Reading Class 9 Hindi Notes and Class 9 Hindi Ganga Chapter 1 Summary दो बैलों की कथा पाठ का सारांश helps students understand the main plot quickly.
दो बैलों की कथा पाठ का सारांश
दो बैलों की कथा Class 9 Hindi Summary
Class 9 Hindi Chapter 1 Summary – दो बैलों की कथा Summary Class 9
दो बैलों की कथा’ की गणना प्रेमचंद की श्रेष्ठ कहानियों में की जाती है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने कृषक समाज और पशुओं के भावनात्मक संबंध का वर्णन किया है। उसके ‘हीरा’ और ‘मोती’ नामक दो बैल सीधे-सादे भारतीयों के प्रतीक हैं। वे आज़ादी के लिए बार-बार संघर्ष करते हैं और अंत में उसे पा ही लेते हैं। इस तरह परोक्ष रूप से यह कहानी आज़ादी के आंदोलन की भावना से भी जुड़ी है।
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जानवरों में गधे को सबसे बुद्धिहीन प्राणी माना जाता है। इसका कारण है उसका सीधापन और सहनशीलता, उसके यही गुण उसे ऋषि-मुनियों की श्रेणी में ला देते हैं। उसके लिए लाभ-हानि, सुख-दुख सब कुछ बराबर है। सीधेपन और सहनशीलता के कारण भारतीयों को अफ़्रीका और अमेरिका में असभ्य और बुद्धिहीन समझा जाता है। गधे से कुछ कम सीधा उसका भाई भी है, जिसे बैल के नाम से जाना जाता है। परंतु यह कभी – कभी अड़कर अपना असंतोष भी प्रकट कर देता है, इस कारण इसका स्थान गधे से कुछ ऊपर है।

झूरी के दो बैल थे, जिनका नाम था-‘हीरा’ और ‘मोती’ पछाई जाति के ये दोनों बैल ऊँचे डील-डौल वाले देखने में सुंदर तथा काम में चौकस थे। दोनों में इतनी घनिष्ठता थी कि एक-दूसरे के मन की बातों का अनुमान लगा लेते थे। वे साथ-साथ रहते, खाते और विनोद के भाव में कभी-कभी सींग भी मिला लिया करते थे। वे एक-दूसरे के काम का जोर अपने कंधे पर लेने की कोशिश करते। दिनभर काम के बाद शाम को एक-दूसरे को सूँघकर दोनों एक साथ ही नाँद में मुँह डालते और साथ ही मुँह उठाते थे।
संयोग से एक बार झूरी ने दोनों बैलों को अपनी ससुराल भेज दिया। बैलों ने समझा कि उन्हें बेच दिया गया है। यह उन्हें अच्छा न लगा । उन्हें ले जाने में झूरी के साले गया को बहुत परेशानी हुईं। गया उन्हें आगे को खींचता तो वे पीछे को बल लगाते । गया के घर की नई जगह, नए लोग उन्हें अच्छे नहीं लग रहे थे। रात को जब सब सो गए तो दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और ज़ोर लगाकर मजबूत पगहे तोड़कर प्रात: काल तक वापस झूरी के पास आ गए। झूरी ने चरनी पर बैलों को देखा। दोनों के गले में गराँव, कीचड़ में सने पैर तथा आँखों में विद्रोहमय स्नेह देखकर झूरी उनके गले लग गया। गाँव के लड़कों ने उनका स्वागत किया और अपने-अपने घरों से रोटियाँ, गुड़, चोकर, भूसी आदि लाकर दिया। बैलों के यूँ भागकर चले आने से झूरी की पत्नी नाराज़ हुईं उसने बैलों को खली, चूनी चोकर खिलाने से मना कर दिया। झूरी ने सूखे भूसे में नौकर से खली डालने के लिए कहा, पर झूरी की पत्नी के डर से नौकर ऐसा न कर सका।
