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NCERT Class 8th Hindi Chapter 9 आदमी का अनुपात Question Answer
आदमी का अनुपात Class 8 Question Answer
कक्षा 8 हिंदी पाठ 9 प्रश्न उत्तर – Class 8 Hindi आदमी का अनुपात Question Answer
पाठ से प्रश्न – अभ्यास
मेरी समझ से
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
प्रश्न 1.
कविता के अनुसार ब्रह्मांड में मानव का स्थान कैसा है?
- पृथ्वी पर सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण
- ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म
- सूर्य, चंद्र आदि सभी नक्षत्रों से बड़ा
- समस्त प्रकृति पर शासन करने वाला
उत्तर:
- ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म
प्रश्न 2.
कविता में मुख्य रूप से किन दो वस्तुओं के अनुपात को दिखाया गया है ?
- पृथ्वी और सूर्य
- देश और नगर
- घर और कमरा
- मानव और ब्रह्मांड
उत्तर:
- मानव और ब्रह्मांड

प्रश्न 3.
कविता के अनुसार मानव किन भावों और कार्यों में लिप्त रहता है?
- त्याग, ज्ञान और प्रेम में
- सेवा और परोपकार में
- ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा में
- उदारता, धर्म और न्याय में
उत्तर:
- ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा में
प्रश्न 4.
कविता के अनुसार मानव का सबसे बड़ा दोष क्या है?
- वह अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं को नहीं समझता।
- वह दूसरों पर शासन स्थापित करना चाहता है ।
- वह प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है।
- वह अपने छोटेपन को भूल अहंकारी हो जाता है।
उत्तर:
- वह अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं को नहीं समझता।
- वह दूसरों पर शासन स्थापित करना चाहता है ।
- वह अपने छोटेपन को भूल अहंकारी हो जाता है।
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(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ विचार कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर:
- मेरे द्वारा इस उत्तर का चयन करने का कारण यह है कि कविता में मानव को पृथ्वी, सूर्य, नक्षत्र, ब्रह्मांड आदि सभी से छोटा बताया गया है।
- इस प्रश्न का यह उत्तर चुनने का कारण यह है कि कविता में मुख्य रूप से मानव और ब्रह्मांड के संदर्भ में ही चर्चा की गई है तथा इन दोनों के अनुपात को ही दिखाया गया है।
- इस प्रश्न का उत्तर चुनने का कारण यह है कि कविता में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मानव ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा आदि के भावों और कार्यों में लगा रहता है। वह इन सब से ऊपर नहीं उठा पाता है।
- इस प्रश्न का यह उत्तर चुनने का कारण यह है कि कविता में मानव जाति के इन तीनों दोषों की परोक्ष या अपरोक्ष रूप से चर्चा की गई है।
पंक्तियों पर चर्चा

नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। अपने समूह में इनके अर्थ पर चर्चा कीजिए और लिखिए-
(क) “अनगिन नक्षत्रों में / पृथ्वी एक छोटी / करोड़ों में एक ही ।”
उत्तर:
इस पंक्ति में पृथ्वी के आकार की नक्षत्रों के संदर्भ में तुलना की गई है। इनकी तुलना में पृथ्वी बहुत छोटी है। नक्षत्र अनगिनत हैं। यह पृथ्वी करोड़ों ग्रह-नक्षत्रों में एक है जो सबको अपने में समेटे हुए है।
(ख) “संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है / अपने को दूजे का स्वामी बताता है।”
उत्तर:
इस पंक्ति में मनुष्य के स्वभाव के बारे में बताया गया है। मनुष्य अपने स्वभाव के वशीभूत होकर अनगिनत दीवारें खड़ी करता है। वह खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है तथा अपने को दूसरों को स्वामी बताता है।
(ग) “देशों की कौन कहे / एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है।”
उत्तर:
इस पंक्ति में मनुष्य के स्वभाव तथा उसकी आंतरिक जटिलता को दर्शाया गया है। मनुष्य बड़े स्थान तो क्या एक छोटे स्थान में भी अपनी अलग दुनिया बना लेता है। एक सीमित दायरा भी उसकी सोच को नहीं बदल पाता। यह इस बात को दर्शाता है कि एक स्थान पर रहने वाले दो व्यक्ति कैसे मानसिक रूप से अलग-अलग दुनिया में जीने लगते हैं, अपने विचारों एवं अलग-अलग दृष्टिकोणों के कारण।
मिलकर करें मिलान
• नीचे दो स्तंभ दिए गए हैं। अपने समूह में चर्चा करके स्तंभ 1 की पंक्तियों का मिलान स्तंभ 2 में दिए गए सही अर्थ से कीजिए ।

उत्तर:
1. – 3
2. – 5
3. – 6
4. – 2
5. – 1
6. – 4
अनुपात
• इस कविता में ‘मानव’ और ‘ब्रह्मांड’ के उदाहरण द्वारा व्यक्ति के अल्पत्व और सृष्टि की विशालता के अनुपात को दिखाया गया है। अपने साथियों के साथ मिलकर विचार कीजिए कि मानव को ब्रह्मांड जैसा विस्तार पाने के लिए इनमें से किन-किन गुणों या मूल्यों की आवश्यकता होगी? आपने ये गुण क्यों चुने, यह भी साझा कीजिए।

उत्तर:
मानव को ब्रह्मांड जैसा विस्तार पाने के लिए शांति, सहनशीलता, स्वतंत्रता, समावेशिता, संतुलन, विशालता, सहअस्तित्व, विस्तार, सौहार्द जैसे गुणों या मूल्यों की आवश्यकता होगी, क्योंकि ये गुण (मूल्य) मनुष्य को सकारात्मक या रचनात्मक दिशा में ले जाते हैं, जिससे उसका दिनोंदिन उत्थान होता है जबकि शेष मूल्य मनुष्य के नकारात्मक मूल्य हैं जिनसे मनुष्य का पतन होता जाता है।
संकुचित होता जाता है तथा वह किसी काम का नहीं रह जाता है।
सोच-विचार के लिए
• कविता को पुनः पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए-
(क) कविता के अनुसार मानव किन कारणों से स्वयं को सीमाओं में बाँधता चला जाता है?
उत्तर:
कविता के अनुसार, मानव स्वयं को ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, और अविश्वास जैसे नकारात्मक भावों के कारण सीमाओं में बाँधता चला जाता है। इन्हीं कारणों से वह असंख्य दीवारें खड़ी करता है और एक-दूसरे पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करता है।
(ख) यदि आपको इस कविता की एक पंक्ति को दीवार पर लिखना हो, जो आपको प्रतिदिन प्रेरित करे तो आप कौन-सी पंक्ति चुनेंगे और क्यों ?
