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Class 7 Social Science Chapter 6 Question Answer in Hindi पुनर्गठन का काल
पुनर्गठन का काल Question Answer in Hindi
कक्षा 7 पुनर्गठन का काल पाठ 6 के प्रश्न उत्तर मौसम को समझना
प्रश्न और क्रियाकलाय (पूष्ठ 143)
प्रश्न 1.
मौर्योत्तर काल को पुनर्गंठन का काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल को पुनर्गठन का काल इसलिए कहा जाता है क्योंकि मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में कई नए राज्य बने। इन राज्यों नें एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा की और अपने-अपने साम्राज्य को बढ़ाने की कोशिश की। इस दौरान भारत का मानचित्र काफी बदल गया और लोगों के जीवन में भी बड़े बदलाव आए। नए साम्राज्य जेस इंडो-ग्रीक, शक, कुषाण, शुंग, सातवाहन, चेदि आदि उभरे. जो मौर्य साम्राज्य के अधीन थे।
प्रश्न 2.
संगम साहित्य पर 150 शब्दों में एक लेख लिखिए।
उत्तर:
संगम साहित्य
- संगम साहित्य, प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यों में से एक है. जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत के तमिल भाषी क्षेत्रों से संबंधित है। यह साहित्यिक परंपरा संगम काल के दौरान विकसित हुई, जिसमें कवियों की एक सभा होती थी, जिसे ‘संगम’ कहा जाता है। ‘संगम’ शब्द संस्कृत के ‘संघ’ से निकला है, जिसका अर्थ है ‘संगठन’ या ‘एकत्र होना’, जो इस साहित्यिक आंदोलन की सहयोगी भावना को दर्शाता है।
- संगम साहित्य में विभिन्न काव्य संग्रह शामिल हैं, जो प्रेम, वीरता और सामाजिक मूल्यों जैसे विषयों की खोज करते हैं। यह साहित्य अपनी भावनात्मक गहराई और कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है, जो व्यक्तिगत भावनाओं और मानव संबंधों की जटिलताओं को चित्रित करता है।
- कविताओं को दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: ‘अहम’ (अकम), जो आंतरिक भावनाओं और प्रेम पर केंद्रित है, और ‘पुरम’, जो बाहरी विषयों जैसे वीरता और उदारता को संबोधित करता है।
- संगम साहित्य इतिहासकारों के लिए अत्यंत मृत्यवान है, क्योंकि यह प्राचीन तमिल समाज के सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन की जानकारी प्रदान करता है।
प्रश्न 3.
इस अध्याय में उल्लिखित किन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम मम्मिलित किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया.
उत्तर:
म अथ्याय में मौर्यॉत्तर काल के शासकों में गौतमीपुत्र शातवर्णी जैसं शासकों ने अपनी उपाधियों में अपनी माता का नाम र मिल किया। इस परपरा का उद्देश्य मातृवंश की महता को उजागर करना था। इससे यह दिखाया गया कि रानी का शासन में कितना बड़ा योगदान था। रानी ने कई वैदिक अनुष्ठान किए. जैसे अश्वमेध यज्ञ, और उन्होने ब्राह्मणों, अतिथियों, श्रमिकों, विद्वानों और साधुओं को भूमि, गायें, घोड़े, हाथी, चाँदी के सिक्के और अन्य वस्तुएँ दान कीं।
प्रश्न 4.
