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Class 9 Hindi Chapter 8 रैदास के पद Question Answer
रैदास के पद Class 9 Question Answer
Class 9 Ganga Chapter 8 Question Answer – Class 9 Hindi रैदास के पद Question Answer
अभ्यास (पृष्ठ 147-152)
रचना से संवाद
मेरे तर्क मेरे उत्तर
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
प्रश्न 1.
“अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है?
(क) नाम उच्चारण की कठिनाई
(ख) नाम रटकर याद करना
(ग) आराध्य का नाम जपना
(घ) मित्रों का नाम रटना
उत्तर:
(ग) आराध्य का नाम जपना
तर्क – यहाँ ‘राम रट’ का अर्थ केवल नाम को रटना नहीं बल्कि ईश्वर में पूरी तरह विलीन हो जाना है। यह सातत्य भक्ति का प्रतीक है।
प्रश्न 2.
“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?
(क) एकाकार और समरूप
(ख) तरल और तीव्र सुगंध
(ग) आश्रय और आश्रित
(घ) द्रव और ठोस
उत्तर:
(क) एकाकार और समरूप
तर्क – जैसे चंदन और पानी मिलकर एक हो जाते हैं, पानी में चंदन की सुगंध समा जाती है और उन्हें अलग नहीं किया
जा सकता। उसी प्रकार भक्त का व्यक्तित्व भी भगवान की भक्ति में समाकर एक हो गया है।
प्रश्न 3.
“तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?
(क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।
(ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।
(ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है।
(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
उत्तर:
(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
तर्क – जैसे बाती दीपक के साथ जलकर प्रकाश फैलाती है, वैसे ही भक्त ईश्वर के संपर्क में आकर ज्ञान से प्रकाशित होता है।
प्रश्न 4.
“जो तुम तोरौ राम मैं नहि तोरौ” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?
(क) परोपकारी भक्ति भाव
(ख) आराध्य से अटूट संबंध
(ग) सांसारिक मोह
(घ) कर्मकांड पर बल
उत्तर:
(ख) आराध्य से अटूट संबंध
तर्क – रैदास कहते हैं कि यदि ईश्वर नाता तोड़ भी ले तो भी भक्त नहीं तोड़ेगा, जो उनके अटूट प्रेम और दृढ़ विश्वास को दर्शाता है। वे ईश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं।
प्रश्न 5.
“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?
(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।
(ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं।
(ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।
(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
उत्तर:
(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
तर्क – रैदास के लिए मोक्ष का मार्ग मंदिरों की यात्रा में नहीं बल्कि ईश्वर के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देने में हैं।
प्रश्न 6.
सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?
(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”
(ख) “जाकी जोति बरै दिन राती”
(ग) “तुम दीपक, हम बाती”
(घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”
उत्तर:
(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”
तर्क – यह पंक्ति बताती है कि ईश्वर हर जगह व्याप्त है, इसलिए भक्त जहाँ भी जाता है, उसे ईश्वर ही दिखाई देते हैं। यह दर्शाता है कि ईश्वर किसी एक स्थान पर सीमित नहीं बल्कि कण-कण में व्याप्त हैं।
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अर्थ और भाव
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए।
(क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
उत्तर:
अर्थ – हे प्रभु! आप आकाश में उमड़ते हुए काले बादल (घन) हैं और मैं जंगल में नाचने वाला मोर हूँ। जिस प्रकार काले बादलों को देखकर मोर प्रसन्न होकर नाचने लगता है, वैसे ही मैं आपके दर्शन पाकर भाव-विभोर हो जाता हूँ। जैसे चकोर पक्षी केवल चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही मैं भी आपको निहारता हूँ।
भाव – यहाँ भक्त और ईश्वर के अटूट और अनन्य संबंध को दर्शाया गया है। भक्त का अस्तित्व ईश्वर के बिना अधूरा है।
यहाँ दास्य भाव और प्रेम की तन्मयता का अद्भुत संगम है।
(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।”
उत्तर:
अर्थ – भक्त कहता है कि मुझे तीर्थों पर जाने या व्रत रखने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती और न ही इन्हें करने का कोई संशय या चिंता (अंदेसा) है मेरी बुद्धि और आत्मा अब पूरी तरह इस बात पर स्थिर हो गई है कि आपके कमल रूपी चरणों का आश्रय ही मेरे लिए पर्याप्त है।
भाव – इन पंक्तियों का गहरा भाव ‘अनन्य भक्ति’ है। यहाँ कर्मकांडों की तुलना में ‘विश्वास’ को अधिक महत्व दिया गया है। यह भाव दर्शाता है कि भक्त को अपने आराध्य के चरणों में ही सारे तीर्थों का फल और शांति प्राप्त होने लगती है। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहाँ संशय समाप्त हो जाता है और केवल शांतिपूर्ण समर्पण शेष रहता है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए।
प्रश्न 1.
