Reading Class 8 Hindi Notes Malhar Chapter 1 स्वदेश कविता Summary in Hindi Explanation helps students understand the main plot quickly.
स्वदेश कविता Class 8 Summary in Hindi
स्वदेश Class 8 Hindi Summary
स्वदेश कविता का सारांश – स्वदेश Class 8 Summary in Hindi
कविता ‘स्वदेश’ में कवि गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ ने अत्यंत प्रभावशाली रूप में देशभक्ति, कर्तव्य और साहस का संदेश दिया है। वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि जिस व्यक्ति के हृदय में अपने देश के लिए सच्चा प्रेम नहीं है, उसका जीवन निष्प्राण है। उसका हृदय नहीं बल्कि पत्थर है। इसी तरह से यदि किसी व्यक्ति में जोश, उत्साह और कर्तव्य – भावना नहीं है, तो उसका जीवन निरर्थक है। जो मनुष्य अपने राष्ट्र और समाज के साथ नहीं चलता, वह संसार से कट जाता है। ऐसा व्यक्ति न स्वयं आगे बढ़ सकता है और न ही समाज को आगे ले जा सकता है।
कवि उस व्यक्ति की आलोचना करते हैं, जो साहसहीन है। साहसहीन कभी उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकता। वे आगे कहते हैं कि जो अपने स्वदेश, यानी अपने देश की सेवा नहीं कर सकता, उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता।
एक सच्चा देशभक्त वही होता है, जो समर्पण और बलिदान की भावना से कार्य करता है । कवि देश को मातृभूमि के रूप में देखते हैं। जिसकी मिट्टी में हम जन्मे हैं, पले-बढ़े हैं और जिससे हमें जीवन की सारी आवश्यकताएँ प्राप्त हुई हैं, उस देश की तुलना उन्होंने माँ से की है और कहा है कि इस भूमि के लिए यदि किसी का हृदय नहीं पिघलता, तो वह वास्तव में मानव कहलाने योग्य नहीं है ।
कविता के अंतिम हिस्से में कवि यह कहते हैं कि जब शत्रु सामने आता है, तो उसे देखकर डरना नहीं चाहिए। हमें वीरता, साहस और एकता के साथ उसका सामना करना चाहिए । कवि इस बात पर जोर देते हैं कि हमारे पास बल, हथियार और सबसे बड़ी बात-आत्मबल है। हमें केवल जागरूक और संगठित होकर अपने देश की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए ।

स्वदेश कविता हिंदी भावार्थ Pdf Class 8
स्वदेश सप्रसंग व्याख्या
1. वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।
जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं ।
जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं।।
जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुँच सकेगा पार नहीं ।
जिससे न जाति – उद्धार हुआ,
होगा उसका उद्धार नहीं ।।
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रस – धार नहीं ।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।। (पृष्ठ सं०-1)
शब्दार्थ :
पत्थर – रसहीन, जिसमें भावना न हो ।
स्वदेश – अपना देश ।
प्यार – प्रेम, स्नेह ।
जोश – उत्साह, ऊर्जा।
सार – महत्व, मूल्य।
संसार – संग-दुनिया के साथ, समाज के साथ।
साहस – हिम्मत, वीरता ।
पार – पार जाना, लक्ष्य तक पहुँचना ।
जाति – उद्धार – समाज या देश का कल्याण।
भावों – भावनाएँ, मन की संवेदनाएँ ।
रस – धार – भावनाओं का बहाव, मिठास ।
प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ द्वारा रचित कविता ‘स्वदेश’ से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि ने उस व्यक्ति के हृदय को पत्थर के समान बताया है, जिसमें अपने देश के प्रति प्रेम नहीं है। साथ-साथ कवि उत्साहहीन जीवन को निरर्थक बताया है।
व्याख्याः कवि कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अपने देश के प्रति प्रेम, अनुराग और सम्मान का भाव नहीं है, उसका हृदय वास्तव में हृदय नहीं बल्कि एक पत्थर का टुकड़ा मात्र है। ऐसा जीवन, जिसमें देश के लिए कोई जोश, उत्साह या बलिदान की भावना जागृत नहीं होती, वैसा जीवन व्यर्थ है, उसमें कोई मूल्य या सार्थकता नहीं है।
कवि आगे कहते हैं कि जो व्यक्ति समाज और संसार के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकता, जो अपने आस-पास की परिस्थितियों और लोगों से सामंजस्य नहीं बैठा सकता, उसका अपना कोई नहीं होता ।
जिसने जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस का त्याग कर दिया है, वह कभी भी जीवन की कठिनाइयों को पार करके अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाएगा।
कवि यह भी कहते हैं कि जिस व्यक्ति के कर्मों से उसकी जाति (समुदाय / राष्ट्र) का उद्धार नहीं हुआ, यानी जिसने अपने समाज या देश के उत्थान में कोई योगदान नहीं दिया, उसका स्वयं का भी कभी उद्धार नहीं हो सकता । कवि पुनः दोहराते हैं कि जिस हृदय में भावनाएँ नहीं हैं, जिसमें प्रेम और करुणा की कोई धारा नहीं बहती, वह हृदय वास्तव में पत्थर के समान है, क्योंकि उसमें अपने देश के प्रति सच्चा प्यार विद्यमान नहीं है।

2. जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
हैं माता-पिता बंधु जिसमें,
हम हैं जिसके राजा-रानी।।
जिसने कि खज़ाने खोले हैं,
नव रत्न दिए हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी ।।
उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू का भार नहीं ।
निश्चित है निस्संशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को।
है काल- दीप जलता हरदम,
जल जाना है परवानों को।।
सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या तोप नहीं तलवार नहीं ।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं । । (पृष्ठ सं०-2)
शब्दार्थ :
मिट्टी – भूमि, जन्मभूमि ।
दाना-पानी – अन्न और जल, जीवन का साधन ।
बंधु – रिश्तेदार, भाई-बहन ।
खज़ाना – धन, संपत्ति ।
लासानी – अनुपम, जिसकी कोई तुलना न हो।
ज्ञानी – बुद्धिमान व्यक्ति ।
पसीजा – पिघला, दया आई।
भू का भार – धरती पर बोझ।
निस्संशय – बिना संदेह के ।
परवाना – दीवाना, अपने लक्ष्य पर मर मिटने वाला ।
तोप – तलवार – हथियार, शक्ति के प्रतीक ।
प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ द्वारा रचित कविता ‘स्वदेश’ से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि ने उस भूमि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है, जिसने हमें जीवन दिया और उससे प्रेम न करने वाले को धरती पर बोझ बताया है, साथ ही देश के लिए कर्म करने की प्रेरणा दी है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि हम सब इसी मिट्टी में पैदा हुए, पले-बढ़े तथा अन्न-जल प्राप्त किए अर्थात हमें जीवन मिला। इसी भूमि पर हमारे माता-पिता, भाई-बंधु रहते हैं और हम सब भारतीय इसके राजकुमार – राजकुमारी के समान हैं, यानी हम उसके गौरव और भविष्य हैं।
कवि आगे कहते हैं कि इस देश ने हमारे लिए अपने अनमोल खजाने खोल दिए हैं, उसने हमें अनेक अनुपम और अतुलनीय रत्न (संसाधन, ज्ञान, संस्कृति आदि) प्रदान किए हैं। यह वह भूमि है जिस पर लोग अपना जीवन न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं और जिस पर पूरी दुनिया मोहित है, यानी हमारी यह मातृभूमि अत्यधिक गौरवशाली और पूजनीय है।
जो व्यक्ति ऐसी महान भूमि के प्रति श्रद्धा नहीं रखता, उस पर विश्वास नहीं करता या उसका सम्मान नहीं करता, कवि प्रश्न करते हैं कि क्या वह धरती पर एक बोझ के समान नहीं है ? निश्चित रूप से वह धरती पर बोझ ही है । कवि समझाते हैं कि यह निश्चित है और इसमें कोई संदेह नहीं कि एक दिन सभी को मरना है, जीवन क्षणभंगुर है।
काल (समय) रूपी दीपक हमेशा जल रहा है और हम सभी (मनुष्य) परवानों (पतंगों) की तरह हैं, जिन्हें एक दिन उस पर जल जाना है अर्थात हमारी मृत्यु निश्चित है। इसलिए जब तक जीवन है, हमें सार्थक कर्म करने चाहिए । कवि प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि सब कुछ हमारे अपने हाथों में है, हमारे पास आत्मबल, साहस और क्षमता है।
क्या हमारे पास तोपें और तलवारें नहीं हैं ? (इसका प्रतीकात्मक अर्थ है—हमारे पास देश की रक्षा और प्रगति के लिए आवश्यक सामर्थ्य है ।) अंत में कवि पुनः अपनी बात दोहराते हैं कि वह हृदय पत्थर के समान है, जिसमें अपने देश के प्रति प्रेम का भाव नहीं है।