इस अध्याय में वर्णित किसी एक राज्य जो आपको रोचक लगता है, के विषय में 250 शब्दों का एक लेख लिखिए। आपने उस राज्य का चयन क्यों किया? अपना लेख कक्षा में प्रस्तुत कीजिए और यह जानने का प्रयास कीजिए कि आपके सहपाठियों ने कौन-से राज्यों का सर्वाधिक चयन किया है।
उत्तर:
- सातवाहन साम्राज्य एक ऐसा राज्य है जो मुझे बहुत रोचक लगता है। यह साम्राज्य लगभग 2 शताब्दी सा.सं.पू. से लेकर 2 शताब्दी तक दक्षिण भारत के कई हिस्सों, जैसेआंध्र प्रदंश, तेलंगाना और महाराष्ट्र में फैला हुआ था।
- मैंने इस राज्य का चयन इसलिए किया क्योंकि इसने व्यापार, संस्कृति और कला में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सातवाहन साम्राज्य का ‘आंध्र’ के नाम से भी जाना जाता है और इसके व्यापार नेटवर्क बहुत मजबूत थे. जो उन्हें आंतरिक और बाह्य बाजारों से जोड़ते थे। यह साम्राज्य व्यापार गतिविधियों के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
- सातवाहन साम्राज्य की राजधानी, जैसे अमरावती और प्रतिष्ठान, वाणिज्य और संस्कृति के केंद्र बन गए थे। कला के क्षेत्र में, सातवाहनों की अद्वितीय मूर्तिकला और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं, विशेषकर अमरावती स्तूप, जो बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण स्मारक है।
- सातवाहन परंपरा में राजकुमारों के नाम अक्सर उनकी माताओं के नाम पर रखे जाते थे। उदाहरण के लिए, गौतमीपुत्र शातकर्णी का नाम उनकी माता गौतमी बलश्री के नाम पर रखा गया था। रानियाँ भूमि, गायें, हाथी, और अन्य वस्तुएँ दान करती थीं, जो उनके साम्राज्य की समृद्धि को दर्शाती हैं।
- इस प्रकार, सातवाहन साम्राज्य का इतिहास और संस्कृति मुझे बहुत आकर्षित करती है, और यह भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
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प्रश्न 5.
कल्पना कीजिए कि आपको एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ है। आप कौन-सा राजचिह्न चुनेंगे और क्यों? आप एक शासक के रूप में कौन-सी उपाधि धारण करेंगे? अपने राज्य के विषय में एक लेख लिखिए जिसमें राज्य के मूल्य, नियमावली एवं विशिष्टताएँ सम्मिलित हों।
उत्तर:
जब मुझे एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवमर मिलेगा तो मैं:
- राजचिह्न का चयन : मैं अपने राज्य का राजचिह ‘सूर्य’ चुनूँगा। सूर्य जीवन का प्रतीक है और यह ऊर्जा, प्रकाश और विकास का प्रतिनिधित्व करता है। यह मेंर राज्य के लोगों का प्रंरित करंगा कि वे हमंशा सकारात्मकता और विकास की आंर बढ़ें। इसके अलावा, सूर्य की रोशनी सभी को समान रूप से मिलती है. जो मेरे राज्य में समानता और भाईचार का संदेश देगा।
- उपाधि का चयन : मैं ‘राजा की उपाधि’ धारण करूँगा। राजा का अर्थ है ‘शासक’ और यह एक परंपरागत उपाधि है जो सम्मान और जिम्मेदारी का प्रतीक है। राजा के रूप में, मैं अपने राज्य के लोगों की भलाई के लिए काम करूँगा और उनके अधिकारों की रक्षा करूँगा।
- राज्य की विशेषताएँ : मेरे राज्य के मूल्यों में सत्य, न्याय और समानता शामिल होंगे। मैं एक नियमावली बनाऊँगा जिसमें सभी नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट रूप से बताए जाएँगे। इसके अलावा. मैं शिक्षा को प्राथमिकता दूँगा ताकि सभी लोग ज्ञान प्राप्त कर सकें। मेरे राज्य में सभी धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान किया जाएगा. जिससे एक समृद्ध और विविध समाज का निर्माण होगा।
प्रश्न 6.
आपने मौर्योत्तर काल के वास्तु कलात्मक विकास के विषय में पढ़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप के एक रेखांकित मानचित्र पर इस अध्याय में उल्लिखित कुछ स्थापत्य कलाओं के स्थान को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
प्रमुख स्थलों को रेखांकित मानचित्र पर चिह्नित किया हैं।
- हेलियोडोरस स्तंभ
- भरहुत स्तृप
- साँची स्तूप
- उदगगिरि गुफाएँ
- नानंघाट गुफाएँ
- पीतलखांरा गुफाएँ
- कार्ले गुफाएँ
- हंपी के खंडहर
- कण्णगी की॰ मूर्ति
- ग्रैंड एर्नाकट स्मृति उद्यान

पुनर्गठन का काल Class 7 Question Answer in Hindi
Class 7 Samajik Vigyan Chapter 6 Question Answer
महत्वपूर्ण प्रश्न? (पृष्ठ 117)
प्रश्न 1.
