By going through these Sanskrit Class 8 Notes and NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 7 Hindi Translation Summary Explanation Notes मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा students can clarify the meanings of complex texts.
Sanskrit Class 8 Chapter 7 Hindi Translation मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा Summary
मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा Meaning in Hindi
Class 8 Sanskrit Chapter 7 Summary Notes मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा
इस पाठ में संस्कृत भाषा की महिमा और सौंदर्य का वर्णन किया गया है। इसमें संस्कृत भाषा को एक सुन्दर, मधुर और मानव जीवन को दिशा देने वाली भाषा के रूप में प्रस्तुत किया गया है । गीत गायन प्रतियोगिता के माध्यम से यह भी बताया गया है कि संस्कृत भाषा ऋषियों की साधना का परिणाम है। यह भाषा भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
Class 8 Sanskrit Chapter 7 Hindi Translation मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा
प्रथमा बालिका – भगिनि! अद्य श्रावणी पूर्णिमा अस्ति। वदतु एतस्याः किं वैशिष्ट्यम् ?
द्वितीया बालिका – अहं जानामि अद्य संस्कृतदिवसः अस्ति। वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।
प्रथमा बालिका – सत्यम्। किं भवत्याः विद्यालये संस्कृतदिवसम् अधिकृत्य केषाञ्चन विशिष्टकार्यक्रमाणां योजना कृता ?
द्वितीया बालिका – आम् ओमिते! मम विद्यालये अनेकेषां कार्यक्रमाणां योजना रचिता ।
प्रथमा बालिका – अहो एवम् ! किं तत्र भवती भागं ग्रहीष्यति ?
द्वितीया बालिका – आम् ओमिते! अहं तु गीतगायनप्रतियोगितायां भागं ग्रहीष्यामि ।
प्रथमा बालिका – भगिनि ! अहमपि आगन्तुम् इच्छामि।
द्वितीया बालिका – अवश्यम्। अहं भवत्याः कृते अधुना एव निमन्त्रणपत्रं यच्छामि।
प्रथमा बालिका – भगिनि ! तत्र भवती किं गीतं गास्यति ? कृपया मामपि श्रावयतु ।
द्वितीया बालिका – अस्तु अहं गायामि, भवती अनुगायत
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- भगिनि – बहन (Sister),
- श्रावणी पूर्णिमा – सावन की पूर्णिमा (Full moon of Shravan),
- वैशिष्ट्यम्-विशिष्ट (Importance),
- गीतगायनप्रतियोगिता – गाने की प्रतियोगिता (Singing competition),
- निमन्त्रणपत्रम्-निमंत्रण पत्र (Invitation letter)।
सरलार्थ-
पहली बालिका – बहन! आज श्रावणी पूर्णिमा है। क्या तुम बता सकती हो कि इसका क्या महत्व है?
दूसरी बालिका – हाँ, आज संस्कृत दिवस भी है। हमारे विद्यालय में इसे एक सप्ताह तक मनाया जाएगा।
पहली बालिका – सही कहा । क्या तुम्हारे विद्यालय में कोई विशेष कार्यक्रम रखे गए हैं?
दूसरी बालिका – हाँ, बहुत सारे कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है।
पहली बालिका – क्या तुम भी किसी कार्यक्रम में भाग लोगी?