“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि रैदास की भक्ति केवल लेन-देन या किसी सांसारिक सुख की इच्छा पर आधारित नहीं है, बल्कि यह एक शर्तहीन समर्पण है। जहाँ सामान्य मानवीय संबंध, स्वार्थ या सामने वाले के व्यवहार पर टिके होते हैं, वहीं रैदास का प्रभु से नाता इतना गहरा है कि वे कहते हैं कि यदि भगवान स्वयं भी उनसे नाता तोड़ना चाहें, तो भी वे भक्त के रूप में अपना संबंध कभी नहीं तोड़ेंगे। यह भाव भक्त के उस आत्मविश्वास और एकनिष्ठ प्रेम को प्रकट करता है जहाँ भक्त अपने अस्तित्व को पूरी तरह से ईश्वर में विलीन कर चुका होता है। यहाँ रैदास का ‘अहं’ भाव पूरी तरह मिट चुका है। यह निष्ठा यह भी संदेश देती है कि सच्ची भक्ति बाहरी कर्मकांडों या तीर्थ-व्रतों में नहीं, बल्कि मन की उस दृढ़ता में है जो हर परिस्थिति में अपने ईश्वर पर अडिग विश्वास बनाए रखे।
प्रश्न 2.
रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
उत्तर:
संत रैदास ने अपनी भक्ति में बाहरी आडंबरों; जैसे- तीर्थ यात्रा और कठिन व्रतों के स्थान पर अनन्य श्रद्धा और नाम-स्मरण को ही भक्ति का प्रमुख आधार माना है। उनके अनुसार, ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी विशेष स्थान पर जाने या शरीर को कष्ट देने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हृदय में प्रभु के प्रति सच्चा विश्वास और उनके चरणों में पूर्ण समर्पण का भाव ही पर्याप्त है।
मेरे विचार से भक्ति के आधार केवल बाहरी क्रियाएँ नहीं बल्कि आंतरिक शुद्धि और मानवता की सेवा भी होने चाहिए। भक्ति का सबसे बड़ा आधार ‘प्रेम’ और ‘समर्पण’ है, जहाँ भक्त बिना किसी स्वार्थ के अपने कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर दे। इसके अतिरिक्त सत्य बोलना, मन में दया का भाव रखना और दीन-दुखियों की सहायता करना भी भक्ति के सशक्त आधार हो सकते हैं। आज के संदर्भ में यदि हम अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें और समाज में घृणा के स्थान पर सद्भावना फैलाएँ, तो यही ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति और अटूट निष्ठा का आधुनिक आधार होगा।
प्रश्न 3.
दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों / उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।
उत्तर:
इन पदों में प्रयुक्त प्रमुख प्रतीक और उपमाएँ निम्नलिखित हैं-
- चंदन और पानी-प्रभु ‘चंदन’ हैं और भक्त ‘पानी’ है। जिस प्रकार चंदन के संपर्क में रहने से पानी के कण-कण में सुगंध समा जाती है, उसी प्रकार प्रभु की भक्ति से भक्त का पूरा व्यक्तित्व सुवासित और पवित्र हो जाता है।
- बादल (घन) और मोर प्रभु आकाश में छाए हुए ‘बादल’ के समान हैं और भक्त ‘मोर’ के समान है। जैसे मोर बादलों को देखकर हर्षित होकर नाचता है, वैसे ही भक्त अपने प्रभु के दर्शन पाकर प्रफुल्लित होता है।
- चंद्रमा और चकोर-प्रभु ‘चंद्रमा’ हैं और भक्त ‘चकोर’ पक्षी है। जिस प्रकार चकोर पक्षी बिना पलक झपकाए चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही भक्त की दृष्टि भी केवल अपने आराध्य पर टिकी रहती है।
- दीपक और बाती – प्रभु ‘दीपक’ हैं और भक्त उसमें जलने वाली ‘बाती’ है। जिस प्रकार बाती खुद को जलाकर दीपक के साथ मिलकर प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार भक्त भी प्रभु की भक्ति में लीन होकर दिन-रात जलता है और अपना अस्तित्व प्रभु को समर्पित कर देता है।
- मोती और धागा-प्रभु ‘मोती’ के समान उज्ज्वल और मूल्यवान हैं, जबकि भक्त वह ‘धागा’ है जो उन मोतियों को स्वयं में पिरोए रखता है। यह मेल दर्शाता है कि धागे के बिना मोती की माला नहीं बन सकती और मोती के बिना धागा अधूरा है।
- सोना और सुहागा-भक्त और भगवान का मेल ‘सोना और सुहागा’ के मिलन जैसा है जिस प्रकार सुहागा सोने में मिलकर उसे और भी शुद्ध एवं चमकदार बना देता है, उसी प्रकार प्रभु के सान्निध्य में भक्त का जीवन भी निखर जाता है।
- स्वामी और दास अंत में रैदास जी ने स्वयं को ‘दास’ (सेवक) और प्रभु को ‘स्वामी’ मानकर दास्य-भाव की भक्ति को व्यक्त किया है, जो समर्पण की पराकाष्ठा है।
ये प्रतीक स्पष्ट करते हैं कि रैदास की दृष्टि में भक्त और भगवान का संबंध अभिन्न है। भक्त का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह जो कुछ भी है, अपने प्रभु के कारण ही है।
विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
• “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
उपर्युक्त पंक्ति के रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए। इसमें अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। जिस रचना में व्यंजन । वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
• “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।”
उपर्युक्त रेखांकित अंश में उपमा अलंकार है। किसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर जब किसी वस्तु या व्यक्ति के रूप, गुण, धर्म का वर्णन किया जाता है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है।
• “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।”
उपर्युक्त रेखांकित अंश में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित किया जाए।
अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ
नीचे दी गई सूची को ध्यान से देखिए। इस सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ चुनकर दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए। उदाहरण के लिए पहली विशेषता के सामने पंक्ति दी गई है।

उत्तर:
| विशेषताएँ | उदाहरण |
| सरल और लोकधर्मी भाष | “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौ जोरौ।” |
| उपमा और तुलना | “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।” |
| लयात्मकता और गेयता / ध्वन्यात्मकता | “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, “जैसे चितवत चंद चकोरा” |
| दृढ़ निष्ठा और आस्था | “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।” |
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विषयों से संवाद
प्रश्न 1.
तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?
(संकेत – आप अपने सामाजिक विज्ञान के शिक्षक की सहायता भी ले सकते हैं।)
उत्तर:
भक्तिकालीन निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख संत रैदास और कबीर ने तीर्थ, व्रत और अन्य बाह्य कर्मकांडों के स्थान पर आंतरिक भक्ति और निराकार ईश्वर पर बल दिया। तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में इसके निम्नलिखित प्रमुख कारण माने जा सकते हैं-
(क) सामाजिक विषमता और भेदभाव – उस समय का समाज जाति प्रथा और ऊँच-नीच के भेदभाव में जकड़ा हुआ था। मंदिरों में प्रवेश और धार्मिक अनुष्ठानों पर एक विशेष वर्ग का एकाधिकार था । रैदास और कबीर जैसे संतों ने देखा कि कर्मकांड सामान्य और शोषित जनता को ईश्वर से दूर कर रहे हैं। अतः उन्होंने निर्गुण भक्ति का मार्ग दिखाया, जो सबके लिए समान रूप से उपलब्ध था और इसमें किसी पंडित या पुजारी की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं थी।
(ख) बाह्य आडंबरों का विरोध – तत्कालीन समय में धर्म के नाम पर पाखंड, दिखावा और कठिन व्रत- अनुष्ठान हावी थे। कबीर और रैदास का मानना था कि ईश्वर पत्थर की मूर्तियों या विशिष्ट तीर्थों में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर (हृदय में) निवास करते हैं।
(ग) ईश्वर के साथ सीधा संबंध – रैदास और कबीर ने नामस्मरण और प्रेम को भक्ति का आधार बनाया। तीर्थ और व्रत शरीर को कष्ट देने वाले साधन थे, जबकि निर्गुण भक्ति मन की शुद्धि पर जोर देती थी। उनके लिए भक्ति एक निजी अनुभव थी, जिसे किसी बाहरी क्रिया द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं थी।
इन संतों ने धर्म को लोकतांत्रिक और मानवीय बनाया। सामाजिक न्याय की स्थापना और समाज के अंतिम व्यक्ति को ईश्वर से जोड़ने के लिए ही उन्होंने कर्मकांडों के स्थान पर ‘निराकार’ और ‘आंतरिक विश्वास’ को भक्ति का प्रधान आधार
माना।
प्रश्न 2.
