By going through these Sanskrit Class 8 Notes and NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 9 Hindi Translation Summary Explanation Notes कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्? students can clarify the meanings of complex texts.
Sanskrit Class 8 Chapter 9 Hindi Translation कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्? Summary
कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्? Meaning in Hindi
Class 8 Sanskrit Chapter 9 Summary Notes कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्?
इस पाठ में आहार के महत्व को एक प्राचीन प्रसंग के माध्यम से समझाया गया है कि आहार कब, कैसे और कितना लेना चाहिए। आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वन्तरि द्वारा तोते का रूप लेकर ऋषि वाग्भट से स्वास्थ्य के विषय में प्रश्न पूछना और ऋषि द्वारा उत्तर पाकर प्रसन्न होना तथा वरदान स्वरूप उन्हें अष्टांगसूत्र लिखने का आशीर्वाद देना भी इसमें वर्णित है। स्वास्थ्य के तीन सूत्र ‘हितभुक्’ ‘मितभुक्’ और ‘ऋतुभुक् संतुलित जीवन के लिए अत्यावश्यक हैं, उसकी चर्चा भी इस कथा में मिलती है।

Class 8 Sanskrit Chapter 9 Hindi Translation कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्?
पुत्री – अम्ब! महती बुभुक्षा बाधते, शीघ्रं भोजनं परिवेषयतु ।
माता – वत्से, भोजनम् अत्युष्णम् अस्ति किञ्चित प्रतीक्षस्व।
पुत्री – उष्णं भोजनं किमर्थं न ददाति ?
पिता – वत्से! मुखे दाहः भवेत्, अपि च ‘ अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ इति आयुर्वेदस्य उपदेशः।
पुत्रः – अम्ब! आयुर्वेदे बहवः आहारनियमाः सन्ति इति अस्माकं शिक्षकः अपि बोधयति ।
माता – सत्यम् उक्तं वत्स! आहारविषये एकः रोचकः प्रसङ्गः अस्ति । युवाम् इच्छथ चेत् श्रावयामि।
पुत्रः – अस्तु अम्ब! यावत् भोजनं भोक्तुं योग्यं भवति तावत् तं श्रावयतु।
माता – अस्तु, श्रूयताम्।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- बुभुक्षा – भूख (Hunger),
- इच्छथ – चाहते हो ( want),
- श्रूयताम् – सुनो (Listen ) ।
सरलार्थ-
पुत्री – माँ! बहुत भूख लगी है, जल्दी भोजन परोसिए।
माता – बेटी! भोजन बहुत गर्म है, थोड़ी प्रतीक्षा करो।
पुत्री – गर्म भोजन क्यों नहीं देतीं?
पिता – पुत्री! मुँह में जलन हो सकती है, और ‘बहुत गर्म भोजन हितकारी नहीं होता’ ऐसा आयुर्वेद में कहा गया है।
पुत्र – माँ! आयुर्वेद में भोजन के बहुत से नियम हैं ऐसा हमारे शिक्षक भी बताते हैं ।
माता – सही कहा वत्स! भोजन के विषय में एक रोचक प्रसंग है। तुम दोनों चाहो तो मैं सुनाऊँ ।
पुत्र – हाँ माँ! जब तक भोजन खाने योग्य होता है तब तक सुना दीजिए।
माता – ठीक है, सुनो-
(1) ‘भारतवर्षे वैद्याः विभिन्नानां व्याधीनां शमनं कथं कुर्वन्ति’ इति ज्ञातुं पुरा भगवान् धन्वन्तरिः मनोहरं शुकरूपं धृत्वा प्रतिग्रामम् अभ्रमत् । भ्रमणकाले सः बहूनां प्रख्यातवैद्यानां भवनपार्श्वस्थे वृक्षे उपविश्य ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति ध्वनिम् अकरोत्। किन्तु खगस्य ‘कोऽरुक्’ इति शब्द प्रति कस्यापि अवधानं नासीत् ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- व्याधीनां – बीमारियों का (Of illnesses),
- अरुक्-निरोग (One who is not sick ),
- अवधानं-ध्यान (Attention)।
सरलार्थ –
‘भारतवर्ष में वैद्य (चिकित्सक) विभिन्न रोगों का उपचार कैसे करते हैं’ यह जानने के लिए एक बार भगवान धन्वंतरि, सुंदर तोते के रूप को धारण कर प्रत्येक गाँव में घूमने गए। घूमते समय वे अनेक प्रसिद्ध वैद्यों के घरों के पास स्थित वृक्ष पर बैठकर ‘कोऽरुक्’, ‘कोऽरुक्’, ‘कोऽरुक्’ (कौन स्वस्थ है? ) इस प्रकार बोलने लगे। किन्तु पक्षी के ‘कोऽरुक्’ इस शब्द के प्रति किसी का भी ध्यान नहीं गया।
![]()
(2) अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान् । तत्र विशाले प्राङ्गणे स्थितं पुष्पतरुम् आरुह्य मधुरया गिरा ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति शब्दम् अकरोत्। मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वासु दिक्षु अपश्यत्। क्षणात् वाग्भटः मनोहरं तं शुकम् अपश्यत् । सार्थकं मानुषध्वनि कुर्वन्तं शुकं दृष्ट्वा विस्मितः वाग्भटः चिन्तितवान्- “ नायं लौकिकः खगः। एषः निश्चयेन कश्चन देवविशेषः अस्ति।”
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- कुटीर – झोपड़ी (hut),
- प्राङ्गणम् – आँगन (Open area in front of a house),
- विस्मितः- आश्चर्यचकित (Surprised),
- लौकिक: – लोक से संबंधित (Related to the world)।
सरलार्थ-
अंत में वे वैद्य वाग्भट के आश्रम के पास गए। वहाँ एक विशाल प्रांगण में स्थित पुष्पवृक्ष पर बैठकर मधुर वाणी के द्वारा ‘कोऽरुक्’, ‘कोऽरुक्’, ‘कोऽरुक्’ वही शब्द करने लगे । मधुर वाणी को सुनकर चिकित्सा में संलग्न वाग्भट ने प्रांगण में आकर सभी दिशाओं में देखा । तुरन्त ही वाग्भट ने सुंदर तोते को देखा । सार्थक मानव ध्वनि को करने वाले तोते को देखकर आश्चर्यचकित वाग्भट सोचने लगे – ” नहीं यह साधारण पक्षी नहीं, यह निश्चय ही कोई देव विशेष है।”

(3) सः झटिति तस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान् परन्तु सः खगः फलानि न गृहीत्वा पुनरपि तथैव ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति प्रश्नस्वरेण शब्दमकरोत् । अथ वैद्यः वाग्भटः अचिन्तयत् यत् यावत् खगः स्वप्रश्नानाम् उत्तराणि न प्राप्नोति तावत् अयं भोजनं न वाञ्छति इति । ततः सः अचिरादेव सूत्ररूपाणि त्रीणि उत्तराणि प्राददात् – ‘ हितभुक्’ ‘मितभुक्’ ‘ऋतुभुक्’ इति । समुचितम् उत्तरं श्रुत्वा अत्यन्तं प्रीतः सः शुकः वाग्भटेन अर्पितानि फलानि खादितवान्।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- झटिति – शीघ्र (Quickly),
- हितभुक् – हितकारक खाने वाला (One who eats nutritious food),
- मितभुक्-सीमित मात्रा में भोजन करने वाला (One who eats food in limited quantity),
- ऋतुभुक् ऋतु के अनुसार उपयुक्त भोजन करने वाला (One who eats food which is appropriate as per season)।
सरलार्थ-
उन्होंने उसे मधुर फल अर्पित किए परंतु उस तोते ने फलों को नहीं खाया और बार-बार ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ऐसे प्रश्न की भाषा में शब्द किया। तब वैद्य वाग्भट ने सोचा कि जब तक यह पक्षी अपने प्रश्न का उत्तर नहीं पाएगा, तब तक यह भोजन नहीं खाएगा। इसलिए उन्होंने जल्दी से तीन सूत्रों में उत्तर दिया- हितभुक्, (स्वास्थ्य के लिए हितकारी भोजन करने वाला), मितभुक् ( संतुलित मात्रा में भोजन करने वाला) ऋतुभुक्, (ऋतुओं के अनुसार भोजन करने वाला) । सही उत्तर सुनकर वह तोता अत्यन्त प्रसन्न हुआ और वाग्भट द्वारा अर्पित किए फलों को खाया।
(4) ततः शुकरूपः धन्वन्तरिः वाग्भटम् उक्तवान् – “वत्स! अहं धन्वन्तरिः अस्मि । उत्तमस्य वैद्यस्य अन्वेषणाय भारतवर्षे सर्वत्र परिभ्रमन् अत्र समागतः। तव उत्कृष्टेन आयुर्वेदज्ञानेन अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि । त्वम् अवश्यमेव आयुर्वेद – अष्टाङ्गविचार – सारभूतं तन्त्रं विरचयेः” एतद् उक्त्वा सः अन्तर्हितः।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- अन्वेषणाय – खोजने के लिए (For searching),
- परिभ्रमन् – घूमता हुआ (Wandering around),
- अन्तर्हितः – अदृश्य हुए (Disappeared)।
सरलार्थ-
तब तोते रूप में धन्वंतरि वाग्भट से बोले – “ वत्स ! मैं धन्वंतरि हूँ। उत्तम वैद्य की खोज के लिए पूरे भारतवर्ष का भ्रमण कर यहाँ आया हूँ। तुम्हारे उत्कृष्ट आयुर्वेद ज्ञान से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। तुम अवश्य ही आयुर्वेद का ” अष्टांगविचार – सारभूत तन्त्र को रचो।” यह कहकर वह अंतर्धान हो गए।
(5) एतत् सर्वं दूरात् पश्यन्तः विस्मिताः शिष्याः आचार्यवाग्भटस्य समीपम् आगत्य अपृच्छन्– “गुरुवर ! शुकः कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक्’ इति उक्तवान्, तस्य कोऽर्थः ? अपि च भवान् किम् उत्तरं दत्तवान्?” तदा वाग्भटः छात्राणां जिज्ञासाम् उपशमयन् कथयति–
‘छात्राः, शृणुत! एषः शुकः वदति यत् कः अरुक् अर्थात् कः स्वस्थः नीरोगः वा वर्तते?
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- जिज्ञासाम् – जानने की इच्छा (curiosity),
- उपशमयन् – शांत करता हुआ (Calming down)।
सरलार्थ-
यह सब दूर से देखकर बहुत चकित हुए छात्र आचार्य वाग्भट के समीप आकर पूछने लगे ” गुरुजी ! तोता ‘कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक्’ क्यों बोला इसका क्या अर्थ है?” आपने भी क्या उत्तर दिया ? ” तब वाग्भट छात्रों की जिज्ञासा को शांत करते हुए बोले छात्रों, सुनो! यह तोता कहता है कि अरुक् कौन, यानी स्वस्थ या निरोगी कौन है ?
![]()
(6) तदा मया उक्तम्-
‘यः हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् च सः एव सर्वदा स्वस्थः भवति ।’ छात्राः पुनः जिज्ञासया अपृच्छन्–
” आचार्य ! हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् इति – एतेषां क : आशय : ?” वाग्भटः वदति – ” शिष्याः ! महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः। सः हितभुक् – विषये कथयति-
तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते ।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥1॥
भावार्थ-
अर्थात् यस्य आहारस्य सेवनेन स्वास्थ्यस्य रक्षणं भवेत्, न जातानाम् अर्थात् अनुत्पन्नानां विकाराणाम् उत्पत्तिः न भवेत्, तादृश: आहारः सेवनीयः।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- प्रयुञ्जीत-प्रयोग करें (Should take),
- अनुवर्तते – अनुसरण करता है (Follows ),
- अजातानां – जो पैदा उनको (Of those who are not born),
- अनुत्पत्तिकरम् – जो विकारों को उत्पन्न न करे (That which may not cause harm)।
सरलार्थ-
तब मैंने उत्तर दिया— ‘जो हितभुक्, मितभुक्, और ऋतुभुक् है । वही सदा स्वस्थ होता है।’ ‘छात्रों ने पुन: जिज्ञासापूर्वक पूछा- आचार्य! हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् इन सबका क्या आशय है?’ वाग्भट ने कहा- शिष्यो ! महर्षि चरक का नाम आप सबने सुना ही होगा। वे हितभुक् के विषय में कहते हैं-
श्लोक का अर्थ- ऐसा भोजन जो स्वास्थ्य को बनाए रखे और जो अभी पैदा नहीं हुए उन रोगों को भी उत्पन्न न होने दे, वही हितभोजन होता है।
अर्थात् जिसके आहार के सेवन से स्वास्थ्य की रक्षा हो सके, न जन्म लेने वाले अर्थात् अनुत्पन्न जो रोग हैं उनकी उत्पत्ति भी न हो सके, ऐसे आहार का सेवन करना चाहिए।

(7) मितभुक् विषये कथयति आचार्यः-
भावार्थ-
अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने ।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे ॥२॥
अर्थात् गरिष्ठद्रव्याणि अपि अल्पमात्रं सेवनेन सुपाच्यानि भवन्ति, लघुद्रव्याणि चापि अतिमात्रं सेवनेन हानिकराणि जायन्ते। अतः मात्रानुसारम् एव खादितव्यम् ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- लघूनाम् – सुपाच्य खाद्यों का (Of digestible food),
- उद्दिष्टम् – बताया गया है, (Which has been instructed),
- गरिष्ठम् – जो कठिनता से पचे ( Difficult to digest),
- अतिमात्रं – अत्यधिक मात्रा से (In excessive quantity)।
सरलार्थ-
मितभुक्, विषय में आचार्य कहते हैं- श्लोक का अर्थ- द्रव्यों (भोजन-पदार्थों) के भारी या हल्के होने में, भारी पदार्थों के अल्प सेवन में और हल्के पदार्थों के अधिक सेवन में ‘मात्रा’ को ही कारण बताया गया है।
अर्थात् भारी (गरिष्ठ) भोजन पदार्थ भी थोड़ी मात्रा में सेवन किए जाएँ तो पचने में आसान होते हैं और हल्के पदार्थ भी अधिक मात्रा में सेवन किया जाएँ तो हानिकारक हो जाते हैं। इसलिए मात्रा के अनुसार ही खाना चाहिए।
(8) एवमेव ऋतुभुक् – विषये उच्यते-
तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते ।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥३॥
अर्थात् ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिरः, हेमन्तः, वसन्तः चेति षट् ऋतवः भवन्ति । यः पुरुषः ऋतूनाम् अनुकूलं स्वास्थ्यप्रदम् आहारसेवनं जानाति तदनुसारम् आचरणं च करोति तस्य जनस्य अशितम् अर्थात् भुक्तं पीतं च सर्वमपि बलवर्धकं, वर्णकान्तिजनकं, सुखवर्धकम्, आयुर्वर्धकञ्च भवति । अतः ऋतोः अनुसारं भोक्तव्यम् इति । नियमितरूपेण समयानुसारं सात्त्विकं भोजनम् आवश्यकमिति ऋतुभुक् पदेन ज्ञायते ।
शब्दार्थाः : ( Word Meanings) :
- अशिताद्यात् – खाए हुए से (From eaten food),
- व्यपाश्रयम् – अवलम्ब (Depending),
- वर्णकान्तिजनकं – रूप रंग निखारने वाला (That which enhance the beauty and complexion)।
सरलार्थ-
ऐसा ही ऋतुभुक के विषय में कहते हैं-
श्लोक का अर्थ – उसके खाए-पिए गए आहार से बल और वर्ण बढ़ते हैं। उसकी ऋतु के अनुसार अनुकूलित चेष्टा (व्यवहार), आहार और आश्रय ( रहन-सहन ) ज्ञात हैं।
सरलार्थ-
अर्थात् ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त और वसंत – ये छह ऋतुएँ होती हैं। जो व्यक्ति इन ऋतुओं के अनुसार स्वास्थ्यवर्धक आहार का सेवन करना जानता है और उसके अनुसार आचरण करता है उन लोगों का कच्चा, यानी खाया और पिया हुआ सभी बलवर्धक, रंग-रूप बढ़ाने वाले, सुख देने वाले और आयु बढ़ाने वाले होते हैं।
इसलिए ऋतु (मौसम) के अनुसार भोजन करना चाहिए । नियमित रूप से सात्विक भोजन आवश्यक है ऐसा ऋतुभुक शब्द से जानाना चाहिए।

![]()
(9) एतत् सर्वं श्रुत्वा कश्चन छात्रः वाग्भटम् अपृच्छत् – ” आचार्य ! हितभुगादिविषये वयं तु ज्ञातवन्तः, किन्तु किं सः शुकः सन्तुष्टः अभवत्?” तदा वाग्भटः शुकस्य रहस्यम् उक्तवान्- “प्रियशिष्याः ! अयं विहगः न सामान्यविहगः, अपि तु आयुर्वेदस्य पूज्यः देवः भगवान् धन्वन्तरिः एवं स्वयं शुकरूपेण अत्र आगच्छत् । अस्माकं कृते संक्षेपेण स्वास्थ्यरक्षणाय सूत्ररूपेण सन्देशं च प्रदत्तवान्ं,
भवन्तः अपि शृण्वन्तु स्मरन्तु च-
व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम् ॥४॥
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- बुभुक्षायाम् – भूख लगने पर ( On feeling hungry),
- विशोधनं- शुद्धिकरण (Purification),
- आरोग्यार्थं – स्वास्थ्य के लिए (For health)।
सरलार्थ-
यह सब सुनकर किसी छात्र ने वाग्भट से पूछा – ‘आचार्य ! हितभुक ( संतुलित आहार करनेवाले) आदि विषयों को हम तो जान चुके हैं, लेकिन क्या वह तोता ( शुक) संतुष्ट हुआ था?’ तब वाग्भट ने तोते का रहस्य बताया- ‘प्रिय शिष्यों ! यह पक्षी कोई सामान्य पक्षी नहीं है, बल्कि यह आयुर्वेद के पूज्य देव भगवान धन्वंतरि ही स्वयं शुक ( तोते ) के रूप में यहाँ प्रकट हुए थे। ‘ हमारे लिए संक्षेप में स्वास्थ्यरक्षा के लिए सूत्ररूप में संदेश दिया है, आप लोग भी उसे सुनें और स्मरण रखो –
(10) श्लोक का अर्थ- सुबह उठकर व्यायाम करें, प्रतिदिन दांतों की सफाई करें, साफ पानी से अच्छी तरह स्नान करें और जब भूख लगे तभी भोजन करें।
अस्माकम् ऋषयः नित्यं प्रार्थनाम् अपि कुर्वन्ति । वयमपि स्मरामः
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥५॥
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- निरामया: – रोगों से रहित ( Free from disease),
- भद्राणि – मंगलकारी (Blessings)।
सरलार्थ-
हमारे ऋषि लोग प्रतिदिन प्रार्थना भी करते हैं। हम भी स्मरण करते हैं-
श्लोक का अर्थ- सभी खुश रहें, सब निरोग रहें। सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें रहें और और किसी को भी दु:ख का भागी न बनना पड़े।
![]()
Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यःSummary Notes
सप्तभगिन्यः Summary
‘सप्तभगिनी’ यह एक उपनाम है। उत्तरपूर्व के सात राज्य विशेष को यह उपाधि प्रदान की गई है। इन राज्यों के प्राकृतिक . सौन्दर्य और सांस्कृतिक विलक्षणता को ध्यान में रखकर इस पाठ की रचना की गई है। पाठ का सार इस प्रकार है हमारे देश में अट्ठाईस राज्य तथा सात केन्द्रशासित प्रदेश हैं। इन राज्यों में सात राज्यों का एक समूह है। इन्हें ‘सात बहनें’ नाम से जाना जाता है।
अरुणाचल, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैण्ड और त्रिपुरा-इन सात राज्यों का समूह ‘सात बहनें’ के नाम से प्रसिद्ध है। ये सात बहनें प्राचीन इतिहास में प्रायः स्वाधीन ही दृष्टिगोचर होती हैं। किसी भी शासक ने इन्हें अपने अधीन नहीं किया है। अनेक संस्कृतियों से विशिष्ट भारत-भूमि में इन बहनों की संस्कृति महत्त्वपूर्ण है। पर्वतों, वृक्षों तथा पुष्पों के द्वारा इन राज्यों की प्राकृतिक सम्पदा अत्यधिक समृद्धि और गौरव को बढ़ाती है। वस्तुतः ये सात राज्य सबसे श्रेष्ठ हैं।
सप्तभगिन्यः Word Meanings Translation in Hindi
मूलपाठः, अन्वयः, शब्दार्थः सरलार्थश्च
अध्यापिका – सुप्रभातम्।
छात्राः सुप्रभातम्। सुप्रभातम्।
अध्यापिका – भवतु। अद्य किं पठनीयम्?
छात्राः – वयं सर्वे स्वदेशस्य राज्यानां विषये ज्ञातुमिच्छामः।
अध्यापिका – शोभनम्। वदत। अस्माकं देशे कति राज्यानि सन्ति?
सायरा – चतुर्विंशतिः महोदये!
सिल्वी – न हि न हि महाभागे! पञ्चविंशतिः राज्यानि सन्ति।
अध्यापिका – अन्यः कोऽपि …?
स्वरा – ( मध्ये एव) महोदये! मे भगिनी कथयति यदस्माकं देशे नवविंशतिः राज्यानि सन्ति। एतदतिरिच्य सप्त केन्द्रशासितप्रदेशाः अपि सन्ति।
शब्दार्थ-
भवतु-ठीक है (अच्छा)।
ज्ञातुम्-जानने के लिए।
अद्य-आज।
इच्छामः-चाहते हैं।
शोभनम्-सुन्दर।
चतुर्विंशतिः-चौबीस (Twenty four)।
भगिनी-बहन।
अतिरिच्य-अतिरिक्त।
मध्ये एव-बीच में ही।
कति-कितने।
पञ्चविंशतिः-पच्चीस।
अष्टाविंशतिः-अट्ठाईस।
सप्त-सात (Seven)
सरलार्थ –
अध्यापिका – सुप्रभात।
छात्राएँ – सुप्रभात, सुप्रभात।
अध्यापिका – अच्छा, आज क्या पढ़ना है?
छात्राएँ – हम सभी अपने देश के राज्यों के विषय में जानना चाहती हैं।
अध्यापिका – सुन्दर। बोलो। हमारे देश में कितने राज्य हैं?
सायरा – महोदया, चौबीस।
सिल्वी – नहीं, नहीं। महाभागा! पच्चीस राज्य हैं।
अध्यापिका – कोई अन्य भी …………।
स्वरा – (बीच में ही) महोदया, मेरी बहन कहती है कि हमारे देश में अट्ठाईस राज्य हैं। इसके अतिरिक्त सात केन्द्रशासित प्रदेश भी हैं।
(ख) अध्यापिका – सम्यग्जानाति ते भगिनी। भवतु, अपि जानीथ यूयं यदेतेषु राज्येषु सप्तराज्यानाम् एकः समवायोऽस्ति यः सप्तभगिन्यः इति नाम्ना प्रथितोऽस्ति।
सर्वे – (साश्चर्यम् परस्परं पश्यन्तः) सप्तभगिन्यः? सप्तभगिन्यः?
निकोलसः – इमानि राज्यानि सप्तभगिन्यः इति किमर्थं कथ्यन्ते?
अध्यापिका – प्रयोगोऽयं प्रतीकात्मको वर्तते। कदाचित् सामाजिक-सांस्कृतिक
परिदृश्यानां साम्याद् इमानि उक्तोपाधिना प्रथितानि।
समीक्षा – कौतूहलं मे न खलु शान्तिं गच्छति, श्रावयतु तावद्यत् कानि तानि राज्यानि?
शब्दार्थ-
सम्यक्-अच्छी प्रकार।
जानाति-जानती है।
ते-तेरी।
जानीथ-जानती हो।
यदेतेषु-इनमें।
समवायः-समूह।
प्रथितः-प्रसिद्ध।
किमर्थम्-किसलिए।
प्रतीकात्मकः-सांकेतिक (Symbolic)।
कदाचित्-संभवतः (Perhaps)।
साम्याद्-समानता से।
उक्त०-कही गई उपाधि से।
कौतूहलम्-जिज्ञासा (Eager)।
श्रावयतु-सुनाओ।
साश्चर्यम्-आश्चर्य के साथ (Surprised)।
परस्परं-एक-दूसरे को।
पश्यन्तः-देखते हुए।
कथ्यन्ते-कहे जाते हैं।
परिदृश्यानाम्-वातावरणों के।
प्रथितानि-प्रसिद्ध हैं (Famous)।
सरलार्थ –
अध्यापिका –
तुम्हारी बहन अच्छी प्रकार जानती है। ठीक है, क्या तुम जानते हो कि इन राज्यों में सात राज्यों का एक समूह है, जो ‘सात बहनें’ इस नाम से प्रसिद्ध है। सभी (आश्चर्यपूर्वक एक-दूसरे को देखते हुए) सात बहनें? सात बहनें?
निकोलस – ये राज्य ‘सात बहनें’ इस नाम से किस प्रकार कहे जाते हैं?
अध्यापिका – यह प्रयोग सांकेतिक है। संभवतः सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण की समानता के कारण ये उक्त उपाधि (अर्थात् विशेषण) के द्वारा प्रसिद्ध हो गए हों।
समीक्षा – मेरी जिज्ञासा शान्त नहीं हो रही है। सुनाइए, वे कौन-से राज्य हैं?
(ग) अध्यापिका – शृणुत!
अद्वयं मत्रयं चैव न-त्रि-युक्तं तथा द्वयम्।
सप्तराज्यसमूहोऽयं भगिनीसप्तकं मतम्॥
इत्थं भगिनीसप्तके इमानि राज्यानि सन्ति-अरुणाचलप्रदेशः, असमः, मणिपुरम्, मिजोरमः, मेघालयः, नगालैण्डः, त्रिपुरा चेति। यद्यपि क्षेत्रपरिमाणैः इमानि लघूनि वर्तन्ते तथापि गुणगौरवदृष्ट्या बृहत्तराणि प्रतीयन्ते।
सर्वे – कथम्? कथम्?
अन्वयः-
अद्वयं तथा मत्रयं चैव नत्रियुक्तं द्वयम्। सप्तराज्यसमूहः अयं भगिनीसप्तकं मतम्।
शब्दार्थ-
शृणुत-सुनो।
अद्वयम्-‘अ’ से प्रारम्भ होने वाले दो।
मत्रयम्-‘म’ से प्रारम्भ होने वाले तीन।
न-त्रि-युक्तम्-‘न’ से तथा ‘त्रि’ से प्रारम्भ होने वाले।
द्वयम् – दो।
अयम्- यह।
मतम्-माना गया है।
इत्थम्-इस प्रकार।
क्षेत्रपरिमाणैः-क्षेत्रफल की दृष्टि से।
लघूनि-छोटे।
वर्तन्ते-हैं।
तथापि-फिर भी।
गुणगौरवदृष्ट्या -गुण और गौरव की दृष्टि से।
बृहत्तराणि-बड़े।
प्रतीयन्ते-प्रतीत होते हैं।
सरलार्थ –
अध्यापिका – सुनो,
‘अ’ वर्ण से प्रारम्भ होने वाले (अरुणाचल और असम) दो, ‘म’ वर्ण से प्रारम्भ होने वाले (यथा मणिपुर, मिजोरम और मेघालय) तीन, तथा ‘न’ वर्ण और ‘त्रि’ से प्रारम्भ होने वाले (यथा-नगालैण्ड और त्रिपुरा) दो-यह सात राज्यों का समूह ‘भगिनी सप्तक’ के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार ‘भगिनी सप्तक’ में ये राज्य हैं-अरुणाचलप्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नगालैण्ड और त्रिपुरा। यद्यपि क्षेत्रफल की दृष्टि से ये (राज्य) छोटे हैं, फिर भी गुण और गौरव की दृष्टि से बड़े प्रतीत होते हैं।
सभी – कैसे? कैसे?
(घ) अध्यापिका – इमाः सप्तभगिन्यः स्वीये प्राचीनेतिहासे प्रायः स्वाधीनाः एव दृष्टाः। न केनापि शासकेन इमाः स्वायत्तीकृताः।
अनेक-संस्कृति-विशिष्टायां भारतभूमौ एतासां भगिनीनां संस्कृतिः महत्त्वाधायिनी इति।
तन्वी – अयं शब्दः सर्वप्रथमं कदा प्रयुक्तः?
अध्यापिका – श्रुतमधुरशब्दोऽयं सर्वप्रथमं विगतशताब्दस्य द्विसप्ततितमे वर्षे त्रिपुराराज्यस्योद्घाटनक्रमे केनापि प्रवर्तितः। अस्मिन्नेव काले एतेषां राज्यानां पुनः सचटनं विहितम्।
शब्दार्थ-
स्वीये-अपने।
दृष्टाः -दृष्टिगोचर होते हैं (Seen)
केनापि-किसी के द्वारा भी।
इमाः -ये
स्वायत्तीकृताः-अपने अधीन किए गए हैं।
एतासाम्-इनकी।
भगिनीनाम्-बहनों की।
महत्त्वाधायिनी-महत्त्वपूर्ण (Important)
कदा-कब।
श्रुतमधुर०-सुनने में मधुर।
विगतशताब्दस्य-बीते हुए सौ वर्ष के।
द्विसप्ततितमे-बहत्तरवें (Seventy Two)
उद्घाटनक्रमे-उद्घाटन के क्रम में।
अस्मिन्नेव-इसमें ही।
विहितम्-विधिपूर्वक किया गया।
स्वाधीनाः-स्वतन्त्र (Free)
भारतभूमौ-भारतभूमि पर।
प्रयुक्तः-प्रयोग हुआ (Used)
सङ्घटनं-संगठन (गठन) (Integration, Organization)
प्रवर्तितः-प्रारंभ किया गया (Started)
सरलार्थ –
अध्यापिका – ये सात बहनें अपने प्राचीन इतिहास में प्रायः स्वाधीन ही दृष्टिगोचर होती हैं। किसी भी शासक ने इन्हें अपने अधीन नहीं किया। अनेक संस्कृतियों से विशिष्ट भारतभूमि में इन बहनों की संस्कृति महत्त्वपूर्ण है।
तन्वी – सबसे पहले इस शब्द का प्रयोग कब हुआ?
अध्यापिका – सुनने में मधुर लगने वाला यह शब्द गत शती के बहत्तरवें साल में (1972 ई.) त्रिपुरा राज्य के उद्घाटन
क्रम में किसी के द्वारा प्रयोग किया गया। इस समय ही इन राज्यों का पुनः गठन किया गया।
(ङ) स्वरा – अन्यत् किमपि वैशिष्ट्यमस्ति एतेषाम्?
अध्यापिका – नूनम् अस्ति एव। पर्वत-वृक्ष-पुष्प-प्रभृतिभिः प्राकृतिकसम्पद्भिः सुसमृद्धानि
सन्ति इमानि राज्यानि।भारतवृक्षे च पुष्पस्तबकसदृशानि विराजन्ते एतानि।
राजीवः – भवति! गृहे यथा सर्वाधिका रम्या मनोरमा च भगिनी भवति तथैव
भारतगृहेऽपि सर्वाधिकाः रम्याः इमाः सप्तभगिन्यः सन्ति।
शब्दार्थ
अन्यत्-अन्य (दूसरा) (Other)
वैशिष्ट्य म्-विशिष्टता (Specification)
पुष्प०-फूल।
प्राकृतिकसम्पद्भिः-प्राकृतिक सम्पदाओं के द्वारा (Natural Wealth)
पुष्पस्तबक०-फूलों का गुच्छा (Bunch of Flower)
गृहे-घर में।
सर्वाधिका:-सबसे अधिक
तथैव-उसी प्रकार।
किमपि-कोई भी।
नूनम्-अवश्य (Sure)
प्रभृतिभिः-आदि के द्वारा।
सुसमृद्धानि-समृद्ध (Prosperous)
विराजन्ते-विराजमान हैं (Sat)
यथा-जिस प्रकार।
रम्या-रमणीय (Lovely)
सदृश-जैसे।
भारतवक्षे-भारत रूपी वृक्ष में/पर।
सरलार्थ –
स्वरा – इनकी दूसरी भी कोई विशेषता है।
अध्यापिका – अवश्य ही है। पर्वत, वृक्ष तथा पुष्प आदि प्राकृतिक सम्पदाओं के द्वारा ये राज्य समृद्ध हैं। भारत रूपी वृक्ष पर ये (राज्य) फूलों के गुच्छों के समान विराजमान हैं।
राजीव – आप! जिस प्रकार घर में बहन सबसे अधिक रमणीय और सुन्दर होती है, उसी प्रकार भारत रूपी घर में ये सात बहनें सबसे अधिक सुन्दर हैं।
(च) अध्यापिका – मनस्यागता ते इयं भावना परमकल्याणमयी परं सर्वे न तथा अवगच्छन्ति। अस्तु, अस्ति तावदेतेषां विषये किञ्चिद् वैशिष्ट्यमपि कथनीयम्। सावहित मनसा शृणुत जनजातिबहुलप्रदेशोऽयम्। गारो-खासी-नगा-मिजो-प्रभृतयः बहवः जनजातीयाः अत्र निवसन्ति। शरीरेण ऊर्जस्विनः एतत्प्रादेशिकाः बहुभाषाभिः समन्विताः, पर्वपरम्पराभिः परिपूरिताः, स्वलीलाकलाभिश्च निष्णाताः सन्ति।
मालती – महोदये! तत्र तु वंशवृक्षा अपि प्राप्यन्ते?
शब्दार्थ-
मनसि-मन में।
परम्-परन्तु।
अस्तु-ठीक है।
वैशिष्ट्यम्-विशिष्टता।
शृणुत-सुनो।
निवसन्ति-निवास करते हैं।
समन्विताः-समन्वित (युक्त)।
परम्पराभि:-परम्पराओं के द्वारा (Traditions)
निष्णाताः-कुशल (Expert)
वंशवृक्षाः -बाँस के वृक्ष (Bamboo Trees)
आगता-आ गई
अवगच्छन्ति-जानते हैं (Know)
सावहितमनसा-सावधान मन से।
बहवः-अनेक।
ऊर्जस्विनः-ऊर्जा से युक्त (Energetic)
पर्व-त्योहारों की (Festivals)
परिपूरिताः-भरे हुए (पूर्ण) (Full)
प्राप्यन्ते-प्राप्त होते हैं।
प्रभृतयः-आदि।
बहुभाषिभिः-बहुत भाषाओं से।
स्वलीलाकलाभिः-अपनी क्रिया और कलाओं से।
सरलार्थ –
अध्यापिका – तुम्हारे मन में आई हुई यह भावना परमकल्याणमयी है, परन्तु सभी ऐसा नहीं सोचते हैं। ठीक है, इनके विषय में कुछ विशेषता भी कहनी चाहिए। सावधान मन से सुनो यह जनजाति बहुल प्रदेश है। गारो, खासी, नगा तथा मिजो आदि अनेक जनजातियाँ यहाँ निवास करती हैं। शरीर से ऊर्जा से भरे हुए इन प्रदेशों के निवासी अनेक भाषाओं से युक्त त्योहारों की परम्पराओं से पूर्ण अपनी क्रियाओं और कलाओं में प्रवीण होते हैं।
मालती – महोदया! वहाँ तो बाँस के वृक्ष भी प्राप्त होते हैं?
(छ) अध्यापिका – आम्। प्रदेशेऽस्मिन् हस्तशिल्पानां बाहुल्यं वर्तते। आवस्त्राभूषणेभ्यः
गृहनिर्माणपर्यन्तं प्रायः वंशवृक्षनिर्मितानां वस्तूनाम् उपयोगः क्रियते। यतो हि अत्र वंशवृक्षाणां प्राचुर्यं विद्यते। साम्प्रतं वंशोद्योगोऽयं अन्ताराष्ट्रियख्यातिम् अवाप्तोऽस्ति।
अभिनवः – भगिनीप्रदेशोऽयं बह्वाकर्षकः इति प्रतीयते।
सलीमः – किं भ्रमणाय भगिनीप्रदेशोऽयं समीचीनः?
सर्वे छात्राः – (उच्चैः) महोदये! आगामिनि अवकाशे वयं तत्रैव गन्तुमिच्छामः।
स्वरा – भवत्यपि अस्माभिः सार्द्धं चलतु।
अध्यापिका – रोचते मेऽयं विचारः। एतानि राज्यानि तु भ्रमणार्थं स्वर्गसदृशानि इति।
शब्दार्थ-
आम्-हाँ।
आ-से लेकर।
क्रियते-किया जाता है।
प्राचुर्यम्-अधिकता (प्रचुरता) (Plenty)
अवाप्तः-प्राप्त।
प्रतीयते-प्रतीत (ज्ञात) होता है (Known)
आगामिनि-आने वाले।
इच्छामः-चाहते हैं (Want)
भ्रमणार्थम्-भ्रमण के लिए (Tour)
भवत्यपि-आप भी।
रोचते-अच्छा लगता है।
बाहुल्यं-अधिकता।
निर्मितानाम्-बनी हुई का।
यतो हि-क्योंकि।
वंशोद्योगः-बाँसों का उद्योग।
बह्वाकर्षकः-अत्यधिक आकर्षक।
समीचीन:-उचित।
गन्तुम्-जाना।
सार्धम्-साथ।
हस्तशिल्पानाम्-हाथ से बनी वस्तुओं की (Handicraft)
ख्यातिम्-प्रसिद्धि को।
सरलार्थ-
अध्यापिका – हाँ। इस प्रदेश में हस्तशिल्पों की अधिकता है। वस्त्र व आभूषणों से लेकर घरों के निर्माण तक प्रायः बाँस के वृक्षों से निर्मित वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। क्योंकि यहाँ बाँस के वृक्षों की अधिकता है। अब यह बाँसों का उद्योग (व्यवसाय) अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि को प्राप्त हो गया है।
अभिनव – यह भगिनीप्रदेश अत्यधिक आकर्षक ज्ञात होता है।
सलीम – क्या भ्रमण के लिए यह भगिनीप्रदेश उचित है?
सभी छात्र – (जोर से) महोदया! आने वाले अवकाश में हम वहाँ ही जाना चाहते हैं।
स्वरा – आप भी हमारे साथ चलें।
अध्यापिका – मुझे यह विचार अच्छा लगता है। ये राज्य भ्रमण के लिए स्वर्ग के समान हैं।