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Class 9 Hindi Chapter 5 आखिरी चट्टान तक Question Answer
आखिरी चट्टान तक Class 9 Question Answer
Class 9 Ganga Chapter 5 Question Answer – Class 9 Hindi आखिरी चट्टान तक Question Answer
अभ्यास (पृष्ठ 90-98)
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
प्रश्न 1.
लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य कहाँ से देखा?
(क) विवेकानंद चट्टान से
(ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से
(ग) पच्छिमी क्षितिज से
(घ) सैंड हिल से
उत्तर:
(ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से
तर्क – सैंड हिल पर लोगों की भीड़ थी और एक दूसरा टीला दृश्य को ओट में छिपा रहा था। लेखक ने पूर्ण क्षितिज देखने के लिए कई टीले पार किए और अंततः सबसे ऊँचे टीले से सूर्यास्त देखा।
प्रश्न 2.
“मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ” यह कथन लेखक की किस मनःस्थिति को दर्शाता है?
(क) मौन हो जाना
(ख) विस्मित हो जाना
(ग) भ्रमित हो जाना
(घ) आशंकित होना
उत्तर:
(ख) विस्मित हो जाना
तर्क – लेखक प्रकृति की विशालता और सुंदरता में इतना खो गया कि अपनी पहचान तक भूल गया, जो गहरे विस्मय को दर्शाता है।
प्रश्न 3.
“मैंने सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो।” इस कथन में कौन-सा भाव व्यक्त होता है?
(क) करुणा
(ख) विनम्रता
(ग) आत्मीयता
(घ) संतुष्टि
उत्तर:
(घ) संतुष्टि
तर्क – लेखक ने बहुत थकान और संघर्ष के बाद उस ऊँचे टीले को पाया था। लक्ष्य प्राप्त करने के बाद जो सुख मिलता है, उसे ही यहाँ ‘संतुष्टि’ के रूप में व्यक्त किया गया है।
प्रश्न 4.
“शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” वाक्य में वर्णन है-
(क) बलखाती लहरों का
(ख) सागर की व्यापकता का
(ग) सूर्यास्त के दृश्य का
(घ) पच्छिमी क्षितिज का
उत्तर:
(ख) सागर की व्यापकता का
तर्क – लेखक ने समुद्र के तीनों ओर फैले अंतहीन पानी और उसकी लहरों की प्रचंडता को देखकर यह बात कही थी, जो सागर की विशालता का प्रतीक है।
प्रश्न 5.
लेखक की कन्याकुमारी की यात्रा का वर्णन पढ़कर कहा जा सकता है कि-
(क) यह कन्याकुमारी के मौसम को प्रमुखता से वर्णित करता है।
(ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है।
(ग) यह केवल यात्रा के रोमांच पर केंद्रित है।
(घ) इसमें कन्याकुमारी का काल्पनिक वर्णन मिलता है।
उत्तर:
(ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है।
तर्क – पूरे पाठ में लेखक ने अपने अनुभव, भावनाएँ और दृश्य इतने जीवंत ढंग से प्रस्तुत किए हैं कि पाठक खुद को वहाँ महसूस करता है।
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मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए।
प्रश्न 1.
यात्रियों का समूह सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए सैंड हिल की ओर बढ़ता जा रहा था लेकिन लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुकने के बाद दूसरे टीले की ओर बढ़ने लगा। उसके ऐसा करने के पीछे मूल कारण क्या था?
उत्तर:
लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि वहाँ से अरब सागर की ओर का दृश्य एक दूसरे ऊँचे टीले के कारण छिपा हुआ था। लेखक सूर्यास्त को ‘पूरे विस्तार’ के साथ देखना चाहता था। उसकी जिज्ञासा और सौंदर्य को उसकी पूर्णता में देखने की चाह ही उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी।
प्रश्न 2.
लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के विषय में क्या-क्या बताया?
उत्तर:
लेखक ने स्थानीय लोगों के विषय में निम्नलिखित बातें बताई-
- वहाँ की 8,000 की आबादी में लगभग 400-500 शिक्षित बेरोजगार युवक हैं।
- ये युवा (ग्रेजुएट होने के बावजूद) सीपियों का गूदा खाकर दार्शनिक बहसें करते हैं और नौकरियों के लिए अर्जियाँ देते हैं।
- अपनी जीविका के लिए वे फोटो एल्बम, शंख और मालाएँ बेचने जैसे छोटे-मोटे काम करते हैं।
प्रश्न 3.
“अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया” इस पंक्ति में ‘प्रयत्न की सार्थकता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘प्रयत्न की सार्थकता’ का अर्थ है- अपने लक्ष्य की प्राप्ति से मिलने वाला संतोष । लेखक थक चुका था, फिर भी वह ऊँचे टीलों पर चढ़ता रहा। जब अंततः उसे वह ‘खुला ‘क्षितिज’ मिल गया जहाँ से सूर्यास्त स्पष्ट दिख रहा था, तो उसे लगा कि उसकी मेहनत सफल (सार्थक) हो गई है।
प्रश्न 4.
यात्रा-वृत्तांत में आए उन दृश्यों के विषय में लिखिए जिनका अनुभव लेखक के लिए बिल्कुल नया था।
उत्तर:
लेखक के लिए निम्नलिखित अनुभव नवीन थे-
- बहुरंगी रेत – समुद्र तट पर एक-एक इंच पर बदलते रेत के अनाम रंग (पीली, लाल, सुरमई, काली)।
- चूरा बूँदों की जालियाँ – लहरों का नुकीली चट्टानों से कटकर बारीक बूँदों के जाल के रूप में बिखरना।
- रंगों का तेजी से बदलना – सूर्यास्त के समय पानी के रंग का सोने से लहू (लाल) और फिर बैंजनी होना।
प्रश्न 5.
यात्रा-वृत्तांत से ऐसे दो अंश चुनकर लिखिए जिससे लेखक की मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति का पता चलता है।
उत्तर:
अंश 1 – “टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर लगता कि शायद अब एक ही टीला और है…” (यह लक्ष्य के प्रति उनकी जिद को दिखाता है)।
अंश – 2 – “चट्टान की नोकों पर पैर रखता किसी तरह उसके ऊपर पहुँच गया। सोचा नीचे खड़े रहने की अपेक्षा वह अधिक सुरक्षित होगा।” (यह संकट के समय हार मानने के बजाय रास्ता खोजने की उनकी दृढ़ता को दर्शाता है)।
विधा से संवाद
यात्रा का वृत्तांत
नीचे यात्रा – वृत्तांत के प्रमुख तत्वों / विशेषताओं को कुछ प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से दर्शाया गया है। इन्हें पढ़कर यात्रा-वृत्तांत की रचना-प्रक्रिया को समझने का प्रयास कीजिए। अपनी किसी यात्रा को इन बिंदुओं के माध्यम से समझाइए।
नीचे यात्रा-वृत्तांत के प्रमुख तत्वों विशेषताओं को कुछ प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से दर्शाया गया है। इन्हें पढ़कर यात्रा- वृत्तांत की रचना-प्रक्रिया को समझने का प्रयास कीजिए। अपनी किसी यात्रा को इन बिंदुओं के माध्यम से समझाइए।

उत्तर:
मेरी वाराणसी (बनारस) यात्रा
1. दृश्य वर्णन – मैंने अपनी छुट्टियों में उत्तर प्रदेश के प्राचीन और पवित्र नगर वाराणसी की यात्रा की। गंगा नदी के किनारे बसे इस शहर का दृश्य अत्यंत मनमोहक और अद्भुत है। सुबह के समय घाटों पर उगते सूर्य की लालिमा गंगा के जल में चमकती हुई अत्यंत सुंदर प्रतीत होती है। दशाश्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती का दृश्य अत्यंत भव्य होता है। जलती हुई दीपमालाएँ, घंटियों की ध्वनि और मंत्रोच्चार से पूरा वातावरण दिव्य हो उठता है।
2. आत्मानुभूति व भावनाएँ – इस यात्रा के दौरान मुझे गहरी शांति और आध्यात्मिक अनुभूति हुई। गंगा तट पर बैठकर मन में एक अलग ही सुकून का अनुभव हुआ। ऐसा लगा मानो जीवन की सारी चिंताएँ दूर हो गई हों। गंगा की लहरों को देखकर मन में श्रद्धा और आत्मचिंतन के भाव उत्पन्न हुए।
3. सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य – वाराणसी भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का केंद्र है। यहाँ के घाट, मंदिर और संकरी गलियाँ प्राचीन संस्कृति की झलक प्रस्तुत करती हैं। मैंने काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन किए और वहाँ की धार्मिक आस्थाओं को निकट से देखा। स्थानीय लोग अत्यंत श्रद्धालु और सरल स्वभाव के हैं। यहाँ की बनारसी साड़ियाँ और पान भी बहुत प्रसिद्ध हैं।
4. जीवन-दर्शन – इस यात्रा ने मुझे जीवन की गहराई को समझने का अवसर दिया। वाराणसी में जीवन और मृत्यु दोनों का संगम दिखाई देता है। मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार होते देख यह अनुभव हुआ कि जीवन क्षणभंगुर है। इससे मुझे यह सीख मिली कि हमें अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए और हर क्षण का महत्व समझना चाहिए।
5. शैलीगत विशेषताएँ – इस यात्रा वृत्तांत में सजीव और भावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया गया है। दृश्यात्मकता, उपमा और प्रतीकों के माध्यम से अनुभव को प्रभावशाली बनाया गया है। जैसे- “गंगा की लहरें मानो जीवन के रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए थीं।”
6. रोमांच व संघर्ष – वाराणसी की संकरी गलियों में रास्ता ढूँढ़ना थोड़ा कठिन था। भीड़-भाड़ के कारण कई बार असुविधा भी हुई, परंतु यही अनुभव यात्रा को रोमांचक बनाता है। गंगा आरती में शामिल होना और नाव से घाटों की सैर करना मेरे लिए एक यादगार अनुभव रहा।
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विषयों से संवाद
यात्रा और खोज
संसार में बहुत से लोगों ने लंबी-लंबी यात्राएँ की हैं और अपनी यात्रा से अर्जित ज्ञान और अनुभव से समाज को समृद्ध किया है। पुस्तकालय एवं शिक्षक की सहायता से कुछ महत्वपूर्ण-वृत्तांत और उनके लेखकों के विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए और लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक संकेत नीचे दिया गया है।

उत्तर:
| यात्रा-वृत्तांत | स्थान | रचनाकार |
| किन्नर देश में | हिमाचल प्रदेश (किन्नौर) | राहुल सांकृत्यायन |
| एक बूँद सहसा उछली | यूरोप की यात्रा | अज्ञेय |
| पैरों में पंख बाँधकर | विश्व भ्रमण | रामवृक्ष बेनीपुरी |
| चीड़ों पर चाँदनी | यूरोप और शिमला | निर्मल वर्मा |
मेरे देश की धरती
कन्याकुमारी भारत के तमिलनाडु राज्य में स्थित एक तटीय शहर है जिसके प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण पाठ में हुआ है।
प्रश्न 1.
भारत के समुद्री तट पर स्थित अन्य राज्यों के नाम तथा उनकी अवस्थिति को भारत के मानचित्र पर चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
भारत के समुद्री तट पर स्थित प्रमुख राज्य हैं-
- पश्चिमी तट (अरब सागर) – गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और केरल।
- पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी) – तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल।
इन्हें आप भारत के मानचित्र में पश्चिम (अरब सागर) और पूर्व (बंगाल की खाड़ी) के अनुसार चिह्नित कर सकते हैं।
प्रश्न 2.
यात्रा करना सभी को अच्छा लगता है। आपके मन में भी कुछ जगहों को देखने की इच्छा अवश्य हुई होगी। अपनी पसंद की उन जगहों की सूची नीचे दिए गए शीर्षकों के अनुसार बनाइए।

उत्तर:
मेरी पसंद के पर्यटन स्थल (तालिका)
| पर्यटन स्थल | राज्य जहाँ वह स्थित है | पर्वतीय / समुद्री / मैदानी / अन्य क्षेत्र | जलवायु | घूमने का अनुकूल समय |
| शिमला | हिमाचल प्रदेश | पर्वतीय | ठंडी | मार्च-जून |
| गोवा | गोवा | समुद्री | गर्म व आर्द्र | नवंबर-फरवरी |
| जयपुर | राजस्थान | मैदानी / रेगिस्तानी | गर्म | अक्टूबर-मार्च |
| श्रीनगर | जम्मू-कश्मीर | पर्वतीय | ठंडी | अप्रैल-अक्तूबर |
| दार्जिलिंग | पश्चिम बंगाल | पर्वतीय | ठंडी | मार्च-मई |
इस प्रकार अपनी रुचि के अनुसार अन्य राज्य भी लिख सकते हैं।
प्रश्न 3.
कन्याकुमारी की भौगोलिक स्थिति, परिवेश, महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल एवं जन-जीवन का वर्णन करते हुए बताइए कि वहाँ की स्थिति आपके राज्य अथवा शहर / गाँव से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
कन्याकुमारी – भौगोलिक स्थिति और जन-जीवन
भौगोलिक स्थिति और परिवेश – कन्याकुमारी भारतीय मुख्य भूमि का दक्षिणतम सिरा है, जहाँ तीन जलराशियों (अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी) का मिलन होता है। यहाँ की भूमि पथरीली रेतीली और आसपास का क्षेत्र भी नारियल के पेड़ों से घिरा है।
महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल – विवेकानंद रॉक मेमोरियल, तिरुवल्लुवर प्रतिमा कन्याकुमारी मंदिर, गांधी मंडपम और सैंड हिल।
विभिन्नता (दिल्ली के संदर्भ में) :
- जलवायु – दिल्ली में विषम जलवायु (बहुत गर्मी / बहुत सर्दी) है, जबकि कन्याकुमारी में वर्ष भर आई और उष्णकटिबंधीय (सम) जलवायु रहती है।
- भूगोल – दिल्ली एक मैदानी इलाका है जहाँ यमुना नदी है, जबकि कन्याकुमारी एक तटीय शहर है जो अंतहीन समुद्र से घिरा है।
- जन-जीवन – दिल्ली की जीवनशैली भागदौड़ भरी और महानगरीय है, जबकि कन्याकुमारी में धार्मिक आस्था, पर्यटन और मछुआरों का शांत जीवन प्रमुख है। कन्याकुमारी भारत के दक्षिणी क्षेत्र पर स्थित एक खूबसूरत तटीय शहर है। यहाँ का जन-जीवन पारंपरिक, धर्मिक तथा समुद्र पर आधारित है। यहाँ की संस्कृति में दक्षिण भारतीय छाप दिखाई पड़ती है।
प्रश्न 4.
इस यात्रा – वृत्तांत में कन्याकुमारी में स्थित चट्टान को आखिरी चट्टान कहा गया है। पुस्तकालय या अन्य स्त्रोतों तथा समाज विज्ञान के अपने शिक्षक से बातचीत करके पता लगाइए कि वर्तमान समय में भारत का अंतिम छोर (दक्षिणतम बिंदु) किसे माना जाता है। उस स्थान के विषय में लिखिए।
उत्तर:
भारत का दक्षिणतम बिंदु: इंदिरा पॉइंट
वर्तमान समय में भारत संघ का अंतिम दक्षिणतम बिंदु ‘इंदिरा पॉइंट’ माना जाता है।
- अवस्थिति – यह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ‘ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित है।
- विशेषता – मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिंदु ‘कन्याकुमारी’ है, लेकिन यदि पूरे भारत (द्वीपों सहित) की बात करें, तो इंदिरा पॉइंट सबसे दक्षिण में है।
- ऐतिहासिक तथ्य – इसे पहले ‘पगमैलियन पॉइंट’ के नाम से जाना जाता था। 2004 की सुनामी में इसका एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया था।
प्रश्न 5.
इंटरनेट या अन्य किन्हीं माध्यमों से पता लगाइए कि आखिरी चट्टान में वर्णित कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक चट्टान के स्वरूप में किस प्रकार का विस्तार हुआ है?
उत्तर:
विवेकानंद स्मारक चट्टान का वर्तमान विस्तार
‘आखिरी चट्टान’ पाठ लिखे जाने के बाद से विवेकानंद रॉक मेमोरियल के स्वरूप में काफी विकास और विस्तार हुआ है:
- तिरुवल्लुवर की विशाल प्रतिमा – विवेकानंद चट्टान के ठीक बगल में एक अन्य छोटी चट्टान पर प्रसिद्ध तमिल संत और कवि तिरुवल्लुवर की 133 फीट ऊँची भव्य पत्थर की प्रतिमा स्थापित की गई है। यह प्रतिमा 133 अध्यायों वाले उनके काव्य ‘तिरुक्कुरल’ का प्रतीक है।
- स्मारक का ढाँचा – चट्टान पर ‘विवेकानंद मंडपम’ और श्रीपाद मंडपम बनाए गए हैं। यहाँ एक ध्यान – कक्ष भी है जहाँ शांतिपूर्वक ध्यान किया जा सकता है।
- पर्यटन सुविधाएँ – अब यहाँ पहुँचने के लिए बड़ी और आधुनिक नौका सेवा उपलब्ध है, जो पर्यटकों को तट से चट्टान तक ले जाती है। रात के समय तिरुवल्लुवर प्रतिमा और रॉक मेमोरियल को आधुनिक रंगीन रोशनी से सजाया जाता।
हस्तशिल्प कौशल

“दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख-मालाएँ दिखला रही थीं।”
उपर्युक्त पंक्ति में स्थानीय युवतियों द्वारा यात्रियों को दिखाए जाने वाली शंख-मालाओं का उल्लेख है। यह भारतीय हस्तकला उद्योग के एक पारंपरिक रूप को दर्शाता है, जहाँ स्थानीय कारीगर घरेलू स्तर पर उत्पाद बनाते और बेचते हैं। शिक्षक की सहायता से हस्तकला और कुटीर उद्योग के विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए।
प्रश्न 1.
किसी भी स्थानीय शिल्पकार से बात करके निम्नलिखित बिंदुओं पर जानकारी संगृहीत कीजिए। यह कार्य दो-दो के जोड़े में कीजिए-

• शिल्प का नाम
• यह कार्य कब से कर रहे हैं?
• इसका प्रशिक्षण कहाँ से लिया?
• शिल्प निर्माण में घर की महिलाओं की साझेदारी
• प्रयुक्त सामग्री, तकनीक, लागत और विपणन
• औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण
उत्तर:
शिल्पकार के साक्षात्कार द्वारा प्रस्तुत जानकारी
• शिल्पकार का नाम – रामलाल वर्मा
• शिल्प का काम – मिट्टी के फूलदान बनाना।
• कार्य कब से कर रहे है? – पिछले 20 वर्षों से।
• कार्य का प्रशिक्षण कहाँ से लिया? – शुरुआत में अपने दादा और पिता से सीखा। बाद में सरकारी कुटीर प्रशिक्षण केंद्र से 6 महीने का औपचारिक प्रशिक्षण लिया। वैसे यह हमारा पारंपरिक व्यवसाय है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
• शिल्प निर्माण में महिलाओं की कितनी भागीदारी? – हमारे घर की महिलाओं की इस कार्य में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। वे मिट्टी के फूलदानों को सुंदर रंग में रंगती हैं और उस पर विभिन्न प्रकार के बेल-बूटों की सजावट करती हैं। यहाँ तक कि महिलाएँ फूलदान के लिए मिट्टी भी तैयार करती हैं।
प्रयुक्त सामग्री, तकनीक और लागत
• एक उत्पाद बनाने में लागत और कितना समय लगता है? – एक साधारण मिट्टी का फूलदान बनाने में 50-100 रूपये की लागत आती है और इसे बनाने में 1-2 दिन लग जाते हैं। फिर सूखने के पश्चात इस पर रंगाई और सजावट का कार्य किया जाता है।
औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण
• औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण कितना और किस प्रकार मिला? – मुझे इस शिल्प का मूल ज्ञान तो परिवार से ही मिला लेकिन अपने कौशल को और बेहतर बनाने के लिए मैंने सरकारी कुटीर उद्योग प्रशिक्षण केंद्र से 6 महीने का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
वहाँ से मैंने निम्नलिखित बातें सीखीं-
- पारंपरिक के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का ज्ञान
- नए-नए डिज़ाइन बनाना
- उत्तम गुणवत्ता के साथ कार्य
- पैकिंग करने, कीमत तय करने आदि व्यापारिक जानक
- ऋण, सब्सिडी व अन्य सरकारी योजनाओं की जानकारी
इस प्रकार हमें प्रस्तुत शिल्पकार बहुत ही आत्मविश्वासी और संतोषी व्यक्ति लगे। इनसे बातचीत का अनुभव बहुत ही अच्छा और यादगार रहा।
कुटीर उद्योग
- कुटीर उद्योग वे उद्योग होते हैं जो घर या छोटे स्तर पर चलाए जाते हैं। ‘कुटीर’ का अर्थ होता है ‘घर’। ऐसे उद्योग जिसे घर पर प्रायः घर के सभी सदस्यों द्वारा मिलकर किया जाता है।
- इस उद्योग में पूँजी कम लगती है।
उदाहरण- खादी उद्योग, हस्तकरघा, (अचार- पापड़) अगरबत्ती, पतंग बनाना तथा लिफाफे बनाना इत्यादि शामिल है।
महत्व
- यह उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण है और वहाँ की आय का एक महत्वपूर्ण जरिया है।
- ये पारंपरिक कला को सुरक्षित रखते हैं।
- ये देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं और निर्यात बढ़ाते हैं।
- ये महिलाओं और छोटे कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाते हैं।
प्रश्न 2.
डिजिटल खरीदारी और ई-वाणिज्य कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने में किस प्रकार उपयोगी है?
उत्तर:
डिजिटल खरीदारी और ई-वाणिज्य का कुटीर उद्योगों में निम्नलिखित रूप में उपयोगिता है-
- कुटीर उद्योग के उत्पाद ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश-विदेश तक पहुँच जाते हैं।
- छोटे कारीगरों को बड़े बाजार मिलते हैं, जिससे उनकी आय बढ़ती है।
- बिचौलियों की भूमिका कम हो जाती है, जिससे लाभ सीधे उत्पादक को मिलता है।
- सोशल मीडिया और वेबसाइट्स के जरिए प्रचार-प्रसार आसान हो जाता है।
इस प्रकार, ई-वाणिज्य छोटे उद्योगों को आत्मनिर्भर बनने में मदद करता है।
• निर्यात संवर्धन परिषद् ई-वाणिज्य के साथ मिलकर कारीगरों को अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता और अनुपालन मानकों को पूरा करने में सहायता करती है।
प्रश्न 3.
हस्तशिल्प कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी इकट्ठा कीजिए और अपनी कक्षा में उस पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
हस्तशिल्प कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार के द्वारा निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं-
“मेक इन इंडिया” और “वोकल फॉर लोकल” अभियान
- हस्तशिल्प मेलों और प्रदर्शनियों का आयोजन
- कारीगरों को प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता
- ऑनलाइन प्लेटफॉर्म (जैसे सरकारी ई-मार्केट) उपलब्ध कराना
- निर्यात को बढ़ावा देना
इससे कारीगरों को पहचान और रोजगार मिलता है।
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मिलकर चलें
आपकी कक्षा में कुछ विशेष आवश्यकता वाले साथी भी होंगे जिन्हें अपने दैनिक जीवन में अनेक तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता होगा।
प्रश्न 1.
ऐसे साथियों को अगर किसी यात्रा पर जाना हो तो उनके समक्ष किस प्रकार की चुनौतियाँ आ सकती हैं?
उत्तर:
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के सामने यात्रा के दौरान आने वाली चुनौतियाँ-
- गम्यता – ऊबड़-खाबड़ रास्ते सीढ़ियाँ और संकीर्ण गलियाँ।
- परिवहन – बसों या ट्रेनों में व्हीलचेयर के लिए जगह या लिफ्ट की कमी।
- सूचना का अभाव – ब्रेल लिपि में संकेतों का न होना या सांकेतिक भाषा (Sign Language) की सुविधा न मिलना।
- शौचालय – विशेष आवश्यकताओं के अनुकूल शौचालय (Disabled Friendly Toilets) का न होना।
प्रश्न 2.
उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कुछ ऐसे सुझाव दीजिए जो उनकी यात्रा को सहज बनाने में उपयोगी हों।
उत्तर:
यात्रा को सहज बनाने के सुझाव –
- यूनिवर्सल डिजाइन – पर्यटन स्थलों पर ढलान (Ramps), रेलिंग और लिफ्ट की अनिवार्य सुविधा हो।
- सहायक उपकरण – स्टेशनों और हवाई अड्डों पर व्हीलचेयर और सहायक स्टाफ की उपलब्धता।
- तकनीकी सहायता – मोबाइल ऐप्स जिनमें ऑडियो गाइड (नेत्रहीनों के लिए) और वीडियो सांकेतिक भाषा (मूक-बधिरों के लिए) हो।
- विशेष कोच – सार्वजनिक परिवहन में कम से कम एक कोच पूरी तरह ‘दिव्यांग मित्र’ बनाया जाए।
प्रश्न 3.
अपने द्वारा दिए गए सुझावों पर विद्यालय के विशेष शिक्षा शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए और समझिए कि आपके द्वारा सुझाए गए उपाय कितने प्रभावी हैं तथा उनमें और क्या बदलाव किए जा सकते हैं?
उत्तर:
जब मैंने अपनी कक्षा अध्यापिका से बात की तो वे बहुत खुश हुई। उन्होंने महिला – सहायिका की विशेष ड्यूटी लगवाई। वह हमेशा अमीना के साथ रहेगी। अध्यापिका ने मुझे कहा- सरला! तुम बहुत अच्छी हो, करुणावान हो। तुम अपनी सहेली के साथ रहना। उसे हर अनुभव सुनाना। उससे बातें करना, गप्पें मारना। अगर कोई उसे परेशान करे तो आगे आना।
प्रश्न 4.
प्राप्त सुझावों के विषय में कक्षा के विशेष आवश्यकता वाले साथियों से भी चर्चा कीजिए और उनकी राय जानने का प्रयास कीजिए।
उत्तर:
मैंने स्वयं अमीना से बात की। वह मेरी बात सुनकर बहुत खुश हुई। उसने मुझे गले से लगा लिया। बोली- तुम मेरी पिछली जन्म की साथी हो। सुनो! मैं तुम पर कम-से-कम बोझ बनूँगी। मुझे जहाँ बिठा दोगे, बैठ जाऊँगी। मैं गाना गाऊँगी। सबका मनोरंजन करूँगी। और सरला! इनते साथियों के बीच समुद्र के किनारे कभी गई नहीं हूँ। मुझे बहुत खुशी मिलेगी। बस मुझ पर दया न करना! मुझे अपनी सहेली समझना।
सृजन
प्रकृति की ओर
क्या आपने कभी सूर्योदय और सूर्यास्त के समय का दृश्य देखा है? अगर नहीं तो एक दिन सुबह जल्दी उठकर उगते सूरज की लालिमा को देखिए और अस्त होते सूर्य के साथ शाम का भी आनंद लीजिए। अब इन दोनों दृश्यों की तुलना करते हुए अपने अनुभव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हाँ, मैं जब नैनीताल गई थी, तब मैंने सूर्योदय और सूर्यास्त के समय का दृश्य देखा था।
तुलना-
सूर्योदय : एक नई आशा – जब सुबह की पहली किरण पहाड़ की ओट से झाँकती है, तो प्रकृति में एक चैतन्यता छा जाती है। आसमान का रंग गहरा केसरिया और फिर हल्का पीला होता जाता है। चिड़ियों की चहचहाहट में एक ऊर्जा होती है। सूर्योदय आरंभ का प्रतीक है, यह हमें कार्य करने की प्रेरणा देता है। इसमें एक ‘शोर’ है जो जगाता है।
सूर्यास्त : एक शांत उपसंहार इसके विपरीत, सूर्यास्त के समय आसमान रंगों की एक अद्भुत कलाकारी पेश करता है। सिंदूरी, बैंगनी और सुनहरे रंगों का ऐसा मेल जो शब्दों से परे है। सूर्यास्त में एक ठहराव है, एक उदासी है जो सुकून देती है। यह दिन भर के संघर्ष के बाद विश्राम का प्रतीक है। सूर्यास्त मौन है, जो हमें भीतर की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित करता है।
अनुभव की साझेदारी
विधा से संवाद के अंतर्गत आपने दिए गए बिंदुओं के माध्यम से यात्रा – वृत्तांत के प्रमुख तत्वों के विषय में जाना और समझा। इन तत्वों को ध्यान में रखकर आप भी अपने घूमे हुए किसी प्रिय स्थान के अनुभवों पर एक यात्रा संस्मरण लिखिए।
उत्तर:
एक बार मैं अपने माता-पिता के साथ ऋषिकेश से ऊपर एक स्थान रानी-चोरा गया। मुझे नाम थोड़ा-सा अजीब लगा। वहाँ पहुँचने के रास्ते बहुत सँकरे और पगडंडीनुमा थे। पहाड़ी रास्तों पर हमारी गाड़ी धीरे-धीरे उछलती हुई आगे बढ़ रही थी। मैं कुछ घबरा रहा था परंतु फिर भी हिम्मत से बैठा रहा। थोड़ी देर की कठिन चढ़ाई के पश्चात हम ऊपर पहुँच गए। वहाँ का नज़ारा देख कर मैं अचंभित था। वहाँ करीब 15 टेंट लगे थे जिनमें हमें ठहरना था। उन सभी टेंटों के बाहर सेब के पेड़ थे जिन पर कुछ हरे और कुछ लाल सेब लगे हुए थे। सामने इतने बादल तैर रहे थे मानो हम बादलों के ऊपर हों। चारों तरफ पहाड़ों पर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष मानो आकाश तक पहुँचने का रास्ता हो। मैं तो चारों तरफ घूमकर उस सौंदर्य को निहार रहा था कि तभी पापा ने टेंट की जिप खोलकर अंदर चलने के लिए कहा। मैं अपनी छोटी बहन और मम्मी-पापा के साथ टेंट के अंदर चला गया, जहाँ बहुत सुंदर बिस्तर बिछा था।
दो कुर्सी और एक मेज रखी थी। वह टेंट बहुत सुंदर सजा था। उसी में पीछे की तरफ बाथरूम बना था जहाँ एक नल लगा था और बाल्टी डिब्बा भी रखा था। मैंने पहली बार टेंट अंदर से देखा था। मैं अभी यह सब देख ही रहा था कि छोटी बहन चीख पड़ी। उसके इशारे पर हमने देखा कि टेंट की छत पर और कोनों में बहुत बड़ी-बड़ी मकड़ियाँ चिपकी हुई हैं जिन्हें देखकर मैं भी डर गया । तभी वहाँ का संचालक आया और बोला कि ये जंगल की मकड़ियाँ हैं, काटेगी नहीं! पर हमें बहुत डर लग रहा था। तब मैंने और मेरी बहन ने वहाँ से मकड़ियाँ भगाईं। अभी हम सब खाना खाकर सोने की तैयारी कर रहे थे कि संचालक फिर आया। कहने लगा कि टेंट की जिप अंदर से अच्छे से बंद कर लें तथा लाइट भी बंद कर लें क्योंकि यह जंगल का क्षेत्र है। रोशनी देखकर अक्सर टाइगर आ जाता है। यह सुनते ही हमारे शरीर में झुरझुरी – सी दौड़ गई। हमने झटपट लाइट बंद की और धीमी रोशनी में मोबाइल को तकिए की ओट में चलाया। जैसे-तैसे हमने वहाँ रात काटी परंतु अगली सुबह हम नाश्ते के बाद वहाँ से दूसरे स्थान की ओर चल दिए क्योंकि हम अब दूसरी रात वहाँ काटने के कतई भी मूड में नहीं थे। यह यात्रा मुझे हमेशा याद दिलाती है एक रोमांच की।
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चर्चा-परिचर्चा
प्रश्न-
• ‘यात्राएँ हमें समृद्ध करती हैं’ विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा आयोजित कीजिए।
उत्तर:
अध्यापक – बच्चो! ऋषिकेश की यात्रा कैसी रही?
अमन – श्रीमन! इस यात्रा ने मेरा जीवन बदल दिया। पहाड़ों की ठंडक और गंगा की निर्मल धारा देखकर मन प्रसन्न हो गया।
स्मिता – और श्रीमन! नहाने का जितना सुख बहती गंगा में मिला इतना सुख न शॉवर में मिला, न पूल में, न बाथरूम में और न बारिश में।
स्नेहा – श्रीमन! अब पता चला, लोग हजारों मील दूर से हरिद्वार और ऋषिकेश में क्या करने जाते हैं।
अमन – ऋषिकेश के ढाबे, होटल, बाज़ार, भोजन भी कितना स्वादिष्ट और सस्ता था।
स्मिता – हाँ, शुद्ध और स्वादिष्ट!
स्नेहा – मुझे तो झूलों में बहुत आनंद आया।
अमन – लक्ष्मण झूला, राम- झूला।
स्मिता – गंगा में तैरने वाली मछलियों का क्या कहना। मैंने उन्हें खूब खिलाया।
अमन – और श्रीमन! वहाँ के बाज़ार कितने आकर्षक और सस्ते थे।
स्मिता – और ठहरने के लिए कितने होटल थे, धर्मशालाएँ थीं।
स्नेहा – और वहाँ पूरा भारत उमड़ा पड़ा था। किसी को भारत के दर्शन हों तो ऋषिकेश- हरिद्वार चला जाए।
अध्यापक – देखा, यात्राएँ हमें कितना समृद्ध करती हैं।
आमन और स्मिता – हम फिर कब चलेंगी श्रीमन!
• “एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ।”
यात्रा के दौरान कई बार ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियाँ सामने आ जाती हैं। ऐसी किसी स्थिति का सामना करने के लिए व्यक्ति में किन गुणों को होना आवश्यक है? अपने सहपाठियों के साथ मिलकर इस विषय पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
यात्रा के दौरान अनेक बार ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियाँ सामने आ जाती हैं जैसे- रास्ता भटकना, स्वास्थ्य बिगड़ना, सामान खो जाना, कोई दुर्घटना हो जाना इत्यादि। उस समय हमें समझ और धैर्य से काम लेना चाहिए क्योंकि घबराने से समस्या दुगनी हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में शांत भाव से वक्त का जायजा लेना चाहिए और धैर्य के साथ परिस्थिति से बाहर निकलने हेतु उचित निर्णय लेना चाहिए। ऐसा परिस्थिति में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है-
- धैर्य – सबसे ज्यादा यही गुण हमें कठिन समय में स्थिर रखता है और उचित निर्णय की दिशा में अग्रसर करता है।
- समझदारी से निर्णय – परेशानी या मुसीबत में पड़ने पर हमें शांत भाव से पूरी परिस्थिति को जाँचना चाहिए और फिर समयानुसार उचित निर्णय लेकर कठिनाई से बाहर आने का प्रयास करना चाहिए।
- सतर्कता – यात्रा में यदि व्यक्ति सतर्क रहेगा तो निश्चय ही वह परेशानी में नहीं फँसेगा। इसलिए आसपास के वातावरण के प्रति सजगता रखें।
• यदि आपके पास भी कोई ऐसा अनुभव हो तो उसे अपने सहपाठियों के साथ साझा कीजिए।
उत्तर:
• मेरे जीवन में भी यात्रा का एक ऐसा अनुभव है जब हमें भी समस्या का सामना करना पड़ा। एक बार हम सपरिवार हिमाचल की यात्रा पर थे। हम कुल आठ लोग थे। सभी यात्रा में गीत गाते हुए आनंद ले रहे थे कि तभी ड्राईवर ने घबरा कर सूचित किया कि गाड़ी के ब्रेक फेल हो गए हैं। इतना सुनते ही हम सबके होश उड़ गए। एक तरफ पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाई में बहती व्यास नदी । ऐसा लगा कि अब बचना मुश्किल है। हमारी गाड़ी में दो छोटे बच्चे भी थे जिन्होंने रोना शुरू कर दिया। घबरा तो मैं भी गया परंतु पापा ने इशारे से शांत किया। मेरे पापा बहुत साहसी और समझदार थे। उन्होंने सबको धैर्य बँधाया।
हमारी गाड़ी सरपट दौड़ी चली जा रही थी कि तभी सामने से एक और गाड़ी आई। जब हमने गाड़ी की गति कम नहीं की तो सामने- से आती सभी गाड़ियों को स्थिति का अंदाजा हो गया। उन्होंने दूर से ही खतरे को भाँप कर गाड़ियाँ पीछे ही रोक लीं। तभी पापा ने कहा कि खतरा बहुत है पर एक आखिरी कोशिश अवश्य करनी है। आगे जैसी ईश्वर की मर्जी। उन्होंने ड्राईवर से कहा- आगे मोड़ पर जहाँ चौड़ाई है वहाँ गाड़ी को ज़ोर से पहाड़ में दे मारे। सब घबरा गए, परंतु और किसी के पास कोई रास्ता न था। तब ड्राईवर ने पापा की बात मानकर ऐसा ही किया, जिससे हमारी गाड़ी सड़क पर पलट गई और रुक गई। पापा और ड्राईवर ने गाड़ी के आगे का शीशा तोड़ा और सभी को गाड़ी से बाहर निकाला। तब तक पीछे रुकी गाड़ियों ने बचाव दल को सूचित कर दिया था। थोड़ी देर में बचाव दल पहुँचा। सबको थोड़ी-थोड़ी चोटें आईं थीं परंतु सबकी जान बच गई। सबने पापा के धैर्य और सूझबूझ की प्रशंसा की। मुझे अपने पापा पर बहुत गर्व अनुभव हो रहा था।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
क्रिया – विशेषण की पहचान और रेखांकन
“समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।”
उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित पद ‘धीरे-धीरे कम होना क्रिया की विशेषता बता रहा है। यहाँ कम होने की क्रिया धीमी गति से हो रही है।
जिस प्रकार संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं, उसी प्रकार क्रिया की विशेषता बताने वाले शब्द ‘क्रिया-विशेषण’ कहलाते हैं। इस वाक्य में ‘धीरे-धीरे’ पद व्याकरणिक दृष्टि से क्रिया-विशेषण है।
नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यानपूर्वक पढ़कर उनमें क्रिया-विशेषण पदों की पहचान कीजिए तथा दिए गए उदाहरण के अनुसार लिखिए।
वाक्य
(क) बल खाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं।
(ख) यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं।
(ग) मैं देर तक भारत के स्थल भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा।
उदाहरण-

उत्तर:
| वाक्य | क्रिया-विशेषण | क्रिया, जिसकी विशेषता बताई जा रही है |
| (क) बल खाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं। | कटती हुई | ‘आती थीं’ क्रिया की रीति (तरीका) बता रहा है। |
| (ख) यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं। | उस दिशा में | ‘जा रही थीं’ क्रिया का स्थान/ दिशा बता रहा है। |
| (ग) मैं देर तक भारत के स्थल भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। | देर तक | ‘देखता रहा’ क्रिया का समय (काल) बता रहा है। |
आओ नए वाक्य बनाएँ
पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे तालिका में दिए गए हैं। इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों का अर्थ बताते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए।

उत्तर:
| वाक्य | रेखांकित शब्द | अर्थ | नए वाक्य |
| तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी पानी था। | क्षितिज | वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं। | डूबता हुआ सूरज क्षितिज पर बहुत सुंदर लग रहा था। |
| पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे। | झुरमुट | पेड़ों या पौधों का घना समूह | बगीचे में पेड़ों का एक सुंदर झुरमुट था। |
| दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी। | ढलान | नीचे की ओर झुकी हुई जमीन या रास्ता। | पहाड़ी की ढलान पर साइकिल चलाना बहुत रोमांचक था। |
| पच्छिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक श्रृंखला दूर तक चली गई थी। | श्रृंखला | एक के बाद एक जुड़ी हुई वस्तुओं की पंक्ति | पहाड़ों की श्रृंखला सुंदर लग रही थी। |
| सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी। | बीहड़ | ऊबड़-खाबड़ और डरावना जंगल | रात के समय वह बीहड़ रास्ता बहुत वीरान लग रहा था। |
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गतिविधियाँ
प्रश्न 1.
कल्पना कीजिए कि आप अपने परिवार के साथ कहीं घूमने गए हैं। वहाँ आपकी भेंट एक ऐसे यात्री से होती है जिसे आपकी सहायता की आवश्यकता है लेकिन आप दोनों एक-दूसरे की भाषा से अपरिचित हैं। ऐसे में उस अनजान यात्री की सहायता आप कैसे करेंगे?
उत्तर:
ऐसी स्थिति में उस अनजान यात्री की सहायता निम्नलिखित तरीकों से की जा सकती है:
- संकेतों और शारीरिक भाषा का उपयोग
- चित्रों और रेखाचित्रों के माध्यम से
- तकनीक का सहारा
- गूगल ट्रांसलेटर
- वैश्विक प्रतीकों का उपयोग
प्रश्न 2.
पधारो म्हारे देश
अपने क्षेत्र के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों की एक सूची बनाइए और उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर एक विवरणिका (ब्रॉशर) तैयार कीजिए।
उत्तर:
(मेरा क्षेत्र दिल्ली)
(महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल एवं उनकी विशेषताएँ)
1. लालकिला
- मुगल कालीन
- शाहजहाँ द्वारा निर्मित
- स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा ध्वजारोहण
- यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल
2. जामा मस्जिद
- भारती की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक
- भव्य वास्तुकला और विशाल प्रांगण
3. कुतुब मीनार
- विश्व की सबसे ऊँची ईंट की मीनार
- यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल
4. लोटस टेम्पल
- कमल के आकार का अद्भुत मंदिर
- शांति और ध्यान का केंद्र
- सफेद पत्थर से निर्मित
5. इंडिया गेट
- शहीद सैनिकों की स्मृति में बना स्मारक
- पर्यटकों का विशेष आकर्षण
6. अक्षरधाम मंदिर
- भव्य मंदिर परिसर
- सांस्कृतिक प्रदर्शनी और लाइट शो
7. जंतर-मंतर
- प्राचीन खगोलीय वेधशाला
- विज्ञान और वास्तुकला का अद्भुत संगम
- महाराज सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित (छात्र चित्र सहित प्रस्तुत सूची से आकर्षक ब्राशर स्वयं बनाएँ)
भाषा संगम
“ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को ला रहे थे”

‘नाव’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची आगे दी गई है।
नाव (हिंदी); नौ, नौका (संस्कृत); बेड़ी (पंजाबी); किश्ती, नाव (उर्दू); नाव (कश्मीरी); बेड़ी, किश्ती (सिंधी); होड़ी, नाव (मराठी); नाव, होडी (गुजराती); बहड़ी (कोंकणी); नाउ, नौका, डुड्रा (नेपाली); नाओ, नौका (बांग्ला); नाओ दोणि (असमिया); हि (मणिपुरी); नौका, नाआ (ओड़िआ) ; पडव, नाव (तेलुगू); ओडम् (तमिल); तोणि (मलयालम); (कन्नड़)।
• इनके अतिरिक्त यदि आप ‘नाव’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं। तो उस भाषा में भी लिखिए।
• उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में, भी लिखिए।
https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp
उत्तर:
• अन्य भाषा में ‘नाव’ का उच्चारण
भोजपुरी – नउका
राजस्थानी – नावड़ी
बिहारी (मैथिली) – नओका
हिमाचली – कश्ती
अवधी – नउका
ब्रज – नैया
• “ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को ला रहे थे”
विभिन्न भाषाओं में-
- भोजपुरी – मल्लाह ऊँच- ऊँच लहर से बचावत नाव ले आवत रहन।
- अवधी – मल्लाह ऊँची-ऊँची लहरन से बचावत नाव ले आवत रहे।
- राजस्थानी – मल्लाह ऊँची-ऊँची लहरां सै बचाव नाव ने लै आवत रया।
- पंजाबी – मल्लाह उच्चीयां लहरां तों बचाउँदे होए किश्ती लै आ रहे सन।
- गुजराती – मल्लाह ऊँची-ऊँची लहरोथी बचावता नाव लैने आवी रहना हता।
- मराठी – नावाडी उंच-उंच लाटांपासून वाचवत नाव थेऊन येत होते।
- संस्कृत – नौकिकाः उच्च- उच्च तरङ्गेभ्यः रक्षन्तः नौकां आनयन्ति स्म।
- कशमीरी – मल्लाह ऊँची-ऊँची लहरन पेत्थ बचावित नाव आनन आसन।
- उर्दू – मल्लाह ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए कश्ती ला रहे थे।
झरोखे से
आपने ‘आखिरी चट्टान तक’ रचना पढ़ी जो दक्षिण भारत की यात्रा पर आधारित है। आइए, अब पढ़ते हैं हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार निर्मल वर्मा का कुंभ मेले पर आधारित यात्रा-वृत्तांत का एक अंश-
उत्तर:
प्रयाग : 1976
मुँह अँधेरे सीटी सुनाई देती है- घनी नींद में सुराख बनाती हुई। एक क्षण पता नहीं चलता, मैं कहाँ हैं किस जगह हूँ, कौन-सा समय है? आँखें खुलती हैं, तो ढेस-सा अँधेरा गटगट पीने लगती हैं, जैसे मुँह की प्यास आँखें बुझा रही हैं। याद आता है मेरे नीचे मेरा स्लीपिंग बैग है, मेरी यात्राओं और यातनाओं को ढोता हुआ। मैं जाग गया हूँ – लेकिन मेरी समूची देह गरमाई के घेरे में सो रही है।
कुछ देर बाद आँखें अँधेरे में टोहती हुई एक एक चीज पर ठहर जाती हैं- किताब, तिपाई, लालटेन, फूस का अधखुला दरवाजा, हवा में सरसराती छत। बाहर एक फुसफुसाता हुआ शोर है- रेंगती हुई आवाज़ों का रेला – जैसे हजारों पैर रेत को थपथपाते हुए चल रहे हैं। मैं हड़बड़ाकर अपना स्लीपिंग बैग समेटता हूँ। हाथों में रेत, मिट्टी, फूस के पत्तों को ठेलता हुआ दरवाजा खोल हूँ, तो ठिठका-सा रह जाता।
चाँद दिखाई देता है। पूर्णिमा का पूरा चाँद, इलाहाबाद के किले पर ऊँघता हुआ। पिछली रात उसे गंगा के भीतर देखा था- एक सफेद परछाई, एक झिलमिला-सा स्वप्न – अब समूची रात यात्रा में थका हुआ वह किले के माथे पर चिपका था, एक गोल, सफेद, मुरझाई बिंदी जिसे सिर्फ एक अँगुली से पोंछा जा सकता था।
“आप जाग गए?”
सच्चे महाराज का चौकीदार मुझे देखकर कुछ हैरान-सा हो जाता है। दरअसल जब से मैं आया हूँ, वह मुझ पर हैरान है। वह उन्नीस-बीस वर्ष का युवक, जो शायद बचपन में ही आश्रम में बस गया था। मैं जहाँ कहीं भी होता हूँ, वह अपनी फैली फटी-फटी आँखों से मुझे निहारता है— मैं क्या हूँ, यह वह नहीं समझ पाता, न मैं तीर्थयात्री लगता हूँ, न कल्पवासी – मैं उसे आधा प्पी, आधा जिप्सी- सा दिखाई देता हूँगा- जो अपने पाप-पुण्यों को एक डफल बैग में समेटकर कुंभ मेले में भटकता है।
“आप भी संगम जाएँगे?”
उसने संदेह से मेरी ओर देखा।
“हाँ, इसीलिए आया हूँ” मैंने कहा। “यह सीटी कौन बजा रहा है?”
“पुलिस” उसने कहा। “यात्रियों को रास्ता दिखाना पड़ता है- बेचारे अँधेरे में भटक जाते हैं।” दबी ठिठुरती आवाज़ें, भजन की कुछ पंक्तियाँ ठंडी रेत और भूरी चाँदनी पर उठती हैं, किसी बूढ़े स्नानार्थी का काँपता स्वर हवा में बहुत दूर तक रिरियाता रहता है। मैं पंप को ढूँढ़ता हुआ आश्रम का चक्कर लगाता हूँ। लगता है सब सो रहे हैं। हवा में खाली झोपड़ों के दरवाजे सरसराते हैं, खुलते हैं, बंद हो जाते हैं। सब कुटियों से अलग सच्चे महाराज की यज्ञशाला दिखाई देती है- पीले फूल के मंडप, एक छत पर दूसरी छत – जैसे कोई जापानी पैगोड़ा चाँदनी में चमक रहा हो।
कुंभ मेले के वृत्तांत का यह अंश आपको रोचक लगा? अब इस यात्रा-वृत्तांत को इंटरनेट, पुस्तकालय से ढूँढ़कर पूरा पढ़िए।
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खोजबीन
• इस यात्रा वृत्तांत में उल्लिखित ‘आखिरी चट्टान’ को ‘विवेकानंद चट्टान’ के नाम से भी जाना जाता है। युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत के रूप में विवेकानंद के जन्मदिवस 12 जनवरी को भारत में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ तथा ‘राष्ट्रीय युवा सप्ताह’ के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा सप्ताह के एक हिस्से के रूप में भारत सरकार द्वारा प्रत्येक वर्ष ‘राष्ट्रीय युवा महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है। विवेकानंद के जीवन, लेखन और सामाजिक कार्यों के विषय में ‘पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए और कक्षा में चर्चा कीजिए। कुछ लिंक नीचे दिए गए हैं।
उत्तर:
स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए सच्चे आदर्श और मार्गदर्शक
https://haryanarajbhavan.gov.in/hi/publication/
स्वामी विवेकानंद – आध्यात्मिक वैज्ञानिक प्रेस सूचना ब्यूरो, भारत सरकार
https://www.pib.gov.in
दिए गए लिंक को उपयोग से छात्र स्वयं स्वामी विवेकानंद के संबंध में जानकारी प्राप्त करें व अपना ज्ञान वर्द्धन करें।