By going through these Sanskrit Class 8 Notes and NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation Summary Explanation Notes गीता सुगीता कर्तव्या students can clarify the meanings of complex texts.
Sanskrit Class 8 Chapter 5 Hindi Translation गीता सुगीता कर्तव्या Summary
गीता सुगीता कर्तव्या Meaning in Hindi
Class 8 Sanskrit Chapter 5 Summary Notes गीता सुगीता कर्तव्या
यह पाठ भगवद्गीता के गहन ज्ञान और महत्व को दर्शाता है। गीता के उपदेश अमृत तुल्य हैं। इसके उपदेश सार्वकालिक और सार्वभौमिक हैं। ये जीवन – क्षेत्र और कार्य क्षेत्र सब जगह काम आते हैं। यह पाठ विद्यार्थियों को गीता के गूढ़ संदेशों को आत्मसात कर जीवन में उनका अभ्यास करने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Class 8 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation गीता सुगीता कर्तव्या
1. कुरुक्षेत्रे श्रीगीता-जयन्ती महोत्सवः आचरितः । तत्र बहवः जनाः अगच्छन् । रमेशः अपि स्वजनकेन सह तत्र गतवान् । कथावाचकः गीतायाः विषये वर्णयति स्म –
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥
इदं श्रुत्वा रमेशः पितरम् अपृच्छत् – पितः ! गीता का ? कथं सुगीता कर्तव्या ? ”
पिता – पुत्र! बहुभ्यः वर्षेभ्यः पूर्वं कुरुक्षेत्रे कौरवाणां पाण्डवानां च मध्ये सङ्ग्रामः अभवत् । तस्मिन् युद्धे स्वबान्धवान् दृष्ट्वा अर्जुन : युद्धं कर्तुं न इच्छति स्म । तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्मुखम् अर्जुनं कर्तव्यपालनार्थम् उपदिष्टवान्। श्रीकृष्णस्य उपदेशः एव श्रीमद्भगवद्गीता अस्ति । गीतायाम् अमृततुल्याः उपदेशाः सन्ति ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- महोत्सव : – त्यौहार (Festival),
- कथावाचकः – कथा वाचक (The narrator/the proponent),
- सुगीता-अच्छी तरह से गाई जाने वाली (Melodious Song),
- युद्धपराङ्मुखम् – युद्ध विमुख (The war-averse),
- अमृततुल्याः-अमृत के समान (Like nectar)।
सरलार्थ-
कुरुक्षेत्र में श्री गीता – जयन्ती – महोत्सव मनाया गया । वहाँ बहुत से लोग गए। रमेश भी अपने पिता के साथ वहाँ गया । कथावाचक गीता के विषय में बता रहे थे- गीता को अच्छी तरह से समझना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए। अन्य शास्त्रों के विस्तार की आवश्यकता क्या है क्योंकि यह स्वयं जिसकी नाभि में कमल हैं ऐसे विष्णु भगवान के मुख रूपी कमल से निकली हुई है।
यह सुनकर रमेश ने पिता से पूछा – ” पिताजी ! गीता क्या? कैसे सुगीता करनी चाहिए। ”
पिता – पुत्र! बहुत वर्ष पहले कुरुक्षेत्र में कौरव और पाण्डवों के बीच में युद्ध हुआ। उस युद्ध में अपने भाई- बंधुओं को देखकर अर्जुन युद्ध करना नहीं चाहता था । तब भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध से विमुख हुए अर्जुन को कर्तव्य पालन के लिए उपदेश दिया। श्रीकृष्ण का उपदेश ही श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता में अमृत के समान उपदेश हैं।

2. रमेशः – तर्हि सुगीता कर्तव्या इत्यस्य कः आशयः?
पिता – अस्य आशयः अस्ति यत् गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः । गीता उत्तमभावेन पठितव्या । कार्यक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदेशाः अनुपालनीयाः । अस्मिन् पाठे वयं श्रीमद्भगवद्गीताया: काँश्चन श्लोकान् पठामः । वयं श्लोकान् मिलित्वा गायामः अपि ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- उत्तमभावेन – अच्छे भावों से (In a good manner),
- अनुपालनीयाः – पालन करने योग्य या अनुसरण करने योग्य (Worth following)।
सरलार्थ-
रमेश – तो ‘सुगीता’ करनी चाहिए इसका क्या आशय है?
पिता – इसका आशय यह है कि गीता का अभ्यास ठीक प्रकार से करना चाहिए। गीता उत्तम भाव से पढ़नी चाहिए। कार्यक्षेत्र में और जीवन के क्षेत्र में गीता का उपदेश पालन करने योग्य है। इस पाठ में हम श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोकों को पढ़ते हैं। हम श्लोकों को मिलकर गाते भी हैं।
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(1) दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ १ ॥
पदच्छेदः – दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः स्थिती मुनिः उच्यते ।
अन्वयः – दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीतराग-भय-क्रोधः मुनिः स्थितधीः (इति) उच्यते ।
भावार्थ: – यः मनुष्यः आपत्कालेषु उद्वेगं न अनुभवति । यः सुखप्राप्तये अपि निस्पृहः (इच्छारहितः ) भवति । यः इच्छा, आसक्तिः, भयः, क्रोधः, इत्येतेभ्यः मुक्तः भवति । सः मौनी पुरुषः स्थितप्रज्ञः भवति।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- अनुद्विग्नमनाः – अविचलित मन वाला (Person of tranquil mind),
- विगतस्पृहः- आसक्ति रहित (Detached),
- वीत-राग-भय-क्रोधः – वासना, भय और क्रोध से रहित (Free from attachment, fear and anger),
- स्थितधीः – स्थिर मन वाला (Steady minded)।
अर्थ-
जो मनुष्य मुसीबत के समय उत्तेजित नहीं होता, जो सुख प्राप्ति के समय इच्छा रहित रहता है, जो इच्छा, प्रेम, लगाव, डर और गुस्से से मुक्त हो गया है, वही मौन रहने वाला पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है ।
सरलार्थ-
दुखों की प्राप्ति होने पर जिस व्यक्ति के मन में उद्वेग नहीं होता । सुखों की प्राप्ति होने पर भी जो आसक्त नहीं होता यानी इच्छारहित रहता है। जो राग, मोह, भय और क्रोध आदि से मुक्त होता है (तपस्वी) स्थिर बुद्धि वाला होता है।
(2) क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥२॥
पदच्छेदः – क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ।
अन्वयः – क्रोधात् सम्मोहः भवति । सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः (भवति) । स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः (भवति) । बुद्धिनाशात् (जन:) प्रणश्यति ।
भावार्थ: – मानवस्य यदा क्रोधः भवति तदा क्रोधात् अविवेकः उत्पद्यते । अविवेकात् आत्मानं विस्मरति । किं योग्यं किञ्च अयोग्यम् इति अविचिन्त्य क्रोधात् व्यामोहं प्राप्नोति । यदा अधिकः व्यामोहः भवति तदा मनुष्यस्य स्मृतिः निष्क्रिया नष्टा च भवति। स्मृतेः नाशात् बुद्धिः नश्यति । बुद्धेः नाशात् सः मनुष्यः विनाशं प्राप्नोति ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- सम्मोह : – कर्तव्य अकर्तव्य का अविवेक (Delusion),
- स्मृतिविभ्रमः – स्मरण शक्ति का नष्ट होना (Loss of memory),
- प्रणश्यति – (मनुष्य) नष्ट हो जाता है (Gets distroyed)।
अर्थ-क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव (अविवेक) उत्पन्न हो जाता है, मूलभाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है या नष्ट हो जाता है।
सरलार्थ-
मनुष्य जब क्रोध में होता है तब क्रोध से अविवेक उत्पन्न होता है। अविवेक से मनुष्य अपने आपको भूल जाता है। क्या उचित है और क्या अनुचित है ऐसा बिना सोचे-समझे क्रोध से व्यामोह प्राप्त करता है। जब अधिक विमोह होता है तब मनुष्य की स्मृति निष्क्रिय और नष्ट हो जाती है। याददाश्त के नष्ट होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि से नष्ट होने से मनुष्य का विनाश हो जाता है।
(3) तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३॥
पदच्छेदः – तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम् ज्ञानिनः तत्त्वदर्शिनः ।
अन्वयः – तद् प्रणिपातेन सेवया परिप्रश्नेन विद्धि ते तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति ।
भावार्थः – भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनम् उपदिशति हे अर्जुन ! भवान् गुरोः समीपं गत्वा यथार्थज्ञानं प्राप्तुं प्रयासं करोतु । भवान् विनीतः जिज्ञासुः च भूत्वा गुरोः सेवां करोतु । तत्त्वज्ञानी गुरुः भवते ज्ञानं प्रदास्यति । यतः ये सत्यस्य दर्शनं कृतवन्तः ते एव यथार्थज्ञानिनः भवन्ति ।
शब्दार्थाः : (Word Meanings) :
- प्रणिपातेन – प्रणाम के द्वारा (By bowing down),
- परिप्रश्नेन – बार – बार प्रश्न पूछने से (By questioning),
- तत्त्वदर्शिनः- तत्त्वज्ञानी (Who realized the truth),
- उपदेक्ष्यन्ति – उपदेश देंगे (They will preach)।
अर्थ-
उस ज्ञान को विनम्रतापूर्वक, प्रश्न पूछकर और सेवा करके जानो । तत्त्वदशी ज्ञानी मनुष्य तुम्हें ज्ञान प्रदान करेंगे।
सरलार्थ-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं- हे अर्जुन!, आप गुरु के पास जाकर यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करो। आप विनम्र और जिज्ञासु होकर गुरु की सेवा करो । तत्वज्ञानी गुरु आपको ज्ञान देंगे। क्योंकि जिन्होंने सत्य का दर्शन किया है वे ही यथार्थ ज्ञानी होते हैं।

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(4) श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥४॥
पदच्छेदः – श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयतेन्द्रियः ज्ञानम् लब्ध्वा पराम् शान्तिम् अचिरेण अधिगच्छति ।
अन्वयः – संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् (मनुष्यः) ज्ञानं लभते । तथा ज्ञानं लब्ध्वा (सः) अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।
भावार्थः – यः श्रद्धालुः मनुष्यः दिव्यज्ञानं प्राप्तुं निरन्तरं प्रयासं करोति । तथैव यः मनुष्यः इन्द्रियाणि स्ववशे कृतवान्। सः मनुष्यः दिव्यज्ञानं प्राप्स्यति। तादृशं दिव्यं ज्ञानं प्राप्य सः पुरुषः जीवने अनन्तम् आनन्दं प्राप्नोति।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- श्रद्धावान् – श्रद्धा से युक्त (Devoted),
- संयतेन्द्रियः – संयमित इन्द्रियों वाला (One who control his senses),
- अधिगच्छति – प्राप्त करता है (Receives)।
अर्थ-
श्रद्धावान पुरुष इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान को प्राप्त करता है तथा ज्ञान को प्राप्त करके वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्ति रूप परम शान्ति को प्राप्त करता है।
सरलार्थ-
जो श्रद्धालु मनुष्य दिव्यज्ञान को प्राप्त करने की लगातार कोशिश करता है। वैसे ही जिस मनुष्य ने इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया है, वह मनुष्य दिव्यज्ञान प्राप्त करता है। वैसा दिव्य ज्ञान प्राप्त करके वह पुरुष जीवन में अनन्त आनंद को प्राप्त करता है ।
(5) अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥५॥
पदच्छेदः – अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणः एव च निर्मम: निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।
अन्वयः – (यः) सर्वभूतानाम् अद्वेष्टा मैत्रः च करुणः एव निर्मम: निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ( अस्ति, सः एव मम प्रियः भवति ।)
भावार्थ: – हे अर्जुन! यः कस्यामपि परिस्थितौ विचलितः न भवति । यः ईर्ष्यारहितः समस्तप्राणिनां कृते मित्रभावयुतः दयालुः च भवति। यः ममत्वरहितः, अहङ्कारविहीनः, सुखदुःखेषु समभावयुतः क्षमाशीलः च भवति तादृशः पुरुषः भगवतः अत्यन्तं प्रियः भक्तः भवति ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- अद्वेष्टा – द्वेषरहित (One who never hates),
- सर्वभूतानां – सारे प्राणियों का (Of all beings),
- करुण:-दयाहीन (Compassionate),
- निरहङकार :- अहंकार रहित (Egoless),
- समदुःखसुखः – सुख और दुख में समान भाव वाला (Some in Pain and pleasure ),
- क्षमी – क्षमाशील (Endowed with Forbearance)।
अर्थ-
जो किसी से द्वेष नहीं करता, सभी प्राणियों से मित्रवत् व्यवहार करता है। जो कृपालु है, निर्मोही और अहंकार रहित है, जो सुख-दुख आदि द्वन्द्वों में समान भाव रखता है, क्षमाशील है। वही मेरा ( ईश्वर का) प्रिय होता है।
सरलार्थ-
श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, वह ईर्ष्यारहित सारे प्राणियों के लिए मित्र भाव के समान और दयालु होता है। जो ममता और प्रेम से रहित निर्दय और अहंकार से रहित, सुख-दुख में समान भाव वाला और दूसरों को क्षमा करने वाला होता है वैसा पुरुष भगवान का अत्यंत प्यारा भक्त होता है।
(6) सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिय मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ ६ ॥
पदच्छेदः – सन्तुष्टः सततम् योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मयि अर्पितमनोबुद्धिः यः मद्भक्तः सः मे प्रियः ।
अन्वयः – यः योगी सततं सन्तुष्टः यतात्मा दृढनिश्चयः मयि (च) अर्पितमनोबुद्धि: (भवति) सः मद्भक्तः मे प्रियः (भवति)।
भावार्थः – हे पार्थ! यः निरन्तरं सन्तुष्टः भवति । अर्थात् कस्यापि वस्तुनः अभावात् कदापि असन्तुष्टः न भवति। यः मनः इन्द्रियाणि च विजित्य संयमी भवति । यः स्वबुद्ध्या परमेश्वरस्य स्वरूपं स्थिरीकरोति । यश्च मनः बुद्धिं च ईश्वरे समर्पयति । सः मनुष्यः मम अतीव प्रियतमः भक्तः भवति ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- सततं – लगातार (Continuous ),
- यतात्मा – यति, जिसने इन्द्रियों को अपने वश में कर रखा है। (Self-restrained),
- दृढनिश्चय:- दृढ़ निश्चय वाला (Determined),
- अर्पितमनोबुद्धिः :- मन और बुद्धि को अर्पित करने वाला (One who has offered his mind and intellect) |
अर्थ-
जो सदा संतुष्ट है, योगयुक्त है अपने आपको वश में रखता है, जिसका निश्चय दृढ़ है, जिसने अपने मन और बुद्धि को मुझे अर्पण कर दिया है, वही कर्मयोगी भक्त मुझे प्रिय है।
सरलार्थ-
हे अर्जुन! जो निरन्तर संतुष्ट होता है अर्थात् किसी भी वस्तु के अभाव में कभी भी असंतुष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति मन और इन्द्रियों को जीतकर संयमी होता है। जो अपनी बुद्धि से परमेश्वर के स्वरूप को स्थिर करता है और जो मन और बुद्धि को ईश्वर में समर्पित करता है। वह मनुष्य मेरा बहुत ही सबसे प्यारा भक्त होता है।
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(7) यस्मान्नोद्विजते लोकः लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥७॥
पदच्छेदः – यस्मात् न उद्विजते लोकः लोकात् न उद्विजते च यः हर्ष – अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः यः सः च मे प्रियः ।
अन्वयः – यस्मात् लोकः न उद्विजते यः च लोकात् न उद्विजते, य: च हर्ष – अमर्ष-भय- उद्वेगैः मुक्तः सः मे प्रियः (भवति)।
भावार्थ: – हे अर्जुन ! यस्मात् मनुष्यात् कोऽपि मनुष्यः प्राणी वा उद्विग्नः न भवति। यश्च मनुष्यः अन्यस्मात् जनात् प्राणिनः वा उद्विग्नः न भवति । यश्च हर्षेण, ईर्ष्यया, भीत्या, चिन्तया च रहितः भवति। सः मम अतीव प्रियः भक्तः भवति।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- उद्विजते-उद्विग्न होता है (Agitated),
- लोकः – संसार (The world),
- हर्ष – अमर्ष-भय- उद्वेगै:- हर्ष, क्रोध, भय और चिंताओं से (From Joy, impatience, fear and anxiety)।
अर्थ-
जिससे न तो लोगों को क्लेश या कष्ट होता है, और न ही जो लोक में उद्विग्न होता है, जो हर्ष, क्रोध व भय आदि उद्वेगों से मुक्त है अंत में वही मुझे प्रिय है।
सरलार्थ-
हे अर्जुन! जिस मनुष्य से कोई भी मनुष्य या प्राणी उद्विग्न नहीं होता है और जो मनुष्य दूसरे आदमी या प्राणी से उद्विग्न नहीं होता। जो खुशी, ईर्ष्या, डर और चिन्ता से रहित होता है, वह मेरा बहुत प्रिय भक्त होता है।

(8) अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥८॥
पदच्छेदः – अनुद्वेगकरम् वाक्यम् सत्यम् प्रियहितम् च यत् स्वाध्यायाभ्यसनम् च एव वाङ्मयम् तपः उच्यते।
अन्वयः – यद् वाक्यम् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च (तथा) स्वाध्यायाभ्यसनं च एव वाङ्मयं तपः उच्यते।
भावार्थ: – यत् अनुद्वेगकरं (भषणम् उद्वेगं न जनयेत्), सत्यं, प्रियकरं, हितकरं च भाषणं स्यात्, तत् वाङ्मयं तपः इति कथ्यते। शास्त्रादीनां स्वाध्यायः, तेषाम् अभ्यासः च वाचिकं तपः कथ्यते । तथा स्वाध्यायः अभ्यासश्चापि यथाविधि वाक्यं तपः इति उच्यते। अतः विद्यार्थिभिः स्मरणीयं यत्-
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः,
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचनेन का दरिद्रता ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- अनुद्वेगकरम् – व्याकुलता न करने वाला (Unoffending),
- अभ्यसनम् – अभ्यास (Practice),
- वाङ्मयं-वाचिक (Verbal penance)।
अर्थ-
उद्विग्न न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी भाषण नियमित स्वाध्याय और अभ्यास करना – ये वाणी संबंधी तप कहा जाता है ।
सरलार्थ-
जो वाक्य दूसरों को उद्विग्न न करने वाले हों, सत्य हों, प्रिय हों और हितकारी हों उन्हें वाणी का तप कहा जाता है। शास्त्र आदि का स्वाध्याय और उनका अभ्यास वाचिक तप कहलाता है। उसी प्रकार स्वाध्याय और विधि के अनुसार अभ्यास भी तप कहलाता है। अतः विद्यार्थियों के लिए यह स्मरणीय है- प्रिय वाक्य बोलने से सारे प्राणी संतुष्ट हो जाते हैं। इसीलिए प्रिय वाक्य ही बोलना चाहिए। बोलने में कैसी दरिद्रता ?
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Class 8 Sanskrit Chapter 5 कण्टकेनैव कण्टकम् Summary Notes
कण्टकेनैव कण्टकम् Summary
मध्य प्रदेश के डिण्डोरी जिले में परधानों के मध्य अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं। इनमें एक कथा है-धर्म में धक्का तथा पाप में पुण्य। यह कथा पञ्चतन्त्र की शैली में लिखी गई है। इस कथा में यह बताया गया है कि संकट में पड़ने पर भी चतुराई और प्रत्युत्पन्नमति से उस संकट से निकला जा सकता है। कथा का सार इस प्रकार है कोई चञ्चल नाम का शिकारी था। एक बार उसने वन में जाल बिछाया। उस जाल में एक बाघ फँस गया।

बाघ की प्रार्थना पर शिकारी ने बाघ को जाल से बाहर निकाल दिया। बाघ ने शिकारी से पानी माँगा। पानी पीकर बाघ शिकारी को खाने के लिए दौड़ा। बाघ की कृतघ्नता से हताश शिकारी नदी के जल के पास गया। नदी का जल कहने लगा कि यह लोक अत्यधिक स्वार्थी है। लोग जल पीते हैं और मुझे ही गन्दा करते हैं। उसकी बात न करते हुए वृक्ष कहने लगा कि लोग मेरी छाया में बैठते हैं तथा मेरे फल खाते हैं और मुझे ही काटते हैं।

तब शिकारी ने अपनी व्यथा एक लोमड़ी को सुनाई। लोमड़ी ने अपनी तीव्र बुद्धि का परिचय देते हुए बाघ को पुनः जाल में फँसा दिया। इस प्रकार लोमड़ी की बुद्धिमत्ता से शिकारी के प्राण बच गए।
कण्टकेनैव कण्टकम् Word Meanings Translation in Hindi
मूलपाठः, अन्वयः, शब्दार्थः सरलार्थश्च
(क) आसीत् कश्चित् चञ्चलो नाम व्याधः। पक्षिमृगादीनां ग्रहणेन सः स्वीयां जीविका निर्वाहयति स्म। एकदा सः वने जालं विस्तीर्य गृहम् आगतवान्। अन्यस्मिन् दिवसे प्रातःकाले यदा चञ्चल: वनं गतवान् तदा सः दृष्टवान् यत् तेन विस्तारिते जाले दौर्भाग्याद् एकः व्याघ्रः बद्धः आसीत्। सोऽचिन्तयत्, ‘व्याघ्रः मां खादिष्यति अतएव पलायनं करणीयम्।’ व्याघ्रः न्यवेदयत्-‘भो मानव! कल्याणं भवतु ते। यदि त्वं मां मोचयिष्यसि तर्हि अहं त्वां न हनिष्यामि।’
शब्दार्थ-
कश्चित्-कोई।
मृगादीनाम्-मृग आदि का (Deerlike)।
स्वीयाम्-अपनी (स्वयं की)।
निर्वाहयति स्म-निर्वाह करता था (चलाता था)।
विस्तीर्य-फैलाकर।
अन्यस्मिन्-दूसरे।
गतवान्-गया।
यत्-कि।
व्याधः-शिकारी (Hunter)।
ग्रहणेन-पकड़ने से।
जीविकाम्-आजीविका को।
एकदा-एक बार।
तदा-तब।
आगतवान्-आ गया।
यदा-जब।
दृष्टवान्-देखा।
दौर्भाग्याद्-दुर्भाग्य से (Unfortunately)।
बद्धः-बँधा।
खादिष्यति-खा लेगा।
न्यवेदयत्-निवेदन किया।
ते-तेरा।
मोचयिष्यसि-छुड़ा दोगे/मुक्त करोगे।
हनिष्यामि-मारूँगा।
विस्तारिते-फैलाए गए।
व्याघ्रः-बाघ (Tiger)।
माम्-मुझे/मुझको।
पलायनम्-भाग जाना।
भवतु-होवे।
माम्-मुझे।
तर्हि-तो।
आसीत्-था।
सरलार्थ-
चञ्चल नामक कोई शिकारी था। वह पक्षियों और पशुओं आदि को पकड़ कर अपनी जीविका का निर्वाह करता था। एक बार वह जंगल में जाल फैलाकर घर आ गया। दूसरे दिन प्रातःकाल जब चञ्चल वन में गया, तब उसने देखा कि उसके द्वारा फैलाए गए जाल में दुर्भाग्य से एक बाघ बँधा हुआ था। उसने सोचा-‘बाघ मुझे खा जाएगा। अत: भाग जाना चाहिए’। बाघ ने निवेदन किया- अरे मानव! तुम्हारा कल्याण होवे। यदि तुम मुझे छुड़ा दोगे तो मैं तुम्हें नहीं मारूँगा।’
(ख) तदा सः व्याधः व्याघ्रं जालात् बहिः निरसारयत्। व्याघ्रः क्लान्तः आसीत्। सोऽवदत्, ‘भो मानव! पिपासुः अहम्। नद्याः जलमानीय मम पिपासां शमय। व्याघ्रः जलं पीत्वा पुनः व्याधमवदत्, शमय मे पिपासा। साम्प्रतं बुभुक्षितोऽस्मि। इदानीम् अहं त्वां खादिष्यामि।’ चञ्चलः उक्तवान्, ‘अहं त्वत्कृते धर्मम् आचरितवान्। त्वया मिथ्या भणितम्। त्वं मां खादितुम् इच्छसि?
शब्दार्थ-
बहिः-बाहर (Outside)।
क्लान्तः-थका हुआ (Tired)।
नद्याः-नदी से।
पिपासाम्-प्यास को।
पीत्वा-पीकर।
अवदत्-कहा/बोला।
बुभुक्षितः-भूखा।
खादिष्यामि-खाऊँगा।
त्वत्कृते-तुम्हारे लिए।
मिथ्या-झूठ।
खादितुम्-खाने के लिए।
निरसारयत्-निकाला।
पिपासुः-प्यासा (Thirsty)।
आनीय-लाकर।
शमय-शान्त करो।
साम्प्रतम्-इस समय।
इदानीम्-अब।
उक्तवान्-कहा।
आचरितवान्-आचरण किया है (Behave)
भणितम्-कहा।
इच्छसि-(तुम) चाहते हो।
सरलार्थ-तब उस शिकारी ने बाघ को जाल से बाहर निकाल दिया। बाघ थका हुआ था। उसने कहा-‘हे मानव! मैं प्यासा हूँ। नदी से जल लाकर मेरी प्यास बुझाओ।’ बाघ ने जल पीकर पुनः शिकारी से कहा-‘मेरी प्यास बुझ गई है। इस समय मैं भूखा हूँ। अब मैं तुम्हें खाऊँगा।’ चञ्चल ने कहा-‘मैंने तुम्हारे लिए धर्म का आचरण (व्यवहार) किया है। तुमने झूठ बोला है। तुम मुझे खाना चाहते हो।’
(ग) व्याघ्रः अवदत्, ‘अरे मूर्ख! क्षुधार्ताय किमपि अकार्यम् न भवति। सर्वः स्वार्थं समीहते’ चञ्चलः नदीजलम् अपृच्छत्। नदीजलम् अवदत्, ‘एवमेव भवति, जनाः मयि स्नानं कुर्वन्ति, वस्त्राणि प्रक्षालयन्ति तथा च मल-मूत्रादिकं विसृज्य निवर्तन्ते, वस्तुतः सर्वः स्वार्थं समीहते।
शब्दार्थ-
क्षुधार्ताय-भूखे के लिए।
समीहते-चाहते हैं।
अपृच्छत्-पूछा।
एव-ही।
वस्त्राणि-वस्त्रों को।
विसृज्य-त्याग कर (छोड़कर)।
कमपि-किसी से भी।
एवम्-ऐसा।
मयि-मुझ में।
प्रक्षालयन्ति-धोते हैं।
निवर्तन्ते-चले जाते हैं।
विसृज्य-त्याग कर (छोड़कर)।
सरलार्थ-बाघ ने कहा-‘अरे मूर्ख! भूखे (प्राणी) के लिए कुछ भी अनुचित नहीं होता है। सभी स्वार्थ चाहते हैं। चञ्चल ने नदी के जल से पूछा। नदी के जल ने कहा-‘ऐसा ही होता है। लोग मेरे जल में स्नान करते हैं, कपड़े धोते हैं तथा मलमूत्र आदि का त्याग करके वापस लौट जाते हैं। वस्तुतः सभी स्वार्थ चाहते हैं।
(घ) चञ्चल: वृक्षम् उपगम्य अपृच्छत्।वृक्षः अवदत्, ‘मानवाः अस्माकं छायायां विरमन्ति। अस्माकं फलानि खादन्ति, पुनः कुठारैः प्रहृत्य अस्मभ्यं सर्वदा कष्टं ददति। यत्र कुत्रापि छेदनं कुर्वन्ति। सर्वः स्वार्थं समीहते।’
शब्दार्थ-
उपगम्य-पास जाकर।
छायायाम्-छाया में।
खादन्ति-खाते हैं।
प्रहृत्य-प्रहार करके (Hit)
सर्वदा-सदा (हमेशा)।
यत्र कुत्रापि-जहाँ कहीं भी।
अस्माकम्-हमारी।
विरमन्ति-आराम करते हैं।
कुठारैः-कुल्हाड़ों से।
अस्मभ्यम्-हमें।
ददति-देते हैं।
छेदनम्-काटना।
सरलार्थ-
चञ्चल ने वृक्ष के पास जाकर पूछा। वृक्ष कहने लगा-‘मनुष्य हमारी छाया में आराम करते हैं, हमारे फल खाते हैं। फिर कुल्हाड़ों से प्रहार करके हमें सदा कष्ट देते हैं। जहाँ कहीं भी काट डालते हैं। सभी स्वार्थ चाहते हैं।
(ङ) समीपे एका लोमशिका बदरी-गुल्मानां पृष्ठे निलीना एतां वार्ता शृणोति स्म। सा सहसा चञ्चलमुपसृत्य कथयति-“का वार्ता? माम् अपि विज्ञापय।” सः अवदत्-“अहह मातृस्वसः! अवसरे त्वं समागतवती। मया अस्य व्याघ्रस्य प्राणाः रक्षिताः, परम् एषः मामेव खादितुम् इच्छति।” तदनन्तरं सः लोमशिकायै निखिला कथां न्यवेदयत्।
शब्दार्थ-
समीपे-पास में।
बदरी०-बेर की।
पृष्ठे-पीछे।
वार्ताम्-बात को।
सहसा-एकदम (अचानक)।
का-क्या।
मातृस्वसः-मौसी।
समागतवती-आई हो।
लोमशिका-लोमड़ी।
गुल्मानाम्-झाड़ियों के (Bushes)।
निलीना-छिपी हुई।
शृणोति स्म-सुन रही थी।
उपसृत्य-पास जाकर।
विज्ञापय-बताओ।
अवसरे-ठीक समय पर।
मया-मैंने / मेरे द्वारा।
रक्षिताः-रक्षा की है।
तदनन्तरम्-इसके पश्चात्।
न्यवेदयत्-कह दी (बताई)।
निखिलाम्-सारी (संपूर्ण) (Complete)।
परम्-परन्तु।
वार्ता-बात।
मामेव-मुझको ही।
सरलार्थ-
पास में बेर की झाड़ियों के पीछे छिपी हुई एक लोमड़ी इस बात को सुन रही थी। वह अचानक चञ्चल के पास जाकर कहने लगी-“क्या बातचीत है? मुझे भी बताइए।” वह कहने लगा-“अरे, मौसी! तुम ठीक समय पर आई हो। मैंने इस बाघ के प्राणों की रक्षा की है, परन्तु यह मुझे ही खाना चाहता है।” इसके बाद उसने लोमड़ी को सम्पूर्ण कथा बता दी।
(च) लोमशिका चञ्चलम् अकथयत्-बाढम्, त्वं जालं प्रसारय। पुनः सा व्याघ्रम् अवदत्-केन प्रकारेण त्वम् एतस्मिन् जाले बद्धः इति अहं प्रत्यक्षं द्रष्टुमिच्छामि। व्याघ्रः तद् वृत्तान्तं प्रदर्शयितुं तस्मिन् जाले प्राविशत् । लोमशिका पुनः अकथयत्-सम्प्रति पुनः पुनः कूर्दनं कृत्वा दर्शय। सः तथैव समाचरत् । अनारतं कूर्दनेन सः श्रान्तः अभवत्। जाले बद्धः सः व्याघ्रः क्लान्तः सन् निःसहायो भूत्वा तत्र अपतत् प्राणभिक्षामिव च अयाचत। लोमशिका व्याघ्रम् अवदत् सत्यं त्वया भणितम् ‘सर्वः स्वार्थं समीहते।’
शब्दार्थ-
बाढम्-ठीक है/अच्छा।
केन प्रकारेण-किस प्रकार से।
द्रष्टुम्-देखना।
प्रदर्शयितुम्-दिखाने के लिए।
पुनः पुनः-बार बार।
दर्शय-दिखाओ (Show)
समाचरत्-आचरण किया।
श्रान्तः-थका हुआ।
अयाचत-माँगने लगा।
बद्धम्-बँधा हुआ।
प्रत्यावर्तत-लौट आया।
प्रसारय-फैलाओ।
एतस्मिन्-इस (सप्तमी)।
वृत्तान्तम्-घटना को (Incident)।
प्राविशत्-प्रवेश कर गया।
कूर्दनम्-कूदना।
तथैव-उसी प्रकार।
अनारतम्-लगातार।
क्लान्तः-थका हुआ।
भणितम्-कहा था।
दृष्ट्वा -देखकर।
अपतत्-गिर गया।
सरलार्थ-
लोमड़ी ने चञ्चल से कहा-अच्छा। तुम जाल फैलाओ। फिर उसने बाघ से कहा-तुम किस प्रकार इस जाल में बँधे थे-यह मैं अपने सामने देखना चाहती हैं। बाघ उस घटना को दिखाने के लिए उस जाल में घुस गया। लोमडी ने फिर कहा-अब बार-बार उछलकूद करके दिखाओ। उसने वैसा ही आचरण किया। लगातार उछलकूद से वह थक गया। जाल में बँधा हुआ वह बाघ निढाल होता हुआ असहाय होकर वहाँ गिर पड़ा तथा प्राणों की भीख माँगने लगा। लोमड़ी ने बाघ से कहा-‘तुमने सच कहा था। सभी स्वार्थ चाहते हैं।