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दूसरे दिन झूरी का साला गया बैलों को ले जाने फिर आया। इस बार उसने दोनों को गाड़ी में जोता और किसी तरह अपने घर ले गया । उसने उन्हें मोटी-मोटी रस्सियों में बाँधा। उन्हें खाने को सूखा भूसा डाल दिया। बैलों ने अपना ऐसा अपमान कभी न देखा था क्योंकि गया ने अपने बैलों को खली-चुनी सब कुछ दिया था। गया ने अगले दिन उन्हें हल में जोता पर बैलों ने कदम न बढ़ाए। वह हीरा की नाक पर डंडे बरसाने लगा। यह देख मोती गुस्से में आग-बबूला हो गया और हल लेकर भागा, जिससे हल, रस्सी, जोत, जुआ सब टूट गए। दोनों के गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं तो पकड़ में ही न आते। गया गाँव के दो आदमियों के साथ दौड़ा आया। उनके हाथ में लाठियाँ थीं। मोती ने उनका मुकाबला करना चाहा पर हीरा ने उसे शांत कराया। दोनों आदमियों ने हीरा-मोती को पकड़ा और घर ले आए।
रात के समय फिर उन्हें सूखा भूसा डालकर घर के लोग भोजन करने लगे। उसी समय एक छोटी लड़की दो रोटियाँ लेकर आई और दोनों के मुँह में एक-एक रोटी देकर चली गई। यह प्रतिदिन का नियम बन गया। दोनों दिन भर जोते जाते, डंडे खाते। शाम को थान पर बाँध दिए जाते और रात को वही लड़की दो रोटियाँ खिला जाती। वे जान चुके थे कि यह भैरो की लड़की है, जिसकी माँ मर चुकी है और सौतेली माँ उसे सताती है। यह जानकर मोती ने हीरा से उस सौतेली माँ को सींग से फेंक देने की बात कही पर लड़की का स्नेह उसे रोक देता था। एक दिन लड़की ने दोनों की रस्सियाँ खोल दीं। वे उसके स्नेह के कारण भाग नहीं रहे थे, तभी लड़की ने शोर मचाया कि दोनों बैल भागे जा रहे हैं। हीरा मोती आगे-आगे तथा गया पीछे-पीछे। वह गाँववालों को लेने के लिए वापस आया, तब तक दोनों को भगाने का मौका मिल गया। वे आगे-आगे भागते रहे, पर वे रास्ता भटक गए। रास्ते में उन्हें नए-नए गाँव तथा खेत मिलने लगे। भूख से व्याकुल दोनों ने एक खेत में जी भर मटर खाए। फिर दोनों ने डकार लेकर सींग मिलाए।

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अचानक उनको सामने से एक बड़ा-सा साँड़ आता दिखा। ‘उससे भिड़ने पर मरना तय है’, यह सोचकर दोनों उससे बचना चाहते थे, पर कोई रास्ता भी न था। दोनों ने भागने को कायरता समझकर उस पर एक साथ चोट करने का निश्चय किया। उन्होंने तय किया कि एक पर झपटने पर दूसरा उसके पेट में सींग घुसेड़ दे। साँड़ को दो-दो शत्रुओं से एक साथ लड़ने का अनुभव न था। जब उसने मोती पर हमला किया तो हीरा उससे लड़ा। साँड़ ने जब हीरा का अंत करने के लिए वार किया तो मोती ने उसके पेट में सींग घुसेड़ दी और जब मोती पर झपटा तो हीरा ने भी ऐसा ही किया। साँड़ बेदम होकर वहीं गिर पड़ा तब उन दोनों ने उसे छोड़ दिया।