दूसरी बालिका – हाँ, मैं गीत गायन प्रतियोगिता में भाग लूँगी।
पहली बालिका – बहन! मैं भी आना चाहती हूँ ।
दूसरी बालिका – ठीक है, मैं तुम्हें अभी निमंत्रण पत्र भी देती हूँ। तुम जरूर आना।
पहली बालिका – बहन वहाँ तुम कौन सा गीत गाओगी? कृपया मुझे भी सुनाओ।
दूसरी बालिका – ठीक है, मैं गाती हूँ, तुम मेरे साथ गाओ।

1. मुनिवरविकसितकविवरविलसित-
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा ।
अयि मातस्तव पोषणक्षमता
मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥ १ ॥
पदच्छेदः – मुनिवर – विकसित – कविवर – विलसित – मञ्जुल – मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा । अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः – (त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि) । अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति।
भावार्थ: – संस्कृतभाषा अतीव सुन्दरभाषा देवभाषारूपेण च परिचिता अस्ति । मुनयः अस्याः संस्कृतभाषायाः विकासं कृतवन्तः । एषा भाषा भूयिष्ठानां भारतीयभाषाणां तथा विश्वस्य बहूनां भाषाणां च जननी – भाषा ( स्रोतो – भाषा) गुरुभाषा (पूरक – भाषा) वा अस्ति। बहवः कवयः काव्यरचनया अस्याः सौन्दर्य वर्धितवन्तः । कोमलपदावल्या परिपूर्णा एषा ज्ञानपेटिका अस्ति। संस्कृतभाषा स्वपदावलिभिः अन्याः भाषाः ज्ञानं विज्ञानं च परिपोषयति । संस्कृतभाषायाः गौरवं वर्णनातीतम् अस्त्।ि
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- विकसित – विकसित की गई (Progressively developed),
- विलसिता – आनन्द देने वाली (That which gives joy),
- पोषणक्षमता – पोषण करने की क्षमता (Capacity to nourish),
- वचनातीता – वाणी से परे (Beyond words),
- भूयिष्ठानां – अधिकांश (Mostly),
- ज्ञानपेटिका – ज्ञान का भंडार (Repository of knowledge)।
अर्थ-
हे संस्कृतभाषा! तुम ऋषि-मुनियों द्वारा विकसित, श्रेष्ठ कवियों द्वारा समृद्ध सुशोभित और अत्यंत सुंदर ज्ञानरूपी संदूवक के समान हो। हे माता! तुम्हारी जो पोषण करने की ( पालन-पोषण की ) क्षमता है, वह मेरी वाणी की सीमा से परे है- अर्थात् उसका वर्णन करना मेरे वश में नहीं ।
सरलार्थ-
संस्कृत भाषा अत्यंत सुंदर और दिव्य भाषा के रूप में जानी जाती है। ऋषि-मुनियों ने संस्कृतभाषा का विकास किया। इस भाषा को अधिकांश भारतीय भाषाओं तथा विश्व की अधिक भाषाओं की जननी और पूरक भाषा कहा जाता है। अनेक महान कवियों ने काव्य रचनाएँ करके इसके सौंदर्य को बढ़ाया है। कोमल और मधुर शब्दों से परिपूर्ण एक ज्ञान का खजाना है। संस्कृत भाषा अपने शब्दों के माध्यम से अन्य भाषाओं को, ज्ञान और विज्ञान से समृद्ध करती है। संस्कृत भाषा का गौरव महान और अतुलनीय है।

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2. वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां
कालिदास – बाणादिकवीनाम् ।
पौराणिक – सामान्य जनानां
जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा ॥ २ ॥
पदच्छेदः – वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनाम् कालिदास – बाणादिकवीनाम् पौराणिक-सामान्य – जनानाम् जीवनस्य आशा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः – (त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास – बाणादिकवीनां पौराणिक – सामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि) ।