उत्तर:
प्रेरणा के लिए मैं यह पंक्ति चुनूँगा: ‘कितनी ही भूमियाँ, कितनी ही सृष्टियाँ।’ क्योंकि यह पंक्ति हमें ब्रह्मांड की विशालता और उसमें मौजूद अनगिनत संभावनाओं की याद दिलाती है। यह हमें अपने छोटे से अहम, स्वार्थ और तुच्छ झगड़ों से ऊपर उठकर बड़ी सोच रखने और व्यापक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करती है। यह बताती है कि हम जिस दुनिया में रहते हैं, वह कितनी विशाल और अद्भुत है और हमारे अपने मन की संकीर्णताएँ हमें इस विशालता का अनुभव करने से रोकती हैं।
(ग) कवि ने मानव की सीमाओं और कमियों की ओर ध्यान दिलाया है, लेकिन कहीं भी क्रोध नहीं दिखाया। आपको इस कविता का भाव कैसा लगा – व्यंग्य, करुणा, चिंता या कुछ और? क्यों?
उत्तर:
इस कविता का भाव मुझे मुख्य रूप से चिंता और करुणा का मिश्रण लगा, जिसमें एक हल्का-सा व्यंग्य भी निहित है क्योंकि-
- चिंता – कवि इस बात को लेकर चिंतित है कि मनुष्य इतना विशाल होते हुए भी, अपनी छोटी सोच और नकारात्मक प्रवृत्तियों (ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, अविश्वास) के कारण खुद को कैसे सीमित कर रहा है। वह देशों की बात तो छोड़िए, एक ही कमरे में दो दुनिया बना रहा है। वह उसकी संकीर्ण मानसिकता पर चिंता व्यक्त करता है।
- करुणा – कवि मानव की इस दशा पर दयालु भाव भी रखता है। वह उसकी कमियों को उजागर करता है, लेकिन किसी तरह का कटु क्रोध या भर्त्सना नहीं करता। ऐसा लगता है कि वह मानव को इस अज्ञान से बाहर निकलने और अपनी वास्तविक क्षमता को समझने की दिशा में प्रेरित करना चाहता है।
- व्यंग्य – “ देशों की कौन कहे, एक कमरे में, दो दुनिया रचाता है”- इस पंक्ति में एक सूक्ष्म व्यंग्य है। यह मनुष्य की उस प्रवृत्ति पर कटाक्ष है कि जब वह इतने बड़े संसार में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रहा, तो वह अपने छोटे दायरे में भी विभाजन पैदा कर रहा है। यह उसकी विडंबना को दर्शाता है।
- कवि का उद्देश्य मानव की बुराइयों पर केवल क्रोध करना नहीं, बल्कि उसे आत्मनिरीक्षण के लिए प्रेरित करना है।
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(घ) आपके अनुसार ‘दीवारें उठाना’ केवल ईंट-पत्थर से जुड़ा काम है या कुछ और भी हो सकता है? अपने विचारानुसार समझाएँ ।
उत्तर:
मेरे अनुसार, कविता में ‘दीवारें उठाना’ केवल ईंट-पत्थर से जुड़ा काम नहीं है, बल्कि यह उससे कहीं अधिक गहरा और प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। यह निम्नलिखित विभिन्न प्रकार की दीवारों को संदर्भित करता है:
- मानसिक और वैचारिक दीवारें: ये वे दीवारें हैं जो मनुष्य अपने विचारों, पूर्वाग्रहों, रूढ़ियों और संकीर्ण मानसिकता के कारण दूसरों और स्वयं के बीच खड़ी कर लेता है। उदाहरण के लिए, ‘मेरा धर्म श्रेष्ठ है’, ‘मेरा देश महान है’, ‘मैं तुमसे बेहतर हूँ’ जैसी सोच वैचारिक दीवारें खड़ी करती है।
- सामाजिक और भावनात्मक दीवारें: ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ और अविश्वास जैसे नकारात्मक भाव लोगों के बीच भावनात्मक दूरियाँ पैदा करते हैं। ये भावनाएँ परिवारों, समुदायों और समाजों में दरारें डालती हैं, जिससे लोग एक-दूसरे से अलग-थलग पड़ जाते हैं।
- जाति, धर्म, लिंग, वर्ग आधारित दीवारें: समाज में विभिन्न समूहों के बीच बनाई गई भेदभावी प्रणालियाँ और पूर्वाग्रह भी अदृश्य दीवारें हैं जो लोगों को विभाजित करती हैं।
- भौगोलिक और राजनीतिक दीवारें: हालाँकि ईंट-पत्थर की दीवारें जैसे कि देशों के बीच की सीमाएँ भी इसमें शामिल हो सकती हैं, लेकिन कविता का मुख्य ज़ोर मनुष्य की आंतरिक विभाजनकारी प्रवृत्ति पर है, जो अंततः बाहरी विभाजनों को जन्म देती है।
संक्षेप में, ‘दीवारें उठाना’ मनुष्य की उस प्रवृत्ति का प्रतीक है जो उसे दूसरों से अलग करती है, उसे संकीर्ण बनाती है और उसे अपनी वास्तविक क्षमता और विशालता का अनुभव करने से रोकती है। यह मानव द्वारा निर्मित विभाजन और अलगाव का द्योतक है।
(ङ) मानवता के विकास में सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता जैसी सकारात्मक प्रवृत्तियाँ ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ और घृणा जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से कहीं अधिक प्रभावी हैं। उदाहरण देकर बताइए कि सहिष्णुता या सहयोग के कारण समाज में कैसे परिवर्तन आए हैं?
