Students prefer Class 8 Hindi Extra Question Answer Malhar Chapter 5 कबीर के दोहे Extra Questions and Answers that are written in simple and clear language.
Class 8 Hindi कबीर के दोहे Extra Question Answer
Class 8 Hindi Chapter 5 Extra Question Answer कबीर के दोहे
NCERT Class 8 Hindi Chapter 5 Extra Questions अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
सत्य के बराबर क्या नहीं है?
उत्तर:
सत्य के बराबर कोई तप नहीं है।
प्रश्न 2.
किसके हृदय में गुरु का वास होता है?
उत्तर:
जिसके हृदय में सत्य होता है।
प्रश्न 3.
कबीर ने खजूर के पेड़ की क्या विशेषता बताई है ?
उत्तर:
वह पंथी (पथिक) को छाया नहीं देता और उसके फल दूर होते हैं।
प्रश्न 4.
कबीर ने गुरु को गोविंद से श्रेष्ठ क्यों बताया है?
उत्तर:
क्योंकि गुरु ही गोविंद तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं।
प्रश्न 5.
अंहकार का त्याग कर कैसी वाणी बोलने चाहिए?
उत्तर:
ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो दूसरों को शांति दे और स्वयं को भी।
प्रश्न 6.
निंदक को पास रखने से क्या लाभ होता है?
उत्तर:
वह बिना पानी, साबुन खर्च किए स्वभाव को निर्मल करता है।
![]()
प्रश्न 7.
सूप की क्या विशेषता है, जिसके कारण साधु की तुलना उससे की गई है ?
उत्तर:
वह सार (काम की वस्तु) को ग्रहण करता है और थोथे (व्यर्थ की वस्तु) को उड़ा देता है।
प्रश्न 8.
कबीर दास जी ने मन को किसके समान बताया है?
उत्तर:
कबीरदास जी ने मन को पक्षी के समान बताया है।
कबीर के दोहे Class 8 Hindi Extra Question Answer लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
कबीर ने सत्य और असत्य के विषय में क्या कहा है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
कबीर कहते हैं कि सत्य के समान कोई तपस्या नहीं है और झूठ के समान कोई पाप नहीं है। उनका मानना है कि जिस व्यक्ति के हृदय में सच्चाई होती है, उसके हृदय में स्वयं ईश्वर या गुरु का वास होता है। वे सत्य को परम धर्म और ईश्वर – प्राप्ति का साधन मानते हैं ।
प्रश्न 2.
खजूर के दृष्टांत द्वारा कबीर क्या समझाना चाहते हैं?
उत्तर:
खजूर के दृष्टांत द्वारा कबीर समझाना चाहते हैं कि केवल बड़ा या धनवान होना पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति दूसरों के लिए उपयोगी नहीं है, परोपकार नहीं करता, तो उसका बड़प्पन निरर्थक है, ठीक वैसे ही जैसे खजूर का पेड़ ऊँचा होने के बावजूद राहगीरों को न छाया देता है और न ही उसके फल आसानी से प्राप्त होते हैं।
प्रश्न 3.
गुरु के महत्व पर कबीर के क्या विचार हैं?
उत्तर:
कबीर गुरु को गोविंद (ईश्वर) से भी श्रेष्ठ मानते हैं। वे कहते हैं कि जब गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों सामने हों, तो पहले गुरु के चरण छूने चाहिए, क्योंकि गुरु ही वे मार्गदर्शक हैं, जिन्होंने ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता दिखाया है। गुरु ज्ञान के माध्यम से अज्ञानता का नाश करते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
प्रश्न 4.
‘अति का भला न बोलना…’ दोहे का भावार्थ लिखें।
उत्तर:
इस दोहे का भावार्थ यह है कि किसी भी चीज की अति अच्छी नहीं होती। न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न ही बहुत अधिक चुप रहना। जिस प्रकार अत्यधिक वर्षा या अत्यधिक धूप हानिकारक होती है, उसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। संयम और मध्य मार्ग ही हितकारी होता है।
प्रश्न 5.
कबीर मधुर वाणी बोलने की प्रेरणा क्यों देते हैं?
उत्तर:
कबीर मधुर वाणी बोलने की प्रेरणा इसलिए देते हैं ताकि व्यक्ति का अहंकार (आपा) समाप्त हो जाए । मधुर वाणी न केवल सुनने वाले को शांति और शीतलता प्रदान करती है, बल्कि उसे बोलने वाले को भी आत्मिक शांति और सुख का अनुभव होता है। यह वाणी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है और सामाजिक सद्भाव बढ़ाती है।
प्रश्न 6.
