Reading Class 9 Hindi Notes and Class 9 Hindi Ganga Chapter 2 Summary क्या लिखूँ पाठ का सारांश helps students understand the main plot quickly.
क्या लिखूँ पाठ का सारांश
क्या लिखूँ Class 9 Hindi Summary
Class 9 Hindi Chapter 2 Summary – क्या लिखूँ Summary Class 9
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा रचित निबंध ‘क्या लिखूँ ?’ एक विचारात्मक और ललित निबंध है, जिसमें लेखक ने निबंध लेखन की कला, लेखकों की मानसिक स्थिति और विषय चयन की दुविधा का बहुत ही रोचक और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है।

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लेखक प्रसिद्ध अंग्रेजी निबंधकार ए. जी. गार्डिनर के इस मत से निबंध की शुरुआत करते हैं कि लिखने के लिए एक विशेष मानसिक अवस्था (आवेग या उमंग) की आवश्यकता होती है। जब मन में भावों का ज्वार उठता है, तो विषय गौण हो जाता है और लेखक किसी भी खूँटी (विषय) पर अपने विचारों का हैट (भाव) टाँग सकता है। हालाँकि, लेखक स्वीकार करते हैं कि उन्हें ऐसी स्वत: स्फूर्त प्रेरणा नहीं मिलती; उन्हें लिखने के लिए कठिन परिश्रम और चिंतन करना पड़ता है।
लेखक को दो विषयों – ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और ‘समाज-सुधार’-पर निबंध लिखने का कार्य मिलता है, जिससे वे उलझन में पड़ जाते हैं। वे निबंधशास्त्र के नियमों का अध्ययन करते हैं; जैसे- निबंध छोटा होना चाहिए, सामग्री और शैली का संतुलन आवश्यक है, रूपरेखा बनानी चाहिए आदि। परंतु उन्हें इन नियमों का पालन करना कठिन लगता है।
अंततः वे स्वतंत्र शैली अपनाने का निश्चय करते हैं और दोनों विषयों को एक ही निबंध में जोड़ देते हैं। वे बताते हैं कि दूर की वस्तुएँ आकर्षक लगती हैं क्योंकि उनकी वास्तविक कठिनाइयाँ हमें दिखाई नहीं देतीं। इसी प्रकार जीवन में अतीत और भविष्य दोनों मनोहारी प्रतीत होते हैं, जबकि वर्तमान से लोग असंतुष्ट रहते हैं।
आगे वे समाज-सुधार पर विचार करते हुए कहते हैं कि हर युग में सुधार की आवश्यकता बनी रहती है। इतिहास में अनेक सुधारक हुए हैं, पर सुधारों का अंत कभी नहीं होता। जीवन निरंतर परिवर्तनशील और प्रगतिशील है। वे अमीर खुसरो की उस चतुराई का स्मरण करते हैं जहाँ उन्होंने एक ही पद्म में चार अलग-अलग फरमाइशों (खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल) को पिरो दिया था। लेखक भी इसी तरह दोनों विषयों को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करते हैं।
लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य की प्रकृति हमेशा ‘दूर’ (अतीत या भविष्य) में सुख खोजने की होती है, जबकि वास्तविकता वर्तमान के संघर्षों और निरंतर सुधारों में निहित है। निबंध केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि लेखक के व्यक्तित्व और उसके विचारों की सच्ची अभिव्यक्ति है।

Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ Summary
- लेखक के सामने दो बालिकाओं, नमिता और अमिता के लिए दो अलग-अलग विषयों पर ‘आदर्श निबंध’ लिखने की चुनौती है।
- नमिता का विषय है- ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं और अमिता का विषय है- ‘समाज-सुधार’।
- लेखक ए. जी. गार्डिनर के मत का उल्लेख करते हैं कि लिखने के लिए मन में एक विशेष ‘आवेग’ या ‘उमंग’ का होना आवश्यक है।
- लेखक के पास निबंध के लिए आवश्यक ‘सामग्री’ जुटाने हेतु न तो विश्वकोश है और न ही पर्याप्त समय, इसलिए वे अपने ज्ञान पर ही भरोसा करते हैं।
- निबंधशास्त्र के अनुसार निबंध छोटा, सुगठित और प्रभावशाली होना चाहिए, जिसमें सामग्री और शैली का उचित समन्वय हो।
- शैली के संबंध में लेखक मास्टर होने के नाते लंबे और कठिन वाक्यों तथा स्पष्टता के लिए छोटे वाक्यों के बीच के द्वंद्व को बताते हैं।
- लेखक अंतत: अमीर खुसरो की पद्धति अपनाते हैं, जहाँ उन्होंने एक ही पद्य में चार अलग फरमाइशों को पूरा किया था।
- लेखक ‘दूर के ढोल सुहावने’ की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि ढोल की कर्कशता दूर होने पर ही मधुर सुनाई देती है।
- इसी तर्क से वृद्धों को अपना ‘अतीत’ सुखद लगता है और युवाओं को अपना ‘भविष्य’ उज्ज्वल दिखाई देता है।
- ‘समाज-सुधार’ पर लेखक का मानना है कि सुधार की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती, क्योंकि आज का सुधार कल का दोष बन जाता है।
- वर्तमान काल सदैव क्षुब्ध रहता है क्योंकि तरुण क्रांति चाहते हैं और वृद्ध अतीत के गौरव की रक्षा करना चाहते हैं।
- अंत में लेखक कहते हैं कि प्रगतिशील साहित्य भी समय के साथ अतीत बन जाएगा, क्योंकि दूर के ढोल हमेशा सुहावने लगते हैं।
क्या लिखूँ पाठ का लेखक परिचय