उत्तर:
यह कथन बिलकुल सत्य है कि मानवता के विकास में सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता जैसी सकारात्मक प्रवृत्तियाँ ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ और घृणा जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से कहीं अधिक प्रभावी हैं। नकारात्मक प्रवृत्तियाँ विभाजन, संघर्ष और विनाश लाती हैं, जबकि सकारात्मक प्रवृत्तियाँ एकता, प्रगति और शांति की ओर ले जाती हैं।
सहिष्णुता या सहयोग के कारण समाज में इस प्रकार परिवर्तन आते हैं-
(i) विज्ञान और प्रौद्योगिकी में प्रगति (सहयोग) –
- अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन – यह विभिन्न देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के बीच अभूतपूर्व सहयोग का परिणाम है। यदि प्रत्येक देश केवल अपने स्वार्थ के लिए काम करता, तो ऐसा जटिल और महँगा अनुसंधान संभव नहीं हो पाता।
- वैक्सीन विकास-कोविड- 19 महामारी के दौरान दुनिया भर के वैज्ञानिकों, फार्मास्युटिकल कंपनियों और सरकारों ने मिलकर रिकॉर्ड समय में वैक्सीन विकसित करने के लिए सहयोग किया।
(ii) मानवाधिकार और सामाजिक न्याय आंदोलन (सहिष्णुता और सहयोग) –
- रंगभेद का अंत (दक्षिण अफ्रीका) – नेल्सन मंडेला और उनके सहयोगियों के अथक प्रयास जिसमें विभिन्न नस्लों और समुदायों के लोगों का सहयोग और एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता शामिल थी, ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद जैसी अमानवीय व्यवस्था का अंत किया। यह सिर्फ़ एक व्यक्ति का प्रयास नहीं था, बल्कि हज़ारों लोगों का सामूहिक सहयोग और सहिष्णुता थी जिन्होंने एक न्यायपूर्ण समाज के लिए संघर्ष किया।
- नागरिक अधिकार आंदोलन (संयुक्त राज्य अमेरिका) – मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में हुए आंदोलन में काले और गोरे दोनों समुदायों के लोगों ने समानता और न्याय के लिए एकजुट होकर काम किया। यह सहिष्णुता और सहयोग का एक बड़ा उदाहरण था ।
(iii) प्राकृतिक आपदाओं के बाद राहत कार्य (सहयोग) –
• जब कोई देश किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा (भूकंप, बाढ़, सुनामी) से ग्रस्त होता है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय से त्वरित सहयोग मिलता है। विभिन्न देश अपनी सेनाएँ, चिकित्सा टीमें, भोजन, पानी और अन्य आवश्यक सामग्री भेजते हैं। यह बिना किसी भेदभाव या स्वार्थ के किया गया सहयोग, आपदा प्रभावित लोगों की जान बचाता है और उन्हें उबरने में मदद करता है।
यह दर्शाता है कि मानव जाति में परोपकार और सहयोग की भावना नकारात्मक प्रवृत्तियों से कहीं अधिक शक्तिशाली है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जब मनुष्य सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता की भावना से काम करता है, तो वह न केवल व्यक्तिगत रूप से बल्कि सामूहिक रूप से भी बड़ी चुनौतियों का सामना कर पाता है और समाज में सकारात्मक व दूरगामी परिवर्तन ला पाता है।
अनुमान और कल्पना से
• अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए-
(क) मान लीजिए कि आप एक दिन के लिए पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित कर सकते हैं। अब आप मानव की कौन-कौन सी आदतों को बदलना चाहेंगे और क्यों?
उत्तर:
यदि मुझे एक दिन के लिए पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करने का अवसर मिलता, तो मैं मानव की निम्नलिखित आदतों को बदलना चाहूँगा–
• ईर्ष्या और द्वेष – मैं मानव के हृदय से ईर्ष्या और द्वेष की भावना को मिटाना चाहूँगा। क्योंकि ये भावनाएँ व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर संघर्ष, घृणा और दुख का मूल कारण हैं। ये लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने के बजाय, तोड़ने का काम करती हैं और सहयोग व प्रगति में बाधा डालती हैं। यदि मनुष्य ईर्ष्या मुक्त हो जाए, तो वह दूसरों की सफलता से प्रसन्न होगा और मिलकर काम करेगा।
• अहंकार और श्रेष्ठता का भाव- मैं मनुष्य में मौजूद अहंकार और यह सोचने की प्रवृत्ति को बदलना चाहूँगा कि वह दूसरों से बेहतर है या उसका समूह/जाति/धर्म श्रेष्ठ है। क्योंकि कविता में भी यह दिखाया गया है कि अहंकार के कारण ही मनुष्य दूसरों का स्वामी बनने की कोशिश कराता है। यह विभाजन और संघर्ष का एक बड़ा कारण है। यदि अहंकार कम हो जाए, तो मनुष्य एक-दूसरे को समान रूप से देख पाएगा, जिससे सहिष्णुता और समझ बढ़ेगी।
• स्वार्थ- मैं अत्यधिक स्वार्थ की प्रवृत्ति को कम करना चाहूँगा। क्योंकि स्वार्थ व्यक्ति को केवल अपने लाभ के बारे में सोचने को मजबूर करता है, भले ही इससे दूसरों को नुकसान हो। यह भ्रष्टाचार, शोषण और असमानता का जनक है। यदि मनुष्य थोड़ा और परोपकारी हो जाए, तो संसाधनों का अधिक न्यायसंगत वितरण होगा और समाज में संतुलन आएगा।
इन आदतों को बदलने से मानवता अधिक शांतिपूर्ण, सहयोगी और समृद्ध समाज का निर्माण कर पाएगी, जहाँ व्यक्ति अपनी विशालता को समझेंगे और ब्रह्मांड के साथ सामंजस्य स्थापित कर पाएँगे।
(ख) यदि आप अंतरिक्ष यात्री बन जाएँ और ब्रह्मांड के किसी दूसरे भाग में जाएँ तो आप किस स्थान (कमरा, घर, नगर आदि) को सबसे अधिक याद करेंगे और क्यों?