निंदक को ‘निर्मल करे सुभाय’ क्यों कहा गया है?
उत्तर:
निंदक को ‘निर्मल करे सुभाय’ इसलिए कहा गया है क्योंकि वह व्यक्ति की कमियों और गलतियों को उजागर करता है। जब हमें अपनी बुराइयों का पता चलता है, तो हम उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार, बिना किसी बाहरी साधन (पानी, साबुन) के निंदक हमारी कमियों को दूर करके हमारे स्वभाव को शुद्ध और स्वच्छ बनाने में मदद करता है।
प्रश्न 7.
साधु को सूप के समान क्यों होना चाहिए?
उत्तर:
साधु को सूप के समान होना चाहिए क्योंकि सूप अनाज के सार (दाने) को रख लेता है और थोथे (भूसे) को उड़ा देता है। इसी प्रकार, एक साधु या सज्जन व्यक्ति को जीवन और समाज से केवल अच्छी, उपयोगी और ग्रहण करने योग्य बातों को अपनाना चाहिए और व्यर्थ, निरर्थक तथा अनुपयोगी बातों को त्याग देना चाहिए। यह विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता का प्रतीक है।
प्रश्न 8.
‘मन पंछी भया’ का क्या आशय है?
उत्तर:
‘मन पंछी भया’ का आशय मन की अत्यधिक चंचलता, गतिशीलता और स्वतंत्रता से है। जिस प्रकार पक्षी जहाँ चाहे उड़ सकता है, उसी प्रकार मन भी बिना किसी सीमा के कहीं भी विचरण कर सकता है, कल्पना कर सकता है या भटक सकता है। यह मन की असीम शक्ति और अस्थिरता को दर्शाता है।
कबीर के दोहे Extra Questions दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
कबीर के दोहों में निहित नैतिक मूल्यों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कबीर के दोहे केवल कविताएँ नहीं, बल्कि जीवन जीने के नैतिक सूत्र हैं। इन दोहों में अनेक नैतिक मूल्य स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं:
- सत्यनिष्ठा : ‘साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप’ – यह दोहा सत्य को सर्वोच्च तपस्या और झूठ को सबसे बड़ा पाप बताता है। कबीर सत्य को ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग मानते हैं।
- परोपकार : ‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर’- इस दोहे से परोपकार का महत्व झलकता है। कबीर कहते हैं कि व्यक्ति का बड़ा होना तभी सार्थक है जब वह दूसरों के लिए उपयोगी हो, अन्यथा वह खजूर के पेड़ के समान निरर्थक है।
- गुरु – भक्ति : ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े… ‘ यह दोहा गुरु की महत्ता और उनके प्रति असीम श्रद्धा को दर्शाता है। गुरु ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता दूर करते हैं और ईश्वर – प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं, इसलिए उनका स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है।
- संयम और संतुलन : ‘अति का भला न बोलना…’- यह दोहा जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने का उपदेश देता है। कबीर कहते हैं कि किसी भी चीज की अति (अधिकता) हानिकारक होती है, चाहे वह बोलना हो, चुप रहना हो, बारिश हो या धूप हो ।
- विनम्रता और मधुर वाणी : ‘ऐसी बानी बोलिए…’–यह दोहा विनम्रता और मधुर वाणी के महत्व पर जोर देता है। कबीर कहते हैं कि वाणी ऐसी हो जो अहंकार को नष्ट करे और दूसरों के साथ-साथ स्वयं को भी शांति प्रदान करे।
- आत्म-सुधार: ‘निंदक नियरे राखिये… ‘ – यह दोहा आत्म-सुधार के लिए निंदा को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है। कबीर निंदक को हितैषी मानते हैं क्योंकि वह हमारी कमियों को बताकर हमें शुद्ध होने का अवसर देता है।
- विवेकशीलता : ‘साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय’- यह दोहा विवेकपूर्ण चुनाव और ग्रहणशीलता का महत्व बताता है। एक साधु को सूप की तरह सार (अच्छी बातें) को ग्रहण करनी चाहिए और थोथे (व्यर्थ की बातें) को त्याग देना चाहिए।
- उत्तम संगति : ‘जो जैसी संगति करे, सो तैसा फल पाय’- यह दोहा संगति के निर्णायक प्रभाव को दर्शाता है। कबीर कहते हैं कि व्यक्ति का व्यक्तित्व और भविष्य उसकी संगति पर निर्भर करता है, अतः उत्तम संगति का चुनाव महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, कबीर के दोहे नैतिकता, आध्यात्मिकता और सामाजिक व्यवहार के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
![]()
प्रश्न 2.