भावार्थः – संस्कृतभाषा अति रमणीया भाषा अस्ति। वाल्मीकि- वेदव्यास-इत्यादयः मुनयः रामायण-महाभारत-पुराणादीन् ग्रन्थान् रचितवन्तः। कालिदास – बाणभट्ट – प्रभृतयः विशिष्टाः कवयः अपि उपादेयानि काव्यानि रचितवन्तः । प्राचीनकालाद् आरभ्य इदानीं यावत् सामान्यजनानां जीवनं संस्कृतभाषया रचितैः काव्यैः प्रभावितम् अस्ति। संस्कृतभाषा बहूनां लक्ष्याणां प्रापिका अस्ति। अतः संस्कृतभाषा सुन्दरभाषा अस्ति।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- पौराणिक – पुराण संबंधी (Related to Puranas),
- रमणीया – सुंदर (Beautiful),
- उपादेय – अध्ययन योग्य (Worth studying),
- प्रभावितम् – प्रभावित (Influenced)।
अर्थ-
संस्कृतभाषा तुम वेदव्यास और वाल्मीकि जी जैसे महान ऋषियों की, कालिदास और बाणभट्ट जी जैसे विशिष्ट कवियों की तथा पवित्र पौराणिक पात्रों और सामान्य जनों की जीवन की आशा हो । अत: तुम एक सुंदर और मधुर भाषा हो ।
सरलार्थ-
संस्कृत भाषा अत्यंत सुंदर और मनोहर भाषा है । वाल्मीकि, वेदव्यास जी जैसे महान मुनियों ने रामायण, महाभारत और पुराण आदि ग्रंथों की रचना की। कालिदास, बाणभट्ट आदि विशिष्ट कवियों ने भी संस्कृत भाषा में काव्यों की रचना की ।
प्राचीन काल से लेकर आज तक सामान्य लोगों का जीवन संस्कृत भाषा में रचित काव्यों और गंथों द्वारा प्रभावित होता रहा है। संस्कृतभाषा बहुत से लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक रही है। इसलिए संस्कृतभाषा एक सुंदर भाषा है।

3. श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
गति-मति – प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ३ ॥
पदच्छेदः – श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति – प्रेरककाव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः – हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे! सरसविनोदे ! गति-मति -प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।
भावार्थ: – वस्तुतः रमणीया देवत्वविधायिनी संस्कृतभाषा संस्कृते: जननी सदृशी अस्ति। संस्कृतभाषायाः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते, सर्वे जनाः आनन्दिताः भवन्ति । संस्कृतभाषा वररूपेण संस्कारजन्यं ज्ञानं प्रयच्छति, सरसं विनोदभावं च प्रकाशयति । मानवजीवने उत्तमां गतिं बुद्धिं च प्रददाति । काव्यशास्त्रपरिपूर्णा संस्कृतभाषा अस्माकं संस्कृतिं रक्षति प्रसारयति च ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- श्रुतिसुखनिनदे – कर्णप्रिय ध्वनि देने वाली ( Sound of which is pleasant to listen ),
- स्मृतिः – स्मृति (Memory),
- सकलप्रमोद – सभी को आनन्द देने वाली (That which gives pleasure to all),
- सरसविनोदे – मधुर विनोद करने वाली (That which create pleasure humour),
- गति – दिशा (Progress path)।
अर्थ-
संस्कृतभाषा सुनने में सुखदायक है, सभी को हर्षित करने वाली है । यह ज्ञानयुक्त स्मृतियों के लिए वरदान के समान है, साथ ही रसपूर्ण आनंद प्रदान करती है, यह भाषा मानव जीवन में गति और बुद्धि को प्रेरणा देती है। काव्य और ज्ञान में पारंगत यही हमारी संस्कृति की एक सुंदर और मधुर भाषा है।
सरलार्थ-
संस्कृत भाषा वास्तव में बहुत सुंदर और दिव्य भाषा है। यह हमारी संस्कृति की जननी है। संस्कृत भाषा को सुनने से सुख बढ़ता है, सभी लोग आनन्दित होते हैं। संस्कृत भाषा एक वरदान के रूप में संस्कारों से युक्त ज्ञान प्रदान करती है। मानव जीवन में सही मार्ग और बुद्धि प्रदान करती है। काव्यशास्त्र से परिपूर्ण संस्कृतभाषा हमारी संस्कृति की रक्षा करती है और उसका प्रसार भी करती है।
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4. नवरस – रुचिरालङ्कृति-धारा