आगे बढ़ने कर दोनों मटर के खेत में घुस गए। अभी दो-चार ग्रास ही खाए थे कि खेत के रखवालों ने उन्हें देख लिया। मेड़ पर खड़ा हीरा निकल गया पर मोती सींचे खेत में था। वह भाग न सका । हीरा भी लौट आया। दोनों पकड़े गए और काँजीहौस में बंद कर दिए गए।
दोनों के जीवन में ऐसा पहली बार हुआ कि सारे दिन खाने को कुछ न मिला। इससे तो गया ही अच्छा था, उन्होंने सोचा। यहाँ कई भैंसें, बकरियाँ, घोड़े थे, पर चारा तो किसी के सामने न था। सारा दिन दोनों ने चारे का इंतज़ार किया, पर कोई चारा लेकर न आया। उन्होंने दीवार की मिट्टी चाटनी शुरू की, पर उससे क्या होता। दोनों वहाँ से निकल भागने की योजना बनाने लगे। बाड़े की कच्ची दीवार में हीरा ने सींग मारकर कुछ मिट्टी गिरा दी। उसी समय बाड़े का चौकीदार हाजिरी लेने आया। उसने हीरा को ऐसा करते देख उसे कई डंडे मारे और मोटी रस्सी से बाँध दिया। इतना होने पर भी दोनों ने दीवार गिराना जारी रखा। दो घंटे के बाद आधी दीवार गिर गई यह देख पहले तीनों घोड़ियाँ, फिर बकरियाँ, बाद में भैंसें काँजीहौस से भाग गईं, पर गधे अब भी वहीं खड़े थे। वे डर के मारे भागना नहीं चाहते थे। आधी रात तक गधे वहीं खड़े रहे और मोती हीरा की रस्सियाँ तोड़ने में लगा रहा। सफल न होता देख मोती ने सींग मारकर गधों को भी वहाँ से भगा दिया और हीरा के पास सो गया। अगले दिन मोती को खूब मार पड़ी और उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गया।

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एक सप्ताह तक दोनों बिना चारे के वहीं पड़े रहे। वे बहुत कमज़ोर हो चुके थे। एक दिन बाड़े के सामने डुग्गी बजने लगी और पचास-साठ आदमी वहाँ एकत्र हो गए। दोनों को निकाला गया, पर ऐसे मरियल बैलों का कोई खरीदार न था। अचानक एक दढ़ियल, जिसकी आँखें लाल तथा मुद्रा कठोर थी, आया और उनके कूल्हों में उँगली गोदकर देखने लगा। यह देखकर दोनों अंतर्ज्ञान से काँप उठे। नीलामी के बाद उसने दोनों बैलों को खरीद लिया। डर के मारे हीरा मोती उसके साथ गिरते पड़ते भागने लगे, क्योंकि ज़रा-सी चाल कम होते ही वह डंडा मार देता था। राह में गाय- य-बैलों को हरे-हरे खेतों में चरता देखकर उन्हें अपने भाग्य पर रोना आ रहा था।
सहसा हीरा मोती को वह रास्ता परिचित सा लगा। गया उसी रास्ते से उन्हें ले गया था। वही खेत बाग और गाँव उन्हें मिलने लगे। उनकी थकान और दुर्बलता गायब हो उठी। उन्हें अपना खेत और कुआँ पहचान में आ गया। अपना घर निकट देखकर दोनों तेजी से भागे और अपने थान पर जाकर ही रुके, उन्हें यूँ आया देख झूरी ने बारी-बारी से उन्हें गले लगाया। अब तक दढ़ियल ने आकर उनकी रस्सियाँ पकड़ लीं। यह देख झूरी ने कहा, “ये तो मेरे बैल हैं।” इस पर दढ़ियल ने कहा, “तुम्हारे बैल कैसे? मैं इन्हें मवेशीखाने से नीलाम लिए आता हूँ।” यह कहकर वह जबरदस्ती उन्हें ले जाने की कोशिश करने लगा। उसी समय मोती ने सींग चलाया। दढ़ियल डर के मारे भागने लगा। यह देख मोती दढ़ियल के पीछे भागने लगा और उसे गाँव के बाहर खदेड़ दिया। अंत में हारकर दढ़ियल चला गया।