उत्तर:
यदि मैं अंतरिक्ष यात्री बनूँ और ब्रह्मांड के किसी दूसरे भाग में जाऊँ, तो मैं सबसे अधिक पृथ्वी (जिस पर मेरा घर और नगर स्थित है) को याद करूँगा। क्योंकि कविता में भी इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि पृथ्वी ब्रह्मांड के अनगिनत नक्षत्रों में एक छोटी सी जगह है। लेकिन यही वह स्थान है जहाँ मेरा अस्तित्व है, जहाँ जीवन है, जहाँ मेरे अपने हैं, जहाँ मेरा इतिहास है, और जहाँ प्रकृति की अनमोल सुंदरता है।
कमरा और घर सिर्फ़ भौतिक स्थान हैं, लेकिन पृथ्वी वह सब कुछ समेटे हुए है जो मुझे परिभाषित करता है। ब्रह्मांड में कहीं और इतनी विविधता, जीवन, रंग और भावनाएँ नहीं मिलेंगी जितनी पृथ्वी पर हैं। इसकी विशालता के बावजूद, यह हमारे लिए ‘घर’ है।
(ग) मान लीजिए कि एक बच्चा या बच्ची कविता में उल्लिखित सभी सीमाओं को पार कर सकता या सकती है – वह कहाँ तक जाएगा या जाएगी और क्या देखेगा या देखेगी? एक कल्पनात्मक यात्रा – वृत्तांत लिखिए।
उत्तर:
शीर्षक- ‘सीमाओं से परे एक ब्रह्मांडीय उड़ान’ ।
मीरा, एक नन्हीं बच्ची, जिसके भीतर असीम जिज्ञासा और प्रेम था, उसने कवि की पंक्तियों को सुना और मन-ही-मन हँस पड़ी। उसे लगा कि ये सारी ‘दीवारें’ तो बस मन की उपज हैं। एक रात, जब पूरा ब्रह्मांड शांत था, मीरा ने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी कल्पना के पंखों को फैला दिया। सबसे पहले, उसने अपने कमरे की दीवारों को पार किया। वे कागज़ की तरह गिर गईं।
फिर अपने घर को। घर के बाद शहर और शहर के बाद देश की सीमाएँ भी उसके लिए बेमानी हो गईं। वह उड़ती गई, उड़ती गई… पृथ्वी उसके कदमों तले एक नीले-हरे संगमरमर के गोले जैसी लगने लगी। ‘कितनी छोटी है पृथ्वी!’ मीरा ने सोचा, ‘और हम इस पर ही कितनी लड़ाइयाँ लड़ते हैं ।’
वह अनगिनत नक्षत्रों के बीच से गुजरी, वह लाखों आकाशगंगाओं के बीच से गुजरी, जहाँ अरबों-खरबों सूर्य और ग्रह थे। प्रत्येक आकाश गंगा एक नए ब्रह्मांड की तरह लगती थी, अपनी अलग कहानियाँ समेटे हुए ।
मीरा ने महसूस किया कि हर ब्रह्मांड में अनगिनत पृथ्वी जैसी दुनियाएँ हो सकती हैं, और हर दुनिया पर अनगिनत जीव । ऐसा सोचकर उसके मन में न किसी के प्रति न ईर्ष्या बची, न अहंकार, न स्वार्थ । बस एक असीम विस्मय और प्रेम का भाव था। उसने देखा कि सभी जीव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, एक अदृश्य धागे से बँधे हुए। वह किसी पर स्वामित्व जताना नहीं चाहती थी, बस समझना और अनुभव करना चाहती थी।
जब वह अपनी यात्रा से वापस लौटी, तो उसने अपनी आँखों में एक नई चमक महसूस की। मीरा ने समझ लिया कि असली आज़ादी दीवारों को गिराने में नहीं, बल्कि उन्हें अपने मन से मिटाने में है।
(घ) इस कविता को पढ़ने के बाद, आप स्वयं को ब्रह्मांड के अनुपात में कैसा अनुभव करते हैं? एक अनुच्छेद लिखिए – “मैं ब्रह्मांड में एक… हूँ ?”
उत्तर:
मैं ब्रह्मांड में एक सूक्ष्म कण हूँ, फिर भी असीमित संभावनाओं से भरा हूँ। इस कविता को पढ़ने के बाद, मुझे ब्रह्मांड की विशालता और अपनी अपेक्षाकृत छोटी उपस्थिति का गहरा अहसास हुआ। मैं महसूस करता हूँ कि मैं एक अदृश्य कण मात्र हूँ, जो अरबों आकाशगंगाओं और अनगिनत सूर्यों के बीच इस नीले ग्रह पर निवास कर रहा हूँ। यह विचार मुझे विनम्र बनाता है और मेरे अहंकार को कम करता है। लेकिन साथ ही, मुझे यह भी महसूस होता है कि इस विशालता में मेरा अस्तित्व कोई मायने नहीं रखता पर यह सच नहीं है। मैं उस विराट ब्रह्मांड का ही एक अविभाज्य अंग हूँ।
मेरी चेतना, मेरी सोच, मेरी भावनाएँ- ये सब उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा का ही हिस्सा हैं। मैं इस असीम विस्तार में एक अकेला द्वीप नहीं, बल्कि एक जुड़ा हुआ हिस्सा हूँ, जो अपनी सोच और कर्मों से इस विशाल संसार में योगदान देता है। मेरी लघुता मुझे सीमित नहीं करती, बल्कि मुझे असीम संभावनाओं और ज़िम्मेदारी का एहसास कराती है कि मैं अपनी ईर्ष्या, अहंकार और स्वार्थ की दीवारों को तोड़कर इस विराट के साथ एकाकार हो सकूँ।
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(ङ) मान लीजिए कि किसी दूसरे संसार से आपके पास संदेश आया है कि उसे पृथ्वी के किसी व्यक्ति की आवश्यकता है। आप किसे भेजना चाहेंगे और क्यों ?
उत्तर:
यदि किसी दूसरे संसार से पृथ्वी के किसी व्यक्ति की आवश्यकता का संदेश आता है, तो मैं ऐसे व्यक्ति को भेजना चाहूँगा जिसमें निम्नलिखित गुण हों-
- गहरी सहिष्णुता और खुलापन – वह व्यक्ति जो विभिन्न संस्कृतियों, विचारों और जीवन – शैलियों को स्वीकार कर सके, और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो ।
- उत्कृष्ट संचार कौशल और सहानुभूति – वह व्यक्ति जो अपनी बात स्पष्ट रूप से रख सके और दूसरों की भावनाओं और दृष्टिकोणों को समझ सके ।
- जिज्ञासा और सीखने की इच्छा – वह व्यक्ति जो नए ज्ञान और अनुभवों को सीखने के प्रति उत्सुक हो, न कि अपने पूर्व- कल्पित धारणाओं से बँधा हो ।
- रचनात्मक समस्या समाधान क्षमता- वह व्यक्ति जो अज्ञात परिस्थितियों में भी शांत रहकर समाधान खोज सके।
- मानवता की भलाई के प्रति समर्पण – वह व्यक्ति जो केवल अपने स्वार्थ के बजाय, पूरी मानव जाति के कल्याण के बारे में सोचे।
यदि किसी विशेष व्यक्ति का नाम लेना हो, तो मैं किसी ऐसे शिक्षक या अनुभवी समाज सुधारक को चुनूँगा, जिसके पास उपर्युक्त सभी गुण हों। क्योंकि ऐसे व्यक्ति को भेजने से यह सुनिश्चित होगा कि वह दूसरे संसार में पृथ्वी का सही प्रतिनिधित्व करेगा। वह न केवलं हमारे ज्ञान और प्रगति को साझा करेगा, बल्कि हमारे मानवीय मूल्यों और विविधता को भी प्रस्तुत करेगा ।
(च) कविता में “ ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ” जैसी प्रवृत्तियों की चर्चा की गई है। कल्पना कीजिए कि एक दिन के लिए ये भाव सभी व्यक्तियों में समाप्त हो जाएँ तो समाज में क्या-क्या परिवर्तन होगा ?
