By going through these Sanskrit Class 6 Notes and NCERT Class 6 Sanskrit Chapter 12 Hindi Translation Summary Explanation Notes आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः students can clarify the meanings of complex texts.
Class 6 Sanskrit Chapter 12 Summary Notes आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः Class 6 Summary
प्रस्तुत पाठ में बताया गया है कि आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित उसका बहुत बड़ा शत्रु है, अतः आलस्य को छोड़कर परिश्रम करना चाहिए। एक भिक्षुक सक्षम होते हुए भी भिक्षा माँगता था। एक धनिक युवक ने सौ से भी अधिक रुपए उसको देकर उससे उसके शरीर के अंग खरीदने की इच्छा व्यक्त की, परन्तु भिक्षुक ने उसे मना कर दिया। तब धनिक युवक ने भिक्षुक को समझाया कि तुम्हारे पास इतने कीमती शरीर के अंग हैं, फिर तुम अपने आपको कमजोर क्यों मानते हो तथा भिक्षा क्यों माँगते हो । सौभाग्य से ही मानव जीवन मिलता है। अत: तुम्हें परिश्रम करना चाहिए। उसी दिन से भिक्षुक ने भिक्षा माँगना छोड़ दिया तथा मेहनत करके धन कमाने लगा तथा जीवनयापन करने लगा।
इस प्रेरणार्थक पाठ में यह बताया गया है कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए आलस्य को छोड़कर परिश्रमपूर्वक अपना कर्म करना चाहिए। पाठ की कथा में बताया गया है कि एक भिक्षुक के पास भी शरीररूपी बहुमूल्य संपदा है, जिसका उपयोग उसे भिक्षा के लिए नहीं बल्कि परिश्रमपूर्वक जीवन यापन करने के लिए करना चाहिए ।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः Class 6 Notes
पाठ – शब्दार्थ एवं सरलार्थ

बाल: – मातः! अद्य तु अवकाशदिनम् अस्ति। अद्य अहं सम्पूर्णदिने विश्रामं करिष्यामि ।
माता – अवकाश: विद्यालयस्य अस्ति न तु स्वाध्यायस्य । बहु आलस्यं करोषि । उत्तिष्ठ परिश्रमं कुरु ।
बाल: – अहम् उत्तीर्णः भविष्यामि । किम् अधिकेन परिश्रमेण ?
माता – यः परिश्रमं करोति सः एव जीवने सफलता प्राप्नोति । परिश्रमः एव मनुष्यस्य मित्रम् अस्ति । आलस्यं तु शत्रुः इव अस्ति ।
बाल: – तत् कथं मातः ?
माता – यदि ज्ञातुम् इच्छसि तर्हि एतां कथां पठ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
अद्य – आज ( Today),
अवकाशदिनम् – छुट्टी का दिन (Holiday),
विश्रामं – आराम (Rest),
स्वाध्यायस्य – अध्ययन का (Of study),
आलस्यम् – सुस्ती (Lazyness),
परिश्रमम् – मेहनत (Hardwork),
शत्रु: – दुश्मन (Enemy),
ज्ञातुं – जानने के लिए (To know),
कथां – कहानी ( Story ) ।
सरलार्थ-
बालक – माँ! आज तो छुट्टी का दिन है। आज मैं पूरे दिन विश्राम करूँगा ।
माता – छुट्टी विद्यालय की है, स्वाध्याय की नहीं। बहुत आलस करते हो । उठो, परिश्रम करो।
बालक – मैं उत्तीर्ण हो जाऊँगा। अधिक परिश्रम से क्या ?
माता – जो परिश्रम करता है, वही जीवन में सफलता पाता है। परिश्रम ही मनुष्य का मित्र है। आलस्य तो शत्रु के समान है। बालक – वो कैसे माँ?
माता – यदि जानना चाहते हो, तो इस कथा को पढ़ो।
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(1)

एकस्मिन् विशाले ग्रामे कश्चन भिक्षुकः आसीत् । यद्यपि सः उन्नतः दृढकायः च युवकः आसीत् तथापि सः भिक्षाटनं करोति स्म । मार्गे यः कोऽपि मिलति तं सः कथयति – “कृपया भिक्षां यच्छतु । दरिद्राय दानं करोतु । पुण्यं प्राप्नोतु । ” इति । केचन जनाः तस्मै धनं यच्छन्ति । केचन च तर्जयन्ति ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
भिक्षुकः – भिखारी (Beggar),
वृढकाय: – बलिष्ठ (A person with strong body),
भिक्षाटनम्- भीख के लिए घूमना (Roaming for begging),
दानम् – दान (Alms),
पुण्यम् – पुण्य (Virtue)।
सरलार्थ-
एक बड़े गाँव में कोई एक भिक्षुक रहता था । यद्यपि वह हृष्ट-पुष्ट और मज़बूत शरीर वाला युवक था फिर भी वह भिक्षाटन करता था। मार्ग में जो कोई भी मिलता है उसको वह कहता है- “कृपया भिक्षा दीजिए। दरिद्र के लिए दान कीजिए । पुण्य प्राप्त कीजिए। ” कुछ लोग उसे धन देते हैं। कुछ लोग डाँट देते हैं।
(2)

