस्थित दुर्योधन, कर्ण और शिशुपाल जैसे महान योद्धा इस लक्ष्य को भेदने में असफल रहे। कुछ धनुष की प्रत्यंचा भी नहीं चढ़ा सके। पांडव उस समय अज्ञातवास में ब्राह्मणों के वेश में सभा में उपस्थित थे। जब सभी राजा असफल हो गए, तब अर्जुन ने अनुमति माँगी। उन्होंने जल में मछली की परछाईं देखते हुए एक ही बाण से मछली की आँख को भेद दिया। लक्ष्य भेदने के पश्चात, द्रौपदी ने आगे बढ़कर अर्जुन के गले में वरमाला डाली। यह इस बात का प्रतीक था कि कन्या ने अपनी इच्छा और कौशल की जीत के आधार पर अपना वर चुन लिया है।
स्वयंवर में केवल कुल ही नहीं, बल्कि व्यक्ति के कौशल और पुरुषार्थ को महत्व दिया जाता था। वरमाला डालना इस बात का प्रमाण था कि कन्या स्वेच्छा से उस व्यक्ति को अपना पति स्वीकार कर रही है। यह केवल एक पारिवारिक आयोजन न होकर एक सामाजिक और राजनीतिक आयोजन होता था जहाँ न्याय और नियमों का पालन किया जाता था।
सृजन
प्रश्न 1.
परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मन:स्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
उत्तर:
(दृश्य – स्वयंवर सभा में परशुराम का क्रोध चरम पर है। सीता और सुनयना एक-दूसरे की ओर देखती हैं, उनकी आँखों में भय और व्याकुलता है।)
सुनयना (मौन दृष्टि से) – “पुत्री सीता, देखो ऋषि परशुराम का क्रोध कितना भीषण है। मुझे तुम्हारे भविष्य की चिंता हो रही है। क्या यह शिव धनुष का टूटना तुम्हारे सुखद जीवन का मार्ग प्रशस्त करेगा या कोई अनहोनी होगी?”
सीता (पलकें झुकाकर मौन भाव से) – “हे माँ, मेरा हृदय भी काँप रहा है। प्रभु श्रीराम ने तो केवल आज्ञा का पालन किया, पर महर्षि का यह रौद्र रूप भयावह है। समय जैसे ठहर गया है, एक-एक पल काटना कठिन हो रहा है।”
सुनयना (ढाँढ़स बँधाते हुए) – “धैर्य रखो पुत्री नियति ने जो निश्चित किया है वही होगा।”
प्रश्न 2.
सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान ‘के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए। (संकेत – लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि।)
उत्तर:
परशुराम-लक्ष्मण संवाद के समय सीता जी की मन:स्थिति अत्यंत जटिल रही होगी। उनके मन में उठने वाले भावों का विश्लेषण इस प्रकार है:
- चिंता और भय – जब परशुराम जी ने धनुष टूटने पर क्रोध व्यक्य किया, तो सीता जी स्वभावतः डर गईं होंगी कि कहीं उनके विवाह के इस मांगलिक अवसर पर कोई अनिष्ट न हो जाए।
- गर्व और हर्ष – जब लक्ष्मण जी ने निर्भीकता के साथ परशुराम जी के तर्कों का उत्तर दिया, तो सीता जी को
अपने होने वाले देवर के साहस पर गर्व महसूस हुआ होगा। - हँसी – लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण वचनों; जैसे- ‘बचपन में हमने कई धनुहियाँ तोड़ी’ को सुनकर उनके मन में मंद मुसकान भी आई होगी, क्योंकि लक्ष्मण ने गंभीर वातावरण को थोड़ा हल्का कर दिया था।
- शंका – उन्हें इस बात की शंका भी हुई होगी कि कहीं लक्ष्मण का यह वाक युद्ध परशुराम जी को और अधिक क्रोधित न कर दे, जिससे श्रीराम के लिए संकट खड़ा हो जाए।
प्रश्न 3.
कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
उत्तर:
मैं अपनी उपलब्धियों के बजाय अपने मूल्यों और स्वभाव पर केंद्रित रहकर कुछ इस प्रकार अपना परिचय दूँगा / दूँगी- “मेरा नाम ………………….. (अपना नाम) है। मैं धैर्य और विवेक को अपना सबसे बड़ा बल मानता / मानती हूँ। मेरा मानना है कि इंसान की पहचान उसके बाहुबल या धन से नहीं, बल्कि उसके विनम्र व्यवहार और दूसरों की मदद करने की भावना से होती है। मैं विषम परिस्थितियों में शांत रहकर समाधान खोजने में विश्वास रखता / रखती हूँ और सदैव कुछ नया सीखने के लिए तत्पर रहता / रहती हूँ। सत्यनिष्ठा और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदारी मेरे जीवन के मूल-मंत्र हैं।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए-
• “देखत भृगुपति बेषु कराला।”
• “बोले परसुधरहि अपमाने।।”
• “सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू”
यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है; जैसे- भृगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू। आप इस कविता में अनेक विशेषताएँ देख सकते हैं, जैसे- दोहा – चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उसका कथन कह देना, मुहावरों का उपयोग करना आदि । नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।
| विशेषता | अर्थ | उदाहरण |
| अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | अरि करनी करि करिअलराई |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | अरध निमेष कलप सम बीता |
| रूपक अलंकार | रूप का आरोपण करना | पद सरोज मेले दोउ भाई |
उत्तर:
| विशेषता | अर्थ | उदाहरण | एक और उदाहरण |
| अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | अरि करनी करि करिअ लराई | सहसबाहु सम से रिपु मोरा (‘स’ वर्ण की आवृत्ति) |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | अरध निमेष कलप सम बीता | “उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू” (पल भर में पूरी पृथ्वी उलटने का दावा) |
| रूपक अलंकार | रूप का आरोपण करना | पद सरोज मेले दोउ भाई | ‘भृगुकुलकेतू” (भृगु वंश के ध्वज रूपी परशुराम) |
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बहुभाषिकता
यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है जो कि हिंदी भाषा का ही एक स्वरूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं, जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।
उदाहरण-

उत्तर:
सुभायँ – स्वभाव
कहिअ – कहिए / कहना
मोही – मुझे
आसिष – आशीष
लरिकाई – लड़कपन / बचपन
बिधि – विधाता / भाग्य
लोचन – आँख
जोटा – जोड़ी
कराला – भयानक
भुआला – राजा
रीस – क्रोध
(इनके लिए अपनी भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्द विद्यार्थी स्वयं लिखें।)
लोक में भाषा
नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।

उत्तर:
| शब्द | लोकोक्ति | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
| मन | मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। | आत्मविश्वास, साहस और मनोबल से सफलता निश्चित है। | अगर तुम्हारा मन मजबूत है, तो तुम हर परीक्षा में सफल हो सकते हो। सही कहा है- मन के हारे हार है मन के जीते जीत। |
| राम | राम नाम जपना, पराया माल अपना। | बाहर से भक्ति का ढोंग करना और भीतर से कपटी होना। | आजकल के कई ढोंगी बाबा राम नाम जपते हैं और पराया माल अपना करने में लगे रहते हैं। |
| राजा | यथा राजा तथा प्रजा। | जैसा नेता या मुखिया होता है, वैसी ही जनता होती है। | ईमानदार प्रधानमंत्री के कारण देश में ईमानदारी बढ़ी है। सच है कि यथा राजा तथा प्रजा। |
| बात | बात का बतंगड़ बनाना। | छोटी सी बात को बहुत बड़ा देना। | रमा की आदत है कि वह जरा सी बात का बतंगड़ बना देती है। |
| सिरु (सिर) | सिर मुंडाते ही ओले पड़ना। | कार्य शुरू करते ही बाधा आना। | मैंने नया व्यवसाय शुरू किया ही था कि मंदी आ गई। इसे कहते हैं सिर मुंडाते ही ओले पड़ना। |
गद्य-रूप
नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए-
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।”
इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं। इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं- हे नाथ! शिव- धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या
आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।
अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए-
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।”
उत्तर:
परशुराम के क्रोध को देखकर राजा जनक अत्यंत डर गए और उनके मुख से कोई उत्तर नहीं निकल पा रहा था। सभा में उपस्थित दुष्ट राजा मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे। कि अब अनर्थ होगा। देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी स्त्री-पुरुष अत्यंत चिंतित थे और उनके हृदय में भारी भय समाया हुआ था।
गतिविधियाँ
प्रश्न 1.
यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही (✓) का चिह्न लगाइए-


उत्तर:

प्रश्न 2.
रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
रामचरितमानस के इस ‘राम-लक्ष्मण परशुराम संवाद’ प्रसंग को दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए एक रूपरेखा यहाँ दी गई है। इसमें ध्वनियों, वेशभूषा और संगीत का समावेश किया गया है जो नाटकीयता और भावों को जीवंत कर देगा।
दृश्य नाटक: शिव धनुष भंग और संवाद
1. पात्रों की वेशभूषा
- श्रीराम और लक्ष्मण – राजकुमारों के राजसी वस्त्र, लेकिन माथे पर तिलक और हाथों में धनुष- बाण। राम का मुख शांत और गंभीर, लक्ष्मण का मुख चपल और तेजस्वी।
- परशुराम – ‘कराल’ (भयानक) वेष, शरीर पर भस्म, कंधे पर कुल्हाड़ा (फरसा), जटाएँ और हाथ में धनुष। उनका रूप अत्यंत रौद्र और तेजस्वी हो।
- राजा जनक – राजसी वेशभूषा, चेहरे पर चिंता और विनम्रता के मिश्रित भाव।
- सीता की माता (सुनयना) – रानी के वेश में, चेहरे पर घबराहट और ममता का भाव।
2. मंच सज्जा और ध्वनि
- मंच – राजा जनक की सभा का दृश्य । बीच में खंडित शिव धनुष के टुकड़े जमीन पर पड़े हों।
- ध्वनि प्रभाव – परशुराम के प्रवेश पर बादलों के गरजने जैसी भारी ध्वनि।
- लक्ष्मण के व्यंग्य वचनों पर हल्का संगीत।
- सभा में भय का माहौल दिखाने के लिए दबी दबी फुसफुसाहट।
3. संगीत का उपयोग
- रौद्र रस – जब परशुराम क्रोध में बोलते हैं, तब पार्श्व में तीव्र नगाड़ों की ध्वनि हो।
- शांत रस – जब राम नाथ संभुधनु भंजनिहारा’ बोलें, तब बाँसुरी या वीणा का शांत मधुर संगीत बजना चाहिए।
- व्यंग्य – लक्ष्मण के मुसकराने पर सितार की चपल तान का उपयोग किया जा सकता है।
4. दृश्य क्रम
दृश्य 1: परशुराम का आगमन
(धनुष टूटने की भयानक ध्वनि के बाद परशुराम का क्रोध में प्रवेश होता है। सभा के सभी राजा भयभीत होकर खड़े हो जाते हैं और उन्हें दंडवत प्रणाम करते हैं)।
- परशुराम (कठोर स्वर में) – “कहु जड़ जनक धनुष के तोरा ? बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू।”
- जनक (मौन और भयभीत) – उत्तर नहीं दे पाते, केवल सिर झुकाते हैं।
दृश्य- 2: राम का विनम्र संवाद
(राम आगे बढ़ते हैं, उनके चेहरे पर कोई हर्ष या विषाद नहीं है। वे बहुत धीरज के साथ बोलते हैं)
- राम – “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।”
- परशुराम (और अधिक क्रोधित होकर) – “सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।”
दृश्य – 3: लक्ष्मण का व्यंग्य और उपहास
(लक्ष्मण मुसकराते हैं और परशुराम को चुनौती देते हुए कहते हैं)
• लक्ष्मण – “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।” (लक्ष्मण के इन वचनों पर पार्श्व संगीत में तीव्रता आती है और परशुराम अपना फरसा सँभालते हैं)
यह संवाद केवल शब्दों का खेल नहीं है बल्कि भावों का संघर्ष है। जहाँ एक ओर परशुराम का अहंकार और क्रोध है, वहीं दूसरी ओर राम की मर्यादा और लक्ष्मण का तार्किक विरोध है। संवादों के माध्यम से ही पात्रों का चरित्र उभरता है।
अंत में, विश्वामित्र के समझाने और राम की शक्ति की परीक्षा लेने के बाद परशुराम का क्रोध शांत होता है और वे राम के शांत स्वरूप को पहचानते हैं।
प्रश्न 3.
‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
परिचर्चा-
उत्तर:
अध्यापक – क्यों नीलिमा! तुम बताओ, भय की स्थिति में सत्य कहना जरूरी है क्या?
नीलिमा – जी श्रीमान जी! भय को जीतना बहुत जरूरी होता है।
सुदेश – श्रीमन! ये कह तो रही हैं, पर परशुराम के क्रोध के सामने बोल सकेंगी क्या?
नीलिमा – मैं मानती हूँ श्रीमान जी! यह बहुत कठिन होगा।
सुदेश – कठिन ही नहीं, असंभव! जब देश गुलाम था, सारे लोग जैसे-तैसे जी ही रहे थे।
नीलिमा – परंतु भूलो मत! भगतसिंह, सुभाष, सावरकर और गाँधी जैसे कुछ लोगों ने हिम्मत की। वे अंग्रेज़ों के सामने बोलने का साहस कर सके, तभी देश आज़ाद हुआ।
सुदेश – हाँ, यह बात ठीक है। कोई इन जैसा हो तो वह कहने से नहीं चूकता।
नीलिमा – श्रीमन! कोई कैसा है, इसका आकलन परिस्थिति पड़ने पर होता है। कक्षा में बातें करने से नहीं। मैं इतना जानती हूँ कि कठिन समय आने पर भी कुछ लोग हिम्मत रखते हैं, परंतु कुछ लोग कहने की सोच भी नहीं पाते हैं। उनके बारे में मैं क्या कहूँ।
सुदेश – श्रीमन! नीलिमा ठीक कह रही हैं। हिम्मती लोग कम होते हैं, परंतु होते जरूर हैं। हमें अपनी-अपनी हिम्मत टटोलनी चाहिए।
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मेरी पहेली
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों-

उत्तर:
• समाचार – देश-दुनिया की खबर लाता हूँ, बिना पंख उड़ जाता हूँ। कागज पर मैं छपकर आता, ज्ञान की प्यास बुझाता हूँ।
• धनुष – हाथ में है पर जान नहीं, बाण चले तो बचती शान नहीं। शिव का था जो सभा में टूटा, राम ने तोड़ा, जनक का संशय छूटा।
• मन – चंचल हूँ पर दिखता नहीं, बिना लगाम के दौडूं मैं वश में कर लो तो राजा हार गया तो पत्थर मैं।
• नाग – पैर नहीं पर चलता हूँ, बिना हाथ के डसता हूँ। शिव के गले का हार हूँ मैं, चंदन से लिपटा रहता हूँ।
• नगर – गाँव से बड़ा मेरा विस्तार है, चकाचौंध मेरा श्रृंगार है। भीड़-भाड़ मेरी पहचान है, बताओ मेरा क्या नाम है?
भाषा संगम
“अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक ‘धनुष’ कै तोरा।।”
नीचे ‘धनुष’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
कमान (हिंदी); धनुः, चापम् (संस्कृत); धणुख (पंजाबी); कमान (क्रौस) (उर्दू); कमान (कश्मीरी ) ; धनुषु, कमानु (सिंधी); धनुष्य (मराठी); धनुष, कामठु (गुजराती); धनुश (कोंकणी); धनु (नेपाली); धनुक (बांग्ला); धनु (असमिया); लिरुर् (मणिपुरी); धनुष, धनु, कार्मुक (ओड़िआ); धनुस्सु, विल्लु (तेलुगु); विल् (तमिल) ; धनुस्सु, विल्लु (मलयालम); बिल्लु, धनुष (कन्नड़)
• इनके अतिरिक्त यदि आप धनुष शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
• उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp
उत्तर:
बहूँ गुस्से नाल कौड़े बोल बोल्या मूरख जनक! तू इस ए धनुष कैं तोड़े ? (सिरायकी)
खोजबीन
बालकांड का यह अंश और गोस्वामी तुलसीदास जी की अन्य रचनाएँ इंटरनेट की सहायता से सुनिए और देखिए-
उत्तर:
तुलसीदास-राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
https://www.youtube.com/ watch?v=M7yZx2C0O68
दोहे- कबीर, रहीम, तुलसी
https://www.youtube.com watch?v=A5v38R3VwaE
गोस्वामी तुलसीदास
https://www.youtube.com/watch?v=MJbKZoLLess
कवि तुलसीदास और उनकी कविता