उत्तर:
यदि एक दिन के लिए ” ईर्ष्या, अहं (अहंकार), स्वार्थ” जैसे भाव सभी व्यक्तियों में समाप्त हो जाएँ, तो समाज में अभूतपूर्व और क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलेंगे-
- तत्काल शांति और सद्भाव – युद्ध, संघर्ष, झगड़े और हिंसा तुरंत समाप्त हो जाएँगे। सड़कों पर, घरों में, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अजीब-सी शांति छा जाएगी। लोग एक-दूसरे को दुश्मन के बजाय साथी के रूप में देखेंगे।
- व्यापक सहयोग और प्रगति- विनाशकारी प्रतिस्पर्धा स्वस्थ सहयोग में बदल जाएगी। लोग एक-दूसरे से आगे निकलने के बजाय एक दूसरे का हाथ थामेंगे । वैज्ञानिक अपनी खोजों को साझा करेंगे, कलाकार एक-दूसरे से सीखेंगे और सभी क्षेत्रों में प्रगति की गति कई गुना बढ़ जाएगी।
- न्याय और समानता की स्थापना- भ्रष्टाचार, शोषण और पक्षपात गायब हो जाएँगे। कोई भी व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए किसी दूसरे का हक नहीं मारेगा। सभी को समान अवसर मिलेंगे और समाज अधिक न्यायपूर्ण व समतावादी हो जाएगा।
- सृजनात्मकता और नवाचार को बढ़ावा – अहंकार की अनुपस्थिति से लोग अपनी गलतियों को स्वीकार करने और सीखने के लिए अधिक खुले होंगे। इससे रचनात्मकता और नए विचारों को बढ़ावा मिलेगा।
- संसाधनों का न्यायसंगत वितरण – स्वार्थ की अनुपस्थिति में, धन और संसाधनों का न्यायसंगत वितरण कम होगा। जिसके पास अधिक होगा, वह दूसरों के साथ साझा करने को तैयार होगा, जिससे कोई भूखा या बेघर नहीं रहेगा ।
- भेदभाव का अंत – जाति, धर्म, रंग, लिंग या किसी भी आधार पर होने वाला भेदभाव समाप्त हो जाएगा। हर व्यक्ति को उसकी मानवीय गरिमा के साथ देखा जाएगा। संक्षेप में, यह एक ऐसा समाज होगा जिसकी कल्पना हम केवल काल्पनिक विचारों में करते हैं। यह एक दिन का अनुभव हमें सिखाएगा कि हमारी नकारात्मक प्रवृत्तियाँ ही हमारी सबसे बड़ी दुश्मन हैं और उन्हें छोड़कर हम कितने विशाल और सामर्थ्यवान हो सकते हैं।
(छ) यदि आपको इस कविता का एक पोस्टर बनाना हो, जिसमें इसके मूल भाव – ‘विराटता और लघुता’ तथा ‘मनुष्य का भ्रम’- दर्शाया जाए तो आप क्या चित्र, प्रतीक और शब्द उपयोग करेंगे? संक्षेप में बताइए ।
उत्तर:
यदि मुझे इस कविता का एक पोस्टर बनाना हो, तो मैं निम्नलिखित चित्र, प्रतीक और शब्दों का उपयोग करूँगा/करूँगी–
पोस्टर का शीर्षक: “अनुपात : विराट और भ्रम”
चित्र / प्रतीकः
- पृष्ठभूमि में – एक विशाल, चमकता हुआ ब्रह्मांड (आकाशगंगाएँ, तारे, ग्रह) जिसे बहुत हल्के रंग में दिखाया जाएगा। यह ‘विराटता’ का प्रतीक होगा।
- मध्य में – ब्रह्मांड के बीचों-बीच एक बहुत छोटा, नीला ग्रह। ‘पृथ्वी’ दिखाया जाएगा, जिस पर छोटे-छोटे घर और एक मानव आकृति खड़ी है।
- मानव आकृति के इर्द-गिर्द – मानव आकृति के चारों ओर (या उसके ऊपर से निकलती हुई) कई धुँधली, पारदर्शी ‘दीवारें’ होंगी जो विभिन्न दिशाओं में फैली हुई होंगी और उसे ब्रह्मांड की विशालता को देखने से रोक रही होंगी। ये दीवारें ‘मनुष्य का भ्रम’ और उसकी स्वयं द्वारा निर्मित सीमाओं का प्रतीक होंगी ।
- दीवारों के भीतर- इन दीवारों के अंदर मानव आकृति (जो लघुता का प्रतीक है) के पास छोटे-छोटे प्रतीक होंगे।
- आँखें जो नीचे की ओर देख रही हैं या बंद है- ‘ईर्ष्या’ और ‘स्वार्थ’ (दूसरों को न देख पाना या सिर्फ अपने बारे में सोचना) ।
- एक छोटा-सा मुकुट या बड़ा-सा सिर- ‘अहंकार’ का प्रतीक ।
- मुट्ठी बँधी हुई – ‘घृणा’ या ‘अविश्वास’ का प्रतीक ।
- दीवारों के बाहर – दीवारों के ठीक बाहर, लेकिन ब्रह्मांड के भीतर, कुछ सकारात्मक प्रतीक ।
- खुले हाथ – ‘सहयोग’ और ‘त्याग’ का प्रतीक।
- एक बढ़ता हुआ पौधा या फूल – ‘जीवन’ और ‘प्रगति’ का प्रतीक ।
- रंगों का मिश्रण – ‘सहिष्णुता’ और ‘विविधता’ का प्रतीक ।
संक्षेप में, पोस्टर का उद्देश्य दर्शक को ब्रह्मांड की विशालता (विराटता) के सामने मनुष्य की भौतिक लघुता का एहसास दिलाना है, साथ ही यह भी दिखाना है कि उसकी नकारात्मक प्रवृत्तियाँ (अहंकार, स्वार्थ, ईर्ष्या) उसे इस विशालता का अनुभव करने से रोकती हैं और उसे एक भ्रमित, सीमित प्राणी बना देती हैं। दीवारों के पार दिखने वाला सकारात्मक पक्ष यह संदेश देगा कि इन भ्रमों को त्याग कर ही मनुष्य अपनी वास्तविक क्षमता को पहचान सकता है।
शब्द से जुड़ शब्द
नीचे दिए गए रिक्त स्थानों में ‘सृष्टि’ से जुड़े शब्द में चर्चा करके लिखिए-

उत्तर:

सृजन
(क) कविता में कमरे से लेकर ब्रह्मांड तक का विस्तार दिखाया गया है। इस क्रम को अपनी तरह से एक रेखाचित्र, सीढ़ी या ‘मानसिक चित्रण’ (मांइड-मैप) द्वारा प्रदर्शित कीजिए । प्रत्येक स्तर पर कुछ विशेषताएँ लिखिए, जैसे- पास-पड़ोस की एक विशेष बात, का कोई स्थान, देश की विविधता आदि । उसके नीचे एक पंक्ति में इस प्रश्न का उत्तर लिखिए – ” मैं इस चित्र में कहाँ हूँ और क्यों ?”