वेदविषय- वेदान्त-विचारा |
वैद्य – व्योम-शास्त्रादि – विहारा
विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा ॥ ४ ॥
पदच्छेदः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृति-धारा वेदविषय- वेदान्त-विचारा । वैद्य – व्योम-शास्त्रादि – विहारा विजयते धरायाम् सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते
भावार्थः – संस्कृतकाव्यशास्त्रेषु शृङ्गार – हास्य- करुण – रौद्र-वीर – भयानक – बीभत्स – अद्भुत – शान्त-प्रभृतयः नवसंख्याकाः रुचिराः रसाः सन्ति। शब्दार्थपूर्णा : विविधाः अलङ्काराः शोभन्ते। वेद-उपनिषद् – वेदान्त-पुराणादीनां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति । चिकित्साविज्ञान-खगोलशास्त्रादिभिः सहसंस्कृतभाषा पृथिव्यां विहरति । एवं संस्कृतभाषा सर्वत्र विजयते।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- रुचिरा – आनन्द प्रदान करने वाली (That which gives happiness),
- धरायाम् – धरती पर (On earth),
- अलङ्कृतिधारा-अलंकारों को धारण करने वाली ( Well ornamented),
- व्योमशास्त्रम् – अन्तरिक्ष विज्ञान (Astronomy)।
अर्थ-
संस्कृत भाषा नौ रसों से अलंकृत, वेद और वेदांत जैसे गूढ़ विषयों पर विचार करती है। यह आयुर्वेद, खगोल, गणित और अन्य शास्त्रों को धारण कर धरती पर भ्रमणशील एक सुंदर भाषा है।
सरलार्थ-
संस्कृत काव्यशास्त्रों में शृङ्गार, हास्य, करूण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत आदि आनन्द प्रदान करने वाले यह नौ रस हैं। इसमें अर्थपूर्ण और विविध प्रकार के अलंकार हैं। वेद, उपनिषद, वेदान्त और पुराण आदि ग्रन्थों के विचार लोगों को प्रेरणा देते हैं। चिकित्सा – विज्ञान, खगोल – विज्ञान जैसे विषयों के साथ यह संस्कृतभाषा धरती पर भ्रमण करती है। इस प्रकार संस्कृत भाषा हर जगह विजय प्राप्त करती है।

Class 8 Sanskrit Chapter 7 भारतजनताऽहम् Summary Notes
भारतजनताऽहम् Summary
अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं के द्वारा संस्कृत साहित्य को समृद्ध बनाया है। महाकवि कालिदास जैसे कविशिरोमणियों की रचनाएँ आज भी अमर हैं। काव्यसर्जन की यह परम्परा आज तक अविच्छिन्न रूपेण चली आ रही है। प्रस्तुत कविता आधुनिक कवि डॉ. रमाकान्त शुक्ल के काव्यसंग्रह से संकलित है। डॉ. शुक्ल आधुनिक संस्कृत जगत् में माँ शारदा के वरदपुत्र हैं। इन्हें राष्ट्रपति सम्मान तथा पद्मश्री जैसे अलङ्करणों से पुरस्कृत किया जा चुका है। शुक्ल जी की कविताएँ आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से भी समय-समय पर प्रसारित होती रहती हैं।

प्रस्तुत कविता डॉ. शुक्ल के ‘भारतजनताऽहम्’ नामक संग्रह से ली गई है। इसमें कवि भारतीय जनता के विविध कौशल एवं अभिरुचियों के विषय में बताते हैं। इस कविता के माध्यम से कवि ने भारतीय जनता की अनेक विशेषताओं को प्रकाशित किया है।

भारतजनताऽहम् Word Meanings Translation in Hindi
मूलपाठः, अन्वयः, शब्दार्थः, सरलार्थश्च
(क) अभिमानधना विनयोपेता, शालीना भारतजनताऽहम्।
कुलिशादपि कठिना कुसुमादपि, सुकुमारा भारतजनताऽहम् ॥
अन्वयः-
अहं भारतजनता अभिमानधना विनयोपेता शालीना कुलिशादपि कठोरा कुसुमादपि सुकुमारा (अस्मि)।
शब्दार्थ-
अभिमानधना-स्वाभिमान रूपी धन वाली।
विनयोपेता-विनम्रता से परिपूर्ण।
कुलिशादपि-वज्र से भी।
कुसुमादपि-फूल से भी।
सुकुमारा-अत्यधिक कोमल।
सरलार्थ-
मैं भारत की जनता हूँ।मैं स्वाभिमान रूपी धन वाली हूँ। मैं वज्र से भी कठोर हूँ। मैं विनम्रता से परिपूर्ण तथा शालीन हूँ। मैं फूल से भी अत्यधिक कोमल हूँ।
