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Sanskrit Class 8 Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Meaning in Hindi
Class 8 Sanskrit Chapter 2 Summary Notes अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
इस पाठ में प्रेरणादायक कथानक के माध्यम से संगठन की शक्ति, धैर्य, आत्मविश्वास और लक्ष्य प्राप्ति की महत्ता को दर्शाया गया है। इस पाठ में चित्रग्रीव नामक कबूतर राजा और उसके मित्र हिरण्यक ( चूहों का राजा) की एक कथा के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि संकट की घड़ी में भी अगर हम एकजुट रहें, तो असंभव कार्य को भी कर सकते हैं।
यह पाठ संदेश देता है कि छोटी-छोटी शक्तियाँ भी जब एकजुट होती हैं, तो बड़े से बड़ा कार्य पूरा कर सकती हैं।
Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
1. कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम् अगच्छन्। तदानीं वर्षारम्भकालः आसीत्। सर्वेऽपि गौरीकुण्डनामकं स्थानं प्राप्तवन्तः । यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा । सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः । नद्या : तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः । पर्वतस्खलनं सञ्जातम् । सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन्! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति । सर्वेषाम् अधैर्यं दृष्ट्वा नायक : सुधीरः सर्वान् सांत्वयन् प्रेरयन् च अवदत्-
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- ग्रीष्मावकाशे – गर्मियों की छुट्टियों में (In summer vacation),
- आरोहन्त: – चढ़े (Climb up),
- वृष्टिः :- बरसात (Rain),
- प्रसृतः – फैल गया (Spread),
- भग्नः – टूट गया (Broke down),
- अक्रन्दन् – रोए (They cried)।
सरलार्थ – .
कुछ मित्र विद्यालय के गर्मियों की छुट्टियों में पुण्य क्षेत्र देवभूमि उत्तराखंड दर्शन के लिए गए। तब अचानक बरसात शुरू हो गई। सभी गौरी कुण्ड नामक स्थान पर पहुँच गए। जब वे लोग श्रीकेदार क्षेत्र की ओर चढ़े। तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही जोर से बरसात शुरू हो गई। अचानक सब जगह अन्धकार फैल गया। नदी के तेज जल प्रवाह के कारण पुल टूट गया और पर्वत स्खलन भी हो गया। सभी लोग बहुत जोर से रोने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे, “हे भगवन् ! रक्षा करो, हमारी रक्षा करो। ” सबका धैर्य टूटता देखकर नायक सुधीर सबको सांत्वना और प्रेरणा देते हुए बोला-

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2. नायकः – अयि भोः मित्राणि! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यम् अवलम्ब्य कमपि उपायं चिन्तयामः ।
दिनेश: – (सविषादम्) अरे भ्रातः ! किं वदसि ? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति । एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः ?
नायकः – मित्र! विषादं मा कुरु। यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।
सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुम: ?
नायकः – प्रियमित्राणि! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः । तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति ।
कपिलः – किम् इदं सम्भवति ?
नायकः – नूनं सम्भवति मित्र ! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि ।
सर्वेऽपि – (उत्कण्ठया) का कथा? वद मित्र ! वद ।
नायकः – सावधानं शृण्वन्तु ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- विपत्काले – मुसीबत के समय (Hard time),
- सविषादम् – दुख से (With sadness),
- सम्भूय – मिलकर (Together),
- नूनं-निश्चित ही (Definitely ),
- उत्कण्ठया – उत्सुकता से (In excitement)।
सरलार्थ-
नायक – अरे हे मित्रो ! इस मुसीबत के समय में हम सब धैर्य रखकर कोई उपाय सोचते हैं।
दिनेश – (दुख से ) अरे भाई ! क्या बोल रहे हो? हमारी मृत्यु पास ही है। ऐसे में कैसे उपाय सोच सकते हैं?
नायक – मित्र ! दुखी मत हो । जब वर्षा शान्त हो जाएगी और वातावरण साफ होगा, तब हम सब मिलकर पुल और रास्ता बनाकर फिर से अपने लक्ष्य की तरफ जाएँगे ।
सुरेश – इस प्रकार की स्थिति में हम कैसे बहुत ही कठिन और असंभव कार्य कर सकते हैं?
नायक – प्रिय मित्रो! हम आत्मविश्वास के बल पर असंभव कार्य भी अवश्य सिद्ध कर सकते हैं। उससे हमारे लक्ष्य की प्राप्ति और प्राणों की रक्षा भी हो जाएगी।
कपिल – क्या ऐसा हो सकता है?
नायक – निश्चित ही हो सकता है मित्र ! इस प्रसंग में मैं हितोपदेश की एक कहानी सुनाता हूँ ।
सभी – (उत्सुकता से) कौन सी कहानी ? बताओ मित्र! बताओ ।
नायक – सभी सावधानी से सुनो।

3. अस्ति गोदावरीतीरे एको विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म । अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः । तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म। केचन कपोता: वनमध्ये तण्डुलकणान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन् । ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् ” कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः तद् निरूप्यताम् । कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।” एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत् – “आः किमर्थम् एवमुच्यते ?
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- तरु: – पेड़ (Tree),
- व्याध: – शिकारी (Hunter),
- तण्डुलकणान् – कच्चे चावल के दानों को (Rice grains),
- विकीर्य – बिखेरकर (Having scattered),
- विस्तीर्य – फैलाकर (Having spread),
- प्रच्छन्न: – छुपा हुआ (Stood secretly),
- अविचारित-बिना सोचे समझे (Without thinking)।
सरलार्थ-
गोदावरी नदी के किनारे एक बहुत बड़ा शाल्मली (बरगद) का पेड़ था । वहाँ हर दिन दूर देश से पक्षी आकर रहते थे। उसके बाद वहाँ कोई शिकारी कच्चे चावलों को बिखेरकर और जाल को फैलाकर छुपकर बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा परिवार के साथ आकाश के रास्ते से जा रहा था। कुछ कबूतर जंगल के बीच में चावलों के कणों को देखकर लालच से आकर्षित हो गए। तब चित्रग्रीव चावल के कणों के लोभी कबूतरों से बोला- यहाँ इस सुनसान जंगल में चावल के कणों का होना कैसे संभव है। कोई शिकारी वहाँ होना चाहिए। सब प्रकार से बिना सोचे-समझे काम नहीं करना चाहिए। यह वचन सुनकर कोई कबूतर घमण्ड से बोला- आह ! किसलिए ऐसा कह रहे हो ?
4. वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते ।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥१॥
शब्दार्थाः : (Word Meanings) :
- ग्राह्यम् – ग्रहण करने योग्य है (Receptive),
- आपत्काले – मुसीबत के समय में (In difficult time),
- अप्रवर्तनम् – नहीं खाना चाहिए ( Should not eat)।
अर्थ-
बड़े बुजुर्गों के वचनों को विपत्ति काल में (संकट के समय में ) स्वीकार करना चाहिए । इसी प्रकार हर जगह बिना ( सोचे-समझे ) भोजन भी नहीं करना चाहिए।

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5. तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोता : भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः । अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन्। ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत्र बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म । इदं दृष्ट्वा चित्रग्रीवः अवदत् – ” अयम् अस्य दोषो न । अनागतविपत्तिं को वा ज्ञातुं समर्थः । अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा कश्चन उपायश्चिन्तनीयः । यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम् । सत्पुरुषाणां लक्षणं तु–
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- अवतीर्य – उतरकर (Having descended),
- प्रवृत्ताः – लग गए ( Engaged ) ।
- तिरस्कुर्वन्ति – अपमान करते हैं (Insulting),
- विस्मयः – आश्चर्य (Amazement),
- कापुरुषलक्षणम् – कायर पुरुषों का लक्ष्ण (Sign of coward)।
सरलार्थ-
उसके वचन को सुनकर और चित्रग्रीव की आज्ञा को न मानकर सारे कबूतर धरती पर उतरकर चावल के दानों को खाने में लग गए। इसके बाद वे सारे कबूतर उस शिकारी के द्वारा जाल में बँध गए। इसके बाद जिसके वचन से कबूतर वहाँ बँध गए थे, सब उसका अपमान कर रहे थे।
यह देखकर चित्रग्रीव बोला- यह इसका दोष नहीं है। आने वाली विपत्ति को जानने में कौन समर्थ है। इसलिए इस विपत्ति के समय में हमारे द्वारा इसका अपमान न करके कोई उपाय सोचना चाहिए। क्योंकि विपत्ति के समय में भय और आश्चर्य ही कायर पुरुषों का लक्षण है। श्रेष्ठ पुरुषों के लक्षण तो-
6. विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ २ ॥
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- विपदि – मुसीबत (In adversity),
- अभ्युदये – उन्नति में (In prosperity),
- विक्रम :- वीरता (Valour),
यशसि – यश में (In fame)।
सरलार्थ-
महान लोगों में ये स्वाभाविक गुण होते हैं जैसे विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमा, सभा में बोलने की चतुराई ( वाक्पटुता ) युद्ध में वीरता, यश की इच्छा और शास्त्रों का ज्ञान ।
7. अतोऽधुना अस्माभिः धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम् । प्रियमित्राणि ! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम्। अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम् । ” एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः । अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत् परं तस्य दृष्टिपथात् दूरं गतेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः । अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोताः उक्तवन्तः – “स्वामिन्! किमिदानीं कर्तुम् उचितम् ?” चित्रग्रीव उवाच – ” प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराज : गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति । सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति । ” एतत् आलोच्य सर्वे हिरण्यकस्य विवरसमीपं गताः। हिरण्यकश्च सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति । ततो हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः । चित्रग्रीव उवाच – ” सखे हिरण्यक ! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे ? ” ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत् – ” आः ! पुण्यवान् अस्मि मम प्रियसुहृत् चित्रग्रीवः समायातः । ‘
शब्दार्था: (Word Meanings) :
- चिन्त्यताम् – चिन्तन करना चाहिए (Should be thought),
- उत्पतिता: – उड़ गए (Flew away ),
- पाशान्-बन्धनों को (Captively),
- प्रत्यभिज्ञाय – पहचानकर (Having recognised),
- निवृत्त: – लौट गया (Come back),
- निःसृत्य – निकलकर (Coming out)।
सरलार्थ-
इसलिए अब हमारे द्वारा धैर्य का सहारा लेकर उपाय सोचते हैं। प्रिय मित्रों ! छोटी-छोटी वस्तुओं का संयोजन भी कार्य को सफल करने वाला होता है यह नीति वचन लोक में प्रसिद्ध है। इसलिए हम सबके द्वारा एक साथ जाल को लेकर उड़ना चाहिए। ऐसा सोचकर के सारे पक्षी जाल को लेकर उड़ गए।
इसके बाद शिकारी ने दूर से जाल ले जाने वाले उन कबूतरों को देखकर (उनके) पीछे दौड़ा परन्तु नज़रों से से वह शिकारी (वापस ) लौट गया। इसके बाद शिकारी को लौटा हुआ देखकर सारे कबूतर बोले ‘स्वामी! क्या यह करना उचित है? चित्रग्रीव बोला – ” प्रिय कबूतरों ! हमारा मित्र हिरण्यक नाम चूहों का राजा गण्डकी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह हमारे जाल को दाँतों के बल से काट देगा । ” ऐसा सोच विचार कर सारे हिरण्यक के बिल के पास गए। हिरण्यक हमेशा खतरे की शंका से सौ दरवाज़ों के अन्दर बिल बनाकर रहता है। इसके बाद हिरण्यक कबूतरों के उतरने के भय से आश्चर्य चकित होकर चुपचाप बैठ गया । चित्रग्रीव बोला – ” मित्र हिरण्यक ! क्या हमारे साथ बात नहीं करोगे? ” तब हिरण्यक उसकी आवाज को पहचान कर खुशी से जल्दी से बाहर निकलकर बोला- “आह! मैं पुण्यवान हूँ, मेरा प्रिय मित्र चित्रग्रीव आया है।

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8. पाशबद्धान् कपोतान् दृष्ट्वा सविस्मयं क्षणं स्थित्वा अवदत् – ” सखे! किमेतत् ? ” चित्रग्रीवोऽवदत्- ” सखे! एतद् अस्माकं विचारहीनतायाः फलम् । ” तत् श्रुत्वा हिरण्यक : चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति । तदा चित्रग्रीवोऽवदत् – ” मित्र ! मा मा एवम्। पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम । ” एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् – ” साधु मित्र! साधु। अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि । ” ततो हिरण्यकः स्वमित्रैः सह सर्वेषां कपोतानां बन्धनानि छिनत्ति स्म। सर्वे कपोताः पाशविमुक्ताः अभवन् । सहर्षं पुनः उड्डीय आकाशमार्गेण गच्छन्तः सर्वे कपोता : राजानं चित्रग्रीवं
प्रशंसन्ति – ” भवतः नीतिशिक्षया नायकधर्मेण च वयं सर्वे सुरक्षिताः । धन्याः वयम् ” । कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति- ” मित्राणि ! आपद्ग्रस्ताः कपोता: बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः । तर्हि किमर्थं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः ?” नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः। भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) :
- सत्वरम् – जल्दी (Quickly),
- उपसर्पति – पास जाता है (Approaches near),
- छिनत्तु-काट दे (Cut it),
- आकर्ण्य-सुनकर (Having heard),
- प्रहृष्टमनाः – प्रसन्न मन वाला (Cheerful person),
- पुलकितः – प्रसन्न, खुश होकर (Excited),
- आश्रितवात्सल्येन – शरण में आए हुए के प्रति प्रेम से (Affection towards people who have taken shelter)।
सरलार्थ-
जाल में बंधे कबूतरों को देखकर हैरानी के साथ क्षण भर रुक कर बोला – ” मित्र ! यह क्या?”
चित्रग्रीव बोला – ” मित्र ! यह हमारी विचारहीनता का फल है। वह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव के बंधन काटने के लिए पास जाता है। तब चित्रग्रीव बोला – ” मित्र, नहीं नहीं ऐसा नहीं है। पहले मेरे शरण में आए हुओ के जाल को काटो, बाद में मेरा । ” यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्न मन से खुश होता हुआ बोला – “वाह मित्र ! वाह! इस शरण में आए हुए के प्रति प्रेम से तुम तीनों लोकों का भी स्वामी बनने योग्य हो गए हो।” इसके बाद हिरण्यक ने अपने मित्र के साथ सारे कबूतरों के बंधन को काट दिया। सारे कबूतर जाल से छूट गए। खुशी के साथ फिर से उड़कर आकाश मार्ग से जाते हुए सारे कबूतर राजा चित्रग्रीव की प्रशंसा करते हैं- ” आपकी नीति शिक्षा और नायक धर्म के द्वारा ही हम सब सुरक्षित हैं। धन्य हैं हम सब । “कथा को सुनाकर नायक सबको सम्बोधित करता है – ” मित्रो ! मुसीबत के समय कबूतरों ने बुद्धिबल से और एकता के बल से अपनी रक्षा की। तो क्या हम संघटित ( एकत्र ) होकर अपनी रक्षा नहीं कर सकते हैं?” नायक के द्वारा प्रेरणा देने वाले वचनों से उत्साहित होकर सारे भय, शोक और संदेह को छोड़कर पुल बनाने के काम में लग गए। बहुत कोशिशों से पुल को बनाकर उन्होंने अपने तथा दूसरे के प्राणों की रक्षा की।
Class 8 Sanskrit Chapter 2 बिलस्य वाणी न कदापि में श्रुता Summary Notes
बिलस्य वाणी न कदापि में श्रुता Summary
प्रस्तुत पाठ ‘पञ्चतन्त्र’ के तृतीय खण्ड से संकलित है। यह खण्ड ‘काकोलूकीय’ नाम से जाना जाता है। पञ्चतन्त्र के रचयिता . का नाम ‘विष्णुशर्मा’ है। इस ग्रन्थ की रचना विष्णुशर्मा ने राजा अमरशक्ति के मूर्ख पुत्रों को नीतिशास्त्र की शिक्षा देने के लिए की थी। इस ग्रन्थ में पाँच खण्ड हैं, जिन्हें ‘तन्त्र’ कहते हैं। पञ्चतन्त्र एक प्रसिद्ध कथाग्रन्थ है। इसमें अनेक कथाएँ ई हैं। बीच-बीच में शिक्षाप्रद श्लोक भी दिए गए हैं। कथाओं के पात्र प्रायः पशु-पक्षी हैं। पाठ का सार इस प्रकार है किसी वन में खरनखर नामक सिंह रहता था। वह भोजन की खोज में घूम रहा था। सायंकाल एक विशाल गुफा को देख कर उसने सोचा-‘इस गुफा में रात में अवश्य कोई प्राणी आता है। अतः यहाँ छिप कर बैठता हूँ।’

इसी बीच उस गुफा का स्वामी दधिपुच्छ नामक गीदड़ वहाँ आया और सिंह के पैरों के निशान देखकर बाहर खड़ा हो गया। गीदड़ बुद्धिपूर्वक विचार करके गुफा से कहने लगा-‘अरे गुफा! आज तुम मुझे क्यों नहीं बुला रही हो?’

यह सुनकर (मूर्ख) सिंह ने सोचा कि यह गुफा इस गीदड़ को प्रतिदिन बुलाती होगी। आज मेरे भय से नहीं बुला रही है। यह सोचकर सिंह ने उसे अन्दर आने के लिए कहा। सिंह की आवाज सुनकर गीदड़ ने कहा- मैंने आज तक गुफा की आवाज नहीं सुनी।’ ऐसा कह कर वह भाग गया।
बिलस्य वाणी न कदापि में श्रुता Word Meanings Translation in Hindi
मूलपाठः, अन्वयः, शब्दार्थः सरलार्थश्च
(क) कस्मिंश्चित् वने खरनखरः नाम सिंहः प्रतिवसति स्म। सः कदाचित् इतस्तत: परिभ्रमन् क्षुधातः न किञ्चिदपि आहारं प्राप्तवान्। ततः सूर्यास्तसमये एकां महतीं गुहां दृष्ट्वा सः अचिन्तयत्-“नूनम् एतस्यां गुहायां रात्रौ कोऽपि जीवः आगच्छति। अतः अत्रैव निगूढो भूत्वा तिष्ठामि” इति।
शब्दार्थ-
कस्मिंश्चित्-किसी।
प्रतिवसति स्म-रहता था।
इतस्ततः-इधर-उधर (Wandering)।
क्षुधार्तः-भूख से व्याकुल (Extremely Hungry)।
किञ्चिदपि-कुछ भी।
ततः-तब।
महतीम्-विशाल।
दृष्ट्वा-देखकर।
नूनम्-अवश्य ही । निश्चित रूप से।
वने-वन में।
कदाचित्-किसी समय।
परिभ्रमन्-घूमता हुआ।
आहारम्-भोजन।
एकाम्-एक।
गुहाम्-गुफा (Cave) को।
अचिन्तयत्-सोचा।
एतस्याम्-इसमें।
रात्रौ-रात में।
जीवः-प्राणी।
अतः-इसलिए।
निगूढो भूत्वा-छिप कर (Hide)
कोऽपि-कोई भी।
आगच्छति-आता है।
अत्रैव-यहाँ पर ही।
तिष्ठामि-बैठ जाता हूँ।
सरलार्थ-
किसी वन में खरनखर नामक सिंह (Lion) रहता था। किसी समय भूख से व्याकुल होकर इधर-उधर घूमते हुए उसे कुछ भी भोजन प्राप्त न हुआ। तब सूर्य के अस्त होने के समय एक विशाल गुफा को देखकर वह सोचने लगा-“निश्चित रूप से इस गुफा में रात में कोई प्राणी आता है। अतः यहाँ पर ही छिप कर बैठता हूँ।”
(ख) एतस्मिन् अन्तरे गुहायाः स्वामी दधिपुच्छः नामकः शृगालः समागच्छत्। स च यावत् पश्यति तावत् सिंहपदपद्धतिः गुहायां प्रविष्टा दृश्यते, न च बहिरागता।शृगालः अचिन्तयत्-“अहो विनष्टोऽस्मि। नूनम् अस्मिन् बिले सिंहः अस्तीति तर्कयामि। तत् किं करवाणि?”
शब्दार्थ-
एतस्मिन् अन्तरे-इसी बीच (Meantime)।
नामकः-नाम।
समागच्छत्-आ गया (Reached)।
पश्यति-देखता है।
सिंहपद०-सिंह के पैरों के।
प्रविष्टा-प्रविष्ट हुई । अंदर चली गई।
बहिः-बाहर।
अचिन्तयत्-सोचने लगा।
नूनम्-अवश्य ही।
अस्तीति-है-ऐसा।
करवाणि-करूँ।
गुहायाः-गुफा का (Cave)।
शृगालः-गीदड़ (Jackal)।
यावत्-ज्यों ही।
तावत्-त्यों ही।
पद्धतिः-निशान।
दृश्यते-दिखाई पड़ रही है।
आगता-आ गई।
विनष्ट:-नष्ट हो गया। न
अस्मिन्-इस।
तर्कयामि-सोचता हूँ।
सरलार्थ-
इसी बीच गुफा का मालिक दधिपुच्छ नामक गीदड़ आ गया। जैसे ही वह देखता है, वैसे ही शेर के पंजों के निशान गुफा में प्रविष्ट होते हुए (जाते हुए) दिखाई पड़े तथा (वे निशान) बाहर नहीं आए। गीदड़ सोचने लगा-“अरे, मैं मर गया। अवश्य ही, इस बिल में शेर है-ऐसा मैं मानता हूँ। तो क्या करूँ?”
(ग) एवं विचिन्त्य दूरस्थः रवं कर्तुमारब्धः-‘भो बिल! भो बिल! किं न स्मरसि, यन्मया त्वया सह समयः कृतोऽस्ति यत् यदाहं बाह्यतः प्रत्यागमिष्यामि तदा त्वं माम् आकारयिष्यसि? यदि त्वं मां न आह्वयसि तर्हि अहं द्वितीयं बिलं यास्यामि इति।”
शब्दार्थ –
एवम्-इस प्रकार।
दूरस्थ:-दूर खड़ा होकर।
कर्तुम्-करने के लिए।
किम – क्या
स्मरसि-तुम याद करते हो (Recollect)
त्वया सह-तुम्हारे साथ।
कृतः-की।
यदा-जब।
विचिन्त्य-सोच कर।
रवम्-आवाज / शब्द।
आरब्धः-आरम्भ किया।
यन्मया-कि मैंने।
समयः-प्रतिज्ञा / समझौता।
यत्-कि।
बाह्यतः-बाहर से।
तदा-तब।
प्रत्यागमिष्यामि-लौटूंगा।
आकारयिष्यसि-बुलाओगे।
तर्हि-तो।
आह्वयसि-बुलाती हो।
यास्यामि-चला जाऊँगा।
सरलार्थ-
ऐसा विचार कर दूर खड़े होकर आवाज करना शुरू किया- “अरे बिल! अरे बिल! क्या तुम्हें याद नहीं है, कि मैंने तुम्हारे साथ समझौता किया है कि जब मैं बाहर से लौटूंगा तब तुम मुझे बुलाओगे? यदि तुम मुझे नहीं बुलाते हो तो मैं दूसरे बिल में चला जाऊँगा।”
(घ) अथ एतच्छ्रुत्वा सिंहः अचिन्तयत्-“नूनमेषा गुहा स्वामिनः सदा समाह्वानं करोति। परन्तु मद्भयात् न किञ्चित् वदति।”
अथवा साध्विदम् उच्यते –
भयसन्त्रस्तमनसां हस्तपादादिकाः क्रियाः।
प्रवर्तन्ते न वाणी च वेपथुश्चाधिको भवेत्।।
अन्वयः –
भयसन्त्रस्तमनसां हस्तपादादिकाः क्रियाः वाणी च न प्रवर्तन्ते, वेपथुः च अधिकः भवेत्।
शब्दार्थ-
अथ-इसके बाद।
श्रुत्वा-सुनकर।
नूनम्-अवश्य।
स्वामिनः-स्वामी का (Master)।
परन्तु-लेकिन।
भयात्-डर से।
वदति-कहती है।
उच्यते-कहा गया है।
सन्त्रस्त०-डरा हुआ।
पाद०-पैर आदि।
वेपथुः-कम्पन (Trembling)
एतत्- यह
अचिन्तयत्-सोचा।
एषा – यह।
समाह्वानम्-आह्वान / बुलाना।
मद्-मेरे।
किञ्चित्-कुछ।
साधु-उचित।
भय०-डर।
मनसा-मन वाले।
हस्त०-हाथ।
प्रवर्तन्ते-प्रवृत्त होती हैं।
भवेत्-होता है।
सरलार्थ-
इसके बाद यह सुनकर सिंह सोचने लगा-“अवश्य ही यह गुफा अपने स्वामी को सदा बुलाती होगी; परन्तु मेरे डर से (आज) कुछ नहीं बोल रही है।”
अथवा यह उचित ही कहा है –
भय से डरे हुए मन वाले (लोगों) के हाथ व पैरों से सम्बन्धित क्रियाएँ तथा वाणी ठीक से प्रवृत्त नहीं हुआ करती हैं तथा कम्पन अधिक होता है।
(ङ) तदहम् अस्य आह्वानं करोमि। एवं सः बिले प्रविश्य मे भोज्यं भविष्यति। इत्थं विचार्य सिंहः सहसा शृगालस्य आह्वानमकरोत्। सिंहस्य उच्चगर्जनप्रतिध्वनिना सा गुहा उच्चैः शृगालम् आह्वयत्। अनेन अन्येऽपि पशवः भयभीताः अभवन्। शृगालोऽपि ततः दूरं पलायमानः इममपठत्
शब्दार्थ-
तद्-तब (तो)।
एवम्-इस प्रकार।
मे-मेरा।
इत्थम्-इस प्रकार।
सहसा-अचानक।
प्रतिध्वनिना-गूंज के द्वारा (Echo)
आह्वयत्-बुलाया।
भयभीताः-डर से, डर कर।
पलायमानः-भागता हुआ।
अपठत्-पढ़ा।
आह्वानं करोमि-बुलाता हूँ।
प्रविश्य-प्रवेश करके। मे-मेरा।
भोज्यम्-भोजन
विचार्य-विचार करके।
उच्चगर्जन०-ऊँची गर्जना, दहाड़ (Roar)
उच्चैः -जोर से।
अनेन-इस प्रकार।
ततः-उससे।
इमम्-इस।
अन्येऽपि-दूसरे भी।
सरलार्थ-
तो मैं इसे बुलाता हूँ। इस प्रकार वह बिल में घुस कर मेरा भोजन बन जाएगा। इस प्रकार विचार करके सिंह ने एकाएक गीदड़ को बुलाया। सिंह की ऊँची गर्जना (दहाड़) की गूंज से उस गुफा ने जोर से गीदड़ को बुलाया। इससे अन्य पशु भी भयभीत हो गए। गीदड़ भी उससे दूर भागता हुआ इस (श्लोक) को पढ़ने लगा
अनागतं यः कुरुते स शोभते
स शोच्यते यो न करोत्यनागतम्।
वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा
बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता॥
अन्वयः-
यः अनागतं कुरुते, सः शोभते। यो अनागतं न करोति, सः शोच्यते। अत्र वने संस्थस्य (मे) जरा समागता, (परम्) कदापि बिलस्य वाणी मे न श्रुता।
शब्दार्थ-
अनागतम्-न आने वाले (दुःख) को।
कुरुते-(प्रतीकार) करता है।
शोच्यते-चिन्तनीय होता है।
संस्थस्य-रहते हुए (Living)
जरा-बुढ़ापा (Old age)
मे-मैंने । मेरे द्वारा।
यः-जो।
शोभते-शोभा पाता है।
वनेऽत्र-यहाँ जंगल में।
समागता-(प्राप्त) हो गई है।
कदापि-कभी भी।
श्रुता-सुनी।
सरलार्थ –
जो (व्यक्ति) न आए हुए (दुःख) का (प्रतीकार) करता है, वह शोभा पाता है। जो न आए हुए (दुःख) का (प्रतीकार) नहीं करता है, वह चिन्तनीय होता है। यहाँ वन में रहते हुए मैं बूढ़ा हो गया हूँ, (परन्तु) कभी भी मैंने बिल की आवाज नहीं सुनी।
भावार्थ-
जो अनागत अर्थात् भविष्य में आने वाली संभावित विपत्ति के निराकरण का उपाय करता है, वह संसार में शोभा पाता है। जो आने वाले कल (आपदा) से बचाव का उपाय नहीं करता है, वह दु:खी होता है। यहाँ वन में रहते हुए मेरा बुढ़ापा आ गया परंतु मैंने कभी भी बिल की आवाज नहीं सुनी।