उत्तर:
विद्यार्थी इस क्रम को रेखाचित्र, सीढ़ी या माइंड मैप द्वारा स्वयं प्रदर्शित करें।
(ख) अगर इसी कविता की तरह कोई कहानी लिखनी हो जिसका नाम हो ‘ब्रह्मांड में मानव’ तो उसको आरंभ कैसे करेंगे? कुछ वाक्य लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी ‘ब्रह्मांड में मानव’ नामक कहानी की कुछ आरंभिक पंक्तियाँ लिखने की कोशिश करें।
(ग) ‘एक कमरे में दो दुनिया रचाता है’ पंक्ति को ध्यान से पढ़िए। अगर आपसे कहा जाए कि आप एक ऐसी दुनिया बनाइए जिसमें कोई दीवार न हो तो वह कैसी होगी? उसका वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
विद्यार्थी दीवार रहित दुनिया का वर्णन स्वयं करें।
(घ) एक चित्र श्रृंखला बनाइए जिसमें ये क्रम दिखे-
आदमी → कमरा → घर पड़ोसी क्षेत्र → नगर → देश → पृथ्वी → ब्रह्मांड
प्रत्येक चित्र में आकार का अनुपात दिखाया जाए जिससे स्पष्ट हो कि आदमी कितना छोटा है।
उत्तर:
विद्यार्थी ऐसी चित्र श्रृंखला स्वयं बनाएँ।
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कविता की रचना
‘दो व्यक्ति कमरे में कमरे से छोटे-
इन पंक्तियों में ‘—’ चिह्न पर ध्यान दीजिए। क्या आपने इस चिह्न को पहले कहीं देखा है? इस चिह्न को ‘निदेशक चिह्न’ कहते हैं। यह एक प्रकार का विराम चिह्न है जो किसी बात को आगे बढ़ाने या स्पष्ट करने के लिए उपयोग होता है। यह किसी विषय की अतिरिक्त जानकारी, जैसे— व्याख्या, उदाहरण या उद्धरण देने के लिए उपयोग होता है। इस कविता में इस चिह्न का प्रयोग एक ठहराव, सोच का संकेत और आगे आने वाले महत्वपूर्ण विचार की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित करने के लिए किया गया है। यह संकेत देता है कि अब कुछ ऐसा कहा जाने वाला है जो पाठक को सोचने पर विवश करेगा।
इस कविता में ऐसी अनेक विशेषताएँ छिपी हैं, जैसे— अधिकतर पंक्तियों का अंतिम शब्द ‘में’ है, बहुत छोटी-छोटी पंक्तियाँ हैं आदि ।

(कविता की विशेषताओं को समझने के लिए पृष्ठ संख्या – 132 देखें।)
(क) अपने समूह के साथ मिलकर कविता की अन्य विशेषताओं की सूची बनाइए। अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए ।
उत्तर:
विद्यार्थी अपने समूह के साथ मिलकर कविता की अन्य विशेषताओं का पता लगाएँ तथा इन्हें कक्षा में सबके साथ साझा करें।
(ख) नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और वे पंक्तियाँ दी गई हैं जिनमें ये विशेषताएँ झलकती हैं । विशेषताओं का सही पंक्तियों से मिलान कीजिए-

उत्तर:
1. – 4
2. – 1
3. – 2
4. – 3
5. – 6
6. – 5
कविता की सौंदर्य
• नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर समूह में मिलकर खोजिए । इन प्रश्नों से आप कविता का आनंद और अच्छी तरह से ले सकेंगे।
(क) कविता में अलग-अलग प्रकार से ब्रह्मांड की विशालता को व्यक्त किया गया है। उनकी पहचान कीजिए ।
उत्तर:
विद्यार्थी कविता में अलग-अलग प्रकार से ब्रह्मांड की विशालता को स्वयं पहचाने।
(ख) “संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है”
“अपने को दूजे का स्वामी बताता है”
“एक कमरे में
दो दुनिया रचाता है”
कविता में ये सारी क्रियाएँ मनुष्य के लिए आई हैं। आप अपने अनुसार कविता में नई क्रियाओं का प्रयोग करके कविता की रचना कीजिए ।
उत्तर:
विद्यार्थी अपने अनुसार कविता में नई क्रियाओं का प्रयोग करके कविता की रचना करें।
आपके शब्द
“सबको समेटे है
परिधि नभ गंगा की”
आपने ‘आकाशगंगा’ शब्द सुना और पढ़ा होगा। लेकिन कविता में ‘नभ गंगा’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है।
आप भी अपने समूह में मिलकर इसी प्रकार दो शब्दों को मिलाकर नए शब्द बनाइए ।
उत्तर:
विद्यार्थी समूह में मिलकर दो शब्दों को मिलाकर नए शब्द बनाएँ।
आपके प्रश्न
“हर ब्रह्मांड में
कितनी ही पृथ्वियाँ
कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियाँ”
क्या आपके मस्तिष्क में कभी इस प्रकार के प्रश्न आते हैं? अवश्य आते होंगे। अपने समूह के साथ मिलकर अपने मन में आने वाले प्रश्नों की सूची बनाइए। अपने शिक्षक, इंटरनेट और पुस्तकालय की सहायता से इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने का प्रयास कीजिए ।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।
विशेषण और विशेष्य
“पृथ्वी एक छोटी”
यहाँ ‘छोटी’ शब्द ‘पृथ्वी’ की विशेषता बता रहा है अर्थात ‘छोटी’ ‘विशेषण’ है। ‘पृथ्वी’ एक संज्ञा शब्द है जिसकी विशेषता बताई जा रही है। अर्थात ‘पृथ्वी’ विशेष्य शब्द है।
अब आप नीचे दी गई पंक्तियों में विशेषण और विशेष्य शब्दों को पहचानकर लिखिए-
उत्तर:
| पंक्ति | विशेषण | विशेष्य |
| 1. दो व्यक्ति कमरे में | दो | व्यक्ति |
| 2. अनगिन नक्षत्रों में | अनगिन | नक्षत्रों |
| 3. लाखों ब्रह्मांडों में | लाखों | ब्रह्मांडों |
| 4. अपना एक ब्रह्मांड | एक | ब्रह्मांड |
| 5. संख्यातीत शंख सी | संख्यातीत | शंख |
| 6. एक कमरे में | एक | कमरे |
| 7. दो दुनिया रचाता है | दो | दुनिया |
पाठ से आगे
आपकी बात
(क) कोई ऐसी स्थिति बताइए जहाँ ‘अनुपात’ बिगड़ गया हो – जैसे काम का बोझ अधिक और समय कम ।
उत्तर:
कोई ऐसी स्थिति बताइए जहाँ ‘ अनुपात’ बिगड़ गया हो; जैसे – काम का बोझ अधिक और समय कम ।