(ख) निवसामि समस्ते संसारे, मन्ये च कुटुम्बं वसुन्धराम्।
प्रेयः श्रेयः च चिनोम्युभयं, सुविवेका भारतजनताऽहम् ॥
अन्वयः-अहं भारतजनता समस्ते संसारे निवसामि, वसुन्धरां च कुटुम्बं मन्ये, प्रेयः श्रेयश्च उभयं चिनोमि, (अहं) सुविवेका।
शब्दार्थ-
निवसामि-निवास करती हूँ।
वसुन्धराम्-पृथ्वी को।
श्रेयः-कल्याणप्रद।
प्रेयः-प्रिय।
उभयम्-दोनों को।
चिनोमि-चुनती हूँ।
सरलार्थ-
मैं भारत की जनता हूँ। मैं समस्त संसार में निवास करती हूँ और (समस्त) भूमण्डल को परिवार मानती हूँ। रुचिकर और कल्याणप्रद दोनों (मार्गों) का चयन करती हूँ। अच्छे विवेक से पूर्ण हूँ।
(ग) विज्ञानधनाऽहं ज्ञानधना, साहित्यकला-सङ्गीतपरा।
अध्यात्मसुधातटिनी-स्नानैः, परिपूता भारतजनताऽहम् ।।
अन्वयः-
अहं भारतजनता विज्ञानधना ज्ञानधना साहित्यकला-सङ्गीतपरा अध्यात्मसुधातटिनी स्नानैः परिपूता (अस्मि)।
शब्दार्थ-
परा-परायण।
सुधा-अमृतमयी।
परिपूता-पवित्र।
तटिनी-नदी।
सरलार्थ-
मैं भारत की जनता हूँ। मैं विज्ञान रूपी धन वाली, ज्ञान रूपी धन वाली तथा साहित्य, कला व संगीत परायण हूँ। मैं अध्यात्म रूपी अमृतमयी नदी में स्नान से अत्यधिक पवित्र हूँ।
(घ) मम गीतैर्मुग्धं समं जगत्, मम नृत्यैर्मुग्धं समं जगत्।
मम काव्यैर्मुग्धं समं जगत्, रसभरिता भारतजनताऽहम् ।4।
अन्वयः-
मम गीतैः समं जगत् मुग्धम्, मम नृत्यैः समं जगत्, मम काव्यैः समं जगत् मुग्धम्, अहं रसभरा भारतजनता।।4।।
शब्दार्थ-
समम्-साथ।
जगत्-संसार।
रसभरिता-रस से परिपूर्ण।
मुग्धम्-मुग्ध।
सरलार्थ-
मेरे गीतों के द्वारा सारा संसार मुग्ध है, मेरे नृत्य के द्वारा सारा संसार मुग्ध है तथा मेरे काव्य के द्वारा सारा संसार मुग्ध है। मैं रस से परिपूर्ण भारत की जनता हूँ।
(ङ) उत्सवप्रियाऽहं श्रमप्रिया, पदयात्रा-देशाटन-प्रिया।
लोकक्रीडासक्ता वर्धेऽतिथिदेवा, भारतजनताऽहम् ।
अन्वयः-
अहम् उत्सवप्रिया, श्रमप्रिया, पदयात्रादेशाटन-प्रिया, लोकक्रीडा सक्ता, अतिथिदेवा, भारतजनता वर्धे।।5।।
शब्दार्थ-
श्रम-परिश्रम।
अटन-भ्रमण।
आसक्ता-अनुराग वाली।
वर्धे-वृद्धि को प्राप्त होती हूँ।
सरलार्थ-
मैं भारत की जनता हूँ। मैं उत्सवप्रिय, श्रमप्रिय तथा पदयात्रा के द्वारा देशों का भ्रमण करने वाली हूँ। मैं लोक, क्रीडाओं अनुराग रखने वाली, अतिथि प्रिय हूँ। मैं वृद्धि को प्राप्त होती हूँ।
(च) मैत्री मे सहजा प्रकृतिरस्ति, नो दुर्बलतायाः पर्यायः।
मित्रस्य चक्षुषा संसार, पश्यन्ती भारतजनताऽहम् ।6।
अन्वयः-
मैत्री मे सहजा प्रकृतिः अस्ति, नः दुर्बलतायाः पर्यायः। संसारं मित्रस्य चक्षुषा पश्यन्ती भारतजनता अहम्।
शब्दार्थ-
सहजा-स्वाभाविक।
न:-नहीं।
पर्यायः-पर्याय।
चक्षुषा-नेत्रों से।
पश्यन्ती-देखती हुई।
सरलार्थ-
मित्रता हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है तथा दुर्बलता का पर्याय नहीं है। (सम्पूर्ण) संसार को मित्र की दृष्टि से देखती हुई मैं भारत की जनता हूँ।
(च) विश्वस्मिन् जगति गताहमस्मि, विश्वस्मिन् जगति सदा दृश्य।
विश्वस्मिन् जगति करोमि कर्म, कर्मण्या भारतजनताऽहम् ।।
अन्वयः-
अहं विश्वस्मिन् जगति गता अस्मि, (अहं) विश्वस्मिन्जगति सदा दृश्य, विस्मिन् जगति कर्म करोमि, (अहं) कर्मण्या भारत जनता (अस्मि)।
शब्दार्थ-
विश्वस्मिन्-सम्पूर्ण।
जगति-संसार में।
दृश्ये-देखी जाती हूँ।
कर्मण्या-कर्मशील।
सरलार्थ-
मैं सम्पूर्ण जगत् में गई हूँ। मुझे सम्पूर्ण जगत् में देखा जाता है। मैं सम्पूर्ण जगत् में कार्य करती हूँ। मैं कर्मशील भारत की जनता हूँ।