कबीरदास जी ने अपने दोहों में तुलनात्मकता का सुंदर प्रयोग किया है। उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
कबीरदास जी ने अपने दोहों में जीवन की गहन सच्चाइयों को सरल भाषा और सहज उपमाओं के माध्यम से समझाया है, जिससे उनके दोहे अधिक प्रभावी और बोधगम्य बन जाते हैं।
1. खजूर का पेड़ (परोपकारहीनता) : ‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।। ‘ यहाँ परोपकार विहीन बड़े व्यक्ति की तुलना खजूर के पेड़ से की गई है। खजूर का पेड़ ऊँचा तो होता है, पर किसी के काम नहीं आता । यह तुलना दिखावटी बड़प्पन की निरर्थकता को स्पष्ट करती है।
2. सूप (विवेकशीलता) : ‘साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय ।।’ यहाँ साधु या सज्जन व्यक्ति के स्वभाव की तुलना सूप से की गई है। जिस प्रकार सूप अनाज में से उपयोगी दाने रख लेता है और अनुपयोगी भूसे को उड़ा देता है, उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति को भी अच्छी बातें ग्रहण करनी चाहिए और व्यर्थ को त्याग देना चाहिए। यह तुलना विवेकपूर्ण चुनाव के महत्व को दर्शाती है।
3. मन की तुलना पक्षी से (चंचलता) : ‘कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय ।’ यहाँ मन की चंचलता, गतिशीलता और स्वच्छंदता की तुलना पक्षी से की गई गई। है। पक्षी जिस प्रकार स्वतंत्र होकर जहाँ चाहे उड़ सकता है, उसी प्रकार मन भी विचारों और कल्पनाओं में कहीं भी भ्रमण कर सकता है। यह तुलना मन के स्वभाव को सरल शब्दों में व्यक्त करती है। इनके प्रयोग से कबीर के दोहे न केवल ….. समझने में आसान हो जाते हैं, बल्कि वे पाठक के मन पर गहरा प्रभाव भी डालते हैं। वे अमूर्त विचारों को मूर्त रूप देकर उन्हें ग्राह्य बनाते हैं।
प्रश्न 3.
कबीर के दोहों में ‘संतुलन’ और ‘विवेक’ के महत्व को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
कबीरदास ने अपने दोहों में जीवन में संतुलन और विवेक के महत्व को बड़े ही मार्मिक ढंग से दर्शाया है।
1. संतुलन का महत्व : ‘अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप । अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।’ इस दोहे के माध्यम से कबीर बताते हैं कि किसी भी चीज की अति (अधिकता) अच्छी नहीं होती। न तो अत्यधिक बोलना उचित है और न ही अत्यधिक मौन रहना। जिस प्रकार प्रकृति में अत्यधिक वर्षा या अत्यधिक धूप हानिकारक होती है, उसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यह दोहा हमें संयमित व्यवहार, तथा विचारों और भावनाओं में संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देता है। जीवन में मध्य मार्ग अपनाना ही सुखकारी होता है, क्योंकि अति सदैव कष्टदायक होती है।
2. विवेक का महत्व : ‘साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय । सार सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय ।।’ इस दोहे में कबीर ने विवेकशीलता को दर्शाने के लिए सूप का उदाहरण दिया है। सूप का कार्य अनाज में से सार तत्व (दाने) को रखना और निरर्थक (भूसे) को उड़ा देना है। ठीक इसी प्रकार, एक विवेकशील व्यक्ति या साधु वह होता है जो जीवन और समाज से केवल उपयोगी, सार्थक और ग्रहण करने योग्य बातों, गुणों और विचारों को ग्रहण करता है, और व्यर्थ, निरर्थक तथा हानिकारक बातों या विचारों का त्याग कर देता है।
यह दोहा हमें सिखाता है कि हमें हमेशा सोच-समझकर, अच्छे-बुरे का भेद करके ही कुछ भी अपनाना चाहिए। इस प्रकार, कबीर के दोहे हमें एक संतुलित और विवेकपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं, जो न केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए, बल्कि सामाजिक सद्भाव के लिए भी आवश्यक हैं।
प्रश्न 4.
कबीर के दोहे किस प्रकार व्यावहारिक जीवन के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होते हैं ? किन्हीं तीन दोहों के संदर्भ में विस्तृत चर्चा कीजिए ।
उत्तर:
कबीरदास के दोहे केवल साहित्यिक रचनाएँ नहीं हैं, वे व्यावहारिक जीवन के लिए शाश्वत मार्गदर्शक सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं।
1. सत्यनिष्ठा और ईमानदारी (साँच बराबर तप नहीं…): ‘साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पापा । जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।’ यह दोहा हमें सत्यनिष्ठ और ईमानदार रहने की प्रेरणा देता है। व्यावहारिक जीवन में, ईमानदारी और सच्चाई व्यक्ति को विश्वसनीयता प्रदान करती है, संबंधों को मजबूत बनाती है और आत्मिक शांति देती है। झूठ और बेईमानी क्षणिक लाभ दे सकती है, लेकिन अंततः वह आत्मिक अशांति और सामाजिक अप्रतिष्ठा का कारण बनती है। यह दोहा हमें हर परिस्थिति में सत्य का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
2. वाणी की मधुरता और अहंकार त्याग (ऐसी बानी बोलिए…) : ‘ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करे, आपहुँ सीतल होय ।। ‘ यह दोहा संचार कौशल और आत्म नियंत्रण का उत्कृष्ट उदाहरण है। व्यावहारिक जीवन में, हमारी वाणी का प्रभाव दूसरों पर बहुत गहरा पड़ता है। मधुर और विनम्र वाणी न केवल दूसरों को प्रसन्न करती है, बल्कि स्वयं बोलने वाले के मन को भी शांत रखती है। यह हमें अहंकार (आपा) का त्याग करने प्रस्तुत करते हैं। उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं।
1. सत्यनिष्ठा और ईमानदारी (साँच बराबर तप नहीं…): ‘साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पापा । जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।’ यह दोहा हमें सत्यनिष्ठ और ईमानदार रहने की प्रेरणा देता है। व्यावहारिक जीवन में, ईमानदारी और सच्चाई व्यक्ति को विश्वसनीयता प्रदान करती है, संबंधों को मजबूत बनाती है और आत्मिक शांति देती है। झूठ और बेईमानी क्षणिक लाभ दे सकती है, लेकिन अंततः वह आत्मिक अशांति और सामाजिक अप्रतिष्ठा का कारण बनती है। यह दोहा हमें हर परिस्थिति में सत्य का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
2. वाणी की मधुरता और अहंकार त्याग (ऐसी बानी बोलिए…) : ‘ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करे, आपहुँ सीतल होय ।।’ यह दोहा संचार कौशल और आत्म नियंत्रण का उत्कृष्ट उदाहरण है। व्यावहारिक जीवन में, हमारी वाणी का प्रभाव दूसरों पर बहुत गहरा पड़ता है। मधुर और विनम्र वाणी न केवल दूसरों को प्रसन्न करती है, बल्कि स्वयं बोलने वाले के मन को भी शांत रखती है। यह हमें अहंकार (आपा) का त्याग करने में सहायता करते है।
Class 8 Hindi Chapter 5 Extra Questions and Answers अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागों पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
प्रश्न 1.
प्रस्तुत दोहे में कबीरदास जी किस दुविधा का वर्णन कर रहे हैं?
उत्तर:
कबीरदास जी इस दुविधा का वर्णन कर रहे हैं कि यदि गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों एक साथ सामने खड़े हों, तो पहले किसके चरण छूकर प्रणाम करना चाहिए।
प्रश्न 2.
कबीर ने स्वयं को किस पर न्योछावर करने की बात कही है?
उत्तर:
कबीर ने स्वयं को गुरु पर न्योछावर करने की बात कही है।
प्रश्न 3.
कबीर गुरु को गोविंद से श्रेष्ठ क्यों मानते हैं?
उत्तर:
कबीर गुरु को गोविंद से श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि गुरु ने ही उन्हें गोविंद (ईश्वर) तक पहुँचाने का मार्ग दिखाया है।
प्रश्न 4.
यह दोहा गुरु के किस महत्व को दर्शाता है ?
उत्तर:
यह दोहा गुरु के उस महत्व को दर्शाता है कि वे ही अज्ञानता को दूर कर ज्ञान प्रदान करते हैं और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। अत: उनका स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है।
प्रश्न 5.
इस दोहे से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर:
इस दोहे से हमें गुरु के प्रति असीम श्रद्धा और सम्मान रखने तथा उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को सर्वोपरि मानने की प्रेरणा मिलती है।
2. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय ।।
प्रश्न-
प्रश्न 1.
कबीरदास जी ने एक साधु के स्वभाव की तुलना किससे की है?
उत्तर:
कबीरदास जी ने एक साधु के स्वभाव की तुलना सूप (अनाज साफ करने का उपकरण) से की है।
प्रश्न 2.
सूप की क्या विशेषता बताई गई है, जिसके आधार पर उसकी और साधु की तुलना की गई है ?
उत्तर:
सूप की विशेषता यह बताई गई है कि वह अनाज में से सार (उपयोगी दाने) को अपने अंदर रख लेता है और थोथे (व्यर्थ के भूसे या कचरे) को उड़ा देता है।
![]()
प्रश्न 3.
‘सार सार को गहि रहे’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘सार-सार को गहि रहे’ का अर्थ है कि केवल उपयोगी, अच्छी और ग्रहण करने योग्य बातों को अपनाना या ग्रहण करना चाहिए।
प्रश्न 4.
‘थोथा देई उड़ाय’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
‘थोथा देई उड़ाय’ से तात्पर्य है कि निरर्थक, बेकार और अनुपयोगी बातों या विचारों को त्याग देना चाहिए।
प्रश्न 5.
इस दोहे से हमें जीवन में क्या सीख मिलती है ?
उत्तर:
इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें जीवन में विवेकशील होना चाहिए, अच्छी बातों और ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए तथा व्यर्थ की बातों या नकारात्मक विचारों का त्याग कर देना चाहिए।
Class 8 Hindi Chapter 5 Extra Questions for Practice
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
दोहों के अनुसार व्यक्ति को कैसा फल प्राप्त होता है ?
(क) भाग्य पर आधारित
(ख) जैसी संगति करे
(ग) जैसा कर्म करे
(घ) ईश्वर की इच्छा से
प्रश्न 2.
कबीर के अनुसार, यदि गुरु और गोविंद दोनों खड़े हों, तो पहले किसे प्रणाम करना चाहिए?
(क) गोविंद को
(ख) गुरु को
(ग) दोनों को एक साथ
(घ) किसी को नहीं
प्रश्न 3.
‘मन का आपा खोया’ का क्या अर्थ है ?
(क) मन को शांत करना
(ख) मन से अहंकार त्यागना
(ग) मन को खो देना
(घ) मन को भटकने देना
प्रश्न 4.
कबीर के अनुसार कौन बिना पानी और साबुन के स्वभाव को निर्मल करता है?
(क) दर्पण
(ख) साबुन
(ग) गुरु
(घ) निंदक
प्रश्न 5.
साधु को ‘सार सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय’ क्यों कहा गया है?
(क) क्योंकि वह समझदार होता है
(ख) क्योंकि वह केवल अच्छी बातें ग्रहण करता है.
(ग) क्योंकि वह व्यर्थ की बातें छोड़ देता है
(घ) (ख) और (ग) दोनों
अति लघूत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
संगति का व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
प्रश्न 2.
गुरु को गोविंद से श्रेष्ठ क्यों माना गया है ?
प्रश्न 3.
‘अति का भला न बरसना’ पंक्ति का क्या अर्थ है ?
प्रश्न 4.
‘मन का आपा खोया’ से कबीर क्या कहना चाहते हैं?
प्रश्न 5.
निंदक को आँगन में कुटिया बनवाकर रखने की सलाह क्यों दी गई है ?
प्रश्न 6.
सूप की मुख्य विशेषता क्या है, जिसके आधार पर इसकी तुलना साधु से की गई है ?
![]()
लघूत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
कबीर ने खजूर के पेड़ का उदाहरण देकर किस प्रकार के व्यक्तियों पर व्यंग्य किया है?
प्रश्न 2.
‘अति का भला न बोलना, अति का भली न चूप’ इस पंक्ति के माध्यम से कबीर जीवन में किस सिद्धांत को अपनाने की सलाह देते हैं ?
प्रश्न 3.
कबीर के अनुसार, वाणी का क्या महत्व है और वह कैसी होनी चाहिए?
प्रश्न 4.
निंदक को पास रखने से क्या लाभ होता है?
प्रश्न 5.
‘जो जैसी संगति करे, सो तैसा फल पाय’। इस दोहे से आप क्या समझते हैं?
प्रश्न 6.
कबीर ने खजूर के पेड़ का उदाहरण देकर किस प्रकार के व्यक्तियों पर व्यंग्य किया है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
कबीर के दोहों में व्यक्त सामाजिक और आध्यात्मिक विचारों की विवेचना उदाहरण सहित कीजिए ।
प्रश्न 2.
वर्तमान समय में कबीर के दोहे कितने प्रासंगिक हैं? स्पष्ट कीजिए ।