- उदाहरण 1: एक छात्र को परीक्षा के लिए बहुत कम समय में एक बड़ा पाठ्यक्रम पूर्ण करना है।
- उदाहरण 2: एक कर्मचारी के पास बहुत सारे कार्य हैं। लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए सीमित संसाधन और समय है।
- उदाहरण 3: एक परिवार में, कमाने वाला एक ही सदस्य है और उस पर सभी खर्चों का बोझ है, जिससे आय और व्यय का अनुपात बिगड़ गया है।
- उदाहरण 4: किसी प्रोजेक्ट में बजट कम हो और अपेक्षाएँ बहुत अधिक हों।
(ख) आप अपने परिवार, विद्यालय या मोहल्ले में ‘विराटता’ (विशाल दृष्टिकोण) कैसे ला सकते हैं? कुछ उपाय सोचकर लिखिए। (संकेत – किसी को अनदेखा न करना, सबकी सहायता करना आदि)
उत्तर:
‘विराटता’ या विशाल दृष्टिकोण का अर्थ है- संकीर्णता से ऊपर उठकर व्यापक सोच रखना। इसे लाने के उपाय-
- समानता और समावेशन- सभी को समान समझना, चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से हों और किसी को भी अनदेखा न करना।
- पारस्परिक सहयोग – दूसरों की मदद करना, चाहे वे परिचित हों या अपरिचित । संकट के समय एक-दूसरे का साथ देना।
- खुले विचारों से सुनना- दूसरों के विचारों और मतों को सुनना और उनका सम्मान करना, भले ही वे हमारे विचारों से भिन्न हों।
- साझा लक्ष्यों पर काम करना- व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर समुदाय या समूह के साझा लक्ष्यों के लिए काम करना।
- सहनशीलता और समझ – विभिन्न संस्कृतियों, विचारों और जीवन शैली के प्रति सहनशीलता और समझ विकसित करना।
- परोपकार और दान – ज़रूरतमंदों की मदद करना और समाज के लिए कुछ करना ।
- पर्यावरण के प्रति जागरूकता – न केवल अपने लिए बल्कि पूरे पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के लिए सोचना।
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(ग) ‘करोड़ों में एक ही पृथ्वी’ – इस पंक्ति को पढ़कर आपके मन में क्या भाव आता है ? आप इस अनोखी पृथ्वी को सुरक्षित रखने के लिए क्या-क्या करेंगे?
उत्तर:
‘करोड़ों में एक ही पृथ्वी’ पंक्ति पढ़कर मन में कई तरह के भाव आते हैं-
- विस्मय और कृतज्ञता- इस ब्रह्मांड में इतनी बड़ी संख्या में ग्रह और ब्रह्मांड होने के बावजूद, यह हमारी पृथ्वी ही है जहाँ जीवन संभव है। यह हमें इसकी विशिष्टता और हमारी खुशकिस्मती का एहसास कराती है।
- अकेलेपन का भाव – यह सोचकर थोड़ा अकेलापन महसूस होता है कि अरबों तारों और ग्रहों के बीच हमारी पृथ्वी कितनी अकेली है, जहाँ जीवन है।
- ज़िम्मेदारी का एहसास – यह हमें इस अद्भुत और जीवनदायी ग्रह को बचाने की अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास कराती है।
इस अनोखी पृथ्वी को सुरक्षित रखने के लिए मैं निम्न कार्य करूँगा/करूंगी: - पर्यावरण संरक्षण- पेड़ों को कटने से बचाना, अधिक से अधिक पेड़ लगाना और प्रदूषण कम करने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करना (जैसे सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना) ।
- संसाधनों का सदुपयोग – पानी, बिजली और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का सावधानीपूर्वक और ज़िम्मेदारी से उपयोग करना।
- जागरूकता फैलानाः लोगों को पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करना ।
- नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोगः सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना और उनका उपयोग करना।
- वन्यजीवों का संरक्षणः वन्यजीवों और उनके आवासों की रक्षा करना।
- अपशिष्ट प्रबंधन: कचरा कम करना, उसका सही निपटान करना और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना।
(घ) कविता हमें ‘अपने को दूजे का स्वामी बताने’ के प्रति सचेत करती है। आप अपने किन-किन गुणों को प्रबल करेंगे ताकि आपमें ऐसा भाव न आए।
उत्तर:
कविता हमें अहंकार, ईर्ष्या और दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रवृत्ति के प्रति सचेत करती है । अपने को दूजे का स्वामी बताने’ का भाव अहंकार और संकीर्ण सोच से आता है। इस भाव को दूर करने के लिए मैं निम्नलिखित गुणों को प्रबल करूँगा/करूँगी:
- विनम्रता – यह समझना कि कोई भी व्यक्ति दूसरों से श्रेष्ठ नहीं है और सभी में कुछ न कुछ अच्छाई होती है।
- समानता का भाव- सभी मनुष्यों को समान मानना और किसी के साथ भेदभाव न करना ।
- सहयोग की भावना – प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग को प्राथमिकता देना और दूसरों की मदद करना।
- कृतज्ञता – जो कुछ भी हमारे पास है, उसके लिए कृतज्ञ होना और दूसरों के योगदान को स्वीकार करना ।
- आत्म-चिंतन- अपनी कमियों को स्वीकार करना और लगातार खुद को बेहतर बनाने का प्रयास करना ।
- करुणा और सहानुभूति – दूसरों के दर्द और भावनाओं को समझना और उनके प्रति दया का भाव रखना।
- खुले विचार – नए विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार करना और सीखने के लिए हमेशा तैयार रहना ।
(ङ) अपने जीवन में ऐसी तीन ‘दीवारों’ के विषय में सोचिए जो आपने स्वयं खड़ी की हैं (जैसे- डर, संकोच आदि)। फिर एक योजना बनाइए कि आप उन्हें कैसे तोड़ेंगे? क्या समाज में भी ऐसी दीवारें होती हैं? उन्हें गिराने में हम कैसे सहायता कर सकते हैं?