मौर्योत्तर काल को कभी-कभी ‘पुनर्गठन का काल’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
- मौर्य साम्राज्य का पतन लगभग 185 सा.सं.पू. में हुआ, जिसके बाद भारत में राजनीतिक अस्थिरता आई।
- मौर्य साम्राज्य के बाद कई नए राज्य जैस इंडो-ग्रीक, शक, कुषाण, शुंग और सातवाहन का उद्य हुआ।
- इन नए राज्यों के बीच शक्ति और क्षेत्र के लिए लगातार प्रतिस्पर्धा चलती रही।
- इस काल में सांस्कृतिक आदान-प्रदान और व्यापार में वृद्धि हुई।
- ‘पुनर्गठन का काल’ का अर्थ है क्षेत्रों का पुनर्सरचना और नए शक्तियों का उदय।
प्रश्न 2.
वह कौन-से मूल्य और सिद्धांत थे जिन्होंने इस काल के सम्राटों का मार्गदर्शन किया?
उत्तर:
- साम्राज्य का विस्तार : सम्राट अक्सर युद्ध या गठबंधन के माध्यम से अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे।
- वैवाहिक गठबंधन : पड़ोसी राज्यों के साथ संबंध मजबूत करने के लिए विवाह संबंध सामान्य थे।
- सांस्कृतिक और आर्थिक विकास : सम्राटों ने कला और साहित्य में उन्नति के लिए सांस्कृतिक और आर्थिक विकास को महत्व दिया।
- धार्मिक सहिष्णुता : कई शासकों ने विभिन्न धर्मों और दार्शनिकों का सम्मान किया, जिससे सहिष्णुता को बढ़ावा मिला।
- स्थिरता और नियंत्रण : सम्राटों का ध्यान अपने क्षेत्रों में स्थिरता और नियंत्रण स्थापित करने पर था।
- सड़कें और शिक्षा : उन्होंने सड़कें, विश्राम गृह, शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं का समर्थन किया।
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प्रश्न 3.
विदेशी आक्रमणकारियों ने किस प्रकार भारतीय समाज में समाहित होकर सांस्कृतिक संगम में योगदान दिया?
उत्तर:
- इंडो-ग्रीक और शक जैसे विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में स्थायी निवास किया।
- इन आक्रमणकारियों ने भारतीय संस्कृति के साथ मिलकर एक नया सांस्कृतिक मिश्रण बनाया।
- आक्रमणकारी अपने साथ नई विचारधाराएँ और प्रथाएँ लेकर आए।
- इस काल में विभिन्न कला शैलियों का विकास हुआ, जैसे गांधार और मथुरा कला।
- विदेशी आक्रमणकारियों की उपस्थिति ने एक विविध सांस्कृतिक धरोहर का निर्माण किया, जिसमें भारतीय और विदेशी दोनों तत्व शामिल हैं।
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 118)
प्रश्न:
एक पृष्ठ पर दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. के प्रारंभिक वर्ष से लेकर तीसरी शताब्दी सा.सं. के अंतिम वर्ष तक की अवधि को चिह्नित करते हुए एक समय-रेखा बनाइए। यह अवधि कुल कितने वर्षों को सम्मिलित करती है? जैसे-जैसे हम अध्याय में आगे बढ़ेंगे, समय-रेखा पर प्रमुख व्यक्तियों, राज्यों और घटनाओं को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से लेकर 1 शताब्दी सा.स.पू. तक कुल 199 वर्ष होती है। यहाँ ध्यान दें कि 0 वर्ष नहीं होता है।
1 शताब्दी सा.सं. से लेकर 300 शताब्दी सा.सं. तक कुल 300 वर्ष होती है।
अब इन दोनों कालखंडों को जोड़ते हैं :
199 वर्ष +300 वर्ष $=499$ वर्ष
नोट: पिछले पृष्ठ पर दी गई समय-रेखा देखें।
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 120)
प्रश्न:
पिछले अध्याय में आपने मौर्य साम्राज्य का मानचित्र देखा (पाठ्यपुस्तक में) (चित्र 5.13)। चित्र 6.2 मौर्योत्तर काल का मानचित्र है। आप उस क्षेत्र में कितने राजवंशों की गणना कर सकते हैं जो पूर्व में मौर्य शासन के अधीन थे?
