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Class 8 Social Science Chapter 2 Question Answer in Hindi भारत के राजनैतिक मानचित्र का पुनर्निर्माण
भारत के राजनैतिक मानचित्र का पुनर्निर्माण Question Answer in Hindi
कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान पाठ 1 के प्रश्न उत्तर भारत के राजनैतिक मानचित्र का पुनर्निर्माण
प्रश्न और क्रियाकलाप (पृष्ठ 59)
प्रश्न 1.
दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य की राजनैतिक रणनीतियों की तुलना कीजिए। इनमें क्या समानताएँ और भिन्नताएँ थीं?
उत्तर:
दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य की राजनैतिक रणनीतियों की तुलना
दिल्ली सल्तनत (1206-1526)
- इसकी स्थापना 1206 ई. में हुई।
- इसके प्रमुख राजवंश गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी हुए।
- शासन अधिकतर तुर्क और अफगान शासकों के हाथ में था।
- सुल्तान की शक्ति सर्वोच्च थी।
- प्रशासन में इक्ता प्रणाली लागू थी।
- धार्मिक नीति अपेक्षाकृत कठोर थी, जजिया कर लगाया जाता था।
- प्रांतीय शासकों (इक्तेदार) को भूमि से कर वसूलने का अधिकार था।
मुगल साम्राज्य
- इसकी स्थापना 1526 ई. में बाबर ने की थी।
- इसके प्रमुख शासक अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, और औरंगजेब थे।
- सम्राट की शक्ति सर्वोच्च थी।
- प्रशासन में मनसबदारी और जागीरदारी प्रणाली लागू थी।
- अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई और जजिया कर समाप्त किया (बाद में औरगजेब ने पुनः लागू किया)।
- प्रशासन अधिक संगठित और केंद्रीकृत था।
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समानताएँ
- दोनों में शासक की शक्ति सर्वोच्च थी।
- दोनों में केंद्रीकृत शासन व्यवस्था अपनाई।
- भूमि से कर वसूली मुख्य आय का स्रोत था।
- सेना का विशेष महत्व था।
विभिन्नताएँ

प्रश्न 2.
विजयनगर साम्राज्य और अहोम साम्राज्य जैसे अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक समय तक पराजित होने से कैसे बच सके? उनकी सफलता में किन भौगोलिक, सैन्य और सामाजिक कारकों का योगदान था?
उत्तर:
मध्यकालीन भारत में कई राज्य आक्रमणों के कारण शीघ्र समाप्त हो गए, परंतु विजयनगर (दक्षिण भारत) और अहोम साम्राज्य (असम) लंबे समय तक स्वतंत्र और शक्तिशाली बने रहे। इसकी सफलता के पीछे भौगोलिक, सैन्य और सामाजिक कारकों का महत्वपूर्ण योगदान था। भौगोलिक कारण
(i) प्राकृतिक सुरक्षा-
- विजयनगर की राजधानी हंपी पहाड़ियों, चट्टानों और तुंगभ्रदा नदी से घिरी थी। इससे शत्रु के लिए सीधा आक्रमण कठिन था।
- अहोम साम्राज्य बह्मपुत्र नदी की घाटी घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा था। बाहरी आक्रमणकारियों के लिए यह क्षेत्र अनजान और कठिन था।
नोट-चित्र 2.25, पृष्ठ सं. 43 देखें।
(ii) जलवायु और भौगोलिक कठिनाइयाँ-
- असम की आर्द्र जलवायु बाढ़, दलदली भूमि ने मुगल सेना को कमजोर किया।
- पहाड़ी और चट्टानी क्षेत्रों ने विजयनगर को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान की।
- दोनों राज्यों की भौगोलिक स्थिति ने उन्हें प्राकृतिक किले जैसा संरक्षण दिया।
सैन्य कारण
(i) सशक्त सेना-
– विजयनगर के पास घुड़सवार सेना, हाथी और प्रशिक्षित सैनिक थे।
नोट-चित्र 2.26 , पृष्ठ सं. 44 देखें।
– अहोमों की सेना स्थानीय भूगोल से परिचित थी और जल युद्ध में निपुण थी।
(ii) गुरिल्ला युद्ध नीति-
- अहोम शासकों ने छापामार (गुरिल्ला) युद्ध पद्धति अपनाई।
- 1671 में सरायघाट के युद्ध में लचित बरफुकन के नेतृत्व में मुगलों को पराजित किया।
(iii) कुशल नेतृत्व-
- विजयनगर में कृष्णदेवराय जैसे शक्तिशाली शासक हुए।
- अहोम साम्राज्य में लचित बरफुकन जैसे वीर सेनानायक थे।
सामाजिक और प्रशासनिक कारण
(i) मज़बूत प्रशासन-
- विजयनगर में नायक व्यवस्था के माध्यम से स्थानीय सरदारों को जिम्मेदारी दी गई।
- अहोमों ने ‘पाइक प्रथा’ लागू की, जिसमें प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति राज्य की सेवा करता था।
(ii) आर्थिक समृद्धि-
- विजयनगर में कृषि, सिंचाई और समुद्री व्यापार से आय होती थी।
- अहोम राज्य कृषि और स्थानीय संसाधनों पर आधारित आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था वाला राज्य था।
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(iii) जनसमर्थन-
- दोनों राज्यों को जनता का सहयोग प्राप्त था।
- सांस्कृतिक और धार्मिक एकता ने भी राज्यों को मज़बूत बनाया।
- विजयनगर और अहोम साम्राज्य का लंबे समय तक पराजित होने से बचने के मुख्य कारण निम्न हैं-
(i) उनकी भौगोलिक स्थिति सुरक्षित थी।
(ii) उनकी सेना संगठित और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रशिक्षित थी।
(iii) उनका प्रशासन मजबूत और जनता पर आधारित था।
(iv) उन्हें जनता का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। इन्हीं कारणों से ये राज्य अन्य कई समकालीन राज्यों की तुलना में अधिक समय तक स्वतंत्र और शक्तिशाली बने रहे।
प्रश्न 3.