“सोने मिलत सुहागा”
‘सुहागा’ एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। ‘सुहागा’ का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।
उत्तर:
सुहागा वास्तव में एक अद्भुत खनिज है, जिसका आयुर्वेद और धातु विज्ञान दोनों में बहुत महत्व है।
सुहागा का रासायनिक परिचय-
- रासायनिक नाम सोडियम टेट्राबोरेट डेकाहाइड्रेट
(Sodium Tetraborate Decahydrate) - रासायनिक सूत्र – Na2B4O7.10H2O
- प्रकृति – यह एक सफेद, क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ है जो पानी में आसानी से घुल जाता है।
सुहागा की प्रमुख विशेषताएँ-
- सफाई और ब्लीचिंग एजेंट-इसमें प्राकृतिक रूप से सफाई करने के गुण होते हैं। यही कारण है कि इसका उपयोग डिटर्जेंट, साबुन और सौंदर्य प्रसाधनों में भी किया जाता है।
- कीटनाशक गुण-सुहागा में फफूँदनाशक (Antifungal) और कीटनाशक गुण होते हैं, जिससे यह लकड़ी के संरक्षण और कीड़ों को दूर रखने में भी उपयोगी है।
- आयुर्वेदिक महत्व-प्राचीन चिकित्सा पद्धति में सुहागा का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है, विशेषकर कफ और त्वचा रोगों के उपचार में।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
शब्दों की बात
प्रश्न 1.
पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर:
संज्ञा – राम, चंदन, मोती
सर्वनाम – तुम हम, कवन, मैं
प्रश्न 2.
रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए।

उत्तर:
मोरा – मोर
बाती – बत्ती
सोने – स्वर्ण / सोना
बरत – व्रत
चकोरा – चकोर पक्षी
राती – रात
तीरथ – तीर्थ
सृजन
प्रश्न 1.
कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर / पाठ करके प्रस्तुत कीजिए ।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।
प्रश्न 2.
कल्पना की कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।
उत्तर:
भक्त और आराध्य के मिलन पर संवाद-
प्रभु – रैदास, तुम दिन-रात मेरी रट क्यों लगाए रहते हो? क्या तुम्हें अपनी सुध-बुध नहीं?
रैदास – प्रभु, अब यह रट छूटने वाली नहीं है। आप चंदन हैं और मैं साधारण पानी जैसे चंदन की सुगंध पानी के कण-कण में समा जाती है, वैसे ही आपकी भक्ति मेरे अस्तित्व का हिस्सा बन गई है।
प्रभु – पर भक्त, संसार में तो बहुत-सी सुंदर वस्तुएँ हैं, तुम केवल मुझे ही क्यों निहारते हो?
रैदास – महाराज! आप आकाश के वे घन (बादल) हैं जिन्हें देखकर मेरा मन रूपी मोर नाचने लगता है। मेरी आँखें आपको वैसे ही निहारती हैं, जैसे चकोर पक्षी बिना पलक झपकाए चंद्रमा को देखता रहता है।
प्रभु – और यदि मैं अंधकार में खो जाऊँ तो?
रैदास – तब आप मेरे दीपक बन जाते हैं और मैं आपकी बाती। मेरी भक्ति की ज्योति दिन-रात आपके प्रेम में जलती रहेगी।
प्रभु – रैदास, तुम्हारा और मेरा यह संबंध बहुत गहरा है।
रैदास – सत्य है ‘प्रभु! आप बहुमूल्य मोती हैं और मैं वह धागा जो आपको थामे रहता है। हमारा मिलन तो ‘सोने में सुहागा’ के मिलने जैसा है, जिससे मेरी शुद्धि और शोभा दोनों बढ़ जाती है। आप मेरे स्वामी हैं, और मैं आपका तुच्छ दास।
प्रश्न 3.
