Reading Class 8 Hindi Notes Malhar Chapter 9 आदमी का अनुपात कविता Summary in Hindi Explanation helps students understand the main plot quickly.
आदमी का अनुपात कविता Class 8 Summary in Hindi
आदमी का अनुपात Class 8 Hindi Summary
आदमी का अनुपात कविता का सारांश – आदमी का अनुपात Class 8 Summary in Hindi
यह कविता मनुष्य के अस्तित्व और उसकी संकीर्णता तथा ब्रह्मांड की विशालता के अनुपात को दर्शाती है। कवि बताता है कि कैसे एक व्यक्ति कमरे में, कमरा घर में, घर मोहल्ले में, मोहल्ले नगर में, नगर प्रदेश में, प्रदेश देश में, देश पृथ्वी पर, पृथ्वी अनगिनत नक्षत्रों में और ये सभी असीमित और अनगिनत ब्रह्मांड में समाए हुए हैं। इस तरह मनुष्य का भौतिक अस्तित्व अत्यंत सूक्ष्म प्रतीत होता है। हालाँकि, इसी छोटे से मनुष्य के भीतर अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी बुराइयाँ इतनी हावी हो जाती हैं कि वह खुद को विशाल समझने लगता है।
वह संख्याहीन दीवारों और सरहदों को अपनी जागीर बताता है और अपने को सर्वोपरि समझता है। कवि अंत में यह कहकर व्यंग्य करता है कि एक कमरे में बंद यह मनुष्य दो दुनिया बनाता है – एक अपने अस्तित्व सूक्ष्मता की और दूसरी मानसिक अहंकार की छद्म विराटता की । कुल मिलाकर कविता मनुष्य के भौतिक अस्तित्व की सूक्ष्मता और उसके मानसिक अहंकार की विराटता के विराधाभास को उजागर करती है।
आदमी का अनुपात कविता हिंदी भावार्थ Pdf Class 8
आदमी का अनुपात सप्रसंग व्याख्या
1. “दो व्यक्ति कमरे में
कमरे से छोटे- (पृष्ठ सं०-126)
शब्दार्थ :
व्यक्ति – इनसान ।
कमरे – घर के भीतर का एक अलग स्थान।
प्रसंग : यह कविता ‘गिरिजा कुमार माथुर’ द्वारा रचित है। प्रस्तुत पंक्तियाँ कविता की शुरुआत करती हैं, जो मनुष्य के भौतिक अस्तित्व की सूक्ष्मता को दर्शाती हैं।
व्याख्या: कवि यहाँ मनुष्य के शारीरिक आकार और उसके स्थान की सीमितता को इंगित करता है। वह कहता है कि एक कमरे में दो व्यक्ति समा सकते हैं और वे दोनों ही उस कमरे के आकार से भी छोटे होते हैं। यह एक साधारण अवलोकन है जो यह दर्शाता है कि मनुष्य का भौतिक शरीर एक निश्चित, सीमित स्थान घेरता है । यह पंक्तियाँ आगे चलकर मनुष्य को ब्रह्मांड के विशाल संदर्भ में एक अत्यंत सूक्ष्म इकाई के रूप में स्थापित करने की भूमिका तैयार करती हैं।

2. कमरा है घर में
घर है मुहल्ले में
मुहल्ला नगर में
नगर है प्रदेश में
प्रदेश कई देश में
देश कई पृथ्वी पर
अनगिन नक्षत्रों में पृथ्वी एक छोटी (पृष्ठ सं०-126)
शब्दार्थ :
मुहल्ला – इलाका।
नगर – शहर ।
प्रदेश – क्षेत्र ।
पृथ्वी – धरती ।
अनगिनत – जो गिना न जा सके।
नक्षत्र – तारा समूह।
प्रसंग: यह कविता ‘गिरिजा कुमार माथुर’ द्वारा रचित है। ये पंक्तियाँ व्यक्ति को स्थान और परिवेश का बोध कराते हुए उसकी वास्तविक सत्ता की लघुता का बोध कराती हैं।
व्याख्याः कवि यहाँ क्रमबद्ध तरीके से बताता है कि व्यक्ति जिस अनंत का छोटा-सा हिस्सा है वह उससे कितना विराट है । उसका कमरा जिस घर का हिस्सा है वह घर बहुत बड़े मोहल्ले का हिस्सा है। मोहल्ला एक नगर में समाहित है। नगर एक प्रदेश का भाग है। प्रदेश क़ई देशों में से एक है। कई देश मिलकर पृथ्वी पर स्थित हैं और यह पृथ्वी स्वयं अनगिनत नक्षत्रों (सितारों और तारामंडलों) के बीच एक बहुत ही छोटी इकाई है।
यह क्रमबद्ध प्रस्तुति पाठक को यह एहसास दिलाती है कि मनुष्य का भौतिक अस्तित्व और उसका तात्कालिक परिवेश, जब ब्रह्मांड के विशाल परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है, तो कितना नगण्य और छोटा प्रतीत होता है । यह मनुष्य को अपनी विशालता के भ्रम से बाहर निकालने का प्रयास है।
3. करोड़ों में एक ही
सबको समेटे है
परिधि नभ गंगा की
लाखों ब्रह्मांडों में
अपना एक ब्रह्मांड
हर ब्रह्मांड में
कितनी ही पृथ्वियाँ (पृष्ठ सं०-126)
शब्दार्थ : परिधि – किसी आकृति की बाहरी सीमा । नभ – आकाश । ब्रह्मांड – विश्व गोलक, समय और स्थान की संपूर्णता जिसमें सभी ज्ञात और अज्ञात वस्तुएँ, ऊर्जा और पदार्थ शामिल हैं। पृथ्वियाँ – बहुत सारी धरती ।
प्रसंग : यह कविता ‘गिरिजा कुमार माथुर’ द्वारा रचित है। प्रस्तुत पंक्तियाँ ब्रह्मांड की असीमता, आकाशगंगा की विशालता और उसमें पृथ्वी जैसे ग्रहों की बहुलता को उजागर करती हैं।
व्याख्या: कवि आगे ब्रह्मांड की अनंतता का वर्णन करता है। वह कहता है कि करोड़ों नक्षत्रों में से हमारी पृथ्वी एक है जो सब कुछ (जीवन, प्रकृति आदि) को समेटे हुए है। यह पृथ्वी आकाशगंगा की विशाल परिधि के भीतर स्थित है।
कवि फिर बताता है कि हमारी नभ आकाशगंगा में लाखों-करोड़ों ‘ब्रह्मांड’ मौजूद हैं। और कल्पना कीजिए, हर ऐसे ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ हो सकती हैं, यानी कितने ही अन्य ग्रह जिस पर जीवन संभव हो सकता है। यह विस्तार मनुष्य को यह अनुभव कराता है कि जिस पृथ्वी को वह अपना सब कुछ मानता है, वह भी अनंत ब्रह्मांड का एक सूक्ष्म अंश मात्र है और उस पर रहने वाला मनुष्य तो और भी अधीक नगण्य है ।

4. कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियाँ (पृष्ठ सं०- 127)
शब्दार्थ :
भूमियाँ – बहुत सारी धरती ।
सृष्टियाँ – बहुत सारे जगत या संसार ।
प्रसंग : यह कविता ‘गिरिजा कुमार माथुर’ द्वारा रचित है। प्रस्तुत पंक्तियाँ मनुष्य द्वारा बनाई गई भौतिक और वैचारिक सीमाओं तथा विभाजनों पर टिप्पणी करती हैं।
व्याख्या: कवि यहाँ एक प्रश्नवाचक लहजे में कहता है कि इस अनंत ब्रह्मांड में कितनी ही भूमियाँ हैं और कितनी ही सृष्टियाँ यानी न जाने कितनी धरती न जाने कितने संसार हैं। यह मनुष्य द्वारा निर्मित भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सीमाओं की निरर्थकता को दर्शाता है। जब ब्रह्मांड स्वयं असीमित है, तो मनुष्य द्वारा अपनी छोटी-छोटी भूमियों पर खींच ली गई ये सीमाएँ कितनी तुच्छ और व्यर्थ लगती हैं। यह उस संकीर्ण मानसिकता पर कटाक्ष है, जो मनुष्य को सीमाओं में बाँधती है और उसे बड़े दृष्टिकोण से वंचित करती है।
5. यह है अनुपात
आदमी का विराट से
इस पर भी आदमी
ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन (पृष्ठ सं०-127)
शब्दार्थ :
अनुपात – सापेक्षिक संबंध, तुलनात्मक संबंध।
विराट – विशाल, बहुत बड़ा ।
ईर्ष्या – जलन, डाह ।
अहं – अहंकार, घमंड ।
घृणा – नफ़रत ।
अविश्वास – भरोसा न होना ।
लीन – डूबा हुआ, मग्न ।
प्रसंग : यह कविता ‘गिरिजा कुमार माथुर’ द्वारा रचित है। प्रस्तुत पंक्तियाँ मनुष्य के भौतिक लघुता और उसके मानसिक अहंकार के बीच के गहन विरोधाभास को रेखांकित करती हैं। यह कविता का केंद्रीय बिंदु है ।
व्याख्या: कवि यहाँ सीधे-सीधे उस अनुपात पर आता है जिसके बारे में वह बात करना चाह रहा है। वह कहता है कि यह मनुष्य का विशाल ब्रह्मांड के प्रति वास्तविक अनुपात है- यानी वह अत्यंत सूक्ष्म, नगण्य है।
इसके बावजूद यह मनुष्य ईर्ष्या (दूसरों से जलना), अहं (अहंकार, घमंड), स्वार्थ (केवल अपने हित का सोचना), घृणा (नफ़रत) और अविश्वास (दूसरों पर भरोसा न करना) जैसी नकारात्मक और विनाशकारी भावनाओं में पूरी तरह से लीन रहता है। यह मानव स्वभाव की विडंबना को दर्शाता है कि अपनी भौतिक नगण्यता के बावजूद, वह मानसिक रूप से इतना अंहकारी, संकीर्ण और नकारात्मक हो सकता है, जिससे वह अपने आसपास की दुनिया को भी दूषित करता है।

6. संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है,
अपने को दूजे का स्वामी बताता है,
देशों की कौन कहे,
एक कमरे में,
दो दुनिया रचाता है। (पृष्ठ सं०-127)
शब्दार्थ :
संख्यातीत – जिसकी गिनती न हो सके, अनगिनत ।
स्वामी – मालिक ।
रचाता है – बनाता है, निर्माण करता है।
प्रसंग : यह कविता ‘गिरिजा कुमार माथुर’ द्वारा रचित है। ये अंतिम पंक्तियाँ मनुष्य के अहंकार, विभाजनकारी मानसिकता और उसके द्वारा निर्मित कृत्रिम दुनियाओं पर तीखा व्यंग्य करती हैं।
व्याख्या: कवि यहाँ मनुष्य की विभाजनकारी प्रवृत्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है। वह कहता है कि मनुष्य केवल भौतिक दीवारें (जैसे सीमाओं की बाड़) ही नहीं बनाता, बल्कि वह अपने शब्दों (विचारों, मतभेदों, आरोपों, भेदभावपूर्ण भाषा) से भी अनगिनत अदृश्य दीवारें खड़ी कर देता है, जो लोगों के दिलों और समाजों को बाँटती हैं। वह ‘अपने को दूजे का स्वामी बताता है’- यानी वह दूसरों पर अधिकार जताना चाहता है, उन्हें अपना गुलाम या अधीनस्थ मानता है। यह उसकी अहंकारी और वर्चस्ववादी प्रवृत्ति को दर्शाता है।
अंतिम पंक्तियाँ सबसे तीखा व्यंग्य हैं- “ देशों की कौन कहे, एक कमरों में, दो दुनिया बनाता है।” कवि कहता है कि जब मनुष्य बड़े पैमाने पर देशों और राष्ट्रों के बीच विभाजन कर सकता है, तो उसकी संकीर्णता और विभाजनकारी सोच इतनी गहरी है कि वह एक छोटे से कमरे में भी दो अलग-अलग दुनियाएँ बना लेता है। ये ‘दो दुनिया हैं:
- यथार्थ की दुनिया: जहाँ वह स्वयं एक अत्यंत सूक्ष्म प्राणी है जो ब्रह्मांड के अनंत विस्तार में एक कण मात्र है, और जहाँ सभी मनुष्य समान हैं।
- अहंकार और संकीर्णता की दुनियाः जिसे उसने अपने भ्रम, ईर्ष्या, स्वार्थ और घृणा से बनाया है; जिसमें वह स्वयं को बड़ा मानता है; दूसरों को पराया समझता है, और निरंतर विभाजन पैदा करता रहता है। ये पंक्तियाँ मनुष्य की आत्म- केंद्रीयता और उसकी अंधी संकीर्णता पर प्रहार करती हैं जो उसे वास्तविक विशालता और एकता से काट देती है।