By going through these Sanskrit Class 8 Notes and NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 10 Hindi Translation Summary Explanation Notes सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) students can clarify the meanings of complex texts.
Sanskrit Class 8 Chapter 10 Hindi Translation सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) Summary
सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) Meaning in Hindi
Class 8 Sanskrit Chapter 10 Summary Notes सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)
यह पाठ हितोपदेश की एक शिक्षाप्रद कथा पर आधारित है, जिसमें यह बताया गया है कि किसी श्रेष्ठ और दीर्घकालिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए छोटी या तात्कालिक सुख-सुविधाओं का त्याग करना बुद्धिमानी है। कथा के पात्रों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति भी दी जा सकती है। पाठ में स्वामीभक्ति, विवेक और समर्पण भाव जैसे गुणों की सराहना की गई है। यह पाठ विद्यार्थियों को त्याग, समर्पण और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।
Class 8 Sanskrit Chapter 10 Hindi Translation सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)
संस्कृतवाङ्मये कथासाहित्यस्य विशिष्टं स्थानम् अस्ति । कथानां द्वारा अतीव मनोरञ्जकतया जीवनसम्बद्धा: विविधाः उपदेशा:, प्रेरणाः हि एतस्य साहित्यस्य प्रयोजनम्। संस्कृतस्य कथासाहित्यम् अत्यन्त समृद्धं वैविध्यपूर्णं च अस्ति ।
प्रस्तुतः पाठः ‘हितोपदेशः’ इत्यस्मात् कथाग्रन्थात् स्वीकृत: । राज्ञः शूद्रकस्य सेवायां नियुक्तस्य कस्यचित् वीरवरनामकस्य कर्तव्यनिष्ठस्य राजपुत्रस्य वैशिष्ट्यस्य वर्णनं कथायामत्र वर्तते । सः राज्ञः राष्ट्रस्य च रक्षणाय स्वप्राणान् अपि अर्पयितुम् उद्यतः अभवत्। तस्य स्वामिभक्ति : राष्ट्राय समर्पणभावः च प्रेरणार्हः । अत्र एषः पाठः भागद्वये अस्ति । पठनीया इयां वीरवरकथा । अनुकरणीयः अयं वीरवरः।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- अतीव – बहुत अधिक (Very much),
- स्वीकृत : – लिया गया (Accepted),
- नियुक्तस्य – नियुक्त किए गए (व्यक्ति) का (Of theAppointed person),
- अर्पयितुम् – समर्पित करना (To dedicate),
- अनुकरणीयः – अनुकरण करने योग्य (Exemplary)।
सरलार्थ-
संस्कृत वाङ्मय में कथा – साहित्य का विशेष स्थान है। कथाओं के द्वारा अत्यन्त मनोरंजक रूप में जीवन से संबंधित विभिन्न उपदेश, प्रेरणाएँ ही इस साहित्य का उद्देश्य है। संस्कृत का कथासाहित्य अत्यन्त समृद्ध और विविधताओं से परिपूर्ण है । प्रस्तुत पाठ ‘हितोपदेश’ नामक कथाग्रंथ से लिया गया है। राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त कोई वीरवर नाम का कर्तव्यनिष्ठ राजा के पुत्र विशेष गुणों का वर्णन इस कथा में मिलता है । वह राजा और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों को भी अर्पित करने के लिए तैयार था। उसकी स्वामिभक्ति ( राजा के प्रति निष्ठा) और राष्ट्र के लिए समर्पण की भावना प्रेरणादायक है। यहाँ यह पाठ दो भागों में है। वीरवर की यह कथा पढ़ने योग्य है। वीरवर की यह कथा अनुसरण करने योग्य है।
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(1) आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी । तत्र शूद्रको नाम महापराक्रमी नानाशास्त्रवित् पूतचरित्रः महीपतिः प्रतिवसति स्म । अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत् । तेन सह वेदरता नाम तस्य पत्नी, शक्तिधरो नाम सुतः, वीरवती नाम कन्या च समायाताः ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- नानाशास्त्रवित् – अनेक शास्त्रों का ज्ञाता (Who knows many Shastras),
- पूतचरित्रः – पवित्र चरित्र वाला (Of high character),
- महीपतिः- राजा (King),
- प्रतिवसति स्म रहता था (Lived),
- वृत्त्यर्थं – आजीविका पाने के लिए (To get livelihood),
- समायाताः -आये (Came)।
सरलार्थ-
एक समय शोभावती नाम की नगरी (शहर) थी । वहाँ शूद्रक नामक एक महापराक्रमी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता, पवित्र चरित्र वाला राजा रहता था। एक बार वीरवर नामक राजपुत्र आजीविका पाने के लिए किसी देश से राजा के द्वार पर आया। उसके साथ वेदरता नामक उसकी पत्नी, शक्तिधर नामक उसका पुत्र और वीरवती नामक उसकी कन्या भी आए।

(2) वीरवरः – (प्रतिहारं वीक्ष्य) भोः प्रतिहार ! वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि, तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम्। (ततो दौवारिकः तं प्रभोः समीपम् अनयत्।)
वीरवर: – (प्रणामपुरस्सरं सविनयम्) देव! यदि सौभाग्येन अहं भवतः सेवायां नियोजितः तर्हि यदादिश्यते तत् श्रद्धया पालयिष्यामि।
राजा – किं ते वर्तनम् ?
वीरवरः – प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !
राजा – का ते सामग्री?
वीरवर: – इमौ बाहू, एष खड्गश्च ।
राजा – नैतच्छक्यम् !
(तत् श्रुत्वा वीरवरः राजानं प्रणम्य राजसभातः निर्गतः ।)
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- प्रतिहारं – द्वारपाल को (To the door keeper),
- वर्तनम् – वेतन (Salary),
- सुवर्णशतचतुष्टयं – चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ (Four hundred gold coins),
- निर्गतः – बाहर चला गया (Went outside)।
सरलार्थ-
वीरवर – (द्वारपाल की ओर देखकर) हे द्वारपाल ! आजीविका पाने के लिए आया हूँ, मैं राजपुत्र हूँ, अतः मुझे अपने स्वामी (राजा) के पास ले चलो।
(फिर द्वारपाल उसे राजा के पास ले गया ।)
वीरवर – (प्रणाम करके, विनम्रतापूर्वक) हे देव! अगर सौभाग्य से मैं आपकी सेवा में नियुक्त हो जाऊँ, तो जो भी आदेश दिया जाएगा, उसे श्रद्धा के साथ मैं पालन करूँगा।
राजा – क्या वेतन चाहिए?
वीरवर – प्रतिदिन चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ, हे देव !
राजा – तुम्हारे पास क्या साधन (सामग्री) हैं?
वीरवर – ये दोनों भुजाएँ और यह तलवार ।
राजा – यह स्वीकार्य नहीं है !
(वह सुनकर वीरवर राजा को प्रणाम कर राजसभा से बाहर चला गया ।)
(3) मन्त्री – (तदालोक्य) देव! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति ।
अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना । स च राजपुत्रः प्रतिदिनं प्रभाते राजदर्शनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छति देवेभ्यः अर्धम् । स्थितस्य चार्द्धं दरिद्रेभ्यो ददाति निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते । ततो धृतायुधः सः राजद्वारमहर्निशं सेवते । यदा राजा स्वयमादिशति तदा याति स्वगृहम्।
अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्द्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- उपपन्नम – उपयुक्त (Appropriate),
- नियोजित – नियुक्त किया गया (Appointed),
- धृतायुधः – शस्त्र धारण किया हुआ (Bearing weapons),
- अहर्निशं – दिन-रात (DayAnd night),
- करुणरोदनध्वनिं – करुणा से भरी रोने की आवाज़ (Sound of pitiful crying)।
सरलार्थ-
मंत्री – (उसे देखकर) हे देव! चार दिन का वेतन देकर पहले परीक्षा की जाए वेतनार्थी के स्वरूप इस राजपुत्र की, क्या यह वेतन उपयुक्त है या नहीं ।
फिर मंत्री के वचन से राजपुत्र वीरवर तांबूल (पान – संबंधी सेवा) देने के कार्य में नियुक्त किया गया। वह और राजपुत्र प्रतिदिन प्रात:काल राजा के दर्शन के बाद अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को अर्पित करता है। और दूसरा आधा भाग वह गरीबों के लिए देता है, और उससे जो शेष बचता है भोजन, विलास ( सुख-सुविधा), खर्च के लिए पत्नी के हाथ में सौंप देता है। इसके बाद शस्त्र धारण करके वह राजद्वार की दिन-रात सेवा करता है । जब राजा स्वयं आदेश देता है तभी वह अपने घर जाता है। एक बार कृष्ण चतुर्दशी पर अर्धरात्रि में राजा ने किसी की करुणा से भरी रोने की आवाज़ सुनी।

(4) राजा – कोऽत्र द्वारि तिष्ठति ?
वीरवर: – सेवको वीरवरोऽत्र द्वारि वर्तते देव !
राजा – क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!
वीरवरः – यथादिशति देवः ।
(ततोऽसौ तद्रोदनस्वरम् अनुसरन् प्रचलितः ।)
राजा – (स्वगतम्) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन् ।
तस्मात् अहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य, निरूपयामि च किमेतदिति ।
(ततो नरपतिः खड्गपाणिः तस्य अनुसरणक्रमेण बहिः निरगच्छत् नगरीद्वारात् । अथ गच्छता राजपुत्रेण बहि: नगरादालोकिता रोदनपरा कापि सुन्दरी दिव्याभरणभूषिता ।)
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- सूचिभेद्ये – सघन (Dense),
- तिमिरे – अन्धकार में (In darkness),
- खड्गपाणि: – खड्गधारी (One with sword),
- रोदनपरा – रोती हुई ( Weeping lady)।
सरलार्थ-
राजा – कौन यहाँ द्वार पर खड़ा है?
वीरवर – सेवक वीरवर यहाँ द्वार पर खड़ा है, हे देव!
राजा – रोने की आवाज़ का पीछा करो हे राजपुत्र !
वीरवर – जैसा आदेश देव ।
(इसके बाद वह उस करुणार्द्र रोने की आवाज़ का अनुसरण करते हुए चल पड़ा ।)
राजा – (मन में) यह राजपुत्र अकेले जाने के योग्य नहीं, सुई की नोक जैसी घोर अंधकारमयी इस रात में । इसलिए मैं भी जाता हूँ पीछे-पीछे उसके, और पता लगाता हूँ कि बात क्या है।
(तब राजा तलवार हाथ में लेकर, उस के पीछे-पीछे चलते हुए नगर के द्वार से बाहर निकला। बाहर निकलते हुए राजपुत्र के द्वारा नगर के बाहर कोई सुन्दरी देखी गई जो दिव्य आभूषणों से सुसज्जित थी ।)
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(5) वीरवर: – का त्वमम्ब! किमर्थं विलपसि?
राजलक्ष्मी: – वत्स! अहमेतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीरस्मि । चिरमेतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि । साम्प्रतं तु देव्या अपराधेनाद्य प्रभृति तृतीये दिवसे राजा पञ्चत्वं यास्यति, तदाहमनाथा भविष्यामि । तदिदानीं नात्र स्थास्यामीति क्रन्दामि ।
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- विलपसि – रो रही हो (You) crying),
- क्रन्दामि – रो रही हूँ (Crying)
सरलार्थ-
वीरवर – आप कौन हो माँ! किसलिए रो रही हो?
राजलक्ष्मी – बेटा! मैं इस राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी हूँ। लंबे समय से इसके बाहु – छाया में बहुत सुखपूर्वक मैं निवास कर रही हूँ। लेकिन अब रानी के अपराध के कारण आज से प्रारंभ होकर तीसरे दिन तक राजा पाँच तत्वों में लीन हो जायेंगे। तब मैं अनाथ हो जाऊँगी । इसलिए अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी, इस विचार से रो रही हूँ ।
(6) वीरवरः – (तदाकर्ण्य प्रणिपत्य) भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी?
राजलक्ष्मी: – अस्ति वत्स! एकैवात्र प्रवृत्ति:, सा चातीव दुःसाध्या।
वीरवर: – (साष्टाङ्गं नमस्कृत्य) अम्ब! कथय, कः सः उपायः दुःसाध्यः ?
राजलक्ष्मी: – श्रूयतां पुत्र! यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहार : क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि ।
(ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।)
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- साष्टाङ्गं – आठों अंगों सहित (With eight parts)।
सरलार्थ
वीरवर – (यह सुनकर प्रणाम करते हुए) हे माता ! यहाँ कोई उपाय है जिससे फिर से दीर्घकाल तक आप और स्वामी अच्छी तरह लंबे समय तक जीवित रहें?
राजलक्ष्मी – हे पुत्र ! एक ही आचरण, वह अत्यंत कठिनाई से पालन करने योग्य है।
वीरवर – (साष्टांग प्रणाम करके) हे माँ! बताइए क्या वह कठिन उपाय है?
राजलक्ष्मी – सुनो पुत्र ! यदि तुम्हारे द्वारा स्वयं की सबसे प्रिय वस्तु को हँसते हुए मुख से भगवती सर्वमंगला के लिए भेंट कर दो, तब फिर जीवित रहेंगे राजा शूद्रक सौ वर्षों तक, और मैं भी सुख से निवास कर सकूँगी।
(इसके बाद वह उसी समय ही चली गई उसके सामने दिखाई नहीं दी)

Class 8 Sanskrit Chapter 10 नीतिनवनीतम् Summary Notes
नीतिनवनीतम् Summary
संस्कृत साहित्य सर्वतोभावेन एक समृद्ध साहित्य है। इसमें ज्ञान-विज्ञान की सभी विधाओं का तलस्पर्शी विवेचन हुआ है। प्रत्येक विधा को ‘शास्त्र’ की संज्ञा प्राप्त है। इस साहित्य में जीवनोपयोगी सन्देश तथा व्यवहारोपयोगी बातें पदे पदे उपलब्ध होती हैं। ये वचन यत्र तत्र सुभाषितों और नीति श्लोकों के रूप में प्राप्त होते हैं। जीवनमार्ग पर चलते हुए जब मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ हो जाता है तो ये कथन ही उसका मार्गदर्शन करते हैं। नीतिशतक, विदुरनीति तथा चाणक्य नीति आदि ग्रन्थ ऐसे ही श्लोकों के अमर आगार हैं।
इसी श्रृंखला में स्मृतिग्रन्थों की रचना हुई। ये मानव सभ्यता के संविधान कहे जाते हैं। इनमें मनुस्मृति का नाम विशेष उल्लेखनीय है। प्रस्तुत पाठ मनुस्मृति के कतिपय श्लोकों का संकलन है जो सदाचार की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। यहाँ कहा है-माता-पिता तथा गुरुजनों का आदर करने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है। इसके अतिरिक्त सुख-दुःख में समान रहना, अन्तरात्मा को आनन्दित करने वाले कार्य करना आदि शिष्टाचारों का उल्लेख भी किया गया है।
नीतिनवनीतम् Word Meanings Translation in Hindi
मूलपाठः, अन्वयः, शब्दार्थः सरलार्थश्च
(क) अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥1॥
अन्वयः-
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः तस्य आयुर्विद्यायशोबलम् (इति) चत्वारि वर्धन्ते।
शब्दार्थ-
अभिवादन:-प्रणाम।
उपसेविन:-सेवा करने वाले का।
चत्वारि-चार।
वर्धन्ते-वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
सरलार्थ-
प्रणाम करने वाले तथा नित्य वृद्ध लोगों की सेवा करने वाले (व्यक्ति) की आयु, विद्या, यश तथा बल-ये चार वस्तुएँ वृद्धि को प्राप्त होती हैं।
(ख) यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥2॥
अन्वयः-
नृणां सम्भवे मातापितरौ यं क्लेशं सहेते, तस्य निष्कृतिः वर्षशतैरपि कर्तुं न शक्या।
शब्दार्थ-
नृणाम्-मनुष्यों का।
सम्भवे-जन्म के समय।
क्लेशं-कष्ट को।
सहेते-सहन करते हैं।
निष्कृतिः-बदला।
शतैः-सैकड़ों। शक्या-की जा सकती। सरलार्थ-मनुष्यों के जन्म के अवसर पर माता-पिता जिस कष्ट को सहन करते हैं, उसका बदला सैकड़ों वर्षों में भी नहीं चुकाया जा सकता।
(ग) तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा।
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते॥3॥
अन्वयः-
तयोः आचार्यस्य च नित्यं सर्वदा प्रियं कुर्यात्। तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते।।
शब्दार्थ-
तयोः-उन दोनों का।
कुर्यात्-करे।
त्रिषु-तीनों के।
तुष्टेषु-प्रसन्न होने पर।
समाप्यते-पूर्ण होता है।
सरलार्थ-
उन दोनों का (अर्थात् माता व पिता का) तथा गुरु का सदा और नित्य ही प्रिय करना चाहिए। उन तीनों के प्रसन्न हो जाने पर सभी तप सम्पन्न हो जाते हैं।
(घ) सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥4॥
अन्वयः-
सर्वं परवशं दु:खम्, सर्वम् आत्मवशं सुखम्, एतत् सुखदुःखयोः लक्षणं समासेन विद्यात्।।
शब्दार्थ-
परवशम्-दूसरे के वश में होना।
आत्म-अपने।
समासेन-संक्षेप में।
लक्षणम्-परिभाषा।
विद्यात्-जान लेना चाहिए।
सरलार्थ-
दूसरे के वश में होना ही दुःख है तथा अपने वश में होना ही सुख है। यह सुख-दुःख की परिभाषा संक्षेप में जानना चाहिए।
(ड) यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्॥5॥
अन्वयः-
यत् कर्म कुर्वतः अस्य अन्तरात्मनः परितोषः स्यात्, तत् प्रयत्नेन कुर्वीत, विपरीतं तु वर्जयेत्।।
शब्दार्थ-
कुर्वतः-करते हुए।
अन्तरात्मन:-अन्तरात्मा का।
परितोषः-सन्तोष।
कुर्वीत-करना चाहिए।
वर्जयेत्-त्याग कर दे।
सरलार्थ-
जिस कार्य को करते हुए अन्तरात्मा को संतोष होता है, उसे प्रयत्न पूर्वक करना चाहिए, विपरीत का त्याग करना चाहिए।
(च) दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्॥
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥6॥
अन्वयः-
दृष्टिपूतं यादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनः पूतं समाचरेत्।।
शब्दार्थ-
दृष्टिपूतम्-दृष्टि के द्वारा पवित्र।
न्यसेत्-रखे।
पिबेत्-पीना चाहिए।
वाचम्-वाणी को।
समाचरेत्-आचरण करना चाहिए।
सरलार्थ-
दृष्टि के द्वारा पवित्र कदम को रखे, वस्त्र से पवित्र जल पीना चाहिए, सत्य से पवित्र वाणी को कहना चाहिए। मन से पवित्र आचरण करना चाहिए।