उत्तर:
पुनर्गठन का काल, जिसे हम मौर्योत्तर काल भी कहते हैं, इस काल में कई नए राजवंशों का उद्य हुआ। इन राज्यों में प्रमुख रूप से निम्नलिखित राजवंश शामिल हैं:
- शुंग
- चेदि
- सातवाहन
- इंडो-ग्रीक
- शक
- कुषाण
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 124)
प्रश्न:
नीचे भरहुत स्तूप की एक पट्टिका का चित्र है। दाहिने तरफ की दोनों आकृतियों को ध्यानपूर्वक देखिए। वे क्या कर रही हैं? क्या आप उनके व्यवसाय का अनुमान लगा सकते हैं? उनके परिधानों पर ध्यान दीजिए। यह हमें उनके बारे में क्या बता रहे हैं? पट्टिका में आपको जो अन्य विवरण दिखे, उन्हें सूचीबद्ध कर कक्षा में उन पर चर्चा कीजिए।\
उत्तर:
- वे चूने और हथौड़े का उपयोग करके पत्थर पर नक्काशी कर रही हैं।
- ये आकृतियाँ शिल्पकार या मूर्तिकार हो सकती हैं।
- आकृतियों ने छोटे कपड़े पहने हैं जो घुटनों के ऊपर तक हैं और कमर के चारों ओर एक कपड़े का टुकड़ा लपेटा हुआ है।
- ये शिल्पकार प्राकृतिक चीजों जैसे फूलों और पत्तियों के जटिल बनावट बनाने में कुशल हैं।
- पेंटिंग में एक बड़ा गोल बनावट है जो संभवतः स्तूप या बोधि वृक्ष का प्रतीक है, जो बुद्ध का प्रतीक है। इस बनावट की नक्काशी उस समय की कलात्मक क्षमता को दर्शाती है। इसके अलावा, पट्टिका में फूलों के बनावट और छोटे घंटियों का सुंदर सममित बनावट भी है, जो कला की उत्कृष्टता को दर्शाता है।
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 124)
प्रश्न:
चित्र 6.6 के कोलाज में चित्रों को ध्यान से देखिए। कपड़ों, आभूषणों और दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
- कपड़े : चित्रों में पुरुष और महिलाओं के पारंपरिक वस्त्र दिखाई देते हैं। पुरुष ने धोती या इसी तरह की अन्य वस्त्र पहनी हुई है, जबकि महिलाएँ साड़ी या लंबी पोशाक में सजी हुई हैं।
- आभूषण : चित्रों में आभूषणों का भी विशेष महत्व है। लोग कांस्य की चूड़ियों के साथ-साथ सोने की परत वाले आभूषण पहनते थे। बालों के आभूषण, हार और कान की बालियों से यह स्पष्ट होता है कि आभूषण केवल धन का प्रतीक नहीं थे, बल्कि व्यक्तिगत सजावट में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। शाही परिवार के सदस्य अधिक भव्य आभूषण पहनते थे, जो उनकी उच्च सामाजिक स्थिति को दर्शाता है।
- दैनिक उपयोग की वस्तुएँ : चित्रों में दिखाए गए हाथी दाँत से बने फूलदान और कंघी उस समय की कारीगरी को दर्शाते हैं। ये वस्तुएँ दैनिक जीवन में उपयोग की जाती थीं और कारीगरों की कलात्मक क्षमताओं को प्रदर्शित करती हैं।
आइए विचार करें (पृष्ठ 126)
प्रश्न:
आपके अनुसार राजा के नाम के आरंभ में उसकी माँ का नाम लिखने की परंपरा का क्या अर्थ है?
