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Class 8 Hindi आदमी का अनुपात Extra Question Answer
Class 8 Hindi Chapter 9 Extra Question Answer आदमी का अनुपात
NCERT Class 8 Hindi Chapter 9 Extra Questions अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
हर ब्रह्मांड में कवि ने किसकी संभावना जताई है ?
उत्तर:
कवि ने हर ब्रह्मांड में बहुत सारी पृथ्वी के होने की संभावना जताई है।
प्रश्न 2.
कवि ने ‘कितनी ही भूमियाँ’ और ‘कितनी ही सृष्टियाँ’ कहकर किस पर कटाक्ष किया है?
उत्तर:
कवि ने मनुष्य द्वारा निर्मित सीमाओं और विभाजनों पर कटाक्ष किया है।
प्रश्न 3.
मनुष्य का विराट से क्या अनुपात है?
उत्तर:
बहुत ही सूक्ष्म या नगण्य ।
प्रश्न 4.
मनुष्य किन नकारात्मक भावनाओं में लीन रहता है?
उत्तर:
मनुष्य ईर्ष्या, अहं (अहंकार), स्वार्थ, घृणा, अविश्वास जैसी नकारात्मक भावनाओं में लीन रहता है।
प्रश्न 5.
मनुष्य किसको ‘दूजे का स्वामी’ बताता है ?
उत्तर:
मनुष्य अपने आपको दूसरे का स्वामी बताता है।
प्रश्न 6.
कवि के अनुसार, मनुष्य एक कमरे में कितनी दुनिया बनाता है?
उत्तर:
कवि के अनुसार मनुष्य एक कमरे में दो दुनियाँ बनाता है।
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आदमी का अनुपात Class 8 Hindi Extra Question Answer लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
कविता में मनुष्य के अस्तित्व को बढ़ते क्रम में कैसे दिखाया गया है? इस क्रम का क्या प्रभाव है ?
उत्तर:
कविता में मनुष्य के अस्तित्व को एक बढ़ते हुए क्रम में दर्शाया गया है: व्यक्ति कमरे से छोटा कमरा घर में, घर मोहल्ले में, मोहल्ला नगर में, नगर प्रदेश में, प्रदेश देश में, देश पृथ्वी पर, और पृथ्वी अनगिनत नक्षत्रों में एक छोटी इकाई है। यह क्रमबद्धता पाठक को यह अनुभव कराती है कि मनुष्य और उसका परिवेश कितना सूक्ष्म है जब उसकी तुलना विशाल ब्रह्मांड से की जाती है। इसका प्रभाव यह है कि यह मनुष्य को उसकी भौतिक नगण्यता का बोध कराता है।
प्रश्न 2.
“यह है अनुपात आदमी का विराट से” – इस पंक्ति का क्या आशय है और यह मनुष्य को क्या सोचने पर विवश करती है?
उत्तर:
इस पंक्ति का आशय यह है कि मनुष्य का वास्तविक अनुपात विशाल ब्रह्मांड के सापेक्ष बहुत ही सूक्ष्म और नगण्य है। कवि यह बताना चाहता है कि जिस मनुष्य को अपने छोटे से दायरे में बहुत बड़ा होने का भ्रम है, वह जब ब्रह्मांड की विशालता के सामने खड़ा होता है, तो उसका अस्तित्व धूल के एक कण से भी कम प्रतीत होता है। यह पंक्ति मनुष्य को अपनी भौतिक तुच्छता और अपने व्यर्थ अहंकार पर सोचने पर विवश करती है।
प्रश्न 3.
कवि ने मनुष्य के आंतरिक दोषों (ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास) पर किस प्रकार प्रकाश डाला है?
उत्तर:
कवि ने मनुष्य के आंतरिक दोषों पर यह कहकर प्रकाश डाला है कि अपनी भौतिक लघुता के बावजूद, मनुष्य ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी नकारात्मक भावनाओं में लीन रहता है। ये दोष उसे बाहरी विशाल दुनिया से विमुख कर देते हैं और उसे अपनी ही बनाई हुई संकीर्ण दुनिया में कैद कर लेते हैं । कवि यह दर्शाता है कि मनुष्य का मन उसके भौतिक शरीर से कहीं अधिक विशाल और जटिल है, परंतु अक्सर यह नकारात्मकं भावनाओं से ग्रस्त रहता है।
प्रश्न 4.
“एक कमरे में, दो दुनिया रचाता है” इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
इस पंक्ति का भाव यह है कि मनुष्य अपने अहंकार, स्वार्थ और विभाजनकारी सोच के कारण वास्तविक दुनिया से कटकर अपनी एक अलग ही दुनिया बना लेता है। ये ‘दो दुनिया’ एक तो उसकी भौतिक उपस्थिति की दुनिया है जिसमें वह बहुत छोटा है और दूसरी उसकी मानसिक दुनिया है जो अहंकार, घृणा और अविश्वास से भरी है। इस मानसिक दुनिया में वह खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, सीमाएँ बनाता है और दूसरों को पराया समझता है। यह कथन मनुष्य की संकीर्ण मानसिकता पर गहरा व्यंग्य है जो उसे एकता और विशालता से दूर रखती है।
प्रश्न 5.
कविता में ‘संख्यातीत शंख सी भी दीवारें उठाता है’ पंक्ति का क्या अर्थ है और यह किस प्रकार की दीवारों की ओर संकेत करती है?
उत्तर:
इस पंक्ति का अर्थ है कि मनुष्य केवल भौतिक दीवारें (जैसे देशों की सीमाएँ या घरों की दीवारें) ही नहीं बनाता, बल्कि वह अपनी वाणी, विचारों, पूर्वाग्रहों और संकीर्ण मानसिकता से भी अनगिनत अदृश्य दीवारें खड़ी कर देता है। ये ‘शब्द’ नफ़रत, भेदभाव, अविश्वास और अहंकार से भरे हो सकते हैं, जो लोगों के दिलों और समाजों के बीच दूरियाँ पैदा करते हैं। यह पंक्ति भौतिक से अधिक मानसिक और भावनात्मक दीवारों की ओर संकेत करती है।
आदमी का अनुपात Extra Questions दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
कविता “आदमी का अनुपात” में कवि ने मनुष्य के भौतिक विस्तार को ब्रह्मांड की विशालता के समक्ष कैसे प्रस्तुत किया है? इस प्रस्तुति का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कवि गिरजाकुमार माथुर ने मनुष्य के भौतिक विस्तार को ब्रह्मांड की विराटता के समक्ष अत्यंत कलात्मक और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। वे एक छोटे बिंदु से शुरू करते हैं और धीरे-धीरे बड़े होते दायरे तक पहुँचते हैं।
व्यक्ति की लघुता – सबसे पहले, कवि बताता है कि “ दो व्यक्ति कमरे में, कमरे से छोटे -“। यह मनुष्य के सीमित शारीरिक आकार को दर्शाता है। बढ़ता दायरा फिर, वे एक क्रमिक श्रृंखला प्रस्तुत करते हैं: ” कमरा है घर में, घर है मोहल्ले में, मोहल्ला नगर में, नगर है प्रदेश में, प्रदेश कई देश में, देश कई पृथ्वी पर” । यह मनुष्य के तात्कालिक परिवेश से लेकर बड़े भौगोलिक क्षेत्रों तक के उसके स्थान को दर्शाता है।
ब्रह्मांडीय संदर्भ- अंततः, कवि इस क्रम को ब्रह्मांडीय स्तर तक ले जाता है: “ अनगिनत नक्षत्रों में पृथ्वी एक छोटी”, “करोड़ों में एक ही सबको समेटे है”, “परिधि नभ गंगा की”, “लाखों ब्रह्मांडों में अपना एक ब्रह्मांड”, “हर ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ”। यह प्रस्तुति दर्शाती है कि हमारी पृथ्वी भी ब्रह्मांड में एक छोटा सा कण है, और उस पर रहने वाला मनुष्य तो और भी नगण्य है।
प्रभाव- इस प्रस्तुति का गहरा प्रभाव पड़ता है। यह पाठक को अपनी तथाकथित ‘विशालता’ के भ्रम से बाहर निकालता है और उसे अपनी वास्तविक भौतिक लघुता का बोध कराता है। यह मनुष्य को यह सोचने पर विवश करता है कि जब उसका भौतिक अस्तित्व इतना सूक्ष्म है. तो उसका अहंकार, स्वार्थ और दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृत्ति कितनी अर्थहीन और मूर्खतापूर्ण है। यह प्रस्तुति एक विनम्रता का भाव उत्पन्न करती है और मनुष्य को अपने तुच्छ विभाजनों से ऊपर उठकर एक व्यापक, ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करती है।
प्रश्न 2.
कविता में कवि ने मनुष्य के भीतर व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्तियों (जैसे ईर्ष्या, अहंकार, घृणा) और उसके भौतिक अस्तित्व के बीच क्या संबंध स्थापित किया है ? इस संबंध से कवि क्या संदेश देना चाहता है ?
उत्तर:
कविता में कवि ने मनुष्य के भीतर व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्तियों और उसके भौतिक अस्तित्व के बीच एक विरोधाभासी संबंध स्थापित किया है। एक ओर कवि मनुष्य के भौतिक अस्तित्व को ब्रह्मांड के सामने अत्यंत सूक्ष्म और नगण्य दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर वह बताता है इसी छोटे से मनुष्य के भीतर ‘ईर्ष्या, अहं (अहंकार) स्वार्थ, घृणा, अविश्वास जैसी विशाल नकारात्मक भावनाएँ भरी हुई हैं।
कवि का कहना है कि यह मनुष्य की विडंबना है कि वह भौतिक रूप से तो ब्रह्मांड में एक कण मात्र है, लेकिन मानसिक रूप से इन बुराइयों के बोझ तले इतना दबा हुआ है कि वह स्वयं को ही सब कुछ मान बैठता है। उसकी आंतरिक संकीर्णता उसके छोटे से भौतिक अस्तित्व से कहीं अधिक विराट है। वह इन नकारात्मकताओं में इतना लीन है कि वह अपने वास्तविक अनुपात को भूल जाता है।
इस संबंध से कवि यह संदेश देना चाहता है कि मनुष्य की असली समस्या उसका छोटा भौतिक अस्तित्व नहीं, बल्कि उसकी बड़ी और विनाशकारी आंतरिक प्रवृत्तियाँ हैं। ये नकारात्मक भावनाएँ उसे वास्तविक ज्ञान, सद्भाव और सार्वभौमिकता से दूर रखती हैं । कवि मनुष्य को अपनी आंतरिक बुराइयों पर विजय प्राप्त करने और उन्हें त्यागने का आह्वान करता है।
वह चाहता है कि मनुष्य अपनी बाहरी लघुता को स्वीकार करे और अपनी आंतरिक विशालता को नकारात्मकता के बजाय प्रेम, सहिष्णुता और समझ से भरे । इस प्रकार, मनुष्य न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक रूप से भी ‘विराट’ बन सकता है।
प्रश्न 3.
‘आदमी का अनुपात’ कविता आज के आधुनिक समाज और विश्व के संदर्भ में कितनी प्रासंगिक है ? तर्क सहित स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
‘आदमी का अनुपात’ कविता आज के आधुनिक समाज और विश्व के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि यह मनुष्य की शाश्वत प्रवृत्तियों और उसके सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर करती है :
अहंकार और संकीर्ण राष्ट्रवाद – आज भी विश्व में राष्ट्रों के बीच, समुदायों के बीच और व्यक्तियों के बीच अहंकार, संकीर्ण राष्ट्रवाद, जातीय श्रेष्ठता का भाव और क्षेत्रीयता का बोलबाला है। ‘अपने को दूजे का स्वामी बताना ‘ या ‘देशों की कौन कहे, एक कमरे में, दो दुनिया रचाता’ जैसी पंक्तियाँ आज भी देशों के बीच सीमा विवादों, व्यापार युद्धों और सांस्कृतिक संघर्षों को दर्शाती हैं।
वैश्विक चुनौतियाँ बनाम व्यक्तिगत स्वार्थ- वैश्विक चुनौतियाँ जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारियाँ, गरीबी और असमानता आज भी मनुष्य के सामने विराट रूप में खड़ी हैं। इसके बावजूद, व्यक्ति और राष्ट्र अपने संकीर्ण स्वार्थी, ईर्ष्या और अविश्वास में लीन रहते हैं, जैसा कि कविता में वर्णित है। यह कविता हमें इन साझा चुनौतियों से निपटने के लिए एकता और सहयोग की आवश्यकता को याद दिलाती है।
डिजिटल दुनिया में मानसिक दीवारें- आज के डिजिटल युग में, जहाँ भौतिक दूरियाँ कम हुई हैं, वहीं ‘ संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है’ पंक्ति और भी प्रासंगिक हो जाती है। सोशल मीडिया पर नफ़रत भरे भाषण, फेक न्यूज़ और ऑनलाइन विभाजनकारी बहसें समुदायों के बीच मानसिक दूरियाँ और अविश्वास बढ़ा रही हैं। यह दर्शाता है कि शब्दों के माध्यम से कितनी आसानी से विभाजन पैदा किया जा सकता है।
यह हमें संकीर्णता त्यागकर सार्वभौमिकता और मानवतावाद को अपनाने का आह्वान करती है, जो आज भी उतना ही आवश्यक है जितना कवि के समय में था ।
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प्रश्न 4.
कवि ने मनुष्य के विभाजनकारी स्वभाव पर किस प्रकार व्यंग्य किया है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
कवि गिरजाकुमार माथुर ने ‘आदमी का अनुपात’ कविता में मनुष्य के विभाजनकारी स्वभाव पर गहरा व्यंग्य किया है। एक ओर कवि मनुष्य के भौतिक अस्तित्व को ब्रह्मांड की विशालता के सामने नगण्य सिद्ध करता है, वहीं दूसरी ओर वह दिखाता है कि यही नगण्य मनुष्य कैसे अपनी मानसिकता से विशाल दीवारें खड़ी करता है।
मनुष्य केवल भौतिक सीमाएँ या दीवारें ही नहीं बनाता, बल्कि वह अपनी वाणी, विचारों, पूर्वाग्रहों और संकीर्णता से भी लोगों के बीच मानसिक दूरियाँ और विभाजन पैदा करता है। ये शब्द घृणा, अविश्वास, और अहंकार से भरे हो सकते हैं, जो लोगों को एक-दूसरे से अलग करते हैं। आगे कवि कहते हैं, “ अपने को दूजे का स्वामी बताता है, देशों की कौन कहे, एक कमरे में दो दुनिया रचाता है ।
“यह पंक्तियाँ मनुष्य के मालिकाना हक जताने और दूसरों को अधीनस्थ समझने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करती हैं। यह दर्शाता है कि मनुष्य अपनी क्षुद्र मानसिकता के कारण छोटी-छोटी चीजों पर भी अपना अधिकार जताता है।
कवि यह भी कहते हैं कि जब देश और सीमाओं की बात आती है, तो मनुष्य बड़े-बड़े विभाजन करता है, लेकिन उसकी यह विभाजनकारी प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि वह एक कमरे जैसे छोटे से स्थान में भी दो दुनियाएँ बना लेता है। ये ‘दो दुनियाँ’ एक तो उसकी अपनी अहं – केंद्रित दुनिया है जिसमें वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानता है और दूसरों को पराया समझता है, और दूसरी वास्तविक दुनिया है जिसमें सब एक हैं। यह व्यंग्य मनुष्य की संकीर्ण सोच और असीमित विभाजनकारी प्रवृत्तियों को उजागर करता है, जो उसे वास्तविक विशालता और एकता से दूर रखती है।
प्रश्न 5.
‘आदमी का अनुपात’ कविता के प्रथम भाग में कवि गिरिजाकुमार माथुर ने मानव स्वभाव की किन जटिलताओं का उद्घाटन किया है? विस्तार से चर्चा करें।
उत्तर:
गिरिजाकुमार माथुर ने कविता के प्रथम भाग में मनुष्य के विरोधाभासी और जटिल स्वभाव का गहन विश्लेषण किया है। एक ओर वे ब्रह्मांड की असीमता ( अनगिनत भूमियाँ और ब्रह्मांडों) का वर्णन करते हुए मनुष्य के भौतिक अस्तित्व की सूक्ष्मता को दर्शाते हैं। इस विराट परिप्रेक्ष्य में मनुष्य का अनुपात अत्यंत लघु प्रतीत होता है। परंतु विडंबना यह है कि इतना छोटा होते हुए भी मनुष्य ‘ईर्ष्या, अहं, घृणा, अविश्वास’ जैसे नकारात्मक भावों में डूबा रहता है।
ये भाव उसके व्यक्तित्व को संकीर्ण बनाते हैं और उसे वास्तविक विशालता प्राप्त करने से रोकते हैं । कवि बताता है कि मनुष्य अपने शब्दों के माध्यम से ‘संख्यातीत दीवारें’ खड़ी करता है, जो संवादहीनता और अलगाव को बढ़ावा देती हैं। वह स्वयं को दूसरों का ‘स्वामी’ घोषित करता है, जो उसकी प्रभुत्ववादी प्रवृत्ति और अहंमन्यता को दर्शाता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह ‘एक कमरे में दो दुनिया रचता है’। यह पंक्ति मनुष्य की सीमित सोच, उसकी द्वंद्वग्रस्त मानसिकता और विभाजनकारी स्वभाव को उजागर करती है। यह दर्शाता है कि मनुष्य बड़े पैमाने पर ही नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत दायरे में भी मतभेद और टकराव पैदा करने में सक्षम है। कुल मिलाकर, कवि मानव की अहंमन्यता, उसकी संकीर्णता और उसके आंतरिक विरोधाभासों पर गहरा व्यंग्य करते हुए उसे आत्म- चिंतन के लिए प्रेरित करते हैं।
Class 8 Hindi Chapter 9 Extra Questions and Answers अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
1. दो व्यक्ति कमरे में,
कमरे से छोटे-
कमरा है घर में,
घर है मुहल्ले में
मुहल्ला नगर में
नगर है प्रदेश में
प्रदेश कई देश में
देश कई पृथ्वी पर
अनगिन नक्षत्रों में
करोड़ों में एक ही
सबको समेटे है
परिधि नभ गंगा की
लाखों ब्रह्मांडों में
हर ब्रह्मांड में
कितनी ही पृथ्वियाँ
प्रश्न 1.
कवि ने मनुष्य के अस्तित्व को किस प्रकार ‘छोटे से छोटे’ और फिर ‘विशाल से विशालतम’ के क्रम में दर्शाया है? इस क्रम का क्या उद्देश्य है ?
उत्तर:
कवि ने मनुष्य के भौतिक अस्तित्व को पहले ‘कमरे से छोटे’ के रूप में दर्शाया है। फिर वह इस दायरे को बढ़ाते हुए कमरे को घर में, घर को मोहल्ले में, मोहल्ले को नगर में, नगर को प्रदेश में, प्रदेश को देश में, देश को पृथ्वी पर, और पृथ्वी को अनगिनत नक्षत्रों में एक छोटी इकाई के रूप में दिखाता है। इस क्रम का उद्देश्य मनुष्य को यह एहसास दिलाना है कि ब्रह्मांड की अनंत विशालता के सामने उसका भौतिक अस्तित्व कितना सूक्ष्म और नगण्य है। यह उसके अहंकार को कम करने और उसे अपने वास्तविक स्थान का बोध कराने के लिए है।
प्रश्न 2.
‘पृथ्वी एक छोटी करोड़ों में एक ही सबको समेटे है ? ” इस पंक्ति का क्या भाव है?
उत्तर:
इस पंक्ति का भाव यह है कि हमारी पृथ्वी, जो स्वयं अनगिनत नक्षत्रों और सौरमंडलों के बीच एक छोटी सी इकाई है, इतनी अद्भुत है कि यह सभी जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और प्राकृतिक संपदा को अपने भीतर समेटे हु है। यह पृथ्वी की विशिष्टता और जीवन-दायी क्षमता को दर्शाता है, जबकि ब्रह्मांड में उसके भौतिक आकार का कोई विशेष महत्व नहीं है।
प्रश्न 3.
‘परिधि नभ गंगा की, लाखों ब्रह्मांडों में अपना एक ब्रह्मांड’ इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ब्रह्मांड की किस विशेषता को उजागर करना चाहता है ?
उत्तर:
इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ब्रह्मांड की असीमता और विशालता को उजागर करना चाहता है। वह बताता है कि एक ब्रह्मांड में लाखों आकाश गंगाएँ हैं। यह दर्शाता है कि मानव की कल्पना से भी परे, अंतरिक्ष में अनगिनत और विशालकाय संरचनाएँ मौजूद हैं, जिसके सामने मानव का अस्तित्व और भी अधिक तुच्छ हो जाता है।
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प्रश्न 4.
इस काव्यांश में प्रयुक्त ‘अनगिनत नक्षत्रों’ और ‘लाखों ब्रह्मांडों’ जैसे शब्द मनुष्य के लिए क्या संदेश देते हैं ?
उत्तर:
ये शब्द मनुष्य को उसकी स्वयं की नगण्यता और ब्रह्मांड की विराटता का संदेश देते हैं। वे यह बताते हैं कि जिस पृथ्वी को हम सब कुछ मानते हैं, वह भी इस विशाल सृष्टि का एक कण मात्र है। यह संदेश मनुष्य को अपनी छोटी सोच और संकीर्णता से ऊपर उठकर एक विशाल और विनम्र दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करता है ।
2.कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियाँ
यह है अनुपात
आदमी का विराट से
इस पर भी आदमी
ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन
संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है,
अपने को दूजे का स्वामी बताता है,
देशों की कौन कहे,
एक कमरे में,
दो दुनिया रचाता है।
प्रश्न-
प्रश्न 1.
‘कितनी ही भूमियाँ, कितनी ही सृष्टियाँ’ – इन पंक्तियों के पीछे कवि का क्या भाव है?
उत्तर:
इन पंक्तियों के पीछे कवि का भाव मनुष्य द्वारा बनाई गई कृत्रिम सीमाओं और विभाजनों पर व्यंग्य करना है। कवि यह दर्शाना चाहता है कि जब ब्रह्मांड इतना विशाल और असीमित है, तो मनुष्य द्वारा अपनी छोटी-छोटी भूमियों पर खींची गई ये सरहदें ( भौगोलिक या वैचारिक) कितनी अर्थहीन और निरर्थक हैं। यह मनुष्य की संकीर्ण मानसिकता पर कटाक्ष है।
प्रश्न 2.
इस पर भी आदमी, ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन’ – कवि ने यहाँ मनुष्य के किस विरोधाभासी स्वभाव को दर्शाया है?
उत्तर:
यहाँ कवि ने मनुष्य के विरोधाभासी स्वभाव को दर्शाया है कि अपनी भौतिक नगण्यता (जो ‘विराट के अनुपात’ में स्पष्ट है) के बावजूद, मनुष्य ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी नकारात्मक और संकीर्ण भावनाओं में डूबा रहता है। यह उसकी अज्ञानता और आत्म-केंद्रीयता को उजागर करता है, जो उसे अपनी वास्तविक लघुता का बोध नहीं होने देती ।
प्रश्न 3.
‘संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है’ भाव स्पष्ट कीजिए । – इस पंक्ति का
उत्तर:
इस पंक्ति का भाव यह है कि मनुष्य केवल भौतिक दीवारें ही नहीं बनाता (जैसे देशों की सीमाएँ या घर) बल्कि वह अपनी वाणी, विचारों, पूर्वाग्रहों, रूढ़ियों और भेदभावपूर्ण भाषा के माध्यम से भी अनगिनत अदृश्य दीवारें खड़ी कर देता है। ये ‘शब्द’ लोगों के बीच गलतफहमियाँ, वैमनस्य और दूरियाँ पैदा करते हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव और आपसी भाईचारा खंडित होता है। यह विभाजन भौतिक से अधिक मानसिक और भावनात्मक होता है।
प्रश्न 4.
कवि ने ‘अपने को दूजे का स्वामी बताता है’ कहकर मनुष्य के किस गुण पर व्यंग्य किया है?
उत्तर:
कवि ने ‘अपने को दूजे का स्वामी बताता है’ कहकर मनुष्य की अहंकारी, वर्चस्ववादी और स्वार्थी प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है। यह दर्शाता है कि मनुष्य अपनी क्षुद्रता के बावजूद दूसरों पर अधिकार जताना चाहता है, उन्हें अपने से कमतर समझता है, और उन पर नियंत्रण करने की इच्छा रखता है । यह गुण उसके भीतर के अहंकार और संकीर्णता को दर्शाता है।
प्रश्न 5.
कविता के अंतिम वाक्य ‘एक कमरे में, दो दुनिया रचाता है’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
इस अंतिम वाक्य का आशय मनुष्य की आत्म- केंद्रीयता और अंधी संकीर्णता पर गहरा व्यंग्य है। कवि कहता है कि देशों के बीच विभाजन की तो बात ही क्या, मनुष्य अपनी विभाजनकारी सोच के कारण एक छोटे से कमरे जैसे सीमित स्थान में भी दो दुनिया बना लेता है।
ये दो दुनिया हैं: एक उसकी यथार्थ की दुनिया, जहाँ वह अत्यंत सूक्ष्म और नगण्य है; और दूसरी उसकी काल्पनिक दुनिया, जिसे उसने अपने अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास से निर्मित किया है। इस दूसरी दुनिया में वह खुद को श्रेष्ठ मानता है, दूसरों को परायां समझता है और स्वयं को विशाल ब्रह्मांड से काट लेता है। यह मनुष्य की मानसिक गुलामी का दर्शाता है।
Class 8 Hindi Chapter 9 Extra Questions for Practice
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
‘संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है’ का क्या अर्थ है?
(क) बहुत सी इमारतें बनाना
(ख) अनगिनत शब्दों से अलगाव पैदा करना
(ग) शब्दों से चित्र बनाना
(घ) शब्दों का उपयोग कर दीवारें तोड़ना
प्रश्न 2.
इस काव्यांश में कवि मनुष्य के किस गुण पर व्यंग्य कर रहा है?
(क) उसकी उदारता पर
(ख) उसकी विनम्रता पर
(ग) उसकी संकीर्णता और अहंकार पर
(घ) उसकी बुद्धिमता पर
प्रश्न 3.
नगर किसमें स्थित है ?
(क) देश में
(ख) प्रदेश में
(ग) पृथ्वी पर
(घ) मुहल्ले में
प्रश्न 4.
‘पृथ्वी एक छोटी’ का क्या अर्थ है ?
(क) पृथ्वी पर छोटे लोग रहते हैं।
(ख) पृथ्वी आकार में बहुत बड़ी है ।
(ग) ब्रह्मांड के संदर्भ में पृथ्वी बहुत छोटी है।
(घ) पृथ्वी का कोई महत्व नहीं है।
प्रश्न 5.
नभ गंगा किसकी परिधि में है ?
(क) पृथ्वी की
(ख) अनगिन नक्षत्रों की
(ग) ब्रह्मांड की
(घ) करोड़ों पृथ्वियों की
प्रश्न 6.
इस कविता का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(क) शहरों का वर्णन करना
(ख) ब्रह्मांड की विशालता और मानव की लघुता दिखाना
(ग) विभिन्न देशों के बारे में बताना
(घ) खगोल विज्ञान की जानकारी देना
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अति लघूत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
कवि ने मनुष्य के भौतिक अस्तित्व को किस प्रकार दर्शाया है?
प्रश्न 2.
पृथ्वी किसमें से एक छोटी है?
प्रश्न 3.
मनुष्य में कौन-सी नकारात्मक भावनाएँ लीन रहती हैं?
प्रश्न 4.
कवि के अनुसार, मनुष्य एक कमरे में कितनी दुनिया रचाता है?
लघूत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
कविता में किस प्रकार का अनुपात दर्शाया गया है ?
प्रश्न 2.
‘पृथ्वी एक छोटी’ कहकर कवि क्या संदेश देना चाहता है?
प्रश्न 3.
नभ गंगा का उल्लेख कविता में किस संदर्भ में किया गया है?
प्रश्न 4.
‘कितनी ही पृथ्वियाँ’ पंक्ति का क्या अर्थ है ?
प्रश्न 5.
यह कविता मनुष्य को उसकी स्थिति के बारे में क्या सोचने पर विवश करती है ?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
‘आदमी का अनुपात’ कविता के दूसरे भाग में कवि ने मनुष्य के अस्तित्व को ब्रह्मांड के विराट स्वरूप से किस प्रकार संबंधित किया है? विस्तार से विश्लेषण करें।
प्रश्न 2.
कविता ‘आदमी का अनुपात’ में निहित दार्शनिक विचारों पर प्रकाश डालिए ।
प्रश्न 3.
‘आदमी का अनुपात’ कविता के केंद्रीय भाव को विस्तार से समझाइए |
प्रश्न 4.
‘आदमी का अनुपात’ कविता हमें क्या संदेश देती है? स्पष्ट कीजिए।