थोड़ी ही देर में झूरी ने नाँदों में खली, चूनी, चोकर और दाना भर दिया, जिसे खाने में दोनों व्यस्त हो गए। गाँव में उत्साह छा गया। मालकिन ने भी दोनों के माथे चूम लिए।

Class 9 Hindi Chapter 1 दो बैलों की कथा Summary
- झूरी के पास हीरा और मोती नाम के पछाईं जाति के सुंदर एवं ऊँचे कद वाले दो बैल थे। दोनों काफ़ी समय से साथ रहते-रहते मित्र बन गए थे।
- एक दिन झूरी ने दोनों बैलों को अपनी ससुराल भेज दिया। वहाँ उनका मन न लगा।
- रात में जब सब लोग सो गए तो दोनों ने ज़ोर लगाकर पगहे तोड़ डाले। सवेरा होते-होते वे दोनों अपने पुराने घर पहुँच गए। बैलों के यूँ लौट आने से झूरी की पत्नी बहुत क्रोधित हुईं।
- गया दोबारा हीरा मोती को गाड़ी में जोतकर ले गया। घर पहुँचने पर उसने दोनों बैलों को मोटी रस्सियों से बाँध दिया। दूसरे दिन हल नहीं जोतने पर उसने दोनों बैलों की पिटाई की।
- एक छोटी लड़की के प्रेम के सहारे दोनों बैल अन्याय सहकर भी वहाँ रह रहे थे। एक रात को हीरा मोती भाग गए। गया उनके पीछे भागा मगर उन्हें पकड़ न सका।
- हीरा और मोती कुछ आगे बढ़े ही थे कि सामने से एक साँड़ आता हुआ उन्हें नज़र आया। दोनों ने एक-साथ मुकाबला करके उसे हरा दिया।
- एक खेत में मटर खाने पर रखवालों ने दोनों को पकड़कर काँजीहौस में बंद करवा दिया। वहाँ कई भैंसें, बकरियाँ, घोड़े, गधे आदि थे, पर सब कमजोर हो गए थे।
- रात को हीरा ने मोती के साथ मिलकर भागने के लिए दीवार तोड़ने की योजना बनाई हीरा दीवार गिराने के लिए बार-बार चोटें करने लगा। चौकीदार ने हीरा का उजड्डपन देख उसे कई डंडे मारे और मोटी रस्सी से बाँध दिया।
- अब की बार मोती ने दीवार तोड़ने के लिए उसी जगह पर चोट करना शुरू कर दिया। करीब दो घंटे की ज़ोर-आजमाइश के बाद दीवार एक हाथ गिर गई। दीवार गिरते ही घोड़ियाँ, बकरियाँ, भैंसें भाग निकलीं।
- सवेरे काँजीहौस के कर्मचारियों ने मोती की खूब पिटाई करने के बाद उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया। हीरा मोती सप्ताह भर काँजीहौस में बँधे रहे। चारा न मिलने से दोनों बेहद दुर्बल हो गए थे।
- एक दढ़ियल व्यक्ति ने नीलामी में हीरा-मोती को खरीद लिया। दोनों मित्र उस दढ़ियल के साथ चल दिए। रास्ते में बाग और गाँव परिचित-सा लगने पर उनकी चाल तेज हो गई घर निकट आने पर दोनों उन्मत्त बछड़ों की भाँति कुलेलें करते हुए घर पर आ पहुँचे।
- अपने बैलों को देख झूरी ने उन्हें गले लगा लिया। दढ़ियल ने आगे बढ़कर जैसे ही उनकी रस्सियाँ पकड़ीं, झूरी ने कहा, “ये मेरे बैल हैं।” दढ़ियल ने कहा, “मैं इन्हें मवेशीखाने से नीलामी के बाद लिए आ रहा हूँ।” इस पर मोती ने उसे गाँव के बाहर खदेड़ दिया।
दो बैलों की कथा पाठ का लेखक परिचय

