Reading Class 4 Hindi Notes Veena Chapter 4 हमारा आहार कविता Hamara Aahar Kavita Poem Summary in Hindi helps students understand the main plot quickly.
Hamara Aahar Kavita Class 4 Summary in Hindi
Hamara Aahar Class 4 Hindi Summary
हमारा आहार कविता का सारांश – Hamara Aahar Summary in Hindi
इस कविता में हमारे आहार को लेकर प्रत्येक दिन के खान-पान का विवरण दिया गया है। इसमें कहा गया है कि यदि हम चावल, दाल-सब्जी, दूध-दही, अमरूद, पपीता तथा मूली, टमाटर, गाजर के सलाद खाएँ तो तन हमेशा स्वस्थ रहेगा तथा चुस्ती-फुर्ती भी बनी रहेगी । गरमी में पानी खूब पीना चाहिएं व खीरा, ककड़ी और खरबूज – तरबूज का भी सेवन करना चाहिए।
यदि आप भूँजा – सत्तू को नियमित रूप से खाते हैं तो बीमार होने की संभावना भी नहीं होती। जब हम ढंग से खाते हैं तथा भूख से अधिक भोजन नहीं करते हैं तो बीमार होने का संदेह भी दूर हो जाता है।

प्रस्तुत कविता में बताया गया है कि हमें चावल, दाल, सब्जियाँ, दूध-दही और ताजे फल; जैसे- आम, अनार, पपीता, केला आदि खाना चाहिए। गर्मियों में खरबूजा, तरबूज, खीरा और ककड़ी खाने से शरीर को ठंडक मिलती है। पानी खूब पीना चाहिए और सलाद को भी रोजाना भोजन में शामिल करना चाहिए।
कविता में यह भी बताया गया है कि हमें जरूरत से ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए, क्योंकि उससे शरीर को नुकसान हो सकता है। हमें ताजा और घर का बना खाना खाना चाहिए और व्यायाम भी करना चाहिए, ताकि हम बीमार न पड़ें। लौकी, गाजर, टमाटर और
पालक जैसी हरी-भरी सब्जियों को भी नहीं भूलना चाहिए । अगर हम ऐसा आहार अपनाएँगे, तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी ।
हमारा आहार कविता हिंदी भावार्थ Pdf Class 4
Hamara Aahar सप्रसंग व्याख्या
1. कैसा हो अपना आहार,
आओ मिलकर करें विचार ।
चावल, दाल और सब्जी खाओ,
तन में चुस्ती-फुर्ती लाओ।
शब्दार्थ :
आहार – भोजन ।
विचार – सोचने-समझने का ढंग ।
तन – शरीर ।
चुस्ती – मजबूती ।
व्याख्या – कविता में कवि ने यह समझाया है कि हमारे प्रतिदिन का भोजन कैसा होना चाहिए? आइए हम सब मिलकर इस पर विचार करें, यदि हम दाल-चावल और सब्जी का सेवन करते हैं तो हमारे शरीर में सदैव चुस्ती-फुर्ती बनी रहेगी ।
2. केवल आलू तुम मत लाना,
भिंडी, परवल, नेनुआ भी खाना ।
दूध-दही तुम छककर खाओ,
फल-फूलों के बाग लगाओ।
शब्दार्थ :
छककर – जी भरकर ।
बाग- उपवन ।
व्याख्या – कवि ने यह समझाते हुए कहा है कि आप भिंडी, परवल, नेनुआ जरूर खाएँ लेकिन आलू केवल मत लें। बल्कि दूध-दही जी भरकर खाएँ- पीएँ तथा फल और फूलों के बाग भी लगाएँ।
3. आम-अमरूद, पपीता खाओ,
केला, बेल भी घर ले आओ।
खरबूज, तरबूज, ककड़ी, खीरा,
गरमी की हरते हैं पीड़ा ।
शब्दार्थ :
हरते हैं – ठीक करते हैं।
पीड़ा – दुःख ।
व्याख्या – कवि कहता है कि जब आप गरमी में आम, अमरूद और पपीता खाते हैं तो बेल व केला भी खरीदकर घर ले जाना चाहिए । खरबूज, खीरा, तरबूज और ककड़ी गरमी में खाना फायदेमंद भी होता है। और गरमी से संबंधित दर्द भी दूर करते हैं।

4. खूब करो पानी का व्यवहार,
इसकी महिमा अपरंपार ।
भोजन में हो खूब सलाद,
इसका है अपना अंदाज ।
शब्दार्थ :
व्यवहार – उपयोग करना।
महिमा – महत्व ।
अपरंपार – असीम।
अंदाज – ढंग, तरीका |