कल्पना कीजिए कि आप अकबर या कृष्णदेवराय के दरबार में एक विद्वान हैं। अपने किसी मित्र को पत्र लिखकर वहाँ की राजनीति, व्यापार, संस्कृति और समाज का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्थान-फतेहपुर सीकरी
तारीख –
प्रिय मित्र,
सप्रेम नमस्कार,
आशा है कि तुम स्वस्थ और प्रसन्न होंगे। मैं यहाँ सम्राट अकबर के दरबार में एक विद्वान के रूप में कार्य कर रहा हूँ। तुम्हें यहाँ की राजनीति, व्यापार, संस्कृति और समाज के विषय में बताने की इच्छा से तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूँ।
यहाँ की राजनीति अत्यंत संगठित और सुव्यवस्थित है। सम्राट अकबर सभी धर्मों के लोगों को समान सम्मान देते हैं। उन्होंने ‘सुलह-ए-कुल’ की नीति अपनाई है, जिसके अनुसार सभी धर्मों के साथ सहिष्णु व्यवहार किया जाता है। प्रशासन में मनसबदारी प्रथा लागू है, जिसके अंतर्गत अधिकारियों को उनके पद और योग्यता के अनुसार जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं।
राजपूतों को भी उच्च पद प्रदान किए गए हैं, जिससे साम्राज्य में स्थिरता बनी हुई है।
व्यापार की स्थिति भी बहुत समृद्ध है। देश-विदेश से व्यापारी आते हैं। रेशम, कपास, मसाले, कीमती पत्थर और धातुओं का व्यापार होता है। सड़कों और सरायों की व्यवस्था अच्छी है, जिससे साम्राज्य में आवागमन सुगम है। राज्य को करों के माध्यम से पर्याप्त आय प्राप्त होती है।
संस्कृति के क्षेत्र में भी अत्यधिक उन्नति हो रही है। दरबार में कवि, चित्रकार, संगीतज्ञ और विद्वानों को सम्मान दिया जाता है। विभिन्न धर्मों के विद्वान इबादतखाने में विचार-विमर्श करते हैं। स्थापत्य कला के क्षेत्र में फतेहपुर सीकरी और आगरा का विशिष्ट स्थान है।

चित्र 2.27. फतेहपुर सीकरी में अकबर द्वारा निर्मित पाँच मंजिला ‘पंचमहल’ (वर्तमान आगरा के समीप)
यहाँ का समाज विविधताओं से भरा है, परंतु लोग आपस में सद्भाव से रहते हैं। शिक्षा और कला को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रिय मित्र, यहाँ का वातावरण ज्ञान, कला और समन्वय की भावना से परिपूर्ण है। मुझे विश्वास है कि भविष्य में यह साम्राज्य और अधिक उन्नति करेगा।
शेष सब कुशल हैं। आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।
आपका मित्र
क.ख.ग.
प्रश्न 4.
अकबर, जो अपनी युवावस्था में एक क्रूर विजेता था, कुछ वर्षों बाद कैसे सहिष्णु और दयालु हो गया? ऐसे परिवर्तन का क्या कारण हो सकता है?
उत्तर:
अकबर अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में एक युद्धप्रिय और क्रूर विजेता था, क्योंकि उस समय साम्राज्य का विस्तार और सुरक्षा उसकी प्राथमिकता थी। लेकिन कुछ वर्षों बाद उसके स्वभाव और नीतियों में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। इसके प्रमुख कारण थे-
(i) अनुभव और परिपक्वता-समय के साथ अकबर अधिक समझदार और दूरदर्शी शासक बन गया। उसे समझ आया कि केवल युद्ध से राज्य स्थिर नहीं रह सकता।
(ii) विद्वानों और संतों का प्रभाव-अबुल फ़जल, बीरबल तथा सूफी संतों के विचारों ने उसके दृष्टिकोण को उदार बनाया।

(iii) कलिंग/चित्तौड़ जैसे युद्धों के परिणांम-युद्धों में भारी रक्तपात देखकर उसने महसूस किया कि हिंसा से जनसमर्थन नहीं मिलता।
(iv) साम्राज्य में स्थिरता की आवश्यकता-भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विभिन्न धर्मों और जातियों को साथ लेकर चलना जरूरी था।
(v) सुलह-ए-कुल की नीति-सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता अपनाने से वह अधिक न्यायप्रिय और दयालु शासक बना।
निष्कर्ष-अकबर का हृदय परिवर्तन उसके अनुभव विद्वानों के प्रभाव और साम्राज्य को स्थायी व मज़बूत बनाने की आवश्यकता के कारण हुआ। इसी कारण वह एक क्रूर विजेता से उदार और न्यायप्रिय शासक के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
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प्रश्न 5.