जीवन-परिचय – हिंदी साहित्य में ‘उपन्यास सम्राट’ के नाम से मशहूर प्रेमचंद का जन्म वाराणसी के निकट लमही नामक स्थान पर 1880 में हुआ था। उनके पिता का नाम अजायब राय तथा माता का नाम आनंदी देवी था। प्रेमचंद के बचपन का नाम धनपत राय था। बचपन में ही पिता की मृत्यु होने के कारण घर की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गईं वे दसवीं पास करते ही प्राइमरी स्कूल में शिक्षक बन गए। नौकरी करते हुए उन्होंने बी०ए० पास किया। तत्पश्चात उनकी नियुक्ति स्कूल इंस्पेक्टर के रूप में हुई, पर गांधी जी के आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी त्याग दी और 1920 के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद वे लेखन कार्य के प्रति समर्पित हो गए। इस महान साहित्यकार का निधन 1936 ई० में हो गया।
रचनाएँ – प्रेमचंद हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार माने जाते हैं। उन्होंने लगभग 300 से अधिक कहानियाँ तथा 11 उपन्यास लिखे। उनकी कहानियों का संग्रह ‘मानसरोवर’ के नाम से आठ भागों में संकलित है। उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
उपन्यास : गोदान, सेवासदन, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, वरदान, कायाकल्प, निर्मला, रंगभूमि, गबन तथा कर्मभूमि।
कहानियाँ : कफ़न, नवनिधि, प्रेरणा, प्रेम-प्रसून, प्रेम-पच्चीसी, मन-मोहक, समर यात्रा, सप्त सरोज, अग्नि-समाधि, प्रेम-गंगा और सप्त-सुमन आदि।
नाटक : कर्बला, प्रेम की बेदी, संग्राम और रूठी रानी।
संपादन कार्य : हंस, जागरण, माधुरी आदि पत्रिकाओं का संपादन।
निबंध : कुछ विचार।
साहित्यिक विशेषताएँ – प्रेमचंद ने ‘राष्ट्रीय जागरण’ और ‘समाज सुधार’ को अपने लेखन का प्रमुख विषय बनाया। उनके लेखन में देश-प्रेम एवं देशभक्ति का स्वर होने के कारण अंग्रेज़ों ने उनकी कृति ‘सोजे वतन’ को जब्त कर लिया। उन्होंने दीन-हीन किसानों, ग्रामीणों तथा शोषितों की दुर्दशा का चित्रण अपने लेखन में किया। उन्होंने किसानों की समस्याओं-ऋण-ग्रस्तता, अशिक्षा के अलावा समाज में व्याप्त बुराइयों- दहेज, नशाखोरी, शोषण, बेमेल तथा बहुविवाह, ऊँच-नीच, छुआछूत आदि पर भी प्रभावशाली साहित्य सृजन किया।
भाषा-शैली – प्रेमचंद का साहित्य जनसाधारण का साहित्य है। उनके साहित्य की भाषा सरल, मुहावरेदार तथा व्यावहारिक शब्दों से युक्त है। उन्होंने लोकभाषा में साहित्य सृजन किया। उनके पात्रों की भाषा वातावरण तथा मनोदशा के अनुकूल है। वे बड़ी से बड़ी बात को भी सरल शब्दों और संक्षेप में कहने में सिद्धहस्त हैं। उन्होंने अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों का अपने लेखन में प्रयोग किया है। इससे भाषा सजीव, प्रवाहमयी तथा व्यावहारिक बन गई है।
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दो बैलों की कथा पाठ का शब्दार्थ और टिप्पणियाँ
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निरापद – आपत्ति से रहित, निर्विघ्न, सुरक्षित। सहिष्णुता – सहनशीलता, क्षमा। विषाद – उदासी, अवसाद, जड़ता, मन उचट जाना। पराकाष्ठा – अंतिम सीमा चरम कोटि या सीमा। कदाचित – कभी, शायद।
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पछाईं – पश्चिमी प्रदेश का, पश्चिम दिशा। चौकस – चौकन्ना, सावधान, ठीक। डील – शरीर की ऊँचाई-चौड़ाई आदि, कद, देह, शरीर। विग्रह – अलगाना, फैलाना फूट पैदा करना, खंड, भाग, विस्तार। विनोद – परिहास, मनोरंजन, हटाना, क्रीड़ा, कौतूहल। आत्मीयता – अपनापन, मैत्री। नाँद – मिट्टी का एक बड़ा और चौड़ा बर्तन, जिसमें पशुओं को चारा-पानी आदि दिया जाता है, हौदी। गोईं – खेल का साथी सखी। पगहिया – ढोर (पशु) बाँधने की रस्सी।
पृष्ठ-6
कनखियों / कनखी – आँख की कोर, तिरछी निगाह से देखना, आँख का इशारा। चरनी – मेंड़दार लंबा चबूतरा जिस पर गाय-बैल को चारा पानी दिया जाता है, गाय-बैल को चारा-पानी देने के लिए गाड़ी हुई नाँद। प्रतिवाद – विरोध, खंडन, वादी की बात के विरोध में कही जाने वाली बात।
पृष्ठ-7
ताकीद – किसी कार्य के लिए बार-बार चेताने की क्रिया। टिटकार / टिटकारना – ‘टिक-टिक’ शब्द करके घोड़े, बैल आदि को चलने के लिए प्रेरित करना।
पृष्ठ-8
तेवर – क्रोधभरी दृष्टि, कोप प्रकट करने वाली तिरछी नजर, भौंह। थान – पशुओं के बाँधे जाने की जगह, बँधी हुई लंबाई का कपड़े का बड़ा टुकड़ा।
पृष्ठ-9
बरकत – वृद्धि, बढ़ती, सौभाग्य, लाभ, प्रभाव
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बेतहाशा – बहुत तेज़ी से बदहवास होकर (भागना), बिना सोचे-विचारे। व्याकुल – घबराया हुआ हतबुद्धि, व्यग्र, अभिभूत, भीत। रगेवता/रगेदना – भगाना, खदेड़ना, दौड़ाना। तजुरबा / तजरबा – अनुभव। मल्लयुद्ध – कुश्ती, बाहुयुद्ध।
पृष्ठ-11
ग्रास – कौर, निवाला, आहार, निगलना, ग्रहण। मेड़ – खेत की सीमा, सिंचाई आदि के लिए उसके चारों ओर बनाया हुआ मिट्टी का घेरा। खुर – नख। काँजीहौस (काइन हाउस) – वह बाड़ा जिसमें दूसरे का खेत आदि खाने वाले या अनाथ चौपाए (पशु) बंद किए जाते और कुछ दंड लेकर छोड़े या नीलाम किए जाते हैं। साबिका / साविका – वास्ता, सरोकार, काम (पड़ना, होना)। तृप्ति – भोजन आदि की प्राप्ति से उत्पन्न संतोष या तृप्त होने का भाव । दहक – आग का दहकना, लपट, ज्वाला।
पृष्ठ-12
उजड्डपन – अशिष्टता, उद्दंडता, उच्छृंखलता। बूते / बूता – सामर्थ्य, बल, शक्ति, बस। आजमाई / आजमाना – परीक्षार्थ प्रयोग करना, परीक्षा, जाँच करना।
पृष्ठ-13
चेत – होश, संज्ञा, याद, ज्ञान, चित्त, मन, इच्छा, सावधानी। डुग्गी – चमड़े से मढ़ा चौड़े मुँह का छोटा बाजा।
पृष्ठ-14
नीलाम – बिक्री की एक रीति जिसमें सबसे अधिक दाम बोलने वाले के हाथ माल बेचा जाता है, बोली बोलकर बेचना।
पृष्ठ-15
उन्मत्त – मतवाला, सनकी। अख्तियार – पसंद करना या इसका अधि कार, वश, विचाराधिकार, ग्रहण।