Reading Class 5 Hindi Notes Veena Chapter 2 न्याय की कुर्सी Nyay Ki Kursi Summary in Hindi helps students understand the main plot quickly.
Nyay Ki Kursi Class 5 Summary in Hindi
Nyay Ki Kursi Class 5 Hindi Summary
न्याय की कुर्सी का सारांश – Nyay Ki Kursi Summary in Hindi
‘न्याय की कुर्सी’ पाठ की कहानी उज्जैन की प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगरी की है। नगर के बाहर एक लंबे-चौड़े मैदान में एक लड़कों का झुंड खेल रहा था। उनमें से एक लड़का एक टीले पर चढ़ा किंतु अचानक ठोकर खाकर गिर गया। आसपास देखने पर उसे वहाँ एक चिकना बड़ा-सा पत्थर दिखा। उसने अपने मित्रों को भी वह शिला दिखाई। फिर बड़ी शान के साथ उस शिला पर बैठकर उन्हें कहने लगा कि यह मेरा सिंहासन है और मैं राजा हूँ। तुम सब मेरे दरबारी । तुम अपनी-अपनी फरियाद लेकर आओ । फिर मैं फैसला करूँगा। सबको यह खेल पसंद आया। वे एक-एक करके आते और मन से कोई भी फरियाद सुनाते और लड़का उसका न्याय करता । उन्हें यह खेल इतना अच्छा लगा कि वे सब इसे रोज खेलने लगे। राजा बने लड़के की न्याय – बुद्धि की चर्चा होने लगी। सभी लोग उसके न्याय की प्रशंसा करते और कहते कि अवश्य ही कोई दैवी शक्ति है। एक बार दो किसानों में झगड़ा हुआ। वे राजा के दरबार न जाकर उस लड़के के पास गए।

लड़के ने इस गंभीर झगड़े का जो निर्णय लिया उसे देखकर सभी दंग रह गए। उसके बाद तो सभी ने राजा के पास दरबार में न जाकर इस लड़के के पास आना शुरू कर दिया। राजा के कानों में जब यह बात पड़ी तो वह क्रोधित हो गया। वह स्वयं लड़के का न्याय देखने आया, तो हैरान रह गया। उन्होंने कहा सच में यह लड़का बहुत बुद्धिमान है। तब मंत्री ने उन्हें बताया कि रोज फैसला सुनाने वाला लड़का अस्वस्थ है, यह कोई नया लड़का है। इस पर राजा ने कहा कि ज़रूर इस कुर्सी में ही कोई चमत्कार है।
राजा ने उस जगह को खुदवाया तो पाया कि वह केवल एक पत्थर ही नहीं अपितु सुंदर सिंहासन है। जिसके चारों पायों पर चार देवदूतों की मूर्तियाँ बनी हुई थीं। विद्वानों ने बताया कि यह राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था जो अपने न्याय और विवेक के लिए जाने जाते थे। राजा ने वह सिंहासन राजदरबार में रखवा लिया और सोचा कि अब वह स्वयं उस पर बैठकर फैसला करेंगे। अगले दिन जैसे ही राजा सिंहासन पर बैठने लगे तभी उन्हें ‘ठहरो’ शब्द सुनाई दिया। राजा ने इधर-उधर देखा पर कोई दिखाई नहीं दिया। दूसरी बार आवाज आने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह सिंहासन के पाये की मूर्ति की आवाज थी । मूर्ति ने कहा कि यदि तुमने कभी चोरी नहीं की है तो तुम इस पर बैठने योग्य हो। राजा ने स्वीकार किया कि उसने दरबारी की जमीन पर कब्जा कर लिया था। मूर्ति ने राजा को बैठने के लिए मना कर दिया और तीन दिन का प्रायश्चित करने को कहा। उसके बाद मूर्ति आकाश में उड़ गई। चौथे दिन राजा उपवास के बाद फिर सिंहासन पर बैठने लगा तब दूसरी मूर्ति ने उसे रोका। मूर्ति ने कहा कि यदि आपने कभी झूठ नहीं बोला तो आप इस पर बैठ सकते हैं। इस पर राजा ने विचार किया कि झूठ तो कई बार बोला था। वह पीछे हट गया । मूर्ति पंख फैलाकर आकाश में उड़ गई। राजा ने फिर उपवास किया और फिर बैठने की चेष्टा (कोशिश) की।

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तीसरी मूर्ति ने राजा को रोका और पूछा कि क्या राजा ने कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाई है ? राजा इस बार भी पीछे हट गया और तीसरी मूर्ति भी उड़ गई। तीन दिन का उपवास कर राजा फिर सिंहासन पर बैठने लगा तो चौथी मूर्ति ने कहा कि अब तक जो भी लड़के इस पर बैठते थे वे सब भोले-भाले थे। उनके मन में कलुषित भावना नहीं थी। अगर तुम्हारा विश्वास है कि तुम इस पर बैठने योग्य हो तो इस पर बैठ सकते हो । राजा ने मन ही मन सोचा कि मुझसे ज्यादा धनवान, बलवान और बुद्धिमान और कौन होगा? यह सोचकर राजा जैसे ही सिंहासन की तरफ बढ़ा, उसी समय चौथी मूर्ति पंख फैलाकर सिंहासन समेत आकाश में उड़ गई।
‘न्याय की कुर्सी’ इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि न्याय करने के लिए केवल शक्ति, पद या अधिकार ही काफी नहीं हैं बल्कि एक शुद्ध (पवित्र) हृदय, सद्गुण, ईमानदारी, निःस्वार्थता, चरित्र और न्याय करने की इच्छा होना अत्यंत आवश्यक है। यह कहानी न्याय, ईमानदारी और आत्म-सुधार के महत्त्व को दर्शाती है और यह संदेश देती है कि हमें अपनी कमियों को पहचानना चाहिए और उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

न्याय की कुर्सी शब्दार्थ
पृष्ठ 8
- उज्जैन – मध्य प्रदेश का एक प्रमुख शहर ।
- प्राचीन – पुराना ।
- ऐतिहासिक – जिसका संबंध इतिहास (History) से हो।
- टीले – छोटी पहाड़ियाँ ।
- झुंड – समूह ।
- ठोकर-चलते या दौड़ते समय पैर का किसी चीज से टकराना और लड़खड़ाकर गिर पड़ना ।
- शिला – पत्थर ।
- सिंहासन – राजा की गद्दी ।
- दरबारी – दरबार में रहने वाला व्यक्ति ।
- फरियाद – शिकायत ।
- फैसला- न्याय निपटारा या निर्णय।
- काल्पनिक – मनगढ़त या झूठ-मूठ ।
- गवाह – गवाही देने वाला ।
- आनंद – मजा ।
- बयान – कथन, घोषणा या बातचीत।
पृष्ठ 9
- न्याय- बुद्धि-फैसला लेने की समझदारी ।
- अवश्य-पक्का ।
- दैवी शक्ति – देवी – देवताओं से प्राप्त शक्ति ।
- गंभीर-गहरा या जटिल ।
- चर्चा – जिक्र या बातचीत ।
- बयान- बातचीत ।
- दंग – हैरान।
- संतोष – इच्छा के पूरा होने पर मिलने वाली मानसिक शांति और आनंद, तृप्ति ।
- क्रोध – गुस्सा |
- गरजकर – गुस्से में ज़ोर से बोलना ।
- छोकरा-लड़का।
- मजाल – हिम्मत ।
- न्यायकर्ता – न्याय (फैसला) करने वाला ।
- किस्सों – कहानियाँ ।
पृष्ठ 10
- लाव-लश्कर- सेना, फौज या किसी व्यक्ति के साथ आने वाले लोग या सामान।
- प्रिय- प्यारा ।
- स्तंभित-हैरान।
- बुद्धि-अक्ल ।
- लोहा मानना – यह एक मुहावरा है। इसका अर्थ है कि किसी की वीरता या ज्ञान की श्रेष्ठता को स्वीकार करना ।
- आश्चर्य – हैरान ।
- जाँच करना – परखना, पता लगाना ।
- पायों – पैर ।
- देवदूत – देवों के दूत अर्थात् देवों का संदेश लाने वाला ।
- विद्वान – शिक्षित, पंडित या ज्ञानी।
पृष्ठ 11
- ऐसा-वैसा – आम या साधारण ।
- सदियों – वर्षों या सालों पुराना |
- विवेक – समझदारी ।
- प्रसिद्ध – मशहूर ।
- आज्ञा – आदेश ।
- पाये-पैर ( कुर्सी या सिंहासन से संबंधित ) ।
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पृष्ठ 12
- लज्जा-शर्म से। सर-सिर ।
- कब्जा करना – छीन लेना ।
- प्रायश्चित – पश्चाताप या अपनी गलती का पछतावा करना।
- उपवास – व्रत ।
- विश्वास – यकीन ।
- सकपकाना – हिचकना या चकित होना ।
- हिचकिचाना- झिझकना, संकोच करना ।
- लड़खड़ाना – संतुलन खोना ।
- कलुष – पाप, खोट या बुरी भावना।
- धनवान- दौलतमंद या जिसके पास बहुत धन हो ।
- बलवान – ताकत वाला/जिसके पास बल हो ।
- बुद्धिमान – समझदार या अक्लमंद। योग्य-लायक।
पृष्ठ 13
- दृढ़ – मज़बूत ।
- समेत – सहित या साथ ।