यदि विजयनगर साम्राज्य तालीकोटा का युद्ध जीत जाता तो क्या होता? कल्पना कीजिए और दक्षिण भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास पर उसके प्रभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1565 ई. तालीकोटा का युद्ध विजयनगर साम्राज्य और दक्कन के सुल्तानों के बीच हुआ। वास्तविक इतिहास में विजयनगर पराजित हुआ, परंतु यदि वह पराजित हो जाता, तो दक्षिण भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास पर इसका निम्न प्रभाव पड़ता।
(i) राजनीतिक प्रभाव-
- दक्षिण भारत में विजयनगर का प्रभुत्व लंबे समय तक बना रहता।
- दक्कन के सुल्तानों की शक्ति कम हो जाती।
- दक्षिण में एक मजबूत और स्थिर केंद्रीकृत शासन स्थापित होता।
- मुगलों के लिए दक्षिण भारत में विस्तार करना कठिन हो सकता था।
नोट-चित्र 2.6, पृष्ठ सं. 32 देखें।
(ii) सांस्कृतिक प्रभाव-
- हंपी और अन्य नगरों में कला, मंदिर स्थापत्य और साहित्य का और विकास होता।
- भक्ति आंदोलन और हिंदू संस्कृति को अधिक संरक्षण मिलता।
- विदेशी व्यापार बढ़ता और आर्थिक समृद्धि बढ़ती।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यदि विजयनगर विजयी होता तो दक्षिण का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास अधिक स्थिर, समृद्ध और शक्तिशाली रूप में विकसित हो सकता था।
प्रश्न 6.
प्रारंभिक सिख पंथ द्वारा प्रचारित अनेक मूल्य जैसे समानता, सेवा और न्याय आज भी प्रासंगिक हैं। इनमें से किसी एक मूल्य का चयन कीजिए और चर्चा कीजिए कि यह समकालीन समाज में कैसे प्रासंगिक है।
उत्तर:
प्रारंभिक सिख पंथ, जिसकी स्थापना गुरु नानक साहब ने की, उन्होंने सेवा (निःस्वार्थ सेवा) को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मूल्य माना। सेवा का अर्थ है कि बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की सहायता करना। गुरुद्वारे में चलने वाली लंगर प्रथा इसका श्रेष्ठ उदाहरण है, जहाँ सभी लोग समान रूप से बैठकर भोजन करते हैं।
समकालीन समाज में सेवा की प्रासंगिकता
- सामाजिक समानता को बढ़ावा-लंगर की परंपरा आज भी जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को समाप्त करने का संदेश देती है। आधुनिक समाज में समानता और भाईचारे के लिए यह मूल्य अत्यंत आवश्यक है।
- आपदा और संकट के समय सहायता-कोविड-19 जैसी महामारी या प्राकृतिक आपदाओं के समय सिख समुदाय द्वारा निःस्वार्थ सेवा के अनेक उदाहरण देखने को मिले, जो यह दर्शाता है कि सेवा आज भी मानवता के लिए उपयोगी और प्रासंगिक है।
- मानवीय संवेदना और सहयोग-आज के प्रतिस्पर्धी युग में लोग अक्सर स्वार्थ में उलझ जाते हैं। सेवा का मूल्य हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति और सहयोग की भावना सिखाता है।
- राष्ट्र निर्माण में योगदान-स्वयं सेवा, रक्तदान, गरीबों की सहायता, शिक्षा में सहयोग-ये सभी सेवा के आधुनिक रूप हैं, जो समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि सेवा प्रारंभिक सिख पंथ का एक प्रमुख मूल्य था और आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह समाज में समानता, सहयोग और मानवता की भावना को बढ़ावा देता है। आधुनिक समय में शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए यह मूल्य परमावश्यक है।
प्रश्न 7.
कल्पना कीजिए कि आप किसी बंदरगाह नगर (सूरत, कालीकट या हुगली) में एक व्यापारी हैं। वहाँ वस्तुओं, व्यापार करने वाले लोगों, जहाजों की आवा-जाही आदि के संबंध में आप जो दृश्य देखते हैं, उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर:
- मैं इस समय सूरत के विशाल बंदरगाह नगर में एक व्यापारी के रूप में कार्य कर रहा हूँ। यहाँ का दृश्य अत्यंत रोमांचक और चहल-पहल से भरा रहता है। प्रतिदिन समुद्र की लहरों के साथ दूर-दूर देशों से बड़े-बड़े जहाज बंदरगाह पर आकर रुकते हैं। जैसे ही किसी जहाज के आने की सूचना मिलती है, पूरे नगर में उत्साह उमंग फैल जाता है।
- बंदरगाह पर अलग-अलग देशों के व्यापारी दिखाई देते हैं-कोई अरबी पोशाक में है, कोई फारसी वेश में, तो कोई यूरोपीय टोपी पहने हुए। गोदामों में कपास, रेशम, मसाले, इत्र, कीमती पत्थर और हाथ से बुने वस्त्र भरे रहते हैं। समुद्र से आने वाली नमकीन हवा में मसालों की सुगंध घुली रहती है।
- जहाजों से माल उतारने और चढ़ाने का काम दिन-रात चलता रहता है। मजदूरों की आवाज़ें, व्यापारियों की बातचीत और सौदेबाजी की गूँज पूरे वातावरण को जीवंत बना देती है। कभी-कभी समुद्री तूफान का डर भी बना रहता है, परंतु व्यापार की आशा इस भय को कम कर देती है।
- यहाँ का समाज भी विविधताओं से भरा है। अलग-अलग भाषाएँ, रीति-रिवाज़ और संस्कृतियाँ मिलकर इस नगर को समृद्ध बनाती है। यह बंदरगाह केवल व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि संस्कृतियों के मिलन का स्थान है।
भारत के राजनैतिक मानचित्र का पुनर्निर्माण Class 8 Question Answer in Hindi
Class 8 Samajik Vigyan Chapter 2 Question Answer
प्रश्न 1.
इस कालखंड में विदेशी आक्रमणों एवं नए राजवंशों के उदय ने भारत की राजनैतिक सीमाओं को किस प्रकार नया आकार दिया? (पृष्ठ 21)
उत्तर:
मध्यकालीन काल (11 वीं से 17 वीं शताब्दी ई.) के दौरान विदेशी आक्रमणों और नए राजवंशों के उदय ने भारत की राजनीतिक सीमाओं को नया रूप दिया। 11 वीं शताब्दी से तुर्की-अफगान आक्रमणों के कारण 1192 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई, जिससे उत्तर-पश्चिमी साम्राज्य खण्डित हो गए। 1526 में पानीपत में बाबर की विजय ने मुगल साम्राज्य की स्थापना की, जिसने भारत के अधिकांश हिस्से को एकजुट किया। 14 वीं शताब्दी में विजयनगर और बहमनी सल्तनत जैसे नए राजवंश भारत के दक्षिणी भाग में उभरे, जिन्होंने दिल्ली के नियंत्रण का विरोध किया। अहोम (भारत के उत्तर-पूर्व में) और राजपूतों (वर्तमान राजस्थान राज्य में ज्यादातर) जैसी क्षेत्रीय शक्तियों ने स्वायत्तता बनाए रखी, जिससे एक खंडित राजनीतिक मानचित्र बन गया। 1398 में तैमूर के आक्रमण ने सल्तनत को कमजोर कर दिया जबकि अकबर और औरगजेब के अधीन मुगल विस्तार अपने चरम पर पहुँच गया, लेकिन विद्रोहों का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप सीमाएँ अस्थिर और विवादित रहीं।
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प्रश्न 2.
भारतीय समाज ने विदेशी आक्रमणों का सामना किस प्रकार किया? राजनैतिक अस्थिरता के वातावरण में भारतीय अर्थव्यवस्था ने किस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया? (पृष्ठ 21)
उत्तर:
भारतीय समाज ने आक्रमणों के प्रति कड़ा प्रतिरोध दिखाया। 1671 में सरायघाट की लड़ाई में विजयनगर साम्राज्य, अहोम और 1576 में हल्दीघाटी की लड़ाई में राजपूत सभी दृढ़ रहे और अपनी क्षेत्रीय पहचान बनाए रखी। 1699 में गठित सिख खालसा ने भी मुगल शक्ति की अवहेलना की। समुदायों ने मंदिरों का पुन निर्माण किया और विभिन्न संस्कृतियों को एक साथ लाया। भारत की अर्थव्यवस्था राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान समायोजित हुई। राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद, भारतीय कारक मजबूत बने रहे। सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से कृषि मजबूत रही। कालीकट और सूरत जैसे बंदरगाहों के माध्यम से व्यापार अच्छी तरह से चला, जिसे हुंडी प्रणाली (सुरक्षित धन हस्तांतरण के लिए) से मदद मिली। मंदिरों ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को चलाया। कारीगरों ने कपड़ा और कई हथियार बनाए। यद्यपि भारी करों ने किसानों को नुकसान पहुँचाया, लेकिन शासन की फैली हुई प्रणालियों ने अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में मदद की।
प्रश्न 3.
इस कालखंड ने लोगों के जीवन पर क्या प्रभाव डाला? (पृष्ठ 21)
उत्तर:
इस काल ने लोगों के जीवन में कठिनाई और विकास दोनों लाए। कभी-कभी उपज के आधे तक पहुँचने वाले भारी करों के साथ-साथ, बार-बार लूटपाट ने किसानों को गरीब बना दिया और कई क्षेत्रों में अकाल पड़ गए। साथ ही, व्यापार और शिल्प फलते-फूलते रहे, हालाँकि मुनाफा ज्यादातर धनी वर्गों तक ही पहुँचा। सांस्कृतिक रूप से, इस युग में महान उपलब्धियाँ देखी गई। विजयनगर के मंदिर, ताजमहल जैसी मुगल इमारतें और सिख धार्मिकग्रंथ भारतीय विरासत में समृद्धि लाए, भले ही मूर्तिभंजन और जजिया ने कई लोगों को दर्द पहुँचाया। रानी दुर्गावती, महाराणा प्रताप और गुरु तेग बहादुर प्रतिरोध और साहस के प्रतीक के रूप में खड़े हुए। गाँवों ने अपने स्थानीय शासन को बनाए रखा और मजबूत सामुदायिक बंधनों ने लोगों को बदलते और अक्सर अस्थिर समय के अनुकूल ढलने में मदद की।
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 26)
प्रश्न 1.
चित्र 2.6 (पाठ्यपुस्तक) को ध्यानपूर्वक देखें। आप क्या सोचते हैं, अलाउद्दीन खिलजी ने स्वयं को ‘द्वितीय सिकंदर’ क्यों कहा?
उत्तर:
अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी महत्वाकांक्षा और सैन्यशक्ति दिखाने के लिए खुद को अपने सिक्के पर दूसरा सिकंदर कहा। वह उत्तरी और मध्य भारत में अपनी विजयों और मुगल आक्रमणों के खिलाफ अपने बचाव की तुलना सिकंदर महान की उपलब्धियों से करना चाहता था, ताकि एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया जा सके।
प्रश्न 2.
आपके विचार से उन दिनों सेना को बनाए रखने एवं युद्ध संचालन के लिए किन प्रकार के संसाधनों की आवश्यकता होती होगी? समूहों में विभिन्न प्रकार के व्ययों पर चर्चा करें, जैसे-हथियारों या सैनिकों के लिए भोजन से लेकर युद्ध में पशुओं का उपयोग, सड़क निर्माण इत्यादि। (पृष्ठ 26)
उत्तर:
उन दिनों सेना बनाए रखने के लिए संसाधनों की एक विस्तृत भृंखला की आवश्यकता होती थी। तलवारें, धनुष और बाद में बारूद, तोपखाने जैसे हथियार युद्ध के लिए आवश्यक थे। सैनिकों और जानवरों को भोजन की निरंतर आपूर्ति की आवश्यकता थी। अनाज और अन्य प्रावधानों सहित। घोड़े, हाथी और ऊँट जैसे जानवर परिवहन और लड़ाई दोनों के लिए महत्वपूर्ण थे। सैन्य अभियानों से प्राप्त सामान, जो लोगों पर लगाए गए करों और हाल ही में लूटपाट के लिए भुगतान करते थे। सेना का वित्तपोषण बुनियादी ढाँचे से आया था, जिसमें सड़कों और पुलों को शामिल किया गया था, ताकि सैनिकों का वेतन, उपकरण और किलेबंदी आदि सभी कार्य सुचारू रूप से हो सके। इसके अलावा, हथियार बनाने के लिए कुशल कारीगरों की आवश्यकता थी और मजदूरों से रसद और निर्माण कार्य का समर्थन किया।
प्रश्न 3.
आपको क्यों लगता है कि मध्यकाल में ऐसे स्थानों को दुर्गों के निर्माण के लिए चुना गया? इसके पक्ष-विपक्ष पर चर्चा कीजिए। (संकेत-रणनीति, सुरक्षा, भेद्यता इत्यादि विषयों पर विचार करें।)
उत्तर:
कुंभलगढ़ जैसे मध्यकालीन किले कई कारणों से अरावली पहाड़ियों जैसे रणनीतिक स्थानों पर बनाए गए थे। ऊँचा इलाका प्राकृतिक रक्षा, निगरानी के लिए बेहतर दृश्यता प्रदान करता था और दुश्मनों के लिए पहुँचना मुश्किल बनाता था। आस-पास के जंगलों ने संसाधन प्रदान किए। हालाँकि, अलगाव ने त्वरित सुदृढ़ीकरण प्राप्त करना मुश्किल बना दिया, और खाड़ी इलाके ने आपूर्ति लाइनों और निर्माण को जटिल बना दिया।
(नोट-चित्र 2.10, पृष्ठ सं. 33 देखें।)
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प्रश्न 4.
चित्र 2.14 (पाठ्यपुस्तक) में आप कौन-से तत्व देखते हैं? वे उस समय की जीवन-शैली के बारे में क्या बताते हैं? (संकेत-शस्त्र, जानवर, गतिविधियों को ध्यान से देखें) नोट-चित्र 2.14 , पृ. सं. 35 NCERT देखें।
उत्तर:
उपर्युक्त चित्र में विट्ठल मंदिर की आकृति में योद्धाओं, तलवारों, भाले और ढालों के साथ-साथ घोड़ों और युद्ध के दृश्यों को दिखाया गया है। ये तत्व एक ऐसे समाज को दर्शाते हैं जिसने युद्ध को महत्व दिया, जहाँ जानवरों ने लड़ाई और परिवहन में एक अभिन्न अंग निभाई जो एक जीवंत संघर्ष-संचालित संस्कृति को दर्शाता है।
प्रश्न 5.
चित्र संख्या $2.23,2.24$ और 2.15 के मानचित्रों की तुलना करें। आप क्या अंतर देखते हैं? इनमें क्या परिवर्तन हुए हैं?
नोट-पृष्ठ सं. 35 , चित्र 2.15 देखें।

चित्र 2.23. तुगलक एवं लोदी शासकों (13 वीं से 15 वीं शताब्दी) के अधीन क्षेत्रों तथा दक्षिण एवं पूर्व की क्षेत्रीय शक्तियों के मध्य तुलना

उत्तर:
मानचित्र समय के बीच स्पष्ट अंतर दिखाते हैं। (चित्र 2.23 पृष्ठ 42 पर देखें) 13 वीं और 15 वीं शताब्दी के बीच मुख्य रूप से उत्तरी भारत पर दिल्ली सल्तनत का नियंत्रण प्रदर्शित करता है, जबकि दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्र होयसल और पूर्वी गंग जैसे स्वतंत्र राज्यों के अधीन रहे। (चित्र 2.24 पृष्ठ 42 पर देखें) दक्षिण पर हावी विजयनगर साम्राज्य के उदय, दक्कन पर शासन करने वाली बहमनी सल्तनत और पूर्व में गजपति साम्राज्य को दर्शाता है, जो क्षेत्रीय विखंडन की अवधि को दर्शाता है। (चित्र 2.15 पृष्ठ 35 पर देखें) में अकबर और औरगजेब के शासनकाल के दौरान मुगल साम्राज्य को भारत के अधिकांश हिस्से को अधीन करने के लिए विस्तार करते हुए दिखाया गया है, हालाँकि उत्तर-पश्चिमी हिस्से में सिख और राजपूत जैसे कुछ क्षेत्रीय शक्तियों ने विरोध करना जारी रखा। जो पुनर्गठन हुआ, उसमें दिल्ली सल्तनत के मुख्य रूप से उत्तरी फोकस से हटकर विजयनगर और गजपति जैसी मज़बूत दक्षिणी और पूर्वी शक्तियों का उदय शामिल था, जिसके बाद आक्रमण ii, क्षेत्रीय प्रतिरोध और नए राजवंशों के उदय से प्रभावित होकर मुगलों के अधीन भारत का लगभग एकीकरण हुआ।
प्रश्न 6.
अपने दो पुत्रों को लिखे गए पत्रों में औरंगजेब ने लिखा है, “मैं अकेला आया था और अकेला जा रहा हूँ। मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूँ और क्या कर रहा था… मैंने न देश के लिए और न ही लोगों के लिए अच्छा किया है। भविष्य के लिए भी मेरे पास कोई आशा नहीं है…मैं जीवनभर निराश रहा और दीन-हीन अवस्था में ही जा रहा हूँ।” ये शब्द उनके व्यक्तित्व के कौन-से पक्ष को उजागर करते हैं? आपको उनके बारे में कैसा महसूस होता है। (पृष्ठ 45)
उत्तर:
औरंगजेब का पत्र पछतावा प्रकट करता है, क्योंकि उसने अपने पिता को कैद् किया, गद्दी के लिए अपने ही भाइयों को मार डाला और अपने क्रूर शासन के दौरान हजारों लोगों को मार डाला।
अपने अंतिम वर्षों के दौरान, उसके द्वारा किए गए सभी गलत काम, जिनमें विद्यालयों, मंदिरों, शहरों का बड़े पैमाने पर विनाश और लूट शामिल थे, उससे प्रतिबिंबित हुए होंगे, इसीलिए उसने उल्लेख किया कि उसने देश और लोगों के लिए अच्छा नहीं किया था। उसके पछतावे के अलावा, पत्र उसके जीवन के अंतिम दिनों के दौरान उसके अकेलेपन और उसके अत्याचारपूर्ण शासन और नीतियों के कारण उस समय समाज पर पड़े नकारात्मक प्रभाव को भी दर्शाते हैं।
प्रश्न 7.
कक्षा में चर्चा करें कि ‘पाइक’ प्रणाली ने अहोम साम्राज्य में लोगों के दैनिक-जीवन को चुनौतियों एवं लाभों के संदर्भ में कैसे प्रभावित किया तथा कैसे राजाओं को सेना और अर्थव्यवस्था दोनों का प्रबंधन करने में सहायता की? (पृष्ठ 48)
उत्तर:
पाइक प्रणाली में हर सक्षम पुरुष को श्रम या सैन्य सेवा के बदले भूमि अधिकार दिए। इससे आर्थिक स्थिरता मिली और राजा को स्थायी सैनिकों की आवश्यकता बिना तैयार कार्यबल और सेना हो, जिससे लागत की बचत हुई। हालाँकि, अनिवार्य सेवा ने दैनिक जीवन को भी बाधित किया और श्रम की माँगों के कारण परिवारों पर दबाव डाला। कुल मिलाकर, इस प्रणाली ने अहोम शासकों को सड़कों और नहरों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने और मजबूत रक्षा बल बनाए रखने की अनुमति दी, जैसे कि 1671 में सरायघाट की लड़ाई में, जिसने साम्राज्य की अर्थव्यवस्था और सेना को अधिक कुशल बना दिया।
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प्रश्न 8.
अहोमों ने असम की नदियों, पहाड़ियों और जंगलों का उपयोग अपने लाभ के लिए कैसे किया? क्या आप उन उपायों के बारे में सोच सकते हैं, जिनसे भूगोल ने उनकी रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करने और युद्ध लड़ने में सहायता प्रदान की? (पृष्ठ 49)
उत्तर:
अहोमों ने असम के घने जंगलों, पहाड़ियों और नदियों का उपयोग गुरिल्ला रणनीति और घात लगाकर हमला करने के लिए किया, खासकर 1671 में सरायघाट की लड़ाई में। भूगोल ने सैनिकों के लिए प्राकृतिक बाधाएँ और छिपने के स्थान प्रदान किए, जबकि नदी मार्गों ने बचाव में मदद की। इससे दुश्मनों के लिए नेविगेट करना, हमले शुरू करना और अपनी आपूर्ति लाइनों को बनाए रखना मुश्किल हो गया।

चित्र 2.25. सरायघाट के युद्ध की स्मृति में एक पट्टिका, जिसके अग्रभाग में एक अहोम नाव प्रदर्शित है (सरायघाट युद्ध स्मारक पार्क)

आइए विचार करें (पृष्ठ 28)
प्रश्न 1.
हम प्रतिमा (इमेज) शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं, जबकि सामान्यतः ‘मूर्ति’ या ‘चिह्न’ जैसे शब्द प्रचलित हैं? वास्तव में, ये दोनों शब्द- ‘मूर्ति’ या ‘चिह्न’ यहूदी, ईसाई एवं इस्लाम जैसे पंथों-मजहबों के संदर्भ में निंदनीय हैं क्योंकि इन पंथों की रूढ़िवादी शाखाएँ मूर्ति पूजा या चिह्नों की पूजा की निंदा करती हैं।
भारतीय शास्त्रीय ग्रंथों में ‘मूर्ति’, ‘विग्रह’, ‘प्रतिमा’, ‘रूप’ जैसे शब्दों का उपयोग प्रायः मंदिरों या घरों में होने वाली पूजा में प्रयुक्त मूर्तियों के लिए किया जाता था।
उत्तर:
“छवि” शब्द का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि ‘मूर्ति’ और ‘आइकन’ के यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम में नकारात्मक अर्थ है, जो मूर्ति पूजा की निंदा करते हैं। भारतीय शास्त्रीय ग्रंथ पूजा में उपयोग की जाने वाली मूर्तियों के लिए ‘मूर्ति’ या ‘प्रतिमा’ जैसे तटस्थ शब्दों का उपयोग करते हैं। इसलिए ‘ छवि’ एक तटस्थ शब्द है जो अर्थों से बचता है और सांस्कृतिक संदर्भ का सम्मान करता है।
प्रश्न 2.
तुगलक काल में, तेलुगु मुखियाओं, मुसुनुरी नायकों ने क्षेत्र के 75 से अधिक अन्य मुखियाओं को संगठित कर एक संघ बनाया। इस संघ ने छोटे राज्यों एवं दिल्ली सल्तनत की सेनाओं को पराजित किया तथा 1330-1336 के आस-पास वारंगल (वर्तमान तेलंगाना) से मुहम्मद बिन तुगलक की सेना को खदेड़ दिया। क्या आपको लगता है कि उस समय 75 मुखियाओं का एकजुट करना सरल कार्य रहा होगा?
उत्तर:
14 वीं शताब्दी में 75 सरदारों को एक साथ लाना क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता, खराब संचार और विभिन्न राजनीतिक हितों के कारण एक मुश्किल काम रहा होगा। मुसुनुरी नायकों ने ऐसा करने में कामयाबी हासिल की, जो मज़बूत नेतृत्व, दिल्ली सल्तनत के खिलाफ सामान्य लक्ष्यों और रणनीतिक गठबंधन बनाने की क्षमता को दर्शाता है।
प्रश्न 3.
क्या आपने ‘गजपति’ जैसे शीर्षकों में पति शब्द पर ध्यान दिया? पति का अर्थ है ‘स्वामी’ या ‘प्रभु’। इस काल में कई राजवंशों द्वारा यह शक्ति तथा प्रतिष्ठा के संकेत के रूप में प्रयुक्त होता था। विजयनगर के राजाओं को ‘नरपति’, बहमनी सल्तनत के शासकों को ‘अश्वपति’ तथा मराठा शासकों को ‘छत्रपति’ कहा जाता था। प्रत्येक उपाधि राजत्व एवं शक्ति के विभिन्न पक्षों को दर्शाती है। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि इन तीन उपाधियों का क्या अर्थ है?
उत्तर:
शाही खिताबों में ‘पति’ शब्द के उपयोग ने राजत्व और शक्ति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया। विजयनगर के शासकों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला ‘नरपति’ का अर्थ “पुरुषों का भगवान” था और इसने लोगों पर उनके शासन पर जोर दिया। बहमनी सल्तनत के शासकों को ‘अश्वपति’ या “घोड़ों का भगवान” कहा जाता था, जिसने उनकी घुड़सवार सेना की ताकत पर प्रकाश डाला। मराठा शासकों ने ‘छत्रपति’ की उपाधि का इस्तेमाल किया, जिसका अर्थ ‘सर्वोच्च संप्रभु’ था, ताकि उनके सर्वोपरि अधिकार को दर्शाया जा सके।
प्रश्न 4.
भारत के विषय में बाबर के विचारों में आप क्या विशेष पाते हैं? समूहों में चर्चा करें।
उत्तर:
बाबर के भारत के विषयों से पता चलता है कि वह एक नई भूमि में बाहर महसूस करता था। वह मध्य एशिया की ठण्डी जलवायु और संस्कृति को याद करता था, लेकिन भारत के समृद्ध संसाधनों से प्रभावित था, जिसमें सोने और चाँदी के ढेर, व्यस्त बाजार और कुशल कारीगर शामिल थे। हालाँकि उसने कुछ चीजों की आलोचना की, जैसे कि अपरिचित भोजन और जीवन-शैली, उसने भूमि की सुंदरता और धन पर भी ध्यान दिया। उसके विचार उसकी घर की याद और भारत की ताकत के लिए उसकी नज़र दोनों को दर्शाते हैं।
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प्रश्न 5.
आपके विचार में अकबर ने साम्राज्य विस्तार हेतु अलग-अलग रणनीतियाँ क्यों अपनाई, जबकि दिल्ली के पहले शासक प्रायः केवल सैन्य शक्ति पर ही निर्भर थे? (पृष्ठ 40)
उत्तर:
अकबर ने कूटनीति, विवाह गठबंधन और सुलह-ए-कुल (धार्मिक सहिष्णुता) जैसी विभिन्न रणनीतियाँ अपनाई क्योंकि वह समझते थे कि विविध साम्राज्य पर शासन करने के लिए केवल बल से कही अधिक की आवश्यकता होती है। पहले के दिल्ली सुल्तान ज्यादातर सैन्य शक्ति पर निर्भर थे, जिससे अस्थिरता और विद्रोह होता था। अकबर ने इससे सीखा और राजपूतों जैसे समूहों की वफादारी जीतने के तरीके चुने, जिससे उनका साम्राज्य अधिक स्थिर और एकजुट हो गया।
प्रश्न 6.
हमने ऊपर देखा कि दिल्ली के सुल्तानों का औसत शासनकाल लगभग नौ वर्ष था। यह आँकड़ा मुगल सम्राटों के विषय में औरंगजेब तक 27 वर्ष का हो जाता है और यदि हम 19 वीं शताब्दी में साम्राज्य के अंत तक के सभी मुगल शासकों को सम्मिलित करें तो 16 वर्ष सभी के शासनकाल का औसत था। शासन के वर्षों की इन संख्याओं से आप क्या निष्कर्ष निकालते हैं? (पृष्ठ 43)
उत्तर:
दिल्ली के सुल्तानों का 9 साल का औसत शासनकाल उनके समय को राजनीतिक अस्थिरता और बार-बार हिंसक उत्तराधिकार को दर्शाता है। इसके विपरीत, औरंगजेब तक मुगल सम्राटों ने औसतन 27 साल तक लम्बे समय तक शासन किया, जो दर्शाता है कि उनके पास बेहतर प्रशासन, योजना और गठबंधन थे। लेकिन जब बाद के मुगल शासकों को शामिल किया जाता है, तो औसत गिरकर 16 साल हो जाता है, जो दर्शाता है कि समय के साथ साम्राज्य कमजोर और कम स्थिर हो गया।
प्रश्न 7.
आपको ऐसा क्यों लगता है कि गुरु तेग बहादुर ने धर्म परिवर्तन करने के स्थान पर यातनाएँ सहन कीं? उन्होंने क्यों सोचा कि उनका बलिदान कोई प्रभाव डालेगा? (पृष्ठ 52)
उत्तर:
गुरु तेग बहादुर ने धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखने और कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए यातनाएँ सहीं, यह मानते हुए कि उनकी शहादत मुगल उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध को प्रेरित करेगी।
प्रश्न 8.
सिख गुरुओं एवं खालसा ने किन मूल्यों को अपनाया? (पृष्ठ 52)
उत्तर:
सिख गुरुओं और खालसा ने साहस, न्याय, समानता और निस्वार्थ सेवा के मूल्यों को आत्मसात किया। वे धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने, उत्पीड़न से लड़ने और कमजोरों की रक्षा करने के लिए खड़े हुए, साथ ही अपने अनुयायियों के बीच एकता और नैतिक शक्ति को बढ़ावा दिया।
प्रश्न 9.
वर्तमान विश्व में वे कैसे प्रासंगिक हैं? (पृष्ठ 52)
उत्तर:
ये मूल्य आज महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हमें सिखाते हैं कि सभी के साथ उचित व्यवहार करें, मतभेदों का सम्मान करें और दूसरों की मदद करें, जिससे एक बेहतर और शांतिपूर्ण दुनिया बनाने में मदद मिलती है।