उत्तर:
राजा के नाम के आरंभ में उसकी माँ का नाम लिखने की परंपरा का अर्थ यह है कि यह मातृवंश के प्रति सम्मान प्रकट करता है। यह दिखाता है कि समाज में महिलाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी। इस परंपरा के माध्यम से रानी के प्रभाव और उनके योगदान को मान्यता दी जाती है, जिससे लिंग समानता को बढ़ावा मिलता है।
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आइए विचार करें (पृष्ठ 126)
प्रश्न:
उपर्युक्त अंकों की शुंखला में से कौन-से अंक कुछ-कुछ हमारे आधुनिक अंकों जैसे दिखते हैं? कौन-से नहीं?
उत्तर:
7 हमारे आधुनिक अंकों से कुछ हद तक मिलते-जुलते हैं।
आइए विचार करें (पृष्ठ 127)
प्रश्न:
क्या यह रोचक नहीं है कि एक सुनार भी पत्थर की मूर्ति बना सकता था? आपके विचार में इससे हमें उस समय के लोगों के व्यवसायों के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
इससे यह पता चलता है कि उस समय की समाज में कारीगरों की रचनात्मकता और संसाधनशीलता बहुत महत्वपूर्ण थी। जैसे कि कन्हणदास ने स्वर्णकार के रूप में काम किया, लेकिन साथ ही उसने पत्थर की मूर्तियाँ भी बनाई। यह उस समय की संस्कृति की समृद्धि को दर्शाता है, जहाँ कला और शिल्प का विकास हुआ।
आइए विचार करें (पृष्ठ 129)
प्रश्न:
लगभग दो सहस्त्राब्दी पूर्व के इन शैलकृत कक्षों की समरूपता पर ध्यान दीजिए। शिल्पकारों को केवल छेनी और हथौड़ी से यह अद्भुत दक्षता कैसे प्राप्त हुई होगी? कल्पना कीजिए कि आप उस युग में एक शिल्पी हैं और अपने कौशल से पत्थर को कला में रूपांतरित कर रहे हैं। आप किन उपकरणों का प्रयोग करेंगे?
उत्तर:
प्राचीन भारत में शिल्पकारों ने अद्भुत शिल्पकला का प्रदर्शन किया. जिसमें उन्होंने केवल छेनी और हथौड़ी का उपयोग किया। इन उपकरणों का सही ढंग से उपयोग करने के लिए उन्हें वर्षों का अभ्यास और पत्थर के गुणों की गहरी समझ थी। विभिन्न प्रकार की छेनी का उपयोग करके वं विभिन्न विवरणों को उकेरते थे, जबकि लकड़ी के हथौड़े से छेनी पर सही प्रहार करते थे।
आइए विचार करें (पृष्ठ 129)
प्रश्न:
चित्र 6.14 में दिए गए मानचित्र में आप विभिन्न राज्यों के नामों के साथ कुछ विशिष्ट चिह्न भी देख सकते हैं। ये चिह्न क्या दर्शाते हैं? विचार कीजिए कि ये प्रत्येक राज्य की विशिष्ट पहचान को किस प्रकार दर्शाते हैं?
उत्तर:
चिह्नों और उनके महत्व को समझते हैं:
- चेरा राज्य : इस राज्य का प्रतीक धनुष और तीर है। यह उनके योद्धा संस्कृति को दर्शाता है।
- पांड्य राज्य : इस राज्य का प्रतीक दो मछलियाँ हैं। ये मछलियाँ उनके तटीय व्यापार और नौसैनिक शक्ति को दर्शाती हैं।
- चोल राज्य : चोल राज्य का प्रतीक एक बाघ है। यह शक्ति और क्रूरता का प्रतीक है। चोल लोग अपने साम्राज्य के लिए जाने जाते थे, और बाघ उनकी वीरता को दर्शाता है।
- ये चिह्न हर राज्य की विशिष्ट पहचान को दर्शाते हैं।
- इन चिह्नों के माध्यम से हम विभिन्न राज्यों के बीच भेद कर सकते हैं।
- प्रत्येक राज्य का प्रतींक उसकी शक्ति, एकता और ताकत को दर्शाता है।
आइए विचार करें (पृष्ठ 132)
प्रश्न:
राजा की मूर्ति (पाठ्यपुस्तक में) देखिए। इस मूर्ति में राजा को कैसे दर्शाया गया है? उनकी देह-मुद्रा, वस्त्र और मुख-मुद्रा उनके सामर्थ्य एवं प्रतिष्ठा के विषय में क्या संकेत देते हैं?