“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।
उत्तर:
लघुकथा – अटूट मित्रता
एक छोटे से गाँव में दो मित्र रहते थे- केशव और माधव। केशव एक संपन्न व्यापारी का बेटा था और माधव एक साधारण मजदूर का। समय का चक्र घूमा और केशव के पिता का व्यापार पूरी तरह डूब गया। रातों-रात केशव का परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया।
केशव को लगा कि अब उसकी निर्धनता के कारण माधव का मान-सम्मान भी कम होगा। एक दिन केशव ने माधव से कहा, “मित्र, अब मेरा भाग्य मेरा साथ नहीं दे रहा। तुम एक सफल व्यक्ति हो, समाज में तुम्हारा नाम है। अच्छा यही होगा कि तुम मुझसे नाता तोड़ लो, वरना दुनिया तुम्हें भी नीची नजरों से देखेगी।”
माधव की आँखों में आँसू आ गए। उसने केशव का हाथ थामकर कहा, “जो तुम तोरौ माधव, मैं नहिं तोरौ।” अर्थात यदि तुम मुझसे नाता तोड़ भी लो तो भी मैं तुमसे नाता नहीं तोड़ेगा। माधव ने आगे कहा, “मित्रता कोई कागज का टुकड़ा नहीं जो फट जाए, या कोई सौदा नहीं जो नुकसान होने पर खत्म कर दिया जाए। यदि मैं तुमसे नाता तोड़ दूँ, तो फिर इस संसार में ‘मित्रता’ शब्द पर विश्वास कौन करेगा? तुम मेरा सहारा थे, अब मैं तुम्हारा आधार बनूँगा।”
माधव ने अपनी सारी जमा-पूँजी केशव के व्यापार को फिर से खड़ा करने में लगा दी। कुछ वर्षों बाद केशव फिर से सफल हो गया। लोगों ने देखा कि उनकी मित्रता पहले से भी अधिक मजबूत हो गई थी।
सीख – सच्ची मित्रता और भक्ति वही है जो कठिन समय में और भी निखर कर सामने आए, ठीक वैसे ही जैसे ‘सोने में सुहागा’ मिल जाता है।
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झरोखे से
आपने रैदास के पद पढ़े। अब आप रैदास की तरह ही महाराष्ट्र के संत कवि नामदेव के आगे दिए गए दो पद पढ़िए। निर्गुण संत काव्य परंपरा के संत कवि नामदेव का जन्म 13वीं – 14वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में हुआ। अन्य संत कवियों की भाँति नामदेव ने भी बाह्य आडंबरों, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध कर सामाजिक समरसता, प्रेम एवं निराकार भक्ति से संबंधित पदों की रचना की है।
उत्तर:
(1)
माइ न होती बापु न होता करम न होती काया।
हम नहिं होते, तुम नहिं होते, कवन कहां ते आया।।
राम कोइ न किसी केरा। जैसे तरवर पंखि बसेरा।।
चंद न होता, सूर न होता, पानी होता मिलाया।
सास्त्र न होता बेद न होता, करमु कहां ते आया।।
खेचरि भूचरि तुलसी माला गुरपरसादी पाया।
नामा प्रणवै परम तत्त कूं सतगुर मोहि लखाया।।
(2)
मोहि लागति तालाबेली।
बछरा बिनु गाइ अकेली।।
पानी बिनु ज्यूं मीन तलफैं।
ऐसे रामनाम बिनु नामा कलपै।।
जैसे गाइ का बाछा छूटला।
थन चोखता माखन घूटला।।
नामदेउ नारायन पाया।
गुर भेटत ही अलख लखाया।।
जैसे विषै हेत हेत परनारी।
ऐसे नामे प्रीति मुरारी॥
जैसे ताप ते निरमल घामा।
तैसे रामनाम बिनु बापुरो नामा॥
अब अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि रैदास तथा नामदेव के पदों में क्या-क्या अंतर है और क्या-क्या समानताएँ हैं?
खोजबीन
रैदास के जीवन और पदों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए। कुछ लिंक नीचे दिए गए हैं।
उत्तर: