Experts have designed these Class 8 Social Science Notes and Class 8 SST Chapter 1 Notes in Hindi प्राकृतिक संसाधन एवं उनका उपयोग for effective learning.
Natural Resources and Their Use Class 8 Notes in Hindi
प्राकृतिक संसाधन एवं उनका उपयोग Class 8 Notes
कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान अध्याय 1 नोट्स प्राकृतिक संसाधन एवं उनका उपयोग
→ अपतटीय तेल संयंत्र – समुद्र में तट (किनारा) से दूर समुद्र में स्थापित वह औद्योगिक संरचनाएँ होती हैं जो समुद्र तल में ड्रिल करके तेल /गैस निकालते हैं।
→ संसाधनों का दोहन – प्राकृतिक संसाधनों (जैसे- जल, मृदा, खनिज, वन, जीवाश्म ईंधन) का अत्यधिक और अनियंत्रित उपभोग संसाधनों का दोहन कहलाता है।
→ पारिस्थितिकी तंत्र – जीवों (पेड़-पौधे, मनुष्य, जीव-जंतु, सूक्ष्म जीव) और उनके अजैविक पर्यावरण (जल, वायु, मृदा, ताप, प्रकाश) के मध्य होने वाली परस्पर क्रियाओं की कार्यात्मक इकाई को पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं।
→ प्राकृतिक संसाधन – वे संसाधन जो प्रकृति से स्वतः प्राप्त होते हैं और जिनका उपयोग मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं।
→ नवीकरणीय संसाधन – वह प्राकृतिक संसाधन जो उपयोग के बाद भी प्राकृतिक रूप से फिर बन जाते हैं और लंबे समय तक समाप्त नहीं होते हैं, नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं।
→ अनवीकरणीय संसाधन – वह प्राकृतिक संसाधन जो एक बार उपयोग होने पर बहुत लंबे समय तक दोबारा नहीं बनते या बिलकुल नहीं बनते, अनवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं।
→ दावानल – जंगल की आग।
→ नवीकरणीय संसाधनों का पुनर्स्थापन – नवीकरणीय संसाधनों का पुनर्स्थापन का अर्थ है क्षतिग्रस्त या अत्यधिक उपयोग किए गए संसाधनों को फिर से उनकी प्राकृतिक अवस्था में लाना ताकि वे दोबारा स्वयं नवीकरण हो सकें।
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→ नवीकरणीय संसाधनों का पुनर्जनन नवीकरणीय संसाधनों का पुनर्जनेन का अर्थ है ऐसे प्राकृतिक संसाधनों का स्वतः या मानव प्रयासों से दोबारा विकसित होना, जो उपयोग के बाद फिर से उपलब्ध हो जाते हैं, जैसे- वन, जल, मृदा, जैविक संसाधन आदि।
→ अर्घ्य – सामान्यतः सम्मान या कृतज्ञता के रूप में जल अर्पण करना।
→ पर्वतीय हिम स्त्रोत (वाटर टावर) – पर्वतीय हिम स्रोत वे जल स्त्रोत होते हैं, जो ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में जमी हुई बर्फ (हिमनद / ग्लेशियर) के पिघलने से बनते हैं। यह स्थायी जल स्त्रोत होते हैं।
→ औद्योगीकरण – जब किसी देश या क्षेत्र में कारखानों, मशीनों और उद्योगों का विकास होता है और लोग हस्तकला व कृषि के स्थान पर उद्योगों में काम करने लगते हैं तो यह प्रक्रिया औद्योगीकरण कहलाती है।
→ अविवेकपूर्ण मानव कृत्य – वह मानव गतिविधियाँ, जो बिना सोचे-समझे की जाती हैं और जिनसे पर्यावरण. प्राकृतिक संसाधनों या समाज को नुकसान पहुँचता है उन्हें अविवेकपूर्ण मानव कृत्य कहते हैं।
→ जीवाश्म ईंधन – वे ईंधन जो लाखों वर्षों पहले के पौधों और जीवों के अवशेषों से बने हैं और भूमि के नीचे पाए जाते हैं, उन्हें जीवाश्म ईंधन कहते हैं। कोयला, खनिज तेल और प्राकृतिक गैस इसके उदाहरण हैं।
→ सातत्य विधियाँ – वह तरीके जिनसे प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण, संतुलित और टिकाऊ उपयोग किया जाता है ताकि वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी उपलब्ध रहें, सातत्य विधियाँ कहलाते हैं।
→ औद्योगिक अपशिष्ट – कारखानों और उद्योगों से निकलने वाला वह कचरा या अवशेष पदार्थ, जो उत्पादन के बाद बच जाता है और यदि सही तरीके से न निपटाया जाए तो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है, उसे औद्योगिक अपशिष्ट कहते हैं। यह अपशिष्ट ठोस, द्रव और गैस, तीनों रूपों में हो सकता है।
→ पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ – प्रकृति द्वारा मनुष्य को मिलने वाले वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ, जो वन, नदी, मृदा, समुद्र, वायुमंडल आदि पारिस्थितिकी तंत्रों से प्राप्त होते हैं, उन्हें पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ कहते हैं।
→ मृदा-अपरदन – जब किसी भी कारण (भौतिक, रसायनिक, जैविक) से मृदा की ऊपरी परत नष्ट (बह या उड़ जाती है) हो जाती है तो इस प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं।
→ परागित फसल – वे फसलें जिनमें परागण (परागकण का पुंकेसर से अंडप तक पहुँचना) होने पर ही फल और बीज का निर्माण होता है, उन्हें परागित फसल कहते हैं।
→ संरक्षित कृषि भूमि – ऐसी कृषि भूमि, जिसे कानूनी, तकनीकी अथवा प्राकृतिक उपायों द्वारा सुरक्षित रखा जाता है ताकि उसका कृषि उपयोग बना रहे और उसें अन्य गैर कृषि कार्यों में न बदला जाए, संरक्षित कृषि भूमि कहलाती है।
→ वूट्ज स्टील – प्राचीन भारत में उत्पादित एक उच्च गुणवत्ता वाला स्टील, जो अपनी उन्नत धातु विज्ञान के लिए जाना जाता है।
→ कायाकल्प – किसी चीज को फिर से ताजा या ऊर्जा से भरा बनाने का कार्य।
→ गीली घास पतवार – मृदा में नमी बनाए रखने के लिए फसलों या पौधों की जड़ों के आस-पास मिट्टी की सतह को घास, पत्तियों, भूसा, प्लास्टिक शीट आदि से ढकने की विधि को गीली घास पतवार विधि कहते हैं।
→ भूजल स्तर की पुनर्भरण की दर – किसी क्षेत्र में एक निश्चित समय (जैसे एक वर्ष) में वर्षा, नदियों, झीलों या सिंचाई जल के माध्यम से जितना पानी भूमि में रिसकर भूजल को फिर से भरता है, उसी को भूजल पुनर्भरण की दर कहते हैं।
→ भूजल-निष्कर्षण – भूमि के नीचे जमा पानी को कुएँ, नलकूप या हैंडपंप / पंप की सहायता से बाहर निकालने की प्रक्रिया को भूजल निष्कर्षण कहते हैं।
→ मृदा-क्षरण – मृदा-क्षरण वास्तव में मृदा अपरदन का ही एक रूप है। जब पानी या हवा के प्रभाव से मृदा के सूक्ष्म कण हटते या बह जाते हैं तो इस प्रक्रिया को मृदा-क्षरण कहते हैं।
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→ बहु-फसलीकरण – जब एक ही खेत में एक वर्ष में दो या उससे अधिक फसलें उगाई जाती हैं तो उसे बहु- फसलीकरण कहते हैं।
→ फसल-चक्र – एक ही खेत में विभिन्न फसलों को एक निश्चित क्रम में अलग-अलग मौसमों में उगाने की पद्धति को फसल चक्र कहते हैं।
→ कम्पोस्ट खाद – पौधों के अवशेष, पत्तियाँ, घास, रसोई का जैविक कचरा आदि को सड़ा-गलाकर तैयार की गई प्राकृतिक खाद को कम्पोस्ट खाद कहते हैं।
→ जैव-विविधता – पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीव-जंतु, पेड़-पौधे, सूक्ष्म जीवों तथा उनके बीच की विविधता और आपसी संबंधों को जैव-विविधता कहते हैं।
→ प्रकृति कब एक संसाधन बन जाती है?
- प्रकृति से अभिप्राय पर्यावरण में विद्यमान समस्त सजीव और निर्जीव रूपों की समग्रता से है जिनका निर्माण मानव द्वारा नहीं किया गया है।

- जब मानव प्रकृति द्वारा प्रदान किए गए किसी एक तत्व अथवा तत्वों का उपयोग अपने उपभोग के लिए करता है तब यह प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं। कुछ संसाधनों को आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि हमारे पास उन तक पहुँचने के लिए तकनीकी अभाव हो सकता है अथवा उनको प्राप्त करने में किया गया खर्च यदि उसके मूल्य से अधिक है तो उनका उपयोग संभव नहीं है।
- किसी प्राकृतिक तत्व को प्राकृतिक संसाधन अथवा संसाधन बनने के लिए उसका तकनीकी रूप से सुलभ होना, आर्थिक रूप से व्यवहारिक होना और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य होना आवश्यक है।
- मानव द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्राकृतिक संसाधनों को प्रत्यक्ष संसाधन (जल, वायु, मृदा आदि) तथा अप्रत्यक्ष संसाधन (कोयला, खनिज तेल बहुमूल्य पत्थर, धातु अयस्क आदि) में वर्गीकृत किया जा सकता है।
→ प्राकृतिक संसाधनों की श्रेणियाँ
- प्राकृतिक संसाधनों को उनके उपयोग के आधार पर जैसे अस्तित्व के लिए सामग्री के रूप में अथवा ऊर्जा स्त्रोत के रूप में वर्गीकृत करके एवं नामांकन करके अधिक सरल रूप में समझा जा सकता है।

- जीवन के लिए आवश्यक संसाधन – वायु, जल और मृदा को आवश्यक संसाधनों की श्रेणी में रखा जाता है। क्योंकि इनके बिना मानव जीवन संभव नहीं है।
- सामग्री के लिए संसाधन – मानव प्रकृति से प्राप्त उपहारों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उनके रूप और गुणों में परिवर्तन करके उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करता है।
- ऊर्जा के लिए संसाधन – आधुनिक जीवन के लिए ऊर्जा ऊर्जा महत्वपूर्ण संसाधन है। विभिन्न प्राकृतिक स्रोतों जैसे- कोयला, जल, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, सूर्य तथा पवन आदि से प्राप्त होती है।
→ नवीकरणीय और गैर-नवीकरणीय संसाधन-
- प्रकृति समय के साथ स्वयं को स्वस्थ्य नवीनीकृत और संरक्षित करती है। प्रकृति में पुनर्जनन, पुनर्स्थापन से अधिक व्यापक है। उदाहरण के रूप में वन एवं मृदा प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से स्वयं का पुनः निर्माण करती है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल से प्राप्त ऊर्जा तथा वनों से प्राप्त लकड़ी नवीकरणीय संसाधन के अंतर्गत आते हैं।
- गैर-नवीकरणीय संसाधनों से अभिप्राय उन संसाधनों से है जिनका पुनर्निमाण लंबे समय काल में होता है। जीवाश्म ईंधन, खनिज एवं धातुएँ गैर-नवीकरणीय संसाधनों की श्रेणी में आते हैं।
→ प्राकृतिक संसाधनों का वितरण और इसके निहितार्थ –
धरातल पर प्राकृतिक संसाधनों का वितरण समान नहीं है। प्रायः कम महत्वपूर्ण खनिज अधिक मात्रा में और अधिक महत्वपूर्ण खनिज कम मात्रा में पाए जाते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का यह असमान वितरण बस्तियों, व्यापार और वैश्विक संबंधों को प्रभावित करता है। यह प्रायः संघर्षो को भी जन्म देता है।

→ प्राकृतिक संसाधन अभिशाप –
किसी देश का प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध होना सदैव उसके आर्थिक विकास की गारंटी नहीं होता है। आर्थिक विकास तभी संभव है जब वह देश अपने प्राकृतिक संसाधनों को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में परिवर्तित कर सके। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के उपरांत भी वहाँ आर्थिक वृद्धि और विकास मंद हो सकता है। इस स्थिति को ही अर्थशास्त्री प्राकृतिक संसाधन अभिशाप’ या प्रचुरता का विरोधाभास कहते हैं।
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→ प्राकृतिक संसाधनों का दायित्वपूर्ण और विवेकपूर्ण उपयोग-प्रबंधन –
प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण उपयोग से प्रदूषण, जैव-विविधता की हानि, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत को नुकसान के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। इसलिए धरातल पर मानव के अस्तित्व को सुरक्षित बनाए रखने के लिए नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं विवेकपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना चाहिए। जिससे संसाधनों का पुनर्स्थापन एवं पुनर्जनन संभव हो सके।

→ नवीकरणीय संसाधनों का पुनर्स्थापन और पुनर्जनन-
यहाँ दो उदाहरण दिए हैं कि किस प्रकार भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन और औद्योगिक प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के अति उपयोग का परिणाम है।
→ भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन (पंजाब-एक केस अध्ययन) –
पंजाब, जो कभी भारत की हरित क्रांति की रीढ़ था, अब भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। 1960 के दशक में उच्च उपज वाली फसलों की शुरुआत ने जल की माँग में तीव्र वृद्धि की वर्तमान में मुफ्त और सस्ती विद्युत आपूर्ति ने जल के दोहन की गति को बहुत बढ़ा दिया है। कीटनाशकों और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण भी धरातलीय और भूमिगत जल प्रदूषित हुआ है जिससे अनेक स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होने लगे हैं। पंजाब के 80% क्षेत्र को अतिदोहित क्षेत्र’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह जल स्रोतों के पुनर्भरण की तुलना में अत्यधिक दोहन का दुष्परिणाम है।

→ सीमेंट का उदाहरण –
वर्तमान में निर्माण कार्यों में सीमेंट का व्यापक रूप से उपयोग होता है। सीमेंट उद्योग को सबसे अधिक प्रदूषण करने वाले उद्योगों में शामिल किया गया है। इससे निकलने वाली धूल मानव और पशुओं के स्वास्थ्य के साथ-साथ फसलों, मिट्टी और पानी को भी नुकसान पहुँचाती है। यद्यपि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इन दुष्प्रभावों को कम करने अथवा रोकने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।
→ वृक्षायुर्वेद –
यह पौधों और वृक्षों के अध्ययन और देखभाल पर केंद्रित प्राचीन भारतीय वनस्पति विज्ञान है। यह भारत की प्राचीन पारम्परिक ज्ञान प्रणाली है जिसे 10वीं शताब्दी में सुरपाल के ‘वृक्षायुर्वेद’ में औपचारिक रूप से वर्णित किया गया है। इसमें मृदा के चयन, बीज उपचार, सिंचाई, प्राकृतिक कीट नियंत्रण विधियों आदि का वर्णन मिलता है। यह फसल रोटेशन और मिश्रित फसल जैसी कृषि विधियों को बढ़ावा देता है। यह मृदा में नमी बनाए रखने के साथ जुताई के उचित तरीकों पर भी प्रकाश डालता है।
→ सिक्किम-एक केस अध्ययन –
सिक्किम राज्य में रहने वाले पेमा परिवार को अपने खेत में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक उपयोग के कारण घटती पैदावार और बढ़ते कर्ज का सामना करना पड़ा। राज्य द्वारा जैविक कृषि को प्रोत्साहन देने पर पेमा परिवार ने भी इसे अपनाया। आरंभ में उन्हें कम पैदावार का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे खाद प्राकृतिक कीट निरोधक और फसल विविधीकरण के कारण उत्पादन में वृद्धि हुई। इसके कारण जैव-विविधता में भी वृद्धि दर्ज की गई। 2016 तक सिक्किम, भारत का प्रथम जैविक राज्य बन गया।
→ संसाधनों का दायित्वपूर्ण और विवेकपूर्ण उपयोग –
वर्तमान में अनवीकरणीय संसाधनों का भविष्य में लंबे समय तक उपयोग के लिए आवश्यक है कि नवीकरणीय संसाधनों के उपयोग के साथ-साथ अनवीकरणीय संसाधनों के सीमित उपयोग एवं उनके विकल्पों की खोज पर बल दिया जाए।
→ अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन-
नवीकरणीय ऊर्जा में भारत का नेतृत्व – 2015 में भारत और फ्रांस ने सौर ऊर्जा के लिए अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन (I.A.S.E.) आरंभ किया। यह संगठन उन देशों पर केंद्रित है जहाँ वर्ष भर पर्याप्त धूप रहती है। भड़ला सौर उद्यान ( राजस्थान) अनवीकरणीय ऊर्जा के लिए भारत के संकल्प को दर्शाता है। यह गठबंधन भारत के लिए पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और आर्थिक अवसर दोनों प्रदान करता है।