उत्तर:
- राजा करिकाल की मूर्ति में उन्हें सजाए गए हाथी पर सवार दिखाया गया है। यह उनके शक्ति और अधिकार का प्रतीक है।
- मूर्ति में राजा की मुद्रा सीधी और आत्मविश्वास से भरी हुई है।
- राजा के वस्त्र, मुकुट और आभूषण बहुत ही रंगीन और भव्य हैं। यह उनके उच्च सामाजिक स्तर और समृद्धि को दर्शाते हैं।
- राजा करिकाल की चेहरे की अभिव्यक्ति शांत और आत्मविश्वासी है। यह दर्शाता है कि वे एक सक्षम और निर्णायक नेता हैं।
उनकी यह छवि लोगों में विश्वास और सम्मान पैद्दा करती है, जिससे उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ती है।
आइए विचार करें (पृष्ठ 133)
प्रश्न:
क्या आपने कभी सोचा है कि इतिहासकार कई शताब्दियों पहले सुदूर स्थित दो राज्यों के बीच व्यापारिक संबंधों का पता कैसे लगाते हैं? आइए, इस पर विचारविमर्श करें कि यह जानकारी कैसे प्राप्त की जाती होगी।
उत्तर:
इतिहासकार कई शताब्दियों पहल के राज्यों के बीच व्यापारिक संबंधों का पता लगाने के लिए प्राचीन ग्रंथों, शिलालेखों और सिक्कों का अध्ययन करते हैं। वे कलाकृतियों और व्यापारिक सामान, जैसे मसाले और मोती. का विश्लेषण करते हैं।
इसके अलावा, पुरातात्तिक खोजें, जैसे बंदरगाह स्थल और व्यापार मार्ग, भी यह समझने में मदद् करती हैं कि ये राज्य कैसे आपस में जुड़े थे और सामान का आदान-प्रदान कैसे करते थे।
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पृष्ठ संख्या-133
प्रश्न:
क्या आप यहाँ (पाठ्यपुस्तक में) दिए गए किसी एक सिक्के पर चेर राजवंश का राजचिह्न देख पा रहे हैं?
उत्तर:
हाँ, चेर राजवंश के सिक्कों पर उनका राजचिह्न देखने को मिलता है। चेर राजवंश के सिक्कों पर अक्सर धनुष और बाण के प्रतीक होते हैं। ये प्रतीक उनकी पहचान, शक्ति और वीरता को दर्शाते हैं।
आइए विचार करें (पृष्ठ 134)
प्रश्न:
पांड्य राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था। आपके विचार में मोती उस समय व्यापार की दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण था?
उत्तर:
पांड्य राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था क्योंकि मोती उस समय के सबसे सुंदर और कीमती आभूषण थे। इनकी सुंदरता और दुर्लभता कें कारण इनकी बहुत माँग थी। पांड्य क्षेत्र समुद्र के पास था, जिससे उन्हें मोती मछली पकड़ने में आसानी होती थी। मोती व्यापार से बहुत धन उत्पन्न होता था और ये भारत के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी लोकप्रिय थे। पांड्य नरंशों की मजबूत नौसेना ने व्यापार को और बढ़ावा दिया. जिससे वे रोम. एशिया और अन्य दूर-दराज के बाजारों से जुड़ सके।
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 135)
प्रश्न:
आपके विचार में कुछ इंडो-ग्रीक सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ग या लक्ष्मी जैसे देवी-देवताओं के चित्र अंकित होने का क्या अर्थ रहा होगा?