व्याख्या -कवि कहता है गरमी के मौसम में पानी खूब पीना चाहिए क्योंकि इसका महत्व अधिक होता है और भोजन में सलाद भी खूब होना चाहिए, इसका अपना अंदाज होता है।
5. मूली, टमाटर, गाजर खाना,
पालक को भी भूल न जाना।
भूँजा-सत्तू नियमित खाएँ,
वैद्य-हकीम घर न आएँ ।
शब्दार्थ :
नियमित – रोजाना ।
वैद्य – वैद्यराज जड़ी-बूटियों से मरीज को ठीक करने वाला ।
हकीम – यूनानी चिकित्सक।
व्याख्या – कवि कहता है कि गरमी के दिनों में मूली, गाजर और टमाटर सलाद के रूप में खाना चाहिए और पालक भी कभी-कभी खाना चाहिए। जो लोग भूँजा हुआ सत्तू खाते हैं, वे कभी वैद्यराज या हकीम के पास नहीं जाते हैं।
6. पेट से ज्यादा जब कोई खाए,
खाकर वह पीछे पछताए ।
ताजा खाना हरदम खाओ,
नहीं बहाना कभी बनाओ।
शब्दार्थ :
ज्यादा – अधिक मात्रा में ।
पछताए – दुखी होए।
ताजा खाना – गरम भोजन ।
हरदम – सदैव ।
बहाना – झूठी बातें बनाना ।
व्याख्या – कवि कहता है कि गरमी के दिनों में यदि जरूरत से ज्यादा भोजन करते हो तो बाद में पछताते हो, क्योंकि वह अपच हो जाता है। इसलिए ताजा बना हुआ भोजन करने में कभी बहाना नहीं बनाना चाहिए।
7. जब खाते हैं ढंग से खाना,
व्याधि को ना मिले बहाना ।
ऐसा हो अपना आहार,
खांकर हम ना पड़ें बीमार ।
शब्दार्थ :
ढंग से खाना – खूब चबा-चबाकर खाना ।
व्याधि – रोग ।
बहाना – अवसर मिलना ।
आहार- भोजन।
बीमार – अस्वस्थ होना ।
व्याख्या – कवि कहता है कि जब हम भोजन खूब चबा-चबाकर खाते हैं तो बीमार होने का अवसर नहीं मिल पाता। यदि हम इस तरह से भोजन करते हैं तो खाकर कभी बीमार नहीं पड़ेंगे।
काव्यांश 1
कैसा हो अपना आहार,
आओ मिलकर करें विचार ।
चावल, दाल और सब्जी खाओ,
तन में चुस्ती-फुर्ती लाओ।
केवल आलू तुम मत लाना,
भिंड़ी, परवल, नेनुआ भी खाना ।
दूध-दही तुम छककर खाओ,
फल-फूलों के बाग लगाओ।
शब्दार्थ :
आहार – भोजन, खाने की चीज़ें;
चुस्ती-फुर्ती – फुर्तीलापन;
छककर – भरपेट, जी भरकर ।
संदर्भ / प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘वीणा’ में संकलित कविता ‘हमारा आहार’ से लिया गया है। इस काव्यांश के माध्यम से हमें स्वास्थ्यवर्द्धक और संतुलित आहार लेने की प्रेरणा दी गई है।
व्याख्या – कवि हमें यह सोचने के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि हमें कैसा भोजन करना चाहिए। कवि कहते हैं कि सभी मिलकर इस विषय पर विचार करें, ताकि हम अच्छा और स्वास्थ्यवर्धक आहार अपना सकें। चावल, दाल और सब्जियाँ खाने से शरीर में ताकत और स्फूर्ति आती है। यह संतुलित भोजन का भाग है, जिससे शरीर स्वस्थ और फुर्तीला बना रहता है ।
कवि चेतावनी दे रहे हैं कि केवल आलू ही मत लाओ, भिंडी, परवल व तोराई भी खाओ । हमें केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि शरीर की जरूरतों के अनुसार खाना चाहिए। कवि सुझाव देते हैं कि हमें भरपूर मात्रा में दूध और दही खाना चाहिए, क्योंकि ये पोषण से भरपूर होते हैं। साथ ही, फल और फूलों के बाग लगाकर हमें प्रकृति के करीब रहना चाहिए और ताजे फलों का सेवन करना चाहिए ।

काव्यांश 2
आम-अमरूद, पपीता खाओ,
केला, बेल भी घर ले आओ।
खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, खीरा,
गर्मी की हरते हैं पीड़ा।
खूब करो पानी का व्यवहार,
इसकी महिमा अपरंपार ।
भोजन में हो खूब सलाद,
इसका है अपना अंदाज ।
शब्दार्थ :
पीड़ा – कष्ट, तकलीफ़,