उत्तर:
स्वयं खड़ी की गई दीवारें –
दीवार 1:
सार्वजनिक रूप से बोलने का डर (संकोच) – मुझे लोगों के सामने बोलने में झिझक होती है, खासकर जब मैं किसी नए विषय पर अनेक लोगों के समक्ष बात कर रहा होता हूँ।
तोड़ने की योजना –
- छोटे समूहों में बोलने का अभ्यास करना शुरू करूँगा।
- विषय पर अच्छी तरह से तैयारी करूँगा ताकि आत्मविश्वास बढ़े।
- स्वयंसेवी समूहों या सार्वजनिक बोलने वाले क्लबों में शामिल हो सकता हूँ।
- गलतियों से सीखने और उन्हें स्वीकार करने की मानसिकता विकसित करूँगा।
दीवार 2:
असफलता का डर- कोई नया काम शुरू करने से पहले मैं अकसर असफलता के डर से पीछे हट जाता हूँ, जिससे मैं नए अवसरों को आजमाने से चूक जाता हूँ। तोड़ने की योजना –
- छोटी – छोटी चुनौतियों से शुरुआत करूँगा जहाँ असफलता का जोखिम कम हो ।
- असफलता को सीखने के अवसर के रूप में देखूँगा, न कि अंत के रूप में।
- सकारात्मक आत्म- चर्चा का अभ्यास करूँगा ।
- उन लोगों से प्रेरणा लूँगा जिन्होंने असफलता के बावजूद सफलता प्राप्त की।
दीवार 3:
परफेक्शनिस्ट होना (पूर्णतावाद) – मैं हर काम को बिलकुल परफेक्ट करने की कोशिश करता हूँ, जिससे कभी-कभी काम पूरा ही नहीं हो पाता या बहुत देर हो जाती है।
तोड़ने की योजना-
- यह स्वीकार करना कि ‘पर्याप्त अच्छा’ भी अच्छा होता है।
- समय-सीमा निर्धारित करना और उन पर कायम रहना, भले ही काम पूरी तरह से परफेक्ट न लगे।
- दूसरों से फीडबैक लेना और उसे सुधार के अवसर के रूप में देखना।
- छोटे-छोटे लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करना ।
समाजिक दीवारें – हाँ, समाज में भी ऐसी अनेक ‘दीवारें’ होती हैं, जो लोगों को एक-दूसरे से अलग करती हैं और प्रगति में बाधा डालती हैं; जैसे-
- जातिवाद की दीवार- लोगों को उनकी जाति के आधार पर बाँटना और भेदभाव करना ।
- धार्मिक कट्टरता की दीवार- अपने धर्म को श्रेष्ठ मानना और दूसरे धर्मों के प्रति असहिष्णु होना ।
- लिंग भेद की दीवार – पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता बरतना ।
- आर्थिक असमानता की दीवार- अमीर और गरीब के बीच की खाई, जिससे अवसर और सम्मान में अंतर आता है।
- क्षेत्रवाद / भाषायी दीवार – क्षेत्र या भाषा के आधार पर लोगों के बीच भेदभाव ।
- अंधविश्वास और रूढ़िवादिता की दीवार – पुराने और अतार्किक विचारों से चिपके रहना, जो प्रगति में बाधक हैं। इन्हें गिराने में हम कैसे सहायता कर सकते हैं-
- जागरूकता फैलाना – शिक्षा और जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को इन दीवारों के नकारात्मक प्रभावों के बारे में बताना ।
- भेदभाव का विरोध करना- किसी भी प्रकार के भेदभाव का खुलकर विरोध करना और पीड़ितों का समर्थन करना ।
- समानता को बढ़ावा देना- सभी को समान अवसर प्रदान करने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए काम करना ।
- संवाद और समझ को बढ़ावा देना – विभिन्न समूहों के लोगों के बीच संवाद और समझ को बढ़ावा देना ताकि वे एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझ सकें।
- सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देना- उन गतिविधियों में भाग लेना जो विभिन्न समुदायों को एक साथ लाती हैं और उनके बीच सद्भाव बढ़ाती हैं।
इन दीवारों को तोड़ना एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है।
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संख्यातीत शंख
“संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है”
शंख का अर्थ है – 100 पद्म की संख्या ।
नीचे भारतीय संख्या प्रणाली एक तालिका के रूप में दी गई है। तालिका के आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर खोजिए – (भारतीय संख्या प्रणाली को समझने के लिए पाठ्यपुस्तक की पृष्ठ संख्या 136 देखें)
प्रश्न 1.
जिस संख्या में 15 शून्य होते है, उसे क्या कहते हैं?
उत्तर:
पदम्
प्रश्न 2.
महाशंख में कितने शून्य होते है ?
उत्तर:
19
प्रश्न 3.
एक लाख में कितने हज़ार होते हैं?
उत्तर:
100 हज़ार
प्रश्न 4.
उपर्युक्त तालिका के अनुसार सबसे छोटी और सबसे बड़ी संख्या कौन-सी है ?
उत्तर:
तालिका के अनुसार, सबसे छोटी संख्या – 1 (इकाई)
सबसे बड़ी संख्या – 1,00,00,00,00,00,00,00,00,000 (महाशंख)
प्रश्न 5.
दस करोड़ और एक अरब को जोड़ने पर कौन – सी संख्या आएगी?
उत्तर:
10,00,00,000 + 1,00,00,00,000
11,00,00,00,000 (एक अरब दस करोड़)
समावेशन और समानता
जैसे पृथ्वी अनगिनत नक्षत्रों में एक छोटा-सा ग्रह है, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह विशेष आवश्यकता वाला हो या न हो, समाज का एक महत्वपूर्ण भाग है। एक समूह चर्चा आयोजित करें जिसमें सभी मानवों के लिए समान अवसरों की आवश्यकता पर बल दिया जाए। (भले ही उनका जेंडर, आय, मत, विश्वास, शारीरिक रूप, रंग या आकार – प्रकार आदि कैसा भी हो)
उत्तर:
विद्यार्थी दिए गए विषय पर समूह चर्चा का आयोजन करें।
आज की पहेली
(क) पता लगाइए कि कौन-सा अतंरिक्ष यान कौन-से ग्रह पर जाएगा-
उत्तर:
इसे विद्यार्थी स्वयं करें।