जीवन-परिचय – पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 में खैरागढ़, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) में हुआ था। हिंदी साहित्य में उनकी ख्याति कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार, हास्य व्यंग्यकार के रूप में है। निबंध लेखन के लिए वे विशेष रूप से स्मरणीय हैं। सन् 1971 में उनका निधन हो गया।
रचनाएँ – पंच-पात्र, पद्म-वन प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने (निबंध संग्रह), अश्रुदल, शतदल (काव्य), झलमला, त्रिवेणी (कहानी संग्रह), विश्व साहित्य, हिंदी कहानी साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, हिंदी उपन्यास साहित्य (आलोचना ) इत्यादि। उन्होंने सरस्वती और छाया पत्रिकाओं का संपादन भी किया।
साहित्यिक विशेषताएँ – पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने अपने लेखन में अध्यात्म, समाज-सुधार और लोकजीवन को प्रमुखता दी है। उन्होंने अपने निबंधों में भारतीय कृषि एवं सामाजिक संबंधों का तार्किक मूल्यांकन और विश्लेषण किया है। उनकी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य साहित्य के सिद्धांतों का सामंजस्य देखने को मिलता है।
भाषा शैली – बख्शी जी की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है। भाषा में संस्कृत शब्दावली का अधिक प्रयोग है। उर्दू तथा अंग्रेज़ी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। इनकी शैली गंभीर प्रभावोत्पादक, स्वाभाविक और स्पष्ट है।
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क्या लिखूँ पाठ का शब्दार्थ और टिप्पणियाँ
पृष्ठ-31
स्फूर्ति – फुरती, उत्तेजना, कंपन, उछलना, मन में प्रकट होना। आवेग – बिना सोचे-विचारे कुछ कर बैठने की अंत:प्रेरणा, झोंक, अशांति, उतावली, एक संचारी भाव। यथार्थता / यथार्थ – सत्य, प्रकृत, उचित। उत्थित – उठा हुआ उठता हुआ, बल-वैभव में बढ़ा हुआ, उत्पन्न, ऊँचा, फैलाया हुआ। रहस्य – गुप्तभेद, गोपनीय विषय, मर्म। विज्ञों / विज्ञ – जानकार, समझदार, विद्वान। सम्मति – सहमति, स्वीकृति, अनुमति राय, मत, आदर सम्मान।
पृष्ठ-32
अनुसंधान – अन्वेषण, खोज, जाँच-पड़ताल, प्रयत्न, योजना, आयोजन। विश्वकोश – वह ग्रंथ जिसमें संसार के सारे विषयों का विवरण हो, वह भंडार जिसमें विश्व की सारी वस्तुएँ संगृहीत हों।
पृष्ठ-33
दुर्बोधता / दुर्बोध – जो शीघ्र समझ में न आए, गूढ़ गांभीर्य – गंभीरता, गहराई, चित्त की स्थिरता, जटिलता। गुत्थी – उलझन, कठिनाई, तागे आदि में उलझने से पड़ी हुई गाँठ। अज्ञों / अज्ञ – ज्ञानरहित, नासमझ, अचेतन। समावेश – साथ रहना, शामिल होना, मिलना, एकत्र होना, प्रवेश पद्धति – प्रथा, परिपाटी, मार्ग, पथ रास्ता, प्रणाली। उदात्त – ऊँचा, महान, श्रेष्ठ, उदार, प्रसिद्ध, प्रिय, ऊँचे स्वर में उच्चरित। आख्यायिका – सिलसिलेवार कहानी या वृत्तांत, शिक्षा देने वाली कल्पित कथा। अभिव्यक्ति – व्यक्त प्रकट होना, प्रकाशन। अनुसरण – पीछे चलना, अनुकरण, अभ्यास, अनुकूल आचरण। संध्या – शाम का वह समय जब दिन के दो भागों का मेल होता है, साँझ, योग, मेल, ठहराव, सीमा।
पृष्ठ-34
अंकित – लिखित, चिह्नित चित्रित गिना हुआ। कोलाहल – बहुत से लोगों के एक साथ बोलने से होने वाला शोर, हंगामा, हल्ला। विषाद – अवसाद, उदासी, तंद्रा। कलरव – मधुर ध्वनि, कोमल स्वर।