उत्तर:
इंडो-ग्रीक सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण या लक्ष्मी जैसे देवी-देवताओं के चित्र होने का अर्थ यह था कि शासक स्थानीय विश्वासों का सम्मान करते थे। इससे भारतीय जनसंख्या के साथ संबंध स्थापित करने की उनकी इच्छा भी प्रकट होती थी। यह सांस्कृतिक मिश्रण को दर्शाता था, जो उस समय शासन और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण था।
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ 136)
प्रश्न:
इस विशाल मूर्ति (पाठ्यपुस्तक में) (1.85 मीटर ऊँची) को ध्यान से देखिए। इसके वस्त्र, आयुघ और जूतों को देखिए। इनसे इस आकृति के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
- यह मूर्तिकला कनिष्क की शक्ति और स्थिति को दर्शाती है।
- उनके वस्त्र एक लंब और भारी कोट के रूप में हैं, जो मध्य एशिया के साथ उनके संबंध को दर्शाते हैं।
- मूर्तिकला सिरविहीन है, लेकिन यह कनिष्क की ताक्तवर छवि को प्रस्तुत करती है।
- कनिष्क की दाहिनो हाथ में एक सजावटी गदा और बाई हाथ में एक तलवार है।
- मूर्तिकला में दिखाई देने वाले भारी जूता ठंडी जलवायु को दर्शाते हैं।
आइए पता लगाएँ (पूठ 136)
प्रश्न:
इन सिक्कों (पाठ्यपुस्तक में) को ध्यान से टेखिए। सम्राट के अतिरिक्त और कौन इस मुद्रा पर अंकित है?
उत्तर:
सिक्कों पर सम्राट कनिष्क के अलावा और भी कई आकृतियाँ अंकित हाती थी। उदाहरण के लिए, एक सिक्के पर भगवान बुद्ध की आकृति है, जबकि दूसरे सिक्के पर भगवान रिव और उनके बैल़ नंदी की आकृति दर्शाई गई है।
आइए विचार करें (पृष्ठ 137)
प्रश्न:
क्या आप जानते हैं कि गांधार कहाँ है? क्या यह आपको महाकाव्य महाभारत के किसी पात्र की याद दिलाता है?
उत्तर:
- गांधार प्राचीन भारत के उत्तर:पश्चिमी क्षेत्र में स्थित था, जो आज के पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों से मेल खाता है। यह क्षेत्र अपनी अनोखी कला शैली के लिए जाना जाता है, जिसमें भारतीय और ग्रीको-रोमन प्रभावों का मिश्रण है।
- महाभारत में, गांधारी एक महत्वपूर्ण पात्र हैं। वह राजा धृतराष्ट्र की पत्नी थीं, जो अंधे थे। गांधारी ने अपने पति के प्रति सम्मान दिखाने के लिए अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली शी। उनके भाई का नाम शकुनी था।
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आइए पता लगाएँ (पूष्ठ 140)
प्रश्न:
अब आप मधुरा और गांधार कला शैलियों की मूल विशेषताओं से परिचित हो चुके हैं। अगले पृष्ठ पर चित्र 6.27 (पाठ्यपुस्तक में) में दी गई कलाकृतियों को देखिए और पह्यानिए। क्या आप बता सकते हैं कि चित्र में दी गई प्रत्येक कलाकृति किस कला शैली से संबंधित है? अपने विचार कारण सहित लिखिए और सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1. गांधार-बुद्ध की मृत्यु का दृश्य
कारण : कपड़ों की तहं बहुत गहरी और असली जैसी दिखर्ता हैं।
2. गांधार-बोधिसत्व मैत्रेय
कारण : मूर्ति ने राजकुमार जैसे कपड़े और गहने पहने हैं और नैन-नक्श बहुत तीखे हैं।
3. मधुरा-शिवलिंग की पूजा
कारण : यह लाल चित्तीदार पत्थर से बना है।
4. मधुरा-नाग और दो नागिन
कारण : इसमें स्थानीय लोक देवताओं को दिखाया गया है और शरीर की बनावट गोल है।
5. मथुरा-कार्तिकेय और अग्नि
कारण : यह भी लाल पत्थर से बना है और भारतीय देवी-देवताओं को निडर अंदाज में दिखाता है।
6. गांधार-खड़े हुए बुद्ध
कारण : बुद्ध ने एक मोटा चोगा पहना है जिसकी तहें रोमन कुपड़ों जैसी दिखती हैं।