Reading Class 6 Hindi Notes Malhar Chapter 6 मेरी माँ Summary in Hindi Explanation helps students understand the main plot quickly.
मेरी माँ Class 6 Summary in Hindi
मेरी माँ Class 6 Hindi Summary
मेरी माँ कविता का सारांश
प्रस्तुत लेख महान स्वतंत्रता सेनानी ‘पंडित रामप्रसाद बिस्मिल’ द्वारा रचित उनकी आत्मकथा ‘निज जीवन की एक छटा’ से उद्धृत अंश ‘मेरी माँ’ से है, जो उन्होंने अपनी माँ को समर्पित करके लिखा था। यह लेख उन्होंने अपनी माता के लिए जेल में रहकर लिखा था, क्योंकि अंग्रेजों द्वारा उन्हें देशद्रोह के मामले में जेल भेज दिया गया था। इस लेख में बिस्मिल ने अपने जीवन में अपनी माता की भूमिका व महत्त्व को बताते हुए अपने चरित्र निर्माण में अपनी माता के अमूल्य योगदान को दर्शाया है और साथ ही उन्होंने अपनी माता के जीवन संघर्ष व दृढ़ इच्छाशक्ति को भी दर्शाया है। प्रस्तुत लेख में उन्होंने खेद भी प्रकट किया है कि वे अपनी माता की पर्याप्त सेवा न कर सके। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को अंग्रेजों द्वारा मात्र 30 वर्ष की अवस्था में फाँसी दे दी गई थी, परंतु आज भी प्रत्येक भारतीय रामप्रसाद बिस्मिल को एक महान देशभक्त की भाँति पूजता है।
मेरी माँ Class 6 Summary in Hindi
हमारी पाठ्यपुस्तक मल्हार में संकलित पाठ ‘मेरी माँ’ ‘ रामप्रसाद बिस्मिल’ जी द्वारा जेल में लिखी उनकी आत्मकथा का एक अंश है। रामप्रसाद बिस्मिल का जब जन्म हुआ, उस समय भारत पर अंग्रेज़ों का राज था। बिस्मिल छोटी-सी आयु से ही भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेज़ों से लड़ते रहे। इस आत्मकथा को नाम दिया गया – ‘निज जीवन की एक छटा’।
प्रस्तुत आत्मकथा के माध्यम से बिस्मिल जी बताते हैं कि लखनऊ कांग्रेस में जाने की मेरी बड़ी इच्छा थी, किंतु दादी जी और पिता जी इसकी अनुमति नहीं देते थे। किंतु मेरी माता जी ने मेरा हर कदम पर साथ दिया। उन्होंने खर्चा भी दे दिया। मैंने शाहजहाँपुर की सेवा-समिति में सहयोग देना आरंभ कर दिया। हर काम में मेरा साथ देने के कारण मेरी माँ को पिता जी की डाँट फटकार व दंड सहना पड़ता था। मेरे जीवन में साहस मेरी माँ और मेरे गुरुदेव श्री सोमदेव जी कृपा से ही आया है। माँ के प्रोत्साहन और सद्व्यवहार के कारण ही आपत्ति और संकट के समय में भी मैं डटा रहा ।

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माँ की शिक्षा के कारण ही मैं धर्म विरुद्ध काम नहीं करता था। हमेशा सत्य का आचरण करता था । ग्यारह वर्ष की आयु में मेरी माँ विवाह करके शाहजहाँपुर आई थीं। वह एक अशिक्षित एवं ग्रामीण कन्या के समान थीं। दादी जी की छोटी बहन ने आकर उन्हें घर के काम-काज सिखाए। अपनी सहेलियों से सीखकर वे देवनागरी की पुस्तकें पढ़ने लगीं। मैंने भी आर्यसमाज में प्रवेश ले लिया था । यदि मुझे ऐसी माँ न मिलती तो मैं भी साधारण जीवन ही व्यतीत कर रहा होता। उन्होंने क्रांतिकारी जीवन में मेरी सहायता की, किंतु साथ ही आदेश दिया कि शत्रु को कभी प्राणदंड न देना। इस आदेश की पूर्ति के लिए कई बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी। हे जननी जन्मदात्री ! तुम्हारी दया से ही मुझे देश सेवा का अवसर मिला है। हे माँ! तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन-पोषण ही नहीं किया बल्कि आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में भी तुम हमेशा सहायक रही हो । जन्म-जन्मांतर तक ऐसी माता मिले।

तुमने मुझे धैर्य का पाठ पढ़ाया। इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं है । मैं केवल एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना पाता। मेरी यह इच्छा पूरी नहीं होनी । तुम्हें मेरी मृत्यु की दुखभरी खबर ही सुनाई जाएगी। तुम यह सोचकर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारे बेटे ने भारत माता की सेवा में जीवन दे दिया। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो स्वर्ण अक्षरों में किसी पृष्ठ पर तुम्हारा नाम भी लिखा जाएगा। मुझे वर दो कि अंतिम समय में भी मैं विचलित न होऊँ और तुम्हारे चरण-कमलों को प्रणाम कर परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करूँ।
शब्दार्थ-पृष्ठ संख्या – 51: होनहार – अच्छे लक्षणों वाला । सेनाध्यक्ष – सेना के अध्यक्ष । आधिपत्य – अधिकार । आत्मकथा-अपने जीवन की कथा । अंश – भाग, हिस्सा |
पृष्ठ संख्या-52 : प्रोत्साहन – उत्साह बढ़ाना । सद्व्यवहार – अच्छा व्यवहार। आपत्ति – संकट । ग्रामीण – गाँव की । अशिक्षित – अनपढ़ । गृहकार्य – घर के कार्य।
पृष्ठ संख्या-53: अक्षर – बोध – अक्षरों का ज्ञान । वार्तालाप – बातचीत। जीवन निर्वाह – जीवन व्यतीत करना । प्राणहानि – मृत्यु | अवर्णनीय – जिसका वर्णन न किया जा सके।
पृष्ठ संख्या-54: संलग्न – लगा होना। मंगलमयी – शुभ चाहने वाली । ताड़ना – डाँट फटकार । जीवनदात्री – जीवन देने वाली । श्रद्धापूर्वक – श्रद्धा के साथ।