व्यवहार – प्रयोग, इस्तेमाल,
महिमा – महत्त्व, विशेषता,
अपरंपार – जिसकी कोई सीमा न हो।
प्रसंग – इस काव्यांश में सरल भाषा में यह समझाया गया है कि हमें किस प्रकार का भोजन करना चाहिए, जिससे हमारा शरीर स्वस्थ, चुस्त और फुर्तिला बना रहे।
व्याख्या – कवि हमें विभिन्न प्रकार के फलों का सेवन करने की सलाह दे रहे हैं; जैसे- आम, अमरूद, पपीता, केला और बेल । ये फल स्वादिष्ट होने के साथ-साथ शरीर के लिए बहुत लाभकारी भी होते हैं। गर्मी के मौसम में खरबूजा, तरबूज, ककड़ी और खीरा जैसे फल और सब्जियाँ बहुत फायदेमंद होती हैं। ये शरीर को ठंडक पहुँचाते हैं और गर्मी से राहत देते हैं।
कवि कहते हैं कि हमें भरपूर पानी पीना चाहिए, क्योंकि पानी हमारे शरीर के लिए अनमोल है और उसकी उपयोगिता बहुत अधिक है। भोजन की थाली में सलाद अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि यह न केवल पोषण देती है, बल्कि खाने में एक ताजगी और अलग स्वाद भी जोड़ती है।

काव्यांश 3
पेट से ज्यादा जब कोई खाए,
खाकर वह पीछे पछताए।
ताजा खाना हरदम खाओ,
नहीं बहाना कभी बनाओ।
जब खाते हैं ढंग से खाना,
व्याधि को ना मिले बहाना।
ऐसा हो अपना आहार,
खाकर हम ना पड़ें बीमार ।
शब्दार्थ :
पछताए – अफसोस करना, गलती का एहसास होना,
बहाना – कोई कारण बताकर टालना;
ढंग – सही तरीका।
प्रसंग – यह काव्यांश बच्चों को ताजे फल, सब्जियाँ, दाल, दूध-दही, सत्तू आदि खाने और तली-भुनी चीजों व आवश्यकता से अधिक खाने से बचने की सीख देता है।
व्याख्या – कवि हमें सावधान कर रहे हैं कि भूख से ज्यादा नहीं खाना चाहिए। जब हम जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं, तो हमारा शरीर बीमार हो सकता है और हमें बाद में पछताना पड़ता है। हमेशा ताजा और साफ खाना ही खाना चाहिए। खाने के समय कोई बहाना नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि सही समय पर और ताजा खाना ही स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
यदि हम सही तरीके से, नियमित और संतुलित भोजन करते हैं, तो शरीर मजबूत रहता है और बीमारियाँ पास नहीं आतीं। यह एक अच्छी जीवनशैली की निशानी है । कवि का संदेश स्पष्ट है कि हमारा भोजन ऐसा होना चाहिए, जो हमें ऊर्जा दे, हमारी रक्षा करे और बीमारियों से दूर रखे।
काव्यांश 4
मूली, टमाटर, गाजर खाना,
पालक को भी भूल न जाना।
भूँजा – सत्तू नियमित खाएँ,
वैद्य-हकीम घर न आएँ।
शब्दार्थ :
भुँजा – आग या गर्मी से भूनकर पकाया गया;
सत्तू – भुने हुए चनों या अनाज का बना आहार;
नियमित – रोजाना, नियम से;
वैद्य-हकीम – पुराने समय के डॉक्टर, जो घरेलू इलाज करते हैं।
प्रसंग – इस काव्यांश के माध्यम से बच्चों को बताया गया है कि मूली, टमाटर, गाजर और पालक जैसी हरी सब्जियाँ अवश्य खानी चाहिए।
व्याख्या – यहाँ बताया गया है कि सब्जियाँ; जैसे – मूली, टमाटर, गाजर, पालक भी रोज के भोजन में जरूर शामिल करने चाहिए, क्योंकि ये शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं।
यदि हम भुना हुआ अनाज और सत्तू जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ नियमित रूप से खाएँगे, तो हमें कभी वैद्य या डॉक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। और हम स्वस्थ रहेंगे। यह काव्यांश बच्चों को सरल भाषा में पोषण और स्वास्थ्य का महत्त्वपूर्ण संदेश देता है।