एकदा तेन मार्गेण कश्चित् धनिकः आगच्छति । सः भिक्षुकः मनसि एव चिन्तयति – “ अहो मम भाग्यम् । अद्य अहं प्रभूतं धनं प्राप्नोमि ” इति ।
भिक्षुकः धनिकं वदति – “आर्य! अहम् अतीव दरिद्रः अस्मि । कृपया दानं करोतु ” इति ।
धनिकः तं पृष्टवान् – ” त्वं किम् इच्छसि ? ”
“आर्य! अहं प्रभूतं धनम् इच्छामि ” इति सः सविनयम् उक्तवान् ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
धनिकः – धनवान् (Rich person),
मनसि – मन में (In mind),
भाग्यम् – भाग्य (Luck),
पुण्यम् – पुण्य (Virtue),
प्रभूतम् – ढेर सारा (A lot of),
अतीव- बहुत सारा (Excessive)।
सरलार्थ-
एक बार उस मार्ग में कोई धनी व्यक्ति आता है। वह भिक्षुक मन में ही सोचता है – “ अहो भाग्य मेरा ।
आज मैं ढेर सारा धन प्राप्त करूँगा । ”
भिक्षुक धनी व्यक्ति को कहता है- “ श्रेष्ठ ! मैं बहुत दरिद्र हूँ। कृपया दान कीजिए। ”
धनी व्यक्ति उससे पूछता है- “तुम क्या चाहते हो?”
“ श्रेष्ठ! मैं ढेर सारा धन चाहता हूँ” उसने विनयपूर्वक कहा।
(3)

तदा धनिकः वदति – ” अहं तुभ्यं सहस्रं रूप्यकाणि यच्छामि । त्वं मह्यं तव पादौ यच्छ ।”
भिक्षुकः वदति – ” अहं मम पादौ तुभ्यं कथं ददामि ? विना पादौ कथं वा चलामि?”
धनिकः वदति – “ अस्तु त्वं पञ्चसहस्रं रूप्यकाणि स्वीकुरु । मह्यं तव हस्तौ यच्छ।”
भिक्षुकः वदति – “हस्ताभ्यां विना अहं कथं भिक्षां स्वीकरोमि?” एवमेव धनिकः सहस्राधिकैः रूप्यकैः तस्य अनेकानि शरीराङ्गानि क्रेतुम् इष्टवान् । किन्तु भिक्षुकः निराकृतवान् ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
तुभ्यम् – तुझे (For you),
मह्यम् – मुझे (For me),
पादौ – दोनों पैर (Feet),
हस्तौ–दोनो हाथ (Both hand),
शरीराङ्गानि-शरीर के अंग (Body parts),
निराकृतवान्- अस्वीकार किया (Refused ) ।
सरलार्थ-
तब धनी व्यक्ति कहता है- ” मैं तुम्हें हज़ार रुपये देता हूँ। तुम मुझे अपने (तुम्हारे) दोनों पैर दे दो।”
भिक्षुक कहता है – “मैं अपना (मेरा) पैर तुम्हें कैसे दे सकता हूँ? पैरों के बिना (मैं) कैसे चलूँगा (चलता हूँ)?”
धनिक कहता है – “ठीक है, तुम पाँच हज़ार रुपये लो। मुझे अपने (तुम्हारे) दोनों हाथ दे दो।”
भिक्षुक कहता है – “ हाथों के बिना मैं कैसे भिक्षा ग्रहण करूँगा (करता हूँ) ।”
इस प्रकार धनिक ने हज़ारों रूपयों से उसके शरीर के अनेक अंगों को खरीदना चाहा। किंतु भिक्षुक ने अस्वीकार कर दिया।
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(4)

तदा धनिकः उक्तवान्। “पश्य मित्र! तव समीपे एव सहस्राधिकमूल्यकानि वस्तूनि सन्ति । तथापि किमर्थं त्वम् आत्मानं दुर्बलं मन्यसे ? सौभाग्येन एव वयं मानवजन्म प्राप्तवन्तः । अस्य सफलतार्थं प्रयत्नं कुरु । इतः गच्छ, शुभं भवतु ” इति ।
तस्माद् दिनात् भिक्षुकः भिक्षाटनं त्यक्त्वा परिश्रमेण धनार्जनं कृत्वा सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान्।
अतः एव सज्जनाः वदन्ति-
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।

शब्दार्थाः (Word Meanings):
उक्तवान्- कहा (Said),
पश्य – देखो (See),
वस्तूनि – चीजें (Things),
दुर्बलम् – निर्बल (Weak),
सौभाग्येन – अच्छे भाग्य से (With good fortune),
मानवजन्म – मनुष्यजन्म (Birth in human body),
त्यक्त्वा – त्याग करके (Having left),
मनुष्याणां – मनुष्यों का (Of humans),
शरीरस्थ: – शरीर में स्थित (In body),
उद्यमसमः – परिश्रम के समान (Like hardwork),
बन्धुः – मित्र (Friend),
नावसीदति – दुखी नहीं होता है (Doesn’t feel sad)।
सरलार्थ-
तब धनिक व्यक्ति ने कहा- “देखो मित्र ! तुम्हारे पास ही हज़ारों रूपयों से अधिक की वस्तुएँ हैं। फिर भी किसलिए तुम अपने को दुर्बल मानते हो? सौभाग्य से हम लोग मानव जन्म प्राप्त किए हैं। इसकी सफ़लता हेतु प्रयत्न करो । यहाँ से जाओ। शुभ हो।” उस दिन से भिक्षुक ने भिक्षाटन को त्याग कर परिश्रम से धन कमाकर गौरव के साथ जीवन यापन शुरू कर दिया । इसीलिए सज्जन कहते हैं-
मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही (उनका) सबसे बड़ा शत्रु होता है।
परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा) कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता ।
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वयं